Saturday, 17 June 2017

लद्दाख.. यानि ठण्डे मरुस्थल का सफर...

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इस आठ जून की सुबह को जब हमारे कदम लद्दाख के रिनपोछे हवाई अड्डे पर पड़े तो हम दिल्ली के साथ-साथ उसकी गर्मी को भी पीछे छोड़ ही चुके थे। यहीं नहीं, राजधानी की चौड़ी सपाट सड़को को, दोनों तरफ दिखती सीमेंट की इमारतों को और सड़को पर दौड़ते वाहनों से उठते धुंए को भी बहुत पीछे छोड़ आए थ। सामने थे कत्थई पहाड़ और उन पर अठखेलियां करते बादल, बलखाती पगडंडीनुमा सड़कें और शांत, सुरम्य वातावरण।  


जैसा कि निर्देशित था, पहले दिन होटल में आराम करने और स्थानीय बाज़ार की सैर करने के बाद दूसरे दिन जब हम घूमने निकले तो हमारा पहला पड़ाव था लामायुरू मॉनेस्ट्री। जो लेह से लगभग 120 किमी दूरी पर, लेह-श्रीनगर हाइवे पर स्थित है। यह राष्ट्रीय राजमार्ग एक (NH-1) है। बलखाती सड़क के एक तरफ सुनहरे, पीले और भूरे पहाड़ों के दर्शन हो रहे थे तो दूसरी तरफ थी बलखाती सिन्धु (Indus) नदी। जहां सूरज की रौशनी पड़ रही थी वहां से उजले, जहां छाया थी वहां से धुंधले और चोटियों पर धवल छटा.. पहाड़ों के इतने रंग थे मानों किसी चित्रकार की बनाई तस्वीर हो।

सिन्धु और झंस्कार नदी का संगम
हम दोनों तरफ के सुंदर नज़ारों का आनंद लेते हुए सफर कर रहे थे कि ड्राइवर ने लेह से लगभग 30 किलोमीटर दूरी पर गाड़ी रोककर हमें उतरने को कहा। गाड़ी से उतरकर नीचे घाटी की तरफ झांका तो नज़ारा दर्शनीय था। दो अलग-अलग नदियों का संगम। नीचे सिन्धु नदी और झंस्कार (Zanskar) नदी मिलते हुए साफ दिख रहीं थीं।  इन दोनों नदियों के जल का रंग भी बिल्कुल अलग था और फ़ितरत भी। एक नदीं बिल्कुल शांत थी तो दूसरी अविकल बहती.. वाचाल, चंचल...। 

मूनलैंड पहाडियां
लेह से लगभग 100 किमी पहले राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या एक पर एक छोटा सा गांव पड़ता है लामायुरू। यहीं पर स्थित हैं मूनलैंड पहाड़ियां। इन पहाड़ियों की विशेषता यह हैं कि इनकी संरचना बिल्कुल चांद पर पाई जाने वाली पहाड़ियों जैसी हैं। यहां का तापमान भी काफी कम रहता है। 



यहीं मूनलैंड पहाड़ियों से कुछ किलोमीटर आगे लेह की सबसे पुरानी मॉनेस्ट्री है- लामायुरू मॉनेस्ट्री। पहाड़ी पर बसी यह गोम्पा मॉनेस्ट्री बेहद शांत, सादगीपूर्ण और खूबसूरत हैं जहां से पूरे गांव का नज़ारा लिया जा सकता है। लामायुरू में हर साल दो बार लेह के प्रसिद्ध मास्क फेस्टिवल्स आयोजित किए जाते हैं। कहते हैं कि यह मॉनेस्ट्री लगभग 400  बुद्ध सन्यासियों का घर रही है। 


इस मॉनेस्ट्री में शाक्यमुनि बुद्ध की वृहद् मूर्ति हैं। दोनों तरफ की दीवारों में छत तक ऊंची लकड़ी और शीशे की अल्मारियों में लाल और सुनहरे कपड़ों में लिपटे धार्मिक ग्रंथ रखे हुए हैं। 


यहां आने के लिए 15 साल से ऊपर के लोगों का 50 रुपए का टिकिट तो लगता है लेकिन परेशानी यह हैं कि  यहां आपको इस मॉनेस्ट्री, यहां की संस्कृति और तमाम धार्मिक दस्तावेज़ो वगैरह के बारे में विस्तार से बताने वाला कोई गाइड उपलब्ध नहीं है। जानकारी के नाम पर केवल एक साइन बोर्ड इस मॉनेस्ट्री के दरवाज़े पर लगा हुआ है। अगर आप बुद्ध धर्म से सम्बन्ध नहीं रखते तो आपको इस प्राचीन मॉनेस्ट्री की विशेषता या धार्मिक महत्व का अंदाज़ा शायद ना हो पाए लेकिन फ़िर भी एक पर्यटक के तौर पर आप यहां की दीवारों पर की गई रंग-बिरंगी खूबसरत चित्रकारी और चटकीली साज सज्जा का आनंद उठा सकते हैं। यहां के माहौल में बसी शांति और पवित्रता को महसूस कर सकते हैं जो आपको किसी दूसरी ही दुनिया में आने का अहसास कराती है। यहां की अलीची मॉनेस्ट्री भी काफी प्रसिद्ध है। 

खरदूंगला के रास्ते पर
 लद्दाख शब्द में ला (La) का मतलब होता है पास यानि रास्ता और दाख (Dakh) का मतलब होता है भूमि। लद्दाख, ऊंचे पासेज यानि ऊंचे रास्तों की भूमि को कहा जाता है। तो 10 जून को हमारा पड़ाव था, लेह से चालीस किलोमीटर सड़क दूरी पर स्थित विश्व का सबसे ऊंचा मोटरेबल पास- 'खरदूंगला'। समुद्र तल से 18,380 किमी ऊंचाई पर स्थित इस पास पर पहुंचना किसी एडवेंचर से कम नहीं है। लगभग 15,000 फीट तक बंजर पहाड़ मिलते हैं और फ़िर शुरू होती हैं कहीं-कहीं सफेद बर्फ से ढकी पहाड़ियां। 17.00 फीट की ऊंचाई तक पहुंचते-पहुंचते आपको हर तरफ हिमआच्छादित, शुभ्र वर्ण के पर्वत दिखने लगते हैं। हिमपात यहां आम है। बर्फीला तूफान या भूस्खलन कभी भी हो सकता है। सड़के संकरी तो हैं ही साथ ही फिसलन भरी हुई भी। यहां पर ऑक्सीजन का स्तर भी काफी कम है। लेकिन अगर आप अपने साथ एक ऑक्सीजन सिलेंडर लेकर चले हैं और जोखिम उठाने को तैयार होकर आए हैं तो इस रास्ते और मंज़िल का भरपूर आनंद उठाया जा सकता है। 




खरदूंगला शिखर पर पहुंचना एक अलग आनंद का अहसास कराता है। हर तरफ बर्फ की सफेद चादर, अगर रंग हैं तो बस, आपके कपड़ों, गाडियों, साइन बोर्ड्स और यहां जगह-जगह पर लगे पवित्र रंगीन बंदनवारों का रंग। किसी की तबीयत खराब होने की स्थिति में आप यहां स्थित आर्मी की डिस्पेन्सरी में जा कर चिकित्सकीय सहायता ले सकते हैं। यहां विश्व का सबसे ऊंचा कैफेटेरिया भी है जहां हमने चाय, मैगी और मोमोज़ का स्वाद लिया। खरदूंगला के माइनस 10 डिग्री तापमान में चौबीसों घंटे यहां रहने वाले फौजियों के आराध्य हैं भगवान शिव, जिनका यहां एक छोटा सा मंदिर भी है। 


पैंगगॉन्ग झील
लद्दाख का सबसे मनोरम स्थल है समुद्र तल से 14,270 फीट की ऊंचाई पर स्थित पैन्गॉन्ग सो (Pangong Tso) झील। तिब्बती भाषा के इस नाम का मतलब होता है "हाई ग्रासलैंड झील"। लेह से डेढ़ सौ किमी दूर स्थित इस सुंदर झील तक पहुंचने के लिए लगभग 5 घंटे का सफर तय करना पड़ता है। रास्ते में पड़ता है लद्दाख का तीसरा सबसे ऊंचा पास 'चांगला'। चांगला तक ऊपर बर्फीले पहाड़ चढ़ने के बाद जब हम नीचे उतरते हैं तो रास्ता बंजर पहाड़ों और पथरीली भूमि से भरा हुआ है। यहां आर्मी का बेस कैम्प भी है। जगह-जगह आर्मी के बकंर्स नज़र आते हैं। चूंकि यह झील भारत-चीन की एक्चुअल लाइन ऑफ कंट्रोल पर है, यहां तक पहुंचने के लिए आपको इनर लाइन परमिट (ILP) लेने की ज़रूरत होती है। 140 किमी लम्बी इस झील का 40 किमी हिस्सा भारत में पड़ता है और बाकी 100 किमी चीन में। रास्ता लम्बा ज़रूर है लेकिन बोरिंग बिल्कुल नहीं। शे और ग्या जैसे गांवो से गुज़रकर और पागल नाला पार करके जब हम इस झील तक पहुंचते हैं, तो यकीन मानिए सारी थकान इसकी एक झलक से ही मिट जाती है। इस झील पर प्रकृति ने जमकर खूबसूरती लुटाई है। पानी का रंग नीला है, बिल्कुल फिल्मों में दिखने वाली झीलों की तरह; वातावरण नि:शब्द है और सुंदरता, बेदाग।  



मैंने अभी कहा था ना कि पैन्गॉन्ग लेक का रास्ता लम्बा ज़रूर है लेकिन बोरिंग बिल्कुल नहीं। लम्बे सफर की उदासीनता को मिटाने का काम प्राकृतिक सुन्दरता ही नहीं करती बल्कि रास्ते पर जगह-जगह लगे बॉर्डर रोड ऑर्गनाइजेशन के रोड साइन्स की भी इसमें अहम् भूमिका है। लद्दाख, मिलिट्री के हिसाब से काफी संवेदनशीन इलाका है क्योंकि यह सियाचिन, कारगिल और द्रास इलाकों को जोड़ता हैं। यहां ठंडे, सख्त, फौलादी पहाड़ों को काटकर उसमें से सड़के निकालने का काम करती है बॉर्डर रोड ऑर्गनाइजेशन (बीआरओ)। बर्फीली, बलखाती सड़कों पर यात्रियों की सुरक्षा के मद्देनज़र बीआरओ के चेतावनी बोर्ड लगे हैं जिनको पढ़ने का अपना अलग मज़ा हैं। इनमें फनी वनलाइनर्स लिखे गए हैं जो आपको सुरक्षित चलने का अहसास दिलाने के साथ-साथ आपके होंठों पर मुस्कुराट भी लाते हैं।


शांति स्तूप
प्राकृतिक दर्शनीय स्थानों और प्राचीन मॉनेस्ट्रीज़ के अलावा लद्दाख में कुछ कदरन आधुनिक मानव निर्मित स्थल भी हैं, जिनमें प्रमुख हैं पूरे विश्व को शांति का संदेश देता शांति स्तूप और मिलिट्री द्वारा बनाया गया सेना प्रदर्शनी स्थल, हॉल ऑफ फेम। 

हॉल ऑफ फेम
  यहां सेना के उपकरणों, परिधानों और विभिन्न सैन्य अभियानों की ऐतिहासिक तस्वीरों को लोगों के लिए प्रदर्शित किया गया है। यहां आकर आपको अपनी सेना के कठिन परिश्रम और अदम्य साहस के बारे में पता चलता है, गर्व का अहसास होता हैं। 


यहां की सबसे अमूल्य धरोहर है राजपूताना राइफल्स के युवा कैप्टन विजयंत थापर द्वारा कारगिल युद्ध में शहीद होने से पूर्व अपने पिता को लिखा गया पत्र। कैप्टन विजयंत केवल 22 साल की छोटी सी उम्र में शहीद हो गए थे। उनके इस पत्र के साथ ही उनके पिता का जवाब भी संलग्न है। इसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता, इसे पढ़कर ही आप इसके भावों के महसूस कर सकते हैं। यहां कुछ पाकिस्तानी सैनिकों से मिले पत्र भी हैं जो उन्होंने अपने परिवारजनों को लिखे थे। अगर यहां जाएं तो उन्हें भी ज़रूर पढ़ें।



बाकी अगर आप लद्दाख जा रहे हैं तो लेह पैलेस देखें, मैग्नेटिक हिल देखें, ड्रुक पद्मा स्कूल या रैंचो स्कूल देखें जहां थ्री इडियट्स फिल्म की शूटिंग हुई थी। यहां का वुड अवन पिट्ज़ा और स्थानीय पकवान थुप्का ज़रूर खाएं। ढेर सारे गर्म कपड़े, खूब सारा समय और बहुत सारा साहस लेकर जाईए। मिलिट्री के लोगों से मिलिए, हिमआच्छादित शैलमालाओं को निहारिए...। 

लद्दाख के ठंडे मरुस्थल का सफर आपको प्रकृति की ताकत का भी अहसास दिलाएगा, विविधता का भी और प्रकृति द्वारा निर्मित मानवों की इच्छा शक्ति का भी जो इन बंजर पहाड़ों को छूने और महसूस करने की तमन्ना में यहां तक आते हैं और बहुत सी अच्छी यादें साथ ले जाते हैं। 
'जुले'