Saturday, 17 June 2017

लद्दाख.. यानि ठण्डे मरुस्थल का सफर...

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इस आठ जून की सुबह को जब हमारे कदम लद्दाख के रिनपोछे हवाई अड्डे पर पड़े तो हम दिल्ली के साथ-साथ उसकी गर्मी को भी पीछे छोड़ ही चुके थे। यहीं नहीं, राजधानी की चौड़ी सपाट सड़को को, दोनों तरफ दिखती सीमेंट की इमारतों को और सड़को पर दौड़ते वाहनों से उठते धुंए को भी बहुत पीछे छोड़ आए थ। सामने थे कत्थई पहाड़ और उन पर अठखेलियां करते बादल, बलखाती पगडंडीनुमा सड़कें और शांत, सुरम्य वातावरण।  


जैसा कि निर्देशित था, पहले दिन होटल में आराम करने और स्थानीय बाज़ार की सैर करने के बाद दूसरे दिन जब हम घूमने निकले तो हमारा पहला पड़ाव था लामायुरू मॉनेस्ट्री। जो लेह से लगभग 120 किमी दूरी पर, लेह-श्रीनगर हाइवे पर स्थित है। यह राष्ट्रीय राजमार्ग एक (NH-1) है। बलखाती सड़क के एक तरफ सुनहरे, पीले और भूरे पहाड़ों के दर्शन हो रहे थे तो दूसरी तरफ थी बलखाती सिन्धु (Indus) नदी। जहां सूरज की रौशनी पड़ रही थी वहां से उजले, जहां छाया थी वहां से धुंधले और चोटियों पर धवल छटा.. पहाड़ों के इतने रंग थे मानों किसी चित्रकार की बनाई तस्वीर हो।

सिन्धु और झंस्कार नदी का संगम
हम दोनों तरफ के सुंदर नज़ारों का आनंद लेते हुए सफर कर रहे थे कि ड्राइवर ने लेह से लगभग 30 किलोमीटर दूरी पर गाड़ी रोककर हमें उतरने को कहा। गाड़ी से उतरकर नीचे घाटी की तरफ झांका तो नज़ारा दर्शनीय था। दो अलग-अलग नदियों का संगम। नीचे सिन्धु नदी और झंस्कार (Zanskar) नदी मिलते हुए साफ दिख रहीं थीं।  इन दोनों नदियों के जल का रंग भी बिल्कुल अलग था और फ़ितरत भी। एक नदीं बिल्कुल शांत थी तो दूसरी अविकल बहती.. वाचाल, चंचल...। 

मूनलैंड पहाडियां
लेह से लगभग 100 किमी पहले राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या एक पर एक छोटा सा गांव पड़ता है लामायुरू। यहीं पर स्थित हैं मूनलैंड पहाड़ियां। इन पहाड़ियों की विशेषता यह हैं कि इनकी संरचना बिल्कुल चांद पर पाई जाने वाली पहाड़ियों जैसी हैं। यहां का तापमान भी काफी कम रहता है। 



यहीं मूनलैंड पहाड़ियों से कुछ किलोमीटर आगे लेह की सबसे पुरानी मॉनेस्ट्री है- लामायुरू मॉनेस्ट्री। पहाड़ी पर बसी यह गोम्पा मॉनेस्ट्री बेहद शांत, सादगीपूर्ण और खूबसूरत हैं जहां से पूरे गांव का नज़ारा लिया जा सकता है। लामायुरू में हर साल दो बार लेह के प्रसिद्ध मास्क फेस्टिवल्स आयोजित किए जाते हैं। कहते हैं कि यह मॉनेस्ट्री लगभग 400  बुद्ध सन्यासियों का घर रही है। 


इस मॉनेस्ट्री में शाक्यमुनि बुद्ध की वृहद् मूर्ति हैं। दोनों तरफ की दीवारों में छत तक ऊंची लकड़ी और शीशे की अल्मारियों में लाल और सुनहरे कपड़ों में लिपटे धार्मिक ग्रंथ रखे हुए हैं। 


यहां आने के लिए 15 साल से ऊपर के लोगों का 50 रुपए का टिकिट तो लगता है लेकिन परेशानी यह हैं कि  यहां आपको इस मॉनेस्ट्री, यहां की संस्कृति और तमाम धार्मिक दस्तावेज़ो वगैरह के बारे में विस्तार से बताने वाला कोई गाइड उपलब्ध नहीं है। जानकारी के नाम पर केवल एक साइन बोर्ड इस मॉनेस्ट्री के दरवाज़े पर लगा हुआ है। अगर आप बुद्ध धर्म से सम्बन्ध नहीं रखते तो आपको इस प्राचीन मॉनेस्ट्री की विशेषता या धार्मिक महत्व का अंदाज़ा शायद ना हो पाए लेकिन फ़िर भी एक पर्यटक के तौर पर आप यहां की दीवारों पर की गई रंग-बिरंगी खूबसरत चित्रकारी और चटकीली साज सज्जा का आनंद उठा सकते हैं। यहां के माहौल में बसी शांति और पवित्रता को महसूस कर सकते हैं जो आपको किसी दूसरी ही दुनिया में आने का अहसास कराती है। यहां की अलीची मॉनेस्ट्री भी काफी प्रसिद्ध है। 

खरदूंगला के रास्ते पर
 लद्दाख शब्द में ला (La) का मतलब होता है पास यानि रास्ता और दाख (Dakh) का मतलब होता है भूमि। लद्दाख, ऊंचे पासेज यानि ऊंचे रास्तों की भूमि को कहा जाता है। तो 10 जून को हमारा पड़ाव था, लेह से चालीस किलोमीटर सड़क दूरी पर स्थित विश्व का सबसे ऊंचा मोटरेबल पास- 'खरदूंगला'। समुद्र तल से 18,380 किमी ऊंचाई पर स्थित इस पास पर पहुंचना किसी एडवेंचर से कम नहीं है। लगभग 15,000 फीट तक बंजर पहाड़ मिलते हैं और फ़िर शुरू होती हैं कहीं-कहीं सफेद बर्फ से ढकी पहाड़ियां। 17.00 फीट की ऊंचाई तक पहुंचते-पहुंचते आपको हर तरफ हिमआच्छादित, शुभ्र वर्ण के पर्वत दिखने लगते हैं। हिमपात यहां आम है। बर्फीला तूफान या भूस्खलन कभी भी हो सकता है। सड़के संकरी तो हैं ही साथ ही फिसलन भरी हुई भी। यहां पर ऑक्सीजन का स्तर भी काफी कम है। लेकिन अगर आप अपने साथ एक ऑक्सीजन सिलेंडर लेकर चले हैं और जोखिम उठाने को तैयार होकर आए हैं तो इस रास्ते और मंज़िल का भरपूर आनंद उठाया जा सकता है। 




खरदूंगला शिखर पर पहुंचना एक अलग आनंद का अहसास कराता है। हर तरफ बर्फ की सफेद चादर, अगर रंग हैं तो बस, आपके कपड़ों, गाडियों, साइन बोर्ड्स और यहां जगह-जगह पर लगे पवित्र रंगीन बंदनवारों का रंग। किसी की तबीयत खराब होने की स्थिति में आप यहां स्थित आर्मी की डिस्पेन्सरी में जा कर चिकित्सकीय सहायता ले सकते हैं। यहां विश्व का सबसे ऊंचा कैफेटेरिया भी है जहां हमने चाय, मैगी और मोमोज़ का स्वाद लिया। खरदूंगला के माइनस 10 डिग्री तापमान में चौबीसों घंटे यहां रहने वाले फौजियों के आराध्य हैं भगवान शिव, जिनका यहां एक छोटा सा मंदिर भी है। 


पैंगगॉन्ग झील
लद्दाख का सबसे मनोरम स्थल है समुद्र तल से 14,270 फीट की ऊंचाई पर स्थित पैन्गॉन्ग सो (Pangong Tso) झील। तिब्बती भाषा के इस नाम का मतलब होता है "हाई ग्रासलैंड झील"। लेह से डेढ़ सौ किमी दूर स्थित इस सुंदर झील तक पहुंचने के लिए लगभग 5 घंटे का सफर तय करना पड़ता है। रास्ते में पड़ता है लद्दाख का तीसरा सबसे ऊंचा पास 'चांगला'। चांगला तक ऊपर बर्फीले पहाड़ चढ़ने के बाद जब हम नीचे उतरते हैं तो रास्ता बंजर पहाड़ों और पथरीली भूमि से भरा हुआ है। यहां आर्मी का बेस कैम्प भी है। जगह-जगह आर्मी के बकंर्स नज़र आते हैं। चूंकि यह झील भारत-चीन की एक्चुअल लाइन ऑफ कंट्रोल पर है, यहां तक पहुंचने के लिए आपको इनर लाइन परमिट (ILP) लेने की ज़रूरत होती है। 140 किमी लम्बी इस झील का 40 किमी हिस्सा भारत में पड़ता है और बाकी 100 किमी चीन में। रास्ता लम्बा ज़रूर है लेकिन बोरिंग बिल्कुल नहीं। शे और ग्या जैसे गांवो से गुज़रकर और पागल नाला पार करके जब हम इस झील तक पहुंचते हैं, तो यकीन मानिए सारी थकान इसकी एक झलक से ही मिट जाती है। इस झील पर प्रकृति ने जमकर खूबसूरती लुटाई है। पानी का रंग नीला है, बिल्कुल फिल्मों में दिखने वाली झीलों की तरह; वातावरण नि:शब्द है और सुंदरता, बेदाग।  



मैंने अभी कहा था ना कि पैन्गॉन्ग लेक का रास्ता लम्बा ज़रूर है लेकिन बोरिंग बिल्कुल नहीं। लम्बे सफर की उदासीनता को मिटाने का काम प्राकृतिक सुन्दरता ही नहीं करती बल्कि रास्ते पर जगह-जगह लगे बॉर्डर रोड ऑर्गनाइजेशन के रोड साइन्स की भी इसमें अहम् भूमिका है। लद्दाख, मिलिट्री के हिसाब से काफी संवेदनशीन इलाका है क्योंकि यह सियाचिन, कारगिल और द्रास इलाकों को जोड़ता हैं। यहां ठंडे, सख्त, फौलादी पहाड़ों को काटकर उसमें से सड़के निकालने का काम करती है बॉर्डर रोड ऑर्गनाइजेशन (बीआरओ)। बर्फीली, बलखाती सड़कों पर यात्रियों की सुरक्षा के मद्देनज़र बीआरओ के चेतावनी बोर्ड लगे हैं जिनको पढ़ने का अपना अलग मज़ा हैं। इनमें फनी वनलाइनर्स लिखे गए हैं जो आपको सुरक्षित चलने का अहसास दिलाने के साथ-साथ आपके होंठों पर मुस्कुराट भी लाते हैं।


शांति स्तूप
प्राकृतिक दर्शनीय स्थानों और प्राचीन मॉनेस्ट्रीज़ के अलावा लद्दाख में कुछ कदरन आधुनिक मानव निर्मित स्थल भी हैं, जिनमें प्रमुख हैं पूरे विश्व को शांति का संदेश देता शांति स्तूप और मिलिट्री द्वारा बनाया गया सेना प्रदर्शनी स्थल, हॉल ऑफ फेम। 

हॉल ऑफ फेम
  यहां सेना के उपकरणों, परिधानों और विभिन्न सैन्य अभियानों की ऐतिहासिक तस्वीरों को लोगों के लिए प्रदर्शित किया गया है। यहां आकर आपको अपनी सेना के कठिन परिश्रम और अदम्य साहस के बारे में पता चलता है, गर्व का अहसास होता हैं। 


यहां की सबसे अमूल्य धरोहर है राजपूताना राइफल्स के युवा कैप्टन विजयंत थापर द्वारा कारगिल युद्ध में शहीद होने से पूर्व अपने पिता को लिखा गया पत्र। कैप्टन विजयंत केवल 22 साल की छोटी सी उम्र में शहीद हो गए थे। उनके इस पत्र के साथ ही उनके पिता का जवाब भी संलग्न है। इसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता, इसे पढ़कर ही आप इसके भावों के महसूस कर सकते हैं। यहां कुछ पाकिस्तानी सैनिकों से मिले पत्र भी हैं जो उन्होंने अपने परिवारजनों को लिखे थे। अगर यहां जाएं तो उन्हें भी ज़रूर पढ़ें।



बाकी अगर आप लद्दाख जा रहे हैं तो लेह पैलेस देखें, मैग्नेटिक हिल देखें, ड्रुक पद्मा स्कूल या रैंचो स्कूल देखें जहां थ्री इडियट्स फिल्म की शूटिंग हुई थी। यहां का वुड अवन पिट्ज़ा और स्थानीय पकवान थुप्का ज़रूर खाएं। ढेर सारे गर्म कपड़े, खूब सारा समय और बहुत सारा साहस लेकर जाईए। मिलिट्री के लोगों से मिलिए, हिमआच्छादित शैलमालाओं को निहारिए...। 

लद्दाख के ठंडे मरुस्थल का सफर आपको प्रकृति की ताकत का भी अहसास दिलाएगा, विविधता का भी और प्रकृति द्वारा निर्मित मानवों की इच्छा शक्ति का भी जो इन बंजर पहाड़ों को छूने और महसूस करने की तमन्ना में यहां तक आते हैं और बहुत सी अच्छी यादें साथ ले जाते हैं। 
'जुले'

Saturday, 13 May 2017

भारत के भविष्य से खिलवाड़ करने वाले असली अपराधी कौन हैं?



भारत देश के बच्चों की पढ़ाई, उन्हें योग्य बनाने से लेकर उनसे कई महत्वपूर्ण प्रवेश परीक्षाएं दिलवाने का काम सीबीएसई करती है। पूरे देश में स्कूलों को मान्यता देना, विभिन्न कक्षाओं के लिए कोर्स निर्धारित करना, स्कूलों के ऑडिट करना, किताबें और स्टडी मैटीरियल तैयार करवाना.. जैसे बहुत से महत्वपूर्ण काम इस एकमात्र संस्था के जिम्मे हैं । साथ ही सीबीएसई दुनिया की सबसे बड़ी एक्ज़ाम्स आयोजित कराने वालीं एकमात्र संस्था है जो पूरे देश के सीबीएसई स्कूलों में दसवीं और बारहवीं की परीक्षाएं आयोजित कराने के अलावा नेट (NET), नीट (NEET), आईआईटी जी (JEE) और सीटेट (CTET) जैसी प्रतियोगी/प्रवेश परीक्षाओं का आयोजन भी कराती है।

 यानि कम शब्दों में कहें तो भारत के बच्चों का भविष्य, पढ़ाई, करियर सबकुछ इस सीबीएसई संस्था के हाथों में हैं जोकि एचआरडी मिनिस्ट्री के अन्तर्गत आती है। यहां सीबीएसई की महिमा का गुणगान यूंही नहीं किया गया है। इसके पीछे कई कारण है। पर पहले आज के दो सबसे ज्वलंत सवालों को देखते हैं:

पहला सवाल- प्राइवेट स्कूलों द्वारा लगातार मनमाने ढंग से बढ़ाई जा रही फीस, एनसीईआरटी की किताबें ना लागू करके प्राइवेट पब्लिशर्स की किताबें लागू करना और उन्हें स्कूल में ही खोली गई दुकानों में  दस-बीस गुने दामों पर बेचा जाना वो भी बिना रसीद दिए.. इन सब के लिए असल में कौन ज़िम्मेदार है?

दूसरा सवाल- बोर्ड परीक्षाओं, प्रतियोगी परीक्षाओं और प्रवेश परीक्षाओं के समय पेपर लीक होने और नकल करवाने के लिए सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी किस की बनती है?

पिछले साल बिहार के सीबीएसई स्कूल टॉपरों का मामला सामने आया था जिन्हें नकल करवाकर टॉपर बनाया गया था। और अब हाल में नीट परीक्षा में नकल करवाने का मामला सामने आया है, जिसमें नकल करवाने वाले गैंग ने उस बक्से का ताला तोड़कर प्रश्नपत्रों की फोटो खींची जो कि सीबीएसई द्वारा बख्तरबंद गाड़ी में विभिन्न सेंटरों पर भेजे जा रहे थे। गैंग चलाने वालों को यह तक पता होता था कि किस रोल नंबर पर कौन से सेट का पेपर आएगा। उस पेपर के हिसाब से उत्तर लिखकर प्रवेश पत्र के ज़रिए अभ्यर्थियों तक पहुंचाए जाते थे और इस तरह नकल का खेल चलता था जिसके लिए एक-एक छात्र से लाखों रुपए वसूले जाते थे।

कभी सीटेट का पेपर लीक होता है, कभी सीबीएसई बोर्ड का। नीट परीक्षाओं में भी जमकर धांधली हो ही रही है।  बहुत ही सुनियोजित और व्यवस्थित तरीके से पेपर लीक करके छात्रों को पास कराने वाला यह गिरोह काम करता है। और उतने ही सुनियोजित तरीके से काम करता है पब्लिक स्कूल माफिया, जो पैरेन्ट्स द्वारा लगातार आवाज़ उठाए जाने के बावजूद और मीडिया तक में इस मामले की चर्चा के बावजूद आजतक अनछुआ है। अभी तक स्कूलों पर कोई कार्यवाई नहीं हुई है।

फीस बढ़ाया जाना बदस्तूर जारी है, पैरेन्ट्स को लूटना बदस्तूर जारी है। एनसीईआरटी की किताबें आजतक सारे सीबीएसई स्कूलों में लागू नहीं हो पाई हैं। क्योंकि अगर लागू हो भी जाती हैं तो वो उपलब्ध नहीं होती। सवाल यह भी हैं कि ऐसा क्यों होता हैं, क्यों एनसीईआरटी की किताबें बिक्री के लिए उपलब्ध नहीं कराई जाती या उन्हें जानबूझ कर कम संख्या में छापा जाता है ताकि स्कूल इनकी अनुपलब्धता का तर्क देकर अपने हिसाब से नए पब्लिशर्स की किताबें लागू कर सकें। और सबसे बड़ी बात क्यों सीबीएसई के सुयोग्य ऑडिटर्स स्कूलों में चल रही वो गड़बड़ियां नहीं देख पाते जो साधारण इंसानों को भी दिखाई दे जाती हैं?

अब आते है असली मुद्दे पर। यहां सीबीएसई की बात क्यों की गई? जब स्कूल मनमाने ढंग से फीस बढ़ाते हैं तो हम उसकी ज़िम्मेदारी स्कूल माफिया पर डाल देते हैं, स्कूल की मैनेजमेंट कमेटियों पर डाल देते हैं जिनके हाथ बहुत लम्बे कहे जाते हैं। वहीं परीक्षाओं में पेपर लीक होने के मामले में, नकल कराए जाने के मामले में हम दोष संबंधित स्कूलों के लोगों, डॉक्टरों, इंजीनियरों, टीचरों और गैंग के लोगों पर मढ़ देते हैं। लेकिन कभी सोचा हैं कि इसके असली दोषी कौन हैं। कौन हैं वो लोग जिनकी वजह से स्कूलों की मनमानी बंद नहीं हो पाती, परीक्षाओं में नकल होती हैं और एनसीईआरटी की किताबें सीबीएसई स्कूलों में लागू नहीं हो पाती। क्यों  सीबीएसई द्वारा कराए जाने वाले रिक्रूटमेन्ट में खुले तौर पर रिश्वतखोरी चलती है?

जब सबसे बड़ी अथॉरिटी सीबीएसई है तो पहला दोष किसका हुआ? पर्चा अगर सीबीएसई से निकलने वाली गाड़ी से लीक हो रहा है तो दोष किसका है ? ज़ाहिर है सीबीएसई का, फ़िर हम कैसे सीबीएसई को इस मामले से पाक साफ छोड़ सकते हैं। अगर धांधली हुई है तो इसमें पूरी तरह से ना सही, कहीं ना कहीं सीबीएसई शामिल है। अगर सीबीएसई से मान्यता पाने वाले पब्लिक स्कूल अपनी मनमानी कर रहे हैं तो इसमें सीबीएसई कैसे बच सकती है। कार्यवाई अगर होनी चाहिए तो सबसे पहले सीबीएसई पर होनी चाहिए। जांच अगर होनी चाहिए तो सबसे पहले शुरूआत सीबीएसई से होनी चाहिए। तभी मामले को सुधारा जा सकता है।

ना तो फीस बढ़ोत्तरी के विरोध में भीड़ जुटाकर डीएम, सीएम के चक्कर काटने से कुछ होगा और ना ही पर्चा लीक गैंग की धड़पकड़ से कुछ हासिल होने वाला है। पुलिस चाहे तो इन मामलों को कुछ समय में निपटा सकती है। बस जांच की शुरूआत सही होनी चाहिए। हाथ सही कल्प्रिट पर जाना चाहिए। जो सीबीएसई है और उसकी सरमाएदार एचआरडी मिनिस्ट्री है, जो प्रकाश जावड़ेकर जी के हाथ में हैं, जो कि मोदी सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं।

और अंत में मुझे पता नहीं क्यों बार-बार मोदी जी द्वारा संसद में दिया गया वो बयान भूलता ही नहीं है कि रेनकोट पहन कर बाथरूम में नहाने की कला कोई डॉक्टर साहब से सीखे....।

Monday, 24 April 2017

बिन दु:ख सब सून



आप मानें या ना मानें, एक समय ऐसा था जब इस धरती पर हर खास-ओ-आम को भगवान बनने का मौका मिलता था। यह वो समय था जब भगवान दूर स्वर्ग में नहीं रहते थे बल्कि यहीं ज़मीन पर विचरण करते थे। तब दरअसल देवलोक, धरतीलोक या पाताललोक जैसी अलग अलग जगहें थी ही नहीं। इसी धरती पर पाताल भी था और आकाश के बादल भी। सब एकसार था, एक साथ था। प्रभु हर इंसान से मिलते थे, उसके दुख-दर्द सुनते थे, तकलीफें दूर करते थे और खुशियों में शरीक होते थे, और साथ ही सबको भगवान बनने का अवसर भी देते थे।

आम लोगों में से ही कईं अपनी किसी खूबी के चलते भगवान बनना चुन लेते थे। जैसे अगर किसी के पास धन-दौलत बहुत ज़्यादा थी, तो वो मनी गॉड बन जाता था। किसी की दुआओं में असर रहा हो तो ब्लैसिंग गॉड, कोई लकी है तो वो गॉड ऑव लक। इसी तरह क्लोथ गॉड, फूड गॉड, वॉटर गॉड, एम्यूज़मेन्ट गॉड जैसे हर तरह के गॉड्स हुआ करते थे।

गॉड बनने का तरीका भी अलग था। साफ-सुथरा, नफासत भरा और पूरी तरह एपॉलिटिकल। दक्षिण दिशा में एक खूबसूरत बादलों का पहाड़ था। स्लेटी और नीले रंग का, जिस पर सूरज की शुभ्र और पावन छाया पड़ा करती थी। इस पहाड़ की चोटी पर था पैराडाइज़ टैम्पल, जिसमें सूरज खुद निवास करता था। जो कोई भी अपनी किसी खूबी के कारण गॉड बनना चाहता था उसे यहां तक पहुंच कर, सूरज की गर्म किरणों को हाथ में लेकर कसम उठानी पड़ती थी कि आज के बाद वो केवल लोगों की खुशी के लिए काम करेगा और जो उसके पास बहुतायत में हैं, उसे ज़रूरतमंदों के साथ बांटेगा।

जिन लोगों के मन सच्चे होते थे, वो बिना किसी बोझ के हवा से भी हल्के हो जाते थे और बहुत आसानी से बादलों का पहाड़ चढ़कर पैराडाइज़ टैम्पल पर पहुंच जाते थे। और क्योंकि उनमें ख्वाहिशों की गर्मी नहीं रह जाती थी बल्कि नेकियों की शीतलता रहती थी, सूरज की ऊष्ण किरणें उन्हें जला नहीं पाती थीं। और वो कसम उठाकर, भगवान बनकर वापस लौट आते थे। लोगों के साथ रहते थे, घूमते थे और उनकी सहायता किया करते थे। वहीं जो लोग गॉड बनना तो चाहते थे लेकिन सांसारिक बंधनों से मुक्त नहीं हो पाते थे वो भारी होने के कारण या तो पहाड़ नहीं चढ़ पाते थे या फ़िर उनमें इतनी शीतलता नहीं रहती थी कि सूरज की किरणों का सामना कर सकें।

गॉड हो या सामान्य लोग सबकी औसत उम्र 400 बरस हुआ करती थी। तब लोग जन्म और मृत्यु के बंधनों से भी मुक्त थे। कोई मरता नहीं था और ना ही कोई जन्म लेता था। बस लोग अपनी उम्र पूरी करने पर स्वर्ग में भेज दिए जाते थे जो वहीं पैराडाइज़ टैम्पल वाले पहाड़ के पश्चिम में उसकी तलहटी में बसा था। यह खूबसूरत लाल, पीले,नीले, सफेद रंगों वाले फूलों की घाटी थी, जिसमें शीतल झरने बहते थे। मंद पवन बहा करती थी। यहां लोगों की सुख सुविधाओं का हर सामान मौजूद था। उम्र पूरी कर लेने पर लोगों को यहां लाया जाता था। यह काम हैवन गॉड के जिम्मे था। स्वर्ग में रहने का औसत समय 100 वर्ष था। हर इंसान स्वर्ग में ही आता था क्योंकि तब पनिशमेंट की अवधारणा नहीं थी। और इसलिए नर्क भी नहीं था। लोगों को जस की तस स्वर्ग में ले आया जाता था। और सौ बरस का स्वर्ग निवास पूरा होने के बाद उन्हें एक नए रूप में वापस धरती पर भेज दिया जाता था, फ़िर से 400 वर्ष का जीवन जीने के लिए। 

शायद आपको विश्वास ना हो लेकिन उस समय लोगों के लिए स्वर्ग का प्रवास ही सबसे दुखद अनुभव होता था। क्योंकि वो सशरीर और यादों के साथ स्वर्ग लाए जाते थे। ऐसे में चूंकि उनकी यादें मिटाई नहीं जाती थी, वो अपने परिवारजनों को बहुत मिस किया करते थे। अच्छी यादें उन्हें स्वर्ग में सभी सुख सुविधाओं के बीच भी चैन से नहीं रहने देती थीं और उन्हें हर समय अपनों की यादें और उनके साथ होने की इच्छाएं सताती थी। लेकिन फ़िर भी कई हज़ार वर्षों तक यहीं प्रबंध आराम से चला। लोग ना मरे, ना पैदा हुए, गॉड्स बनते रहे, स्वर्ग आते रहे, स्वर्ग से जाते रहे और यूहीं समय बीतता रहा।

धीरे-धीरे सारे निवासी खुश हो गए। क्योंकि यहां कहीं कोई  भेदभाव नहीं था। सबकी उम्र लगभग समान थी और सबके दुख दूर करने के लिए बहुत सारे गॉड्स थे और एक समय तो ऐसा आया जब कोई निवासी दुखी नहीं रहा। उस दिन किसी के पास करने को कोई काम नहीं बचा। बहुत सारे लोग गॉड बन चुके थे तो उनके पास केवल लोगों की विशेज पूरा करने का काम था लेकिन मज़ेदार बात यह कि विश मांगने के लिए कोई इंसान दुखी नहीं बचा था। मतलब अब गॉड्स भी बेगार हो गए थे। धरती के गॉड्स दुखों की डिमांड करने लगे थे जिन्हें  वो दूर कर सकें और उधर स्वर्ग में रहने वाले लोगों ने मांग उठाई थी कि उनकी यादों को मिटाया जाए जिससे वो स्वर्ग में खुश रह सके।

यहीं वो क्षण था, यहीं वो समय था जब सूरज की आंखे खुली और उसने जाना कि सबको गॉड बनने का समान अवसर देने से और सबका दुख दूर करने का इंतज़ाम करने से दुनिया नहीं चलने वाली। ऐसे तो ज़िंदगी मोनोटॉनस हो जाती है। हमेशा खुशियां मिलने से किसी को खुशी का अहसास नहीं होता। सूरज ने अहसास किया कि इंसान की मैमोरी सलामत रहे तो वो कभी अपने खुशी के क्षण भूल नहीं पाता और स्वर्ग में भी दुखी रहता है।

उसी दिन से एक कम्पलीट इन्फ्रास्ट्रक्टरल चेंज का फैसला लिया गया। दुखों को इन्ट्रोड्यूस किया गया। सबको गॉड बनने का अवसर देने की प्रक्रिया बंद कर दी गई। भूलने की क्वालिटी लोगों में डाली गई। यहीं नहीं देवलोक, पृथ्वीलोक और पाताललोक को भी अलग कर दिया गया। उस दिन सूरज ने जाना था कि दुनिया अगर चलानी है, और अच्छे से चलानी है तो हर फीलिंग का होना ज़रूरी है। केवल सुख, किसी को सुखी नहीं रख सकता। थोड़ी पार्शियेलिटी, थोड़ा करप्शन, थोड़ा दुख, थोड़ा अत्याचार लोगों में जीने की, लड़ने की और जीतने की ललक जगाएगा और लोगों के जीने को यादगार और फोकस्ड बनाएगा।

बस उस दिन का दिन है कि ब्रह्मांड बदल गया और उस रूप का बन गया जिसमें हम आज जी रहे हैं। हांलाकि लोग इस स्थिति से भी खुश नहीं हैं और फिर से भगवान से वैसी ही व्यवस्था करने की गुज़ारिश करते हैं लेकिन अब सूरज महाराज अनुभवी हो चुके हैं और शायद अब वो फ़िर से हमें वैसे जीने का मौका ना दें।





एब्स्ट्रेक्ट थॉट्स !!!



हमेशा हर चीज़ हासिल करना आसान नहीं होता। लेकिन इन तमन्नाओं का क्या किया जाए जो गाहे-बगाहे, जब जी चाहा, बिना दस्तक दिए हर इंसान की ज़िदंगी में चली आती हैं। यह ना तो उम्र देखती हैं और ना ही दुनिया के रीति रिवाज़। कभी भी आपका मन किसी भी चीज़ के लिए मचल सकता है। कहते हैं मन को काबू में करके रखना दुनिया का सबसे बड़ा योग है, जिसने मन पर काबू पा लिया, जिसकी कोई इच्छा, कोई आशा, कोई अपेक्षा ना रहे वो सबसे सुखी इंसान बन जाता है, परमात्मा के करीब पहुंच जाता है। हांलाकि मैं यह नहीं मानती। ज़िदंगी जब मिली है तो इंसान बन कर ही जीना चाहिए। परमात्मा में विलीन होने के लिए तो मरने के बाद काफी समय है। जीवन हमें मिला ही इसलिए हैं कि हम इच्छाओं और माया के अधीन होकर जीएं।अगर ज़िंदग़ी के दौरान ही हम गीता के ज्ञान का निर्वहन करने लगें तो सोचिए कितनी मशीनी हो जाएगी ज़िंदग़ी। ना खुश होने की वजह होगी, ना ही दुखी रहने का कारण। ना किसी से कोई उम्मीद हम कर पाएंगे और ना ही कोई हमसे कोई आशा पालेगा क्योंकि हम तो उसे पूरा करेंगे नहीं।

मुझे पूरा यकीन है कि गीता का ज्ञान देते समय खुद कृष्ण भगवान भी नहीं चाहते होंगे कि इस मिट्टी की दुनिया के बाशिंदे इसका अक्षरक्ष: पालन कभी करने में सफल हो पाएं। क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो फ़िर उनके माया के इस संसार में रहने का मतलब क्या रह जाएगा। फ़िर तो वो सभी भगवान हो जाएंगे..।

शायद इसीलिए भगवान ने हमें मन दे दिया, प्रेम का अहसास दे दिया। एक पल को मन को तो काबू में कर भी लो लेकिन इस दुनिया के सबसे असरदार अहसास से कैसे बच के रह पाओगे। उस पर हाल यह कि इंसान को यह फितरत दे दी कि अहसास-ए-चाहत उसे किसी भी समय, किसी भी जगह और किसी भी वस्तु अथवा व्यक्ति के लिए महसूस हो सकता है। अब चूंकि भगवान ने खुद अपने अंश के रूप में इस अहसास को मानव जाति में डाला था तो ज़ाहिर है इसका असर भी सबसे तीव्र ही होना है। तो ऐसा होने लगा। लोग प्रेम में पड़ने लगे, उसके पीछे जाने लगे और भगवान की बनाई दुनिया तितर-बितर होने लगी। तब भगवान को इसे काबू करने के लिए 'संस्कार' नाम का शै बनाने की सूझी होगी। साथ ही जोड़ दिया एक और खतरनाक हथियार जिसे हम गरिमा यानि मर्यादा यानि डिग्निटी कहते हैं। सेंसरशिप का ठप्पा लगाने वाले कुछ और ताकतवर शस्त्र भी बना दिए गए जैसे- रीति रिवाज़, लोक-लाज, लिहाज, मैच्योरिटी और स्वाभिमान। ताकि लोग इनके साथ खुद के ही मन में पैदा हुई भावनाओं से लगातार लड़ते रहे। सही-ग़लत के बीच अनंत लड़ाई जारी रहे और इंसान आखिरकार अपने मन को मारना सीख जाए। 

 मतलब प्रकृति की लीला तो देखो, मन तो दिया लेकिन इस ज्ञान के साथ कि हमें हर हाल में इस संसार में रहते हुए इस मन को मारना सीखना चाहिए। वहीं व्यक्ति सफल है जो मन पर विजय पा ले। ग़लत है भगवान, आपको ऐसा करना नहीं चाहिए था। खैर, फ़िर भी कुछ लोग हैं, जो हमेशा खुदा की इस खुदाई को चुनौती देते रहते हैं। जो दुनिया के सबसे सरल एककोशिकीय प्राणी अमीबा की तरह होते हैं। जो रीति-रिवाज और संस्कारों की जटिलताओं से परे हैं। जिनका मन बिना किसी दवाब के, परिस्थितियों के अनुसार अपना आकार बदलता रहता है। लोग इन्हें भले ही निकृष्ट नज़रों से देखें लेकिन दरअसल यह निराकार ब्रह्म की तरह होते हैं। ये जब जैसा महसूस करते हैे, वैसे ही हो जाते हैं। यह भगवान के सबसे करीब होते हैं जिनके मन में जो होता है वो सीधा सीधा इनके हाव-भावों में परिलक्षित हो जाता है।

पर ऐसे लोगों का आंकड़ा बहुत ही कम है। और अमीबा बनके जीना हर किसी के बस की बात भी नहीं है। क्योंकि ज़माना जटिलताओं का है, मानव जाति इन अमीबा रूपी प्राणियों को हेय दृष्टि से देखती हैं। लोगों को जटिलता सुख देती हैं। वो यह भूल जाते हैं कि जीवन का सार गुणित होकर जटिलतम बनने में नहीं बल्कि विभाजित होकर अविभाज्य एक इकाई तक पहुंच जाने में हैं जिसके आगे विभाजन संभव नहीं।

एक सच यह भी है चाहें कोई ऐसा कर पाएं या नहीं, पर हर इंसान के जीवन में एक घड़ी ऐसी ज़रूर आती है जब वो दरअसल सरलतम प्राणी बनकर जीना चाहता है। मायावी संसार की जटिलताओं को पीछे छोड़कर जिस आकार में चाहे ढलना चाहता है। शायद वहीं होती है परिवर्तन की घड़ी, जीवन का टर्निंग प्वॉइंट। बन पाएं तो इसी लोक में मोक्ष की प्राप्ति वरना अनंत चलनशीलता तो जारी है ही।

Saturday, 11 March 2017

जनता को कमअक्ल समझने वाले ध्यान दें...



चुनावों के नतीजे आ चुके हैं। शायद अब विपक्षी नेताओं और खासकर खुद को तुर्रम खां समझने वाले पत्रकारों को समझ आए कि आज की जनता निर्णय लेना जानती है, बेआवाज़ लाठी से जवाब देना जानती है।
मुझे उम्मीद है कि उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में भाजपा की ज़बरदस्त जीत और पंजाब में अकाली दल और भाजपा गठबंधन की करारी हार के बाद पत्रकार और नेता यह कहना छोड़ देंगे कि ऐसा पोलेराइजेशन के कारण हुआ या गधे के बयानों के कारण हुआ या मार्केटिंग के कारण हुुआ, या भाजपा की बेहतर रणनीति के कारण हुआ या फिर कार्यकर्ताओं की मेहनत के कारण हुआ... या फिर इसलिए हुआ क्योंकि भाजपा ने सवर्णों के साथ दलितों औऱ जाटवों का भी दिल जीता, मायावती के लोगों को तोड़ लिया..... यह कारण और इस तरह के बहाने ज़िम्मेदार पत्रकारों और नेताओं के लिए वो 'सिल्क रूट' बन चुके हैं जिन पर चलकर उन्हें लगता है कि वो हर हाल में नतीज़ों तक पहुंच ही जाएंगे।
आंखे खोलिए महोदय और कम से कम अब तो जनता की समीक्षात्मक प्रवृत्ति और निर्णय क्षमता पर विश्वास करना सीखिए। जनता ना तो गूंगी है, ना बहरी है और बेवकूफ तो बिल्कुल नहीं.... जो आपकी स्पूनफीडिंग को बड़े आराम से निगल लेगी। यह सोशल मीडिया का दौर है। कोगनीटिव डिसोनेन्स थ्योरी के लागू हो चुके होने का दौर है।
अभी भी अगर आप यह कहेंगे कि जनता जातिवाद के नाम पर वोट देती है, खुद को लुभाने के लिए की जा रही लोकलुभावन योजनाओं पर वोट देती हैं या लहर पर वोट देती है तो एक बार फिर इन चुनावों के नतीजों को देख लीजिए। अगर ऐसा होता तो केवल यूपी और उत्तराखंड में ही नहीं पंजाब में भी बीजेपी-अकाली दल को जीत मिलती। गोवा और मणिपुर में भी क्लीन स्वीप होता। लेकिन ऐसा नहीं है।
आप लोग कुछ भी कह लें, लेकिन सारे लोग जान चुके हैं कि एक के बाद नेताओं ने हमेशा जात-पात के नाम पर उन्हें उल्लू ही बनाया है। कभी दलितों, कभी जाटवों तो कभी हिन्दु-मुसलमानों के नाम पर हमेशा उन्हें बांटते ही आए हैं...।आज की तारीख में जनता काम को वोट देती है, विकास को वोट देती है, ईमानदारी, साफ छवि और काम करने की क्षमता और इच्छा रखने वालों को वोट देती है। लीडर का निर्णय टफ भी हो तो उनके हित के लिए होना चाहिए,यह जनता जान गई है। सबके विकास के साथ ही उनका विकास संभव है यह जनता समझ चुकी है।
अब समझने की बारी उन लोगों की है जो अपनी दिमागी थ्योरियों को जनता का मिजाज समझने की भूल करते हैं और अपने पक्षपाती निर्णयों को जनता का निर्णय मानने की गलती..।

Wednesday, 1 March 2017

मीडिया की एजेंडा सेटिंग थ्योरी का शिकार बन रहे हैं हम... और हमें मालूम तक नहीं


हांलाकि देश में इस समय इतने ज़्यादा ज़रूरी मुद्दे हैं कि ग़ैरज़रूरी मुद्दों पर बहस की गुंजाइश नहीं होती लेकिन क्या किया जाए यह मीडिया का दौर है जहां उसी बात की बात होती है जिसे मीडिया हवा देता है, उन महत्वपूर्ण मुद्दों की नहीं जिन्हें मीडिया दबा देता है।

मास कम्यूनिकेशन की पढ़ाई कर चुके साथियों को इसकी जानकारी होगी। साल 1972 में मैक्सवेल मैककॉम्ब्स और डोनाल्ड शॉ  ने एक थ्योरी दी थी - एजेंडा सेटिंग थ्योरी। जिसके अनुसार मीडिया केवल खबरें ही नहीं दिखाता बल्कि चुनिंदा खबरों के ज़रिए यह एजेंडा भी सेट करता है कि जनता किस चीज़ को महत्वपूर्ण मानकर उसके बारे में ज्यादा से ज्यादा सोचे और बात करें।

और ऐसा किया जाता है उस चुनिंदा खबर को सबसे ज्यादा समय और कवरेज देकर। एजेंडा सेटिंग थ्योरी के द्वारा मीडिया और न्यूज़रूम स्टाफ ना केवल यह तय करते हैं कि कौन सी खबर को महत्व मिलना चाहिए बल्कि जनता के बीच और मुद्दों को गौण भी बना देते हैं। यह भी तय कर देते हैं कि जनता को क्या सोचना चाहिए।


तो हुज़ूर आंखे खोलिए। आज की तारीख में इस एजेंडा सेटिंग थ्योरी का जमकर इस्तमाल हो रहा है। किसानों की आत्महत्या, बेरोजगारी, पानी की कमी, महिलाओं की सुरक्षा, आतंकवाद जैसे असल मुद्दे गौण हो गए हैं। आज हम सब चर्चा करते हैं तो इन बातों पर कि किस नेता ने किस दूसरे नेता के बारे में क्या बुरा कह दिया। कहां देशविरोधी नारेबाज़ी हुई। कहां गुरमेहर को ट्रोल किया गया, किसने ट्रोल किया, किसने किसके बारे में क्या बयान दिया.... ।

चाहें चैनल हों या अखबार सब एक से हैं। और अगर आप सोचते हैं कि आप मीडिया के इस खेल का हिस्सा बनने से खुद को बचा पाए हैं तो आप गलत सोचते हैं। एक बार सोशल मीडिया की दीवारें देख लीजिए जहां हम और आप खरी-खोटी पोस्ट करते हैं। यह साइटें भी ऐसी ही खबरों से रंग रही हैं जिनका एजेंडा मीडिया ने सेट करके दिया है।

आज आलम यह हैं कि महत्वपूर्ण खबरें केवल चैनलों द्वारा दिखाए गए न्यूज़ शतक या सौ खबरों के कैप्सूल में सुनाई देती हैं। इन्हें एयरटाइम या प्रिंटस्पेस ही नहीं मिलता और अगर मिलता भी है तो बहुत कम।

अब देख लीजिए जबसे चुनाव शुरू हुए हैं तब से देश में केवल चुनावी रैलियों और मतदान की बातें हो रही हैं क्योंकि देश का मीडिया केवल इसी पर केंद्रित हो गया है। पिछले दो दिनों से केवल गुरमेहर कौर की ट्रोलिंग का मुद्दा देश का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा बना हुआ है, मानों इस मुद्दे का हल निकल गया तो देश की सारी समस्याओं का हल निकल जाएगा।

जागो देश के लोगों जागो। आज के सोशल मीडिया के दौर में, एजेंडा सेट करने वाले चैनलों के दौर में हम थिंक टैंक तो बन रहे हैं लेकिन ज़मीनी स्तर के मुद्दों पर काम करने के लिए प्रेरित नहीं होते। देश में कई ज़रूरी मुद्दे हैं, बिना बात की बात पर  एक दूसरे को गरियाना, धकियाना छोड़कर बेहतर होगा अगर हम कुछ ज़रूरी बदलावों पर बात करें। मीडिया के निर्दयी खेल का खिलौना मत बनिए। खासकर मास कम्यूनिकेशन वाले साथियों से तो ज़रूर यह अनुरोध है कि हम इन बातों से ऊपर उठें और वाकई में ज़रूरी मुद्दो को मुद्दा बनाएं। क्योंकि व्यर्थ की बहस का कोई अंत नहीं होता जिनमें कि मीडिया की चालों के चलते हम सब अटके हुए हैं।

सोशल मीडिया बहुत प्रभावी और महत्वपूर्ण प्लेटफार्म है, इसका प्रयोग नफरत फैलाने या एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए तो बिल्कुल नहीं होना चाहिए, उसके लिए न्यूज़ चैनल्स ही काफी हैं।



Tuesday, 10 January 2017

'मन की बात'... लेकिन मोदी जी की नहीं, फुटबॉल की :-)



बहुत दिनों से यह सवाल जीतू-मीतू के मन में था। जीतू-मीतू...अरे वो जुड़वा स्पोट्स जूते, जिन्हें पहनकर रोज़ अभिषेक अपने पांच दोस्तों के साथ फुटबॉल खेलने जाता है। दोनों ही बहुत प्यारे हैं। भाई हैं, बिल्कुल एक जैसे, आईडेंटिकल ट्विन्स। एक दूसरे की मिरर इमेज। एक दायां और बायां...।

खैर यह कहानी जीतू-मीतू की नहीं हैं, यह कहानी है उस गोल, प्यारी सी बड़ी फुटबॉल की, जिसे लेकर इन जुड़वां जूतों के मन में सवाल उठा है। हां तो आज जीतू ने इस फुटबॉल से पूछ ही डाला- एक बात बताओ डीयर, रोज़ हम दोनों को अपने पैरों में डालकर अभिषेक तुम्हें किक मारता हुआ मैदान तक ले जाता है, वहां उसके सारे दोस्त भी तुमको इतना मारते हैं, ज़मीन पर पटकते हैं, लेकिन फिर भी तुम हमेशा खुश कैसे रहती हो, हमेशा उछलती कूदती रहती हो... कैसे?

फुटबॉल हंस पड़ी..। अरे भई खुश क्यों ना होऊं। मेरा तो काम ही पैरों में रहना है, मेरा नाम ही फुटबॉल है यानि पैर से खेले जाने वाली बॉल। तो अगर मुझे बच्चे पैरों से मारकर खेलते हैं तो इसमें खराब लगने जैसा क्या है...? बल्कि मैं तो अभिषेक की शुक्रगुज़ार हूं कि उसने स्पोर्ट्स शॉप में रखी इतनी सारी फुटबॉल्स के बीच मुझे चुना। अगर वो मुझे यहां नहीं लाता तो मैं वहीं, एक ही जगह, एक ही शैल्फ में अपने जैसी ही अन्य फुटबॉल्स के साथ रहती-रहती बोर हो जाती। मुझे तो कभी पता ही नहीं चलता कि इस बैट, बॉल, रैकेट, शटलकॉक जैसे खेल के सामानों के अलावा भी इस दुनिया में बहुत सारी चीज़े हैं। प्यारे- प्यारे बच्चे हैं। इसलिए जब-जब अभिषेक मुझे खेलने ले जाता है मुझे बड़ा मज़ा आता है, इस बहाने मैं थोड़ी बहार की ताज़ा हवा भी खा लेती हूं और बहुत से नए-नए लोगों से मिल भी लेती हूं, वरना घर में, टेबल के नीचे एक कोने में पड़े-पड़े तो मेरा मन भी नहीं लगता।

जीतू-और मीतू को तो ऐसे जवाब की आशा ही नहीं थी। वो तो उसे बेचारी फुटबॉल समझकर सहानुभूति जताने की सोच रहे थे। पर यहां तो मामला ही अलग निकला।

 "अच्छा यह बताओ तुम्हें अभिषेक के सारे दोस्तों में से सबसे ज़्यादा कौन पसंद है? " जीतू ने पूछा।

"हां इस बात का जवाब मैं दे सकती हूं.." फिर से एक बार हंसते हुए फुटबॉल बोली। फ़िर कुछ सोचते हुए फुटबॉल ने बताना शुरु किया। देखो, वो गगन है ना, अभिषेक का मोटू दोस्त, वो मुझे ज़्यादा पसंद नहीं, क्योंकि एक तो वो रोज़ रोज़ स्टड्स पहनकर आता है और उससे मुझे किक मारता है तो मुझे चोट लग जाती है। यहीं नहीं वो जानबूझ कर मुझे मैदान से बाहर भेजता है, हालांकि उसकी वजह से मेरी बाहर की सैर भी हो जाती है लेकिन परेशानी यह है कि वो अक्सर मुझे कूड़े की तरफ उछाल देता है, वहां बहुत बदबू आती है।



और वो जो अमन हैं ना, जो रोज़ पीली स्पोर्ट्स टीशर्ट पहनकर आता है और गोलकीपर बनता है, वो भी मुझे बिल्कुल पसंद नहीं। क्योंकि वो बड़ा गंदा रहता है। अक्सर अपनी नाक में हाथ डालता रहता है, और फ़िर उन्हीं गन्दे हाथों से मुझे पकड़ता है। उसके नाखून भी बहुत लम्बे हैं जो मुझे चुभ जाते हैं और दर्द होता है। उसके पास जाना भी मुझे अच्छा नहीं लगता। 

लेकिन इनमें सबसे ज़्यादा नापसंद मुझे यश है। यश खुद को अभिषेक का बड़ा अच्छा दोस्त कहता है लेकिन दरअसल वो अभिषेक से जलता है। जब भी मेरे मैदान से बाहर जाने पर यश मुझे लेने जाता है, वो जानबूझ कर मुझे किक मारकर नाली में गिराता है या फिर कूड़े के बीच और फि़र पैरों से घसीटते हुए, फिर से किक मारकर वापस ले जाता है। वो जानबूझ कर मुझे गंदा करता है, एक बार तो उसने काटा घुसाकर मेरी हवा निकालने की भी कोशिश की थी। वो अच्छा बच्चा नहीं है। उसे इस बात की जलन है कि यहां सब उससे अच्छा खेलते हैं।

"तो तुम्हें कोई भी पसंद नहीं.." इस बार मीतू ने पूछ लिया।

"नहीं आदित्य और रोहित तो बहुत अच्छे हैं। दोनों बहुत अच्छे से मेरे साथ खेलते हैं। और आदित्य को तो खासकर मुझसे बहुत लगाव है। वो जब भी गोलकीपर बनता है और मैं उसके पास जाती हूं तो वो बहुत ज्यादा खुश होता है। वो मेरा ख़याल भी बहुत रखता है क्योंकि उसे बड़े होकर फुटबॉलर बनना है ना। वो अक्सर अभिषेक से मुझे मांगकर मुझे अपने साथ घर ले जाता है और देर तक मेरे साथ खेलता है। किक मारने की प्रैक्टिस करता है। वो अपने घर पर मुझे पलंग पर अपने तकिए के पास ही रखकर सोता है और सुबह उठते ही मुझसे खेलना शुरू कर देता है। इसलिए वो मेरा फेवरेट है।"

हालांकि जीतू और मीतू के दिमाग में अभी सवाल बाकी थे पर तभी फुटबॉल ने उन्हें चुप करा दिया.." वो देखो शाम हो चुकी है और अभिषेक भी आ रहा है। अब यह बातें छोड़ो, अब हम सबके बाहर घूमने जाने का वक्त है".. कहते हुए एक बार फिर फुटबॉल खिलखिलाने लगी, इस बार जीतू और मीतू भी मुस्कुरा दिए, उन्हें ना केवल अपने सवालों के जवाब मिल गए थे बल्कि कुछ गलतफहमियां भी दूर हो गईं थीं।