Friday, 19 February 2016

देशभक्त ऐसे हों तो देश को देशद्रोहियों की ज़रूरत क्या है... रविश जी को बौद्धिक आतंकवाद फैलाने के लिए साधुवाद


सच में रविश जी कमाल कर दिया आपने, रिपोर्टिंग और एंकरिंग का एक नया आयाम छूने के लिए आपने जो कोशिश की है इसे इलैक्ट्रॉनिक जर्नलिज़्म में आने वाली पीढ़िया भी भुला नहीं पाएंगी। इस अंधेरे ने हमें आवाज़े सुनवाई ऐसी आवाज़े जो हमें उद्वेलित करती हैं, विवेक खोने को मजबूर करती हैं, वो सारी आवाज़े जो यह साबित करती हैं कि देशद्रोह का विरोध करने वाले हम सब भारतवासी और चंद न्यूज़ चैनल्स गलत हैं और आप सही। कितनी आसानी से आपने अपनी बात हम पर सबके मन में बैठा दी और साफगोई और निष्पक्ष होने की वाह-वाही भी लूट ली।
रविश जी आपके इस कार्यक्रम में बहुत आवाज़ो को जगह मिली लेकिन कुछ आवाज़े आपने छोड़ दी. मैं यहां केवल उन आवाज़ों का ज़िक्र करना चाहती हूं।
-आपके कार्यक्रम में उन कुछ लोगों की आवाज़े तो थी जिन्होंने कन्हैया को बिना जांच पूरी हुए देशद्रोही साबित कर दिया, लेकिन वो आवाज़े कहां थी जिन्होंने बिना जांच पूरी हुए कन्हैया को निर्दोष करार दे दिया और जिनमें एक आवाज़ आपकी भी है।
-आपने उन आवाज़ो की बात तो की जो यह कहती हैं कि कन्हैया की रिहाई की मांग करने वाले केवल लेफ्ट छात्र नहीं, बल्कि अन्य भी हैं, लेकिन वो आवाज़े क्यों नहीं सुनवाई जो कहती है कि कन्हैया की गिरफ्तारी की मांग करने वाले केवल एबीवीपी के ही नहीं बल्कि सामान्य लोग भी हैं।
-आपने वकीलों की आवाज़े सुनवाई जो वंदे मातरम के नारे लगा रहे थे, और देशद्रोहियों को गालियां दे रहे थे लेकिन उमर खालिद समेत बहुते से जेएनयू छात्रों के उन नारों की आवाज़ कहा थीं जिनमें वो देश की बर्बादी, और भारत तेरे टुकड़े होंगे जैसे नारे लगा रहे थे। और जिसे आपने डॉक्टर्ड टेप कह दिया (बिना जांच के)।
-आपके कार्यक्रम में उन आवाज़ों को जगह मिल गई जो कहते हैं कि यह देशद्रोह नहीं बल्कि बीजेपी और आरएसएस बिग्रेड द्वारा किया जा रहा भगवा सेफ्रोनाइजेशन का मामला है, लेकिन उन आवाज़ों का क्या हुआ जो कहते हैं कि कांग्रेस और वामपंथी विचारधारा के लोग अपने फायदे के लिए देशद्रोह जैसे मामले पर दोषी छात्रों को बचाने की कोशिश कर रहे हैं।
- आपके कार्यक्रम में जेएनयू टीचर्स की आवाज़ों को जगह मिली लेकिन कर्नल जीडी बख्शी के आंसू क्यों नहीं सुनाई दिए।
-आपने उन चंद बीजेपी ट्वीट्स को जगह दी जो राजदीप सरदेसाई और बरखा को गाली देते हैं और कुछ उन ट्वीट्स को भी, जो उनकी रिपोर्टिंग को सही ठहराते हैं, लेकिन वो हज़ारो ट्वीट्स कहा हैं, जो सामान्य लोगों के थे और जो एनडीटीवी की रिपोर्टिंग, बरखा, राजदीप सरदेसाई सबके द्वारा की गई रिपोर्टिंग को सिरे से नकारते हैं।
आवाज़े तो और भी बहुत हैं लेकिन अगर उनको भी जगह मिल जाती तो शायद आप अपने मनसूबों में कामयाब नहीं हो पाते, जो हर हाल में बीजेपी का विरोध करना चाहते हैं चाहे वो देशद्रोह की कीमत पर ही क्यों ना हो। और फिर हमारी सरकार भी सही समय पर सही कार्रवाई करना नहीं जानती तो सजा तो उसे मिलनी ही चाहिए। एक व्यक्ति की भूल हमेशा ही दूसरे के लिए फायदे का सबब बनती है, जैसा कि इस मामले में हुआ, सरकार की ढीलाई, आप जैसे पत्रकारों को अपनी बातें मनवाने का अवसर दे रही है तो उठाईए अवसर का लाभ।
मेरी चिंता तो बस इतनी है कि इस पूरे मामले ने एक नए तरह के आतंकवाद को जन्म दिया है जिसे कहते हैं बौद्धिक आतंकवाद (इंटलेक्चुल टेररिज़्म)... जो सीधे लोगों की सोच पर प्रहार करता है, ना गोली, ना खून, ना दंगा, ना खर्चा... और रिजल्ट- सौ फीसदी। देश के अंदर ही पनपने वाले इस आतंकवाद के चलते देश को दूसरे आतंकवादियों की तो ज़रूरत ही नहीं रही है। बहुद जल्दी आप और आप जैसे लोग अन्य देश विरोधी ताकतों का मोहरा बनेंगे, इस आतंकवाद को फैलाने और भारत और भारतीयता की जड़ को हिलाने के लिए...।