Saturday, 31 December 2016

ये रहीं प्रधानमंत्री के देश के नाम संबोधन की खास बातें...


  • देश के केवल 24 लाख लोग मानते हैं कि उनकी सालाना आय 10 लाख से ज्यादा है। 
  • कष्ट झेलना आप सबके त्याग की मिसाल। लोग मुख्यधारा में आना चाहते हैं। ईमानदारों को सुरक्षा देना प्राथमिकता। 
  • अर्थव्यवस्था की मुख्यधारा में वापस आया काला धन। 
  •  कहीं कहीं सरकारी कर्मचारियों ने गंभीर अपराध किये हैं और आदतन फायदा उठाने का निर्लज्ज प्रयास भी हुआ है, इन्हें बख्शा नहीं जाएगा।
  •  बैेंको से आग्रह- बैंक अब गरीबों को मध्य में रखकर अपने कार्य का आयोजन करें। बैंकों के पास इतना धन कभी नहीं आया था। निम्न मध्यम वर्ग के लिए नीतियां बनाएं।
  • नई योजनाएं- प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत शहरों में गरीबों को नए घर देने के लिए दो नई स्कीमें- 9 लाख तक के कर्ज पर 4 फीसदी की छूट, 12 लाख के कर्ज पर 3 फीसदी तक की छूट। गांव में 33 फीसदी ज्यादा घर बनाए जाएंगे।
  • 2017 में गांव में लोग अगर घर का विस्तार करना चाहते हैं तो उन्हें 2 लाख रुपए तक के कर्ज में 3 फीसदी तक की छूट।
  • रबी की बुआई में 6 फीसदी वृद्धि  हुई।
  • जिन्होंने सहकारी बैंको से कर्ज़ लिया था उन किसानों के लिए- 60 दिन का ब्याज सरकार देगी, उनके अकाउंट में जाएगा। 
  • तीन करोड़ किसान क्रेडिट कार्डों को रुपए कार्ड में बदला जाएगा। किसान कहीं पर भी अपने कार्ड से खरीद- बिक्री कर पाएगें।
  • लघु एवं मध्यम उद्योग वर्ग- छोटे कारोबारियों के लिए क्रेडिट गारंटी एक करोड़ से 2 करोड़ करेगी। (सरकार ट्रस्ट के माध्यम से क्रेडिट कवर करेगी)
  • एनबीएससी से लिया गया लोन भी कवर होगा जिससे छोटे उद्योगों को ज्यादा कर्ज मिलेगा। इन पर ब्याज दर भी कम होगी।
  • छोटे उद्योगों के लिए कैश क्रैडिट लिमिट 20 फीसदी से बढ़ाकर 25 फीसदी की गई। डिजिटल पेमेंट के मामले में 30 फीसदी होगी।
  • जो कारोबारी 2 करोड़ तक सालाना व्यापार करते हैं, डिजिटल लेनदेन पर 6 फीसदी आय मानकर टैक्स की गणना की जाएगी।
  • गर्भवती महिलाएं- सभी 650से ज्यादा जिलों में सरकार गर्भवती महिलाओं की मदद के लिए 6000 रुपए देगी। सीधे एकाउंट में जाएगी राशि।
  • सीनियर सिटिजन्स स्कीम- सांढ़े सात लाख तक की राशि पर दस साल के लिए सालाना 8 फीसदी ब्याज दर को सुरक्षित किया जाएगा। यह ब्याज राशि हर महीने प्राप्त की जा सकेगी।
  • लोकसभा- विधानसभा चुनाव साथ-साथ पर होगी सार्थक बहस


Thursday, 29 December 2016

ओला कैब ड्राइवर नसीम खान साहब ने कैब ड्राइवरों के प्रति मेरा नज़रिया बदल दिया...।


यह हैं ओला कैब के ड्राइवर नसीम खान साहब। मूलत: उत्तर प्रदेश के बलिया, गाज़ीपुर निवासी नसीम फिलहाल दिल्ली के साकेत स्थित जेजे नगर के पास बने सिंगल रूम डीडीए फ्लैट में अपनी बीवी और एक छोटी बच्ची के साथ रह रहे हैं। इनका भाई भी इनके साथ रहता है जिसे यह इंजीनियरिंग करा रहे हैं। नसीम बलिया में रह रहीं अपनी मां और एक छोटी बहन के लिए हर महीने पैसे भी भेजते हैं। नसीम खान, नसीम खान साहब इसलिए हैं कि इन्होंने यह साबित किया है कि इंसान के पेशे से उसकी सीखने और दुनिया जानने की चाह पर रत्ती भर भी असर नहीं पड़ता और ना ही उसके सपने और ख्वाहिशे छोटी हो जाती है। 

अगर इंसान वाकई में खुद को जागरूक करना चाहता है, आगे बढ़ना चाहता है तो परिस्थितियां उसके आड़े नहीं आती। आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए गांव और अपने खेत छोड़कर दिल्ली आए नसीम खुद एक जागरूक इंसान हैं जो हर मुद्दे पर अपनी बेबाक और पूर्वाग्रह रहित राय रखते हैं। इनकी भाषा भी काफी अच्छी है और यह बहुत आसानी से अंग्रेजी के शब्द भी इस्तमाल करते हैं। इनसे बात करते समय आपको बिल्कुल नहीं लगेगा कि आप किसी टैक्सी ड्राइवर से बात कर रहे हैं। नसीम जानते हैं कि उन्हें लाइफ में क्या चाहिए और उसे कैसे हासिल किया जाना है। 

सवारियों को गूगल मैप के ज़रिए मंज़िल तक पहुंचाने के लिए जो इंटरनेट इनके मोबाइल में ओला कंपनी द्वारा फ्री मुहैया कराया गया है, नसीम उसी इंटरनेट के ज़रिए खाली समय में अखबार और खबरें पढ़ते हैं और खुद को आज के हालातों से पूरी तरह अपडेट रखते हैं। आज दोपहर नोएडा सेक्टर 76 से अपने घर आने के लगभग 50 मिनट के दौरान मैंने इनसे आज कुछ मुद्दों पर बात की तो बहुत से भ्रम टूटे।  

 नोटबन्दी के बारे में बात करते हुए नसीम बताते हैं कि इसका असली असर अगर देखना हैं तो गांव में जाईए और जेजे कॉलोनी में रह रहे दिहाड़ी मजदूरो से बात कीजिए तब आप जान पाएंगे कि दरअसल जितना कुछ आपको लग रहा है उससे कहीं ज्यादा असर इसका हुआ है। लोग बर्बाद हो गए हैं। अपनी खुद की कहानी बताते हुए नसीम ने बताया कि वो अपनी मां के खाते में हर महीने पांच से छ हज़ार रुपए डालते हैं। उनकी मां डायबिटीज़ की मरीज है। लेकिन पिछले डेढ़ महीने से उनके खाते में 20,000 रुपए होते हुए भी उनकी मां खुद अपने ही रुपए नहीं निकाल पा रहीं और डायबिटीज़ की दवाई नहीं खरीद पा रहीं। 

बड़े शहरों में ज़रूर बैंको में पैसा आ रहा है लेकिन उनके गांव में एटीएम में तो डेढ़ महीने से पैसा हैं ही नहीं और बैंक में हफ्ते में एक बार एक लाख रुपए आते हैं जो लाइन में लगे लोगों के बैंक तक पहुंचने से पहले ही ख़त्म हो जाते हैं।  'लेकिन अाप उनके मोबाइल में पेटीएम क्यों नहीं डलवा देतें?' मेरे इस सवाल पर नसीम हंसने लगे और फि़र बोले, मैडम आप लोग जो दिल्ली में बैठे हुए हैं, उन्हें सब कितना आसान लगता हैं ना। यहां तो बहुत तेज़ इंटरनेट आता है लेकिन लेकिन गांव में फोर जी, थ्रीजी छोड़िए टूजी तक नहीं चलता। वहां कंपनियों के टावर ही नहीं लगे हैं। मोबाइल की कनेक्टिविटी भी बहुत अच्छी नहीं आती। वहां दवा की दुकान हैं लेकिन वहां भी कहीं पेटीएम या मोबाइल बैंकिंग की सुविधा नहीं है। 

मजबूरी ऐसी आन पड़ी है कि आने वाले 31 दिसम्बर को नसीम को खुद ही कुछ कैश और मां की दवाई यहां दिल्ली से लेकर ट्रेन से अपने गांव बलिया जाना पड़ रहा है। उनका कहना है कि वहां लोगों के पास घर का राशन खरीदने के लिए भी पैसे नहीं हैं। नोटबन्दी के शुरुआती दिनों में जान-पहचान और सामूहिक परेशानी के चलते आसानी से उधार मिल जाया करता था लेकिन अब मुश्किल यह पैदा हो गई है कि खुद दुकानदारों के पास कैश की कमी के चलते वो भी राशन स्टॉक नहीं कर पा रहे हैं, और किसी को उधार देने की स्थिति में नहीं हैं।  " आज हालत यह हो गई है कि मेरा अपना पैसा है मैडम, लेकिन मैं ज़रूरत पर उसे इस्तमाल नहीं कर पा रहा हूं। यह लोकतंत्र हैं, कितने लोग मर रहे हैं, सरकार अपनी ज़िम्मेदारी से कैसे हाथ छुड़ा सकती है, हर एक मौत का जवाब दिया जाना चाहिए। "

उत्तर प्रदेश में आने वाले चुनावों में किस पार्टी का पलड़ा भारी दिख रहा है और आप किसको वोट देंगे, जैसे सवालों पर नसीम संभल बड़ा नपा तुला सा जवाब देते हैं। उनका कहना हैं कि इस बार किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिलेगा बल्कि खिचड़ी सरकार बनेगी। जहां तक जनता की पसंद का सवाल है, लोग बीएसपी को ज्यादा पसंद इसलिए करते हैं क्योंकि मायावती के राज्य में कानून व्यवस्था काफी सुधर जाती है और लोग खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं। सपा सरकार में गुंडाशाही काफी चलती है और कानून व्यवस्था का हाल बुरा हो जाता है। हांलाकि इसके लिए नसीम मुलायम सिंह और उनकी पार्टी के अन्य लोगों को ज़िम्मेदार ठहराते हैं..

" अखिलेश तो सही आदमी है, जवान लड़का है, सचमुच बदलाव लाना चाहता है लेकिन पार्टी में उसकी चलती कहां हैं मैडम?" भाजपा क्या उत्तर प्रदेश में इस बार आ सकती है?, इस सवाल पर नसीम फिर एक बार नसीम हंस देते हैं.." मैडम यूपी में आज भी 75 प्रतिशत लोग ऐसे हैं जो एक शराब की बोतल, या सौ रुपए के नोट के लिए वोट दे देते हैं। सपा और बसपा का ग्राउंड बहुत मज़बूत है, भाजपा को तो उस तक पहुंचने में बहुत समय लगेगा। और अब यह नोटबन्दी का असर, जनता नाराज़ तो है, मीडिया कितना भी अच्छी तस्वीर दिखाएं लेकिन यह बातें ज़मीनी हक़ीकत नहीं बदल सकती। बाकी कल क्या होगा यह तो कोई प्रिडिक्ट नहीं कर सकता, आप भी यहीं हैं और हम भी यहीं, जो होगा सामने आएगा। "

किसानो के हालात, फसलों के नुकसान, बिचौलियों की भूमिका और धान के मूल्य जैसे और भी बहुत सी बातों पर नसीम ने अपनी राय दी जो ज़मीनी हकीकत से रुबरू कराती है। यह एक बहुत समझदार और तहज़ीब वाले ड्राइवर हैं। इनकी मारुति सैलेरियो कैब का नंबर हैं - 'DL1RTB2600'. आप कभी ओला कैब की सर्विस लें तो इनकी कैब बुक अवश्य करा कर देखें। आप का नज़रिया भी कैब ड्राइवर्स के प्रति बदल जाएगा।  

Wednesday, 28 December 2016

भारत कैश से लैस हुआ तो लुप्त हो जाएंगी यह कलाएं, रीतियां और रस्म-ओ-रिवाज़

मोदी जी का क्या है, बड़ी बेफिक्री से नवम्बर की एक रात नेशनल चैनल पर नुमायां हो गए और जारी कर दिया 500 और 1000 के नोटों के रद्दी हो जाने का ऐलान। पूरा देश सन्न... यह क्या कर गए प्रधानमंत्री जी। कमाल की बात यह है कि पूरा का पूरा 9 नवम्बर का दिन निकल गया, न एक भी विपक्षी दल का बयान आया और ना किसी न्यूज़ एंकर को इस फैसले के विरुद्ध बोलते सुना गया। भई सद्मे से उबरने में वक्त तो लगता है ना...।

लोगों को लगा था कोई नहीं, यह नोट जा रहे हैं तो क्या नए आ जाएंगे, और कुछ दिनों में नए नोटो से वहीं पुराना खेल, पुरानी आदतें शुरू कर देंगे। गृहणियां जिनका सालों का जमा धन एक ऐलान के झटके में निकल गया, सोच रही थीं कि उनकी कला तो ज़िन्दा है, नोट फिर जमा कर लेंगी। लेकिन हाय रे मोदी जी के मन की बात ना जानी उन्होंने..। प्रधानमंत्री जी तो कैश से लैस इकोनॉमी लागू करने की मंशा रखते हैं।

यह तुगलकी फरमान जारी करने से पहले ज़रा सोच तो लिया होता प्रधानमंत्री जी कि जो कैश ही ना रहा तो हिन्दुस्तान की संस्कृति में रची-बसी बहुत सी कलाएं और रस्म-ओ-रिवाज़ तो लुप्त ही हो जाएंगे। आपके तो आगे-पीछे कोई है नहीं, ना ही आपको 'दुनियादारी' निभानी है और ना ही 'व्यावहारिकता' से कोई मतलब है जो दोनों चीज़े ही हिन्दुस्तान में बिना कैश मुमकिन नहीं।  कुछ-एक नए रचनात्मक कारोबारों के बारे में भी सोच लिया होता जो बन्द हो सकते हैं।

आपको क्या मालूम प्रधानमंत्री जी कि यह जो रुपया है ना वो  'लिक्विड मनी' जैसी टर्मिनोलॉजी से कहीं ऊपर की चीज़ है। यह कैश हर भारतीय की दिनचर्या, रस्मो-रिवाज़ों, कलाओं और संस्कृति में बिल्कुल उस तरह रचा-बसा है जैसे कि हर सुबह उठकर ब्रश करने की आदत। और अगर भारतीय कैश से लेस हो जाएंगे तो भारतीयता का रंग भी बदल जाएगा। 

-सबसे खराब असर होगा हिन्दुस्तान की बेहद खर्चीली, शाही शादियों पर जिनकी बहुत सारी रीतें केवल कैश पर ही टिकी हैं। बारातों की  तो रौनक ही चली जाएगी। ना तो मुंह में नोट दबाकर नागिन डांस करने की कला जीवित रहेगी और ना नाचते बारातियों पर नोट लुटाने का मज़ा रह जाएगा। 

लेडीज़ संगीत के दौरान बहुओं पर 500 के नोट वारने वाली बुआएं और चाचियां भूतकाल की बात बन कर रह जाएंगी।

 विदा होकर जा रही बेटी की कार के पीछे सिक्के उछालने की रीत भी कल की बात हो जाएगी। 

बनिया शादियों में एक रीत होती है जबकि फेरों के समय दुल्हन ससुर जी द्वारा बनाई गई एक थैली में से जीजाजी के लिए मुट्ठी भर कर नोट या सिक्के निकालती है, अब उस रस्म के भी विदा होने का समय है। 

सबसे खेद का विषय होगा उन 'वुड बी' दूल्हों के लिए जिन्होंने अपने बड़े भाईयों और रिश्तेदारों को बड़ी उमंग से 100 और 500 के नोटों से बनी मालाएं पहनाईं थी और खुद ऐसी ही माला एक दिन पहनने का अरमान दिल में सजाया था, और अब उनका वो अरमान कभी पूरा नहीं हो पाएगा। 

- लोगों को एक दूसरे को लिफाफे देने की कला भी दम तोड़ देगी। उन कलाकारों का क्या होगा जो बड़ी तफ्सील से शादियों और अन्य समारोहों में देने के लिए सुंदर सजावटी लिफाफे तैयार करते हैं जिनमें रखकर रुपयों का आदान प्रदान हो सके। जब रुपए ही नहीं रहेगें तो सजावटी लिफाफों का कारोबार तो ठप्प समझिए। 

- हर भारतीय की आदतों में शुमार पूजा-पाठ पर भी बहुत असर पड़ने वाला है। अब आरती में चढ़ावे के रूप में चढ़ाने के लिए रुपए नहीं होंगे। नवरात्रों में कन्याएं पूजे जाते वक्त जजमान हाथ में मोबाइल लेकर एक-एक कन्या-लांगुर के पास जाएंगे और सबसे उनके पेटीएम अकाउंट की डीटेल लेते हुए एक-एक करके सब के खातों में 10-10 या बीस-बीस रुपए ट्रांसफर करते जाएंगे और साथ ही हर कन्या को हलवा चने भी पकड़ाते जाएंगे। 

-और ज़रा कल्पना कीजिए भारत के भिखारी कौम के भविष्य की। अब तो उन्हें भीख मांगने के लिए मोबाइल के साथ पेटीएम एकाउन्ट रखना पड़ेगा। क्या नज़ारा होगा वो भी जबकि चौराहों पर छोटे-छोटे बच्चे, दिव्यांग भिखारी और दुधमुंहे बच्चों को कमर में दबाएं महिलाएं आती-जाती कारों के शीशे खटखटाएंगे और हाथ में पकड़े मोबाइल के पेटीएम एकाउन्ट में भीख के पैसे ट्रांसफर करने को कहेंगे। जब मन्दिरों के बाहर बैठे हर भिखारी के हाथ में मोबाइल होगा और वो हर आने जाने वाले से अपने मोबाइल के मोबीक्यू वॉलेट में पैसे ट्रांसफर करने की गुहार करेंगे। 

-शनिवार को डिब्बे में तेल डालकर घूमते बच्चों को भी शनिदेव के लिए पैसे नहीं मनी ट्रांसफर लेकर गुज़ारा करना पड़ेगा। 

-सोना तो पहले ही बैंको के लॉकरों में पहुंच गया है, अब अगर रुपया भी नहीं रहा तो तिजोरियों का कारोबार भी बुरी तरह से प्रभावित होगा। लोग तिजोरियां खरीदना हो छोड़ देंगे या फिर काफी कम कर देंगे। 

यह तो केवल छोटे से उदाहरण भर है लेकिन सच तो यह है कि कैश नहीं रहा तो भारत के त्योहारों और उत्सवों की रौनक भी नहींं रहेगी, ना मंदिरों की, ना डांस बारों की, ना शादियों की, ना जागरणों की। क्या मज़ा ऐसे गणेश उत्सवों और जुलूसों का जहां मूर्तियों पर नोटों की बारिश ना हो। कैसे होंगे वो मंदिर जिनके प्रांगणों से कैश बॉक्स गायब हो जाएंगे। सरकारी दफ्तरों में काम करवाने के लिए फाइलों पर भार रखवाना क्या बन्द हो जाएगा? मायावती कैसे नोटों की माला पहनेगी?... माताजी एवं पिताजी, आप लोग तो खासतौर पर कमर कस लीजिए। बच्चों के जेबखर्च के लिए भी मोबाइल की ज़रूरत आने वाली है..।


Tuesday, 20 December 2016

“कम्पार्टमेन्ट के आखिरी छोर की दीवार के पास शव एक के ऊपर एक लदे पड़े थे। ट्रेन के शौचालय जवान शवों से भरे थे जो सुरक्षित स्थान समझकर वहां छिपे होंगे...” – ‘ट्रेन टू पाकिस्तान’ के अंश…



'ट्रेन टू पाकिस्तान' खुशवंत सिंह द्वारा लिखी गई सबसे ज्यादा प्रसिद्ध किताब मानी जाती है, जिसमें उन्होंने देश विभाजन के समय सीमावर्ती गांवो के लोगों में धीरे-धीरे पनप रहे ज़हर, लोगों की दशा और मनोस्थिति का बेहतरीन और सजीव चित्रण किया है। इस उपन्यास की कहानी संक्षेप में इस प्रकार है-1987 की कहानी है जब भारत और पाकिस्तान का विभाजन होने वाला है। ऐसे में सीमा पर स्थित एक शांत गांव मनो माजरा, जिसकी पूरी दिनचर्या गांव के स्टेशन से सुबह-शाम और रात में गुजरने वाली ट्रेनों पर आधारित हैं, में अचानक स्थिति बदल जाती है। गांव के निवासियों तक सीमा पार रहने वाले मुस्लिमों द्वारा अन्य धर्मों के लोगों को लूटने, बेइज्जत करने और मारने के किस्से पहुंचने लगते हैं और तनाव बढ़ने लगता है। मामला तब और गंभीर हो जाता है पाकिस्तान से एक मुर्दों की ट्रेन आती हैं जिसमें एक भी व्यक्ति जीवित नहीं होता। सारे हिन्दुओं को सीमापार के मुसलमान मौत के घाट उतार चुके थे। इस हादसे के बाद गांव में लगातार बढ़ते तनाव और बिखरती कानून व्यवस्था से गुस्साए लोग इस बात का बदला लेने के लिए भारत से मुस्लिमों को लेकर पाकिस्तान जा रही एक ट्रेन पर हमला करने की योजना बनाते हैं। यह ट्रेन खचाखच भरी है। छत पर भी लोग सवारी कर रहे हैं। ऐसे में उस पर हमला करने मनो माजरा से सिखों की एक टोली पहुंचती है। लोग हमले की तैयारी करते हैं... लेकिन अंत में मामला बदल जाता है। पढ़िए इस बेहतरीन उपन्यास के कुछ हिस्से..


डकैती

बहुत ज्यादा रेलगाड़ियां मनी माजरा में नहीं रुकती थीं। एक्सप्रेस गाड़ियां तो रुकती ही नहीं थीं। बहुत सी धीमी गति की यात्री रेलगाड़ियों में से केवल दो, एक सुबह में दिल्ली से लाहौर जाने वाली और दूसरी शाम को लाहौर से दिल्ली आने वाली, रेलगाड़ियां ही कुछ मिनटों के लिए रुकती थीं। अन्य गाड़ियां केवल तब रुकती थीं जब उन्हें रोका जाता था। नियमित रुकने वालों में केवला मालगाड़ियां थीं। हांलाकि मनो माजरा से बहुत कम बार सामान बाहर जाता या आता था लेकिन इसके स्टेशन पर वैगन गाड़ियों की लम्बी कतारें देखी जा सकती थीं। हर गुज़रने वाली मालगाड़ी में घंटों तक सामान चढ़ाया और उतारा जाता था। अंधेरा होने के बाद जब पूरे गांव में सन्नाटा छा जाता था, तब भी पूरी रात इंजन की सीटी और धुंआ छोड़ने की आवाजें, सामान रखने की आवाजें और लोहे से लोहा टकराने का शोर पूरी रात सुनाई देता था

कलयुग

सितम्बर की शुरूआत में मनो माजरा की दिनचर्या गलत होनी शुरू हो गई। रेलगाड़ियां पहले से कहीं ज्यादा अव्यवस्थित समय पर आने-जाने लगीं और बहुतों ने तो रात में गुज़रना शुरू कर दिया। कुछ समय तक तो ऐसा लगा जैसे की अलार्म घड़ी गलत घंटे पर बजने लगी है। और बाद के दिनों में ऐसा महसूस होने लगा जैसे किसी को भी इसे बंद करना याद ना रहा हो। इमाम बख्श ने मीत सिंह की तरफ से सुबह की शुरुआत करने का इंतज़ार किया। और मीत सिंह उठने से पहले मुल्ला की प्रार्थना सुनने की प्रतीक्षा करता था। लोग देर में उठने लगे, उन्होंने यह भी नहीं सोचा कि समय बदल चुका है और मेल ट्रेन अब शायद गुज़रेगी ही नहीं। बच्चे समझते नहीं थे कि उन्हें कब भूख लगनी है और पूरे समय खाने के लिए चिल्लाते रहते थे। शाम में हर कोई सूरज डूबने से पहले घर चला जाता था और एक्सप्रेस ट्रेन के आने से पहले सो जाता था- अगर ट्रेन आएं तो। मालगाड़ियों का आना बिल्कुल बंद हो गया था इसलिए उनको लोरी सुनाकर सुलाने के लिए लोरियां भी नहीं थी। इसकी बजाय, आधी रात और भोर से पहले भूतहा गाड़ियां गुज़रती थीं जो मनो माजरा के सपनो के तोड़ देती थीं। 

नहाने और कपड़े बदलने के बाद हुकुम चन्द को कुछ ताज़गी महसूस हुई। पंखे की हवा ताज़ी और अच्छी थी। वो अपनी आंखों पर हाथ रखकर लेट गया। आंखों के अंधेरे कमरे में पूरे दिन के दृश्य फिर से घूमने शुरू हो गए। उसने अपनी आंखें मलकर उन्हें झटकने की कोशिश की लेकिन दृश्य पहले और काले हुए, फिर और लाल और फिर वापस वैसे ही हो गए। एक आदमी अपने हाथों से अपना पेट पकड़े हुए उसे ऐसी निगाहों से देख रहा था जैसे कह रहा हो- देखो मुझे क्या मिला। वहां एक कोने में घुसे हुए बच्चे और औरतें थीं, उनकी आंखे डर से फैल गईं थीं, उनके मुंह खुले के खुले रह गए थे जैसे अभी उनकी चीख एकदम से गले में अटक कर रह गई हो। कुछ के शरीर पर तो एक खरोंच तक नहीं थी। ट्रेन के डिब्बे के आखिरी छोर की दीवार के पास शव लदे पड़े थे जिनकी आंखें खिड़कियों की तरफ देख रही थीं जहां से शायद गोलियां, भाले या तलवारें आईं होंगी। ट्रेन के शौचालय जवान शवों से भरे पड़े थे जिन्होंने शायद तुलनात्मक रूप से सुरक्षित स्थान ढूंढकर खुद को वहां छिपाया होगा। और वहां सड़ते मांस और मल-मूत्र की बदबू थी। 


मनो माजरा

जब यह पता चला कि पूरी रेलगाड़ी मुर्दों को लेकर आई है, पूरे गांव पर एक भारी सन्नाटा स्थापित हो गया। लोगों ने अपने दरवाजों पर रोक लगानी शुरू कर दी और बहुत से लोग पूरी रात जागकर कानाफूसी करते रहते थे। हर किसी को लगने लगा कि उसका पड़ौसी उसका दुश्मन है। लोगों ने दोस्तों और साथियों को तलाशना शुरू कर दिया। उन्होंने बादलों द्वारा तारों को ढके जाना देखना छोड़ दिया और ठंडी नम हवा की गन्ध का आनंद लेना भी भूल गए। जब वो सुबह उठते थे और देखते थे कि बारिश हो रही है, उनके दिमाग में सबसे पहले ट्रेन और जलते हुए मुर्दों का ख्याल आता था। स्टेशन को देखने के लिए पूरा गांव छत पर चढ़ जाता था

कर्म

तुम्हें मालूम है हिन्दुओं और सिखों के शवों से भरी कितनी गाडियां आ चुकी हैं ? तुम्हें रावलपिंडी, मुल्तान, गुजरेंवाला और शेखूपुरा में हुए नरसंहार के बारे में मालूम है ? तुम इस बारे में क्या कर रहे हो ? तुम बस खाते हो और सोते हो ओर अपने आप को सिख कहते हो, बहादुर सिख, शहीद होने वाले सिक्ख...- उसने अपने दोनों हाथ उठाते हुए कहा ताकि उसका व्यंयग असरदार बन सके। उसने सभी सुन रहे लोगों की आंख में आंख डालकर देखते हुए, उनका परीक्षण किया। लोगों ने शर्म से सिर झुका लिए।
लम्बरदार ने पूछा- हम क्या कर सकते हैं सरदारजी? अगर हमारी सरकार पाकिस्तान के विरुद्ध युद्ध लड़ेगी तो हम लड़ेंगे, यहां मनो माजरा में बैठ कर हम क्या कर सकते हैं?”


ट्रेन टू पाकिस्तान खुशवंत सिंह की बेहतरीन उपन्यासों में से एक है

सरकार... उसने घृणा से कहा,  तुम सरकार के कुछ करने की अपेक्षा रखते हो, वो सरकार जो कायर जमींदारों से भरी पड़ी है। क्या पाकिस्तान के मुसलमानों ने तुम्हारी बहनों को बेइज्जत करने से पहले सरकार की आज्ञा ली थीक्या उन्होंने ट्रेन रोकने और उसमें सवार बच्चे, बूढ़े जवानों और महिलाओं को मारने से पहले सरकार से पूछा थातुम चाहते हो सरकार कुछ करे। वाह, शाबाश.. बहुत बहादुरी की बात..
लेकिन सरदार साहब आप बताओ हम क्या कर सकते हैं?” लम्बरदार ने धीरे से पूछा।
यह बेहतर है, लड़के ने कहा..। अब हम बात कर सकते हैं, सुनो और बहुत ध्यान से सुनो, वो रुका, उसने चारों तरफ देखा और फिर शुरु हुआ। वो अपनी पहली ऊंगली हवा में उठाते हुए, हर एक शब्द पर जोर देते हुए बहुत धीरे-धीरे बोलने लगा… “उनके द्वारा मारे गए हर एक हिन्दु और सिख के लिए दो मुसलमानों को मारो। हर उस महिला के लिए जिसे उन्होंने उठा लिया या बेइज़्जत किया, दो महिलाओं को उठाओ। उन्होंने एक घर लूटा, तुम दो लूटो।  वो अगर एक मुर्दों की ट्रेन भेजते हैं तो हम दो भेजेंगे। वो अगर किसी काफिले पर हमला करते हैं, हम दो काफिलों पर हमला करेंगे। इसी तरह से दूसरी तरफ से हत्याएं रुकेंगी। इसी तरह से उन्हें सबक मिलेगा कि हम भी लूटमार और हत्या का खेल खेलना जानते हैं।



नेता ने अपनी राइफल उठाई और फायर कर दिया। उसका निशाना चूक गया और उस आदमी का पैर रस्सी से बाहर आ गया और हवा में झूलने लगा। दूसरा पैर अभी भी रस्सी में उलझा हुआ था। उसने जल्दी में दूर हटने की कोशिश की। इंजन केवल कुछ यार्ड दूर था और हर सीटी की आवाज़ के साथ हवा में चिंगारी उछल रही थी। किसी ने दूसरा फायर किया। आदमी का शरीर रस्सी से फिसल गया लेकिन वो अपनी थुड्डी और हाथों की सहायता से उस पर लटका रहा। उसने अपने आपको ऊपर खींचा, रस्सी अपनी बांयी बगल के नीचे दबाई और फिर से सीधे हाथ से काटना शुरू कर दिया। रस्सी कई जगह से कट चुकी थी। सिर्फ एक पतला पर मजबूत धागा रह गया था। उसने पहले उसे चाकू से काटने की कोशिश की, फिर दांत से। इंजन उसके पास पहुंच चुका था। एक के बाद एक फायर होने लगे। वो आदमी कांपा और ढेर हो गया। उसके नीचे गिरने के साथ ही रस्सी भी बीच में से टूट गई। ट्रेन उसके ऊपर से निकल गई और पाकिस्तान चली गई"।

Monday, 19 December 2016

क्या आपने बन्ना-बन्नी, लांगुरिया और खेल के गीतों का मज़ा लिया है. लेडीज़ संगीत का मतलब केवल डीजे पर डांस करना नहीं है..



आजकल शादियों में लेडीज़ संगीत के नाम पर जो डीजे लगा दिया जाता है और सब लोग अपनी पसंद के गाने चुन-चुन कर उस पर डांस कर लेते हैं, वो तो संगीत है ही नहीं जनाब। लेडीज़ संगीत का असली मज़ा तो ढोलक की थाप पर सुर लेते बन्ने बन्नी, लागुंरिया, खेल और गालियों से भरे गानों में आता है। यकीन मानिए आप कितने भी अपमार्केट होने का दावा कर लें, पहले से रिहर्सल कर के डीजे के गानों पर डांस कर लें, लेकिन जब तक इन देसी लोकगीतों का मज़ा नहीं लेगें, लेडीज़ संगीत का मज़ा पूरा नहीं होगा। इन गानों में इतना अपनापन है, इतनी आम बोलचाल की भाषा और मज़ेदार छेड़खानियां हैं कि आप एक बार इन्हें सुनेंगे तो वाह-वाही किए बगैर नहीं रह पाएंगे।

इन गानों की खासियत है इनमें सारे नातेदारों और रस्मों को शामिल किया जाना और इनके चुटीले बोल। जैसे कि आपस में गॉसिप करते हुए एक दूसरे से छेड़छाड़ की जा रही हो। शादी के खुशनुमा माहौल में दूल्हा-दुल्हन यानि बन्ना-बन्नी से लेकर, समधी -समधन, चाचियां, मामियां, ताईयां, भाभियां, देवर, देवरानियां, जेठ- जेठानियां.. किसी को भी इन गानों में बख्शा नहीं जाता। सबका तसल्ली से मज़ाक बनाया जाता है, चुहलबाज़ियां की जाती हैं,  लच्छेदार बातों को लपेट लपेट कर, रचनात्मक मुखड़ों के साथ, ढोलक की थाप पर जब रिश्तेदारों को परोसा जाता है तो दिल-दिमाग सब खुश हो जाते हैं। बातें होती हैं मज़ाक की, और मज़ाक मज़ाक में जमकर एक दूसरे की खिंचाई की जाती है। लड़की वाले अपनी बन्नों की तरफदारी करते हुए समधियों की टांग खींचते हैं तो लड़के वाले भी कहीं पीछे नहीं रहते।

एक बानगी देखिए, खास लड़की वालों की तरफ से..

कल रात बन्नी के घर चोरी हुई, इस चोरी में बन्नी का क्या क्या गया..
इस चोरी में बन्नी की सासु गई, चलो अच्छा हुआ घर का कूड़ा गया,
कल रात बन्नी के...
इस चोरी में बन्नी की जिठनी गई, चलो अच्छा हुआ, घर का हिस्सा गया।
कल रात बन्नी के घर...
इस चोरी में बन्नी का देवर गया, चलो अच्छा हुआ घर का लोफर गया।
कल रात बन्नी के..
इस चोरी में बन्नी का जीजा गया, चलो अच्छा हुआ घर का हिटलर गया...।


अब लड़के वालों का क्या जवाब होगा...। वो भी सुन लीजिए..

मोहे तो आवे हिचकी, मेरा दिल तोड़े हिचकी..
.छज्जे छज्जे मैं गई, मुछे मिला कुछ जूस,
मेरे बन्ने को सास मिली है, सब दुनिया में खड़ूस।
मोहे तो आवे हिचकी...
छज्जे छज्जे मैं गई, मुझे मिला जासूस।
मेरे बन्ने को ससुर मिला, सब दुनिया में कंजूस।
मोहे तो आवे हिचकी..
छज्जे छज्जे मैं गई, मुझे मिला एक दाना।
मेरे बन्ने को साला मिला है, सब दुनिया में सयाना।
मोहे तो आवे हिचकी...।
छज्जे छज्जे मैं गई मुझे मिली एक नाली,
मेरे बन्ने को साली मिली है, सब दुनिया में काली...।
मोहे तो आवे हिचकी....

मतलब कमी किसी की तरफ से नहीं रहती। सब मिलकर एक दूसरे का मज़ाक उड़ाते हैं और उड़वाते हैं, बुरा भी कोई नहीं मानता, बल्कि असलियत में ये गाने दो परिवारों को हल्के फुल्के माहौल में एक दूसरे को जानने, पहचानने और जुड़ने का मौका देते हैं।

ऊपर लिखे गाने तो उदाहरण भर हैं, लेकिन इन गानों की फेहरिस्त इतनी लम्बी है और तरबीयत इतनी विविधताओं से भरी हुई किआप हैरान रह जाएंगे। हर रस्म, हर रीत, हर रिश्तेदार से जुड़े गाने मौजूद हैं, फिर चाहे वो मेंहदी की रस्म हो या कंगना खिलाने की, लगुन चढ़कर आई हो या हल्दी लगाई जा रही हो, भात पहनाने की रीत हो या विदाई का समय, सास की टांग खींचनी हो या जेठानी की, नाना ससुर को गालियां देनी हों या फिर खुद दूल्हा या दुल्हन को..।

इन्हें सुनकर आप भी हमारे बुज़ुर्गो को सलाम ठोकेंगे जिन्होंने इन गानों को ईजाद किया और इन्हें अपने दिल की बातों को दूसरों तक पहुंचाने का ज़रिया बनाया। कई बार इन गीतों में आपको कुछ ऐसे शब्द और बातें भी मिल जाएंगे जिन्हें आज के ज़माने में नॉनवेज कहा जाता है। जी हां, अपने बड़ों के अंडरएस्टीमेट बिल्कुल ना करें। हमारे बड़े, बड़े चालू है, जिन्होंने इतनी चतुराई और नफासत से ऐसी-ऐसी बातों को इन गानों में पिरोया है कि किसी को बुरा भी नहीं लगता  और चुटकी काट ली जाती है, वर्जनाएं तोड़ दी जाती हैं, प्रतिबंधित बातें और शब्द बयां कर दिएं जाते हैं और वो भी सबके बीच, सबके सामने।

लोकगीतों के इस अंदाज़ और लोकप्रियता का फायदा बॉलीवुड के गीतकारों और संगीतकारों ने भी जमकर उठाया है। अगर आपको याद हो तो कुछ सालों पहले राकेश ओमप्रकाश मेहरा की फिल्म दिल्ली-6 का एक गाना बड़ा पसंद किया गया था- सास गाली देवे, देवर जी समझा लेवें, ससुराल गेंदा फूल..। गोविंदा और किमी काटकर पर फिल्माया गाना- 'बन्ने से बन्नी जयमाल पर झगड़ी, तू क्यों नहीं लाया रे सोने की तगड़ी...'  हो या फिल्म दुश्मनी का गाना- 'बन्नों तेरी अखियां सुरमेदानी...' यह सारे गीत सीधे-सीधे इन्हीं बन्ना-बन्नियों से उठाकर फिल्मों में डाल दिए गए हैं और लोगों ने हमेशा इन्हें पसंद किया है।


इन गानों के बोलों से साफ झांकती है मिट्टी की महक, परिवार से  जुड़ाव और पीढ़यों से चली आ रही परम्पराएं। एक खासियत यह भी है कि इन गीतों पर थिरकने के लिए किसी प्रेक्टिस की ज़रूरत भी नहीं है। इन गीतों पर तो वो भी नाच सकता है जिसे नाचना नहीं आता, बस पल्लू डाल कर अपना चेहरा पूरा ढक लें, और जैसे चाहें वैसे ठुमके लगाएं..।

तो अबकि बार आप जब किसी लेडीज़ संगीत या शादी समारोह में जाएं तो बजाय डीजे के एक बार अपनी दादी-नानी, चाची, ताई या मामी से उनका गीतों का खज़ाना खोलने की मनुहार करें, ढोलक बजवाएं और इन गीतों का रस ज़रूर लें।


यहां आपके लिए प्रस्तुत हैं कुछ चर्चित बन्ना-बन्नी और लांगुरिया

गाड़ी दो घंटा है लेट, सीट पर सो जा लांगुरिया...
सीट पर सोजा लांगुरिया...नींद तू लेले लागुंरिया.. गाड़ी दो घंटा है लेट...
1-काने से काना मत कहियो, काना जाए रूठ..(2)
ज़रा हौले-हौले बोलियो, ज़रा धीरे-धीरे पूछियो..(2)
अरे कैसे गई तेरी फूट....
गाड़ी दो घंटा है लेट...
2-काले से काला मत कहियो, काला जाए रूठ..(2)
ज़रा हौले-हौले बोलियो, ज़रा धीरे-धीरे पूछियो..(2)
अरे किसने दिया है फूंक...
3-गाड़ी दो घंटा है लेट..
गूंगे से गूंगा मत कहियो, गूंगा जाए रूठ..(2)
ज़रा हौले-हौले बोलियो, ज़रा धीरे-धीरे पूछियो..(2)
बोलना कैसे गया तू भूल...
गाड़ी दो घंटा है लेट....
3-मूरख से मूरख मत कहियो, मूरख जाए रूठ (2)
ज़रा हौले-हौले बोलियो, ज़रा धीरे-धीरे पूछियो..(2)
बुद्धि कैसे हो गई ठूंठ...
गाड़ी दो घंटा है लेट, सीट पर सोजा लांगुरिया..
...........................................................................................................
लांगुरिया

दो -दो जोगनी के बीच अकेलो लागुंरिया...
अकेलो लागुंरिया, माथा फोड़े लागुंरिया...
बड़ी जोगनी यों कहे, कि पिक्चर देखन जाए...
और छोटी जोगनी यों कहे...बाज़ार घुमा दे मोय
किसकी सुने औ किसकी छोड़े, माथा फोड़े लागुंरिया...
दो दो जोगनी के बीच ...
बड़ी जोगनी यों कहे कपड़े सिलवाने जाएं...
और छोटी जोगनी यों कहे कि हार दिला दे मोय...
किसकी सुने औ किसकी छोड़े, माथा फोड़े लागुंरिया...
दो दो जोगनी के बीच ...
छोटी जोगनी यों कहें बरफी खाने का चाह,
और बड़ी जोगनी यों कहें कि गोलगप्पे खिला दे मोय...
किसकी सुने औ किसकी छोड़े, माथा फोड़े लागुंरिया...
दो दो जोगनी के बीच ...
बड़ी जोगनी यों कहें, मेरे संग चलेगा तू...
और छोटी जोगनी यों कहें, तेरे संग चलूंगी मैं...
किसकी सुने औ किसकी छोड़े, माथा फोड़े लागुंरिया...
दो दो जोगनी के बीच ...
.............................................................................................................
बन्ना-बन्नी

बन्ना बुलाए, बन्नी ना आए,आजा प्यारी बन्नी रे, अटरिया सूनी पड़ी
मैं कैसे आऊं, ताऊ जी  खड़े हैं, मैं कैसे आऊं चाचा जी खड़े हैं...
पायल मेरी बजनी रे.., अटरिया सूनी नहीं,
पायल को उतार के, पैरों मोजे डाल के, आजा प्यारी बन्नी रे, अटरिया  सूनी पड़ी...
बन्ना बुलाए, बन्नी ना आए,..
मैं कैसे आऊं मामा जी खड़े हैं, मैं कैसे आऊं मौसा जी खड़े हैं..
बैना मेरी बजनी रे, अटरिया सूनी नहीं,
बैने को उतार को, लंबा घूंघट काढ़ के, आजा प्यारी बन्नी रे.., अटरिया सूनी नहीं..
बन्ना बुलाए, बन्नी ना आए,..
मैं कैसे आऊं नाना जी खड़े हैं, मैं कैसे आऊं दादा जी खड़े हैं...
कंगन मेरे बजनी रे, अटरिया सूनी नहीं,
कंगन को उतार के, सर पे चूनर डार के, आजा प्यारी बन्नी रे... अटरिया सूनी पड़ी..
बन्ना बुलाए, बन्नी ना आए,..
मैं कैसे आऊं जीजाजी खड़े हैं, मैं कैसे आऊं भैया जी खड़े हैं...
झुमका मेरा बजनी रे, अटरिया सूनी नहीं
झुमके को उतार के, चुप्पा चुप्पी मार के...
आजा प्यारी बन्नी रे अटरिया सूनी पड़ी....
.
..........................................................................................................................

खेल का गीत-

रात दिन हो रही है मरम्मत, सूख कर हो गया हूं छुआरा
मेरी बीवी तू जीती मैं हारा...।
बीवी ने मुझसे कचौड़ी मंगाई, कचौड़ी ना लाया तो मारा...
मेरी बीवी तू जीती मैं हारा...रात दिन...
बीवी ने मुझसे कपड़े धुलवाए, कपड़े ना सूखे तो झाड़ा..
मेरी बीवी तू जीती मैं हारा...रात दिन..
बीवी ने मुझसे खाना बनवाया, रोटी जली तो फटकारा..
मेरी बीवी तू जीती मैं हारा...रात दिन..
बीवी ने मुझसे पैर दवबाएं, नींद जो आई तो मारा..
मेरी बीवी तू जीती मैं हारा...रात दिन..

................................................................................................................