Saturday, 30 January 2016

जानलेवा पढ़ाई

  • लगातार बढ़ रहे हैं छात्र-छात्राओं द्वारा आत्महत्या करने के मामले
  • मां-बाप की अपेक्षाओं के चलते गहरे मानसिक दवाब में जी रहे हैं किशोर

  • 2014 में 2403 छात्र-छात्राओं ने फेल होने के डर से मौत को गले लगाया






गाज़ियाबाद के मशहूर कॉलेज से बीटेक कर रही रितुपर्णा की दिनचर्या देखें- सुबह 8 बजे वो सोकर उठती है और 9 बजे तक तैयार होकर, नाश्ता वगैरह करके कॉलेज चली जाती है। लौटते हुए लगभग साढ़े चार-पांच बज जाते हैं। आने के तुरंत बाद रितु खाना खाकर सो जाती है और इसके बाद रात को नौ बजे उठकर सुबह चार बजे तक शांति में पढ़ाई करती है। सुबह चार बजे सोने के बाद वो सीधे आठ बजे स्कूल जाने के समय पर उठती है। इम्तहान के दिनों में यह रुटीन बदल जाता है, कॉलेज से 12-1 बजे तक आ जाने के बाद रितु 5 बजे तक दिन में भी पढ़ाई करती है। 

यहीं नहीं छुट्टी के दिन रितुपर्णा स्पेशल क्लासिस के लिए अपने सर के पास भी जाती है। जब हमने उससे पूछा कि इतनी ज्यादा पढ़ाई करने की क्या आवश्यकता है जबकि यह कोई आईआईटी या मेडिकल की तैयारी नहीं है, तो उसका कहना था कि कॉलेज की पढ़ाई और कोर्स बहुत ज्यादा है। पापा ने इतने पैसे खर्च करके मेरा एडमिशन कराया है। अगर मैं पढ़कर अच्छे नंबर नहीं लाई तो उन्हें खराब लगेगा। और फिर मैं आगे किसी कॉम्पटीटिव एक्ज़ाम में कैसे निकल पाऊंगी...? कैसे उनके सपनों को पूरा कर पाऊंगी? कैसे अपनी पहचान बना पाऊंगी...?  

ऐसा करने और सोचने वाली केवल रितु ही नहीं। यकीनन रितु की तरह आपके आस-पास भी ऐसे ही कितने बच्चे, किशोर होंगे जो अपने मम्मी-पापा की अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए दिन-रात मेहनत कर रहे हैं। छोटी सी उम्र में उन्होंने अपने ऊपर आपके सपनों और आकांक्षाओं का बोझ लादकर जीना सीख लिया है। पर क्या हर बच्चा यह दवाब झेल पाता है? तब क्या होता है जब वो इस बोझ को ढो नहीं पाते, आपकी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाते...और मौत को गले लगा लेते हैं। 

याद है सुपरहिट फिल्म थ्री ईडियट्स फिल्म का वो सीन, जब एक छात्र केवल इसलिए फांसी के फंदे पर झूल जाता है क्योंकि डायरेक्टर उसे फेल कर देते हैं। पढ़ाई का प्रेशर और खासतौर पर एक अच्छे स्कूल में जाने, अच्छा करियर बनाने वाले कोर्स में चुने जाने का मानसिक दबाब इतना ज्यादा है कि बच्चे जो खुद बनना चाहते हैं, वो मां-बाप को बताने से पहले भी उन्हें सौ बार सोचना पड़ता है।

लगभग हर हफ्ते, पंद्रह दिन में हम अखबारों में किसी ना किसी छात्र या छात्रा द्वारा परीक्षाओं/पढ़ाई के दबाब में खुद की जान ले लिए जाने की खबरें पढ़ते हैं। दसवीं और बारहवीं बोर्ड परीक्षाओं के दौरान इन आत्महत्याओं का सिलसिला और बढ़ जाता है। 

पिछले ही दिनों राजस्थान की कोचिंग नगरी, कोटा ने यहां बड़े पैमाने पर छात्रों द्वारा की जा रही आत्महत्याओं के चलते अखबारों के पन्नों पर जगह बनाई थी। साल 2015 में यहां इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज में एडमिशन की तैयारी करने में जुटे 31 बच्चों ने खुदकुशी कर ली। प्रतियोगी परीक्षा में उत्तीर्ण होने की उम्मीद में यहां की कोचिंग क्लासेज़ में दाखिला लेने वाले कई किशोर व युवा अत्यधिक प्रतियोगी माहौल और कड़े पढ़ाई के रुटीन के चलते गहरे मानसिक दबाब में जीते हैं।

 माता-पिता अक्सर अपने बच्चों से इस तरह की बातें कहते हुए सुने जा सकते हैं कि- पढ़ लो, मस्ती करने के लिए पूरी ज़िंदगी पड़ी है.., नेहा को देखा, कितनी होशियार है, एक बार में सीपीएमटी में निकल गई, मेहनत करती है वो, और तुमसे तो उम्मीद लगाना ही बेकार है..., पढ़ लोगे, मेहनत कर लोगे तो अच्छी जगह एडमिशन हो जाएगा, कहीं निकल जाओगे, वरना ज़िंदगी ऐसे ही गुज़र जाएगी...., तुम्हारी पढ़ाई-लिखाई पर बहुत पैसा खर्च कर रहे हैं हम, कुछ तो अच्छा रिजल्ट लाके दिखा दो... वगैरह, वगैरह..। 



बच्चों पर इस कदर आकांक्षाओं और अपेक्षाओं का बोझ लाद दिया जाता है कि उन्हें पढ़ाई करना और अच्छे नंबर लाना ही ज़िदगी जीने की मकसद लगने लगता है।  


पीयूष वर्मा की कहानी

20 वर्षीय पीयूष (बदला हुआ नाम) ने केवल इसलिए अपनी कलाई काट कर जान देने की कोशिश की क्योंकि वो मेडिकल कॉलेज के फर्स्ट ईयर की परीक्षा में एक विषय में फेल हो गया था। तुरंत चिकित्सकीय सहायता ने उसकी जान तो बचा ली लेकिन उसकी मानसिक स्थिति को सामान्य करने के लिए अभी तक काउंसलिंग चल रही है। 

जब पीयूष से इस स्थिति में आने का कारण पूछा गया तो पता चला कि उसने तीन साल तक मेडिकल के एंट्रेस एक्ज़ाम के लिए कोचिंग की थी जिसके बाद उसका डेंटल में सलेक्शन हुआ। काफी डोनेशन देकर उसके डैडी ने उसे एक अच्छे कॉलेज में दाखिला दिलाया। उसके परिवारवालों ने उसकी पढ़ाई पर काफी पैसा खर्च किया था और उनको पीयूष से काफी उम्मीदें थी, ऐसे में जब वो पहली ही साल फाइनल्स में फेल हो गया तो उसकी अपने मम्मी –पापा को फेस करने की हिम्मत नहीं हुई और उसने यह कदम उठाना उचित समझा।

क्या कहते हैं मनोवैज्ञानिक

गाज़ियाबाद के प्रतिष्ठित मनोवैज्ञानिक डॉक्टर सारंग देसाई का मानना है कि बच्चों को इस स्थिति में पहुंचाने के लिए आज का प्रतियोगी युग सबसे ज्यादा जिम्मेदार है जिसके चलते मां-बाप अपने बच्चों से बहुत ज्यादा उम्मीदें लगाते हैं।

 हांलाकि डॉक्टर देसाई यह भी कहते हैं कि आजकल खासकर महानगरों में एक पॉजिटिव ट्रेंड यह उभरा है कि मां-बाप बच्चों केवल पढ़ाई ही नहीं बल्कि उनकी पसंद के और क्षेत्रों में भी जाने का मौका देने लगे हैं। लेकिन यह प्रतिशत काफी कम है। बदलाव धीरे-धीरे आ रहा है। पर अधिकतर छोटे नगरों के युवा, जिनके मां-बाप अपनी जीवन भर की पूंजी दांव पर लगाकर उन्हें महानगरों में पढ़ने के लिए भेजते हैं, के ऊपर अपेक्षाओं का दवाब बहुत ज्यादा होता है। 

आजकल की फिल्मों, सीरियल्स, इंटरनेट सभी पर बाज़ारवाद हावी है जिसने इसे घर-घर तक पहुंचा दिया है। यह बाज़ारवाद हमें ज्यादा खर्चा करने, अच्छे से रहने, अच्छा खाने, अच्छा पहनने और अपनी हर ज़रूरत को पूरी करने के लिए प्रेरित करता है। यह ज़रूरतें पूरी करने के लिए ज़रूरी है अच्छी नौकरी या वाइट कॉलर जॉब और इसके लिए ज़रूरी है पढ़ाई, बहुत ज्यादा पढ़ाई। ज़ाहिर हैं मां-बाप भी आज के इस बाज़ारवाद और प्रतियोगिता के युग में अपने बच्चे को पिछड़ते हुए नहीं देखना चाहते और उनके जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य बन जाता है अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाना। 

अपेक्षाओं का बोझ मां-बाप से होता हुआ कब बच्चों तक पहुंच जाता है, वो समझ भी नहीं पाते और बच्चे इन अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर पाने के अपराध बोध में दबकर आत्महत्या जैसे कदम उठा 
बैठते हैं।

इस समस्या से निबटने का हल बताते हुए डॉक्टर देसाई कहते हैं कि आज के युग में ज़रूरी यह है कि अपने बच्चों के साथ मित्रवत रिश्ता कायम किया जाए। उन की परेशानियों को सुनकर, उनकी इच्छाओं को सम्मान देकर और उनके सोच पर ध्यान देकर काफी हद तक इस दवाब पर लगाम लगाई जा सकती है।   


आत्महत्या रोकने के लिए हैल्पलाइन चलाने वाली समाज सेवी संस्था आसरा की साइट पर उपलब्ध आंकड़े देखें तो-

  • निमहंस की एक स्टडी के अनुसार भारत के 72 फीसदी छात्र इम्तहान के दवाब को झेलने में असमर्थ हैं।
  • यूनेस्को के अनुसार विश्व के 50 फीसदी बच्चें किसी ना किसी दवाब में बड़े हो रहे हैं।
  •  निमहंस की स्टडी के अनुसार हर 20 आईटी प्रॉफेशनल्स में से एक आत्महत्या करने का मन बनाता है।
  • पिछले पांच सालों में युवाओं के बीच डिप्रेशन 2 फीसदी से बढ़कर 12 फीसदी तक पहुंच चुका है।
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन की स्टडी बताती है कि विश्व के हर दस छात्रों में से एक छात्र कड़े दवाब में जी रहा है।

डराते हैं नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरों की साइट पर उपलब्ध ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि छात्रों में इम्तहान के दबाव चलते मौत को गले लगाने की प्रवृत्ति लगातार बढ़ रही है।




  • साल 2014 में भारत में 1,31,666 लोगों ने आत्महत्या की जिनमें से 2403 छात्र थे। इन सभी ने परीक्षाओं में फेल होने के कारण या पास होने के दवाब के चलते अपनी जान ली।
  • इम्तहानों के दवाब के चलते आत्महत्या करना, भारतीयों द्वारा आत्महत्या किए जाने के प्रमुख दस कारणों में छठे स्थान पर आ पहुंचा है। यह पिछले साल 1.8 फीसदी मामलों में आत्महत्या की वजह रहा।    
  • चौंकाने वाली बात यह है एक्ज़ाम्स का यह दवाब केवल किशोरों या युवाओं को ही नहीं बल्कि बच्चों को भी निशाना बना रहा है। 14 साल से कम उम्र के बच्चों में भी परीक्षा में फेल होना, आत्महत्या करने की तीसरी प्रमुख वजह रही जिसके कारण पिछले वर्ष 163 बच्चों (91 लड़के, 72 लड़कियां) ने आत्महत्या की।
  • आंकड़े बताते हैं एक्ज़ाम के दवाब के चलते आत्महत्या के मामलों में लगातार बढ़ोत्तरी का ट्रेंड देखा जा रहा है और यह ट्रेंड देश की मेगा सिटीज़ में ज्यादा देखने को मिल रहा है। 

एक बात हमारी भी सुनें

इतनी सारी बातें लिखने, आंकड़े पेश करने और उदाहरण देने के पीछे हमारा मकसद केवल माता-पिताओं तक यह संदेश पहुंचाना हैं कि अपने बच्चों पर पढ़ाई का दबाब इतना भी मत डालिए कि वो कुम्हला जाएं। जिन बच्चों के बहाने आपने अपनी ज़िंदगी के सपने पूरे करने के सपने देखे हैं, अगर वहीं नहीं रहेंगे तो क्या करेंगे आप? बाद में पछताने से बेहतर है अभी समझदारी का कदम उठाया जाए। पढ़ाई बच्चों के लिए ज़रूरी है, पर उनकी ज़िंदगी का एकमात्र मकसद नहीं। क्या होगा अगर वो फर्स्ट नहीं आ पाएंगे, प्रतियोगी परीक्षाओं में नहीं निकल पाएंगे, इंजीनियर नहीं बनेंगे, डॉक्टर नहीं बनेगें... शायद सबसे अलग, कुछ छोटा काम करें, लेकिन कम से कम खुश तो रहेंगे। हम नहीं कहते कि आप अपने बच्चों को पढ़ाई और करियर बनाने के लिए प्रोत्साहित करना छोड़ दें, बस इतनी गुज़ारिश है कि उन पर अपनी आकांक्षाओं और कड़े नियमों का इतना बोझ ना लादें कि उन्हें पर फैलाने की जगह ही ना मिलें।  

Friday, 22 January 2016

वो इस्लाम और मुसलमानों के लिए कुछ भी नहीं लिख सकते, क्योंकि लेखकों को भी अपनी जान की परवाह है ..एक लेखक का साक्षात्कार


सुनने में अजीब लग सकता है, लेकिन यहीं सच है। अभी हाल ही में मशहूर निर्माता-निर्देशक करन जौहर ने बयान दिया है कि देश में फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन एक मज़ाक बन कर रह गया है। हम उनकी बात से इत्तिफाक तो नहीं रखते लेकिन यह ज़रूर मानते हैं कि कुछ मामलों में फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन बिल्कुल भी लागू नहीं होता। जी हीं डंडे की मार और जान जाने के डर से कुछ क्षेत्रों में सारी 'फ्रीडम ऑफ स्पीच' की हवा निकल जाती है। और यह निषेध क्षेत्र है 'इस्लाम'।
यह हम नहीं कह रहे, यह कहना है एक लेखक का। मशहूर लेखक अजय कंसल जो धर्म की  उत्पत्ति  के ऊपर लिखी गई अपनी किताब "द इवॉल्यूशन ऑफ गॉड (The Evolution Of Gods- The scientific Origin of Divinity and Religion)" को लेकर चर्चा में हैं, और जिनकी किताब अमेज़न ई-बुक की बेस्टसेलर्स में से एक बनी हुई है, और जिसका हिन्दी अनुवाद "मनुष्य ने देवताओं को बनाया" विवादों और विरोध के चलते बाज़ार से वापस लिया जा चुका है..,  भी यह मानते हैं कि लेखकों के लिए इस्लाम के खिलाफ लिखना आसान नहीं हैं, क्योंकि लेखकों को भी अपनी जान प्यारी है। 

क्या कहती है 'द इवॉल्यूशन ऑफ गॉड्स"

हम आपको बता दें कि अजय कंसल ने अपनी किताब 'द इवॉल्यूशन ऑफ गॉड्स' में सिलसिलेवार ब्यौरा दिया है कि किस तरह इंसान ने अपने डर को नाम देने के लिए और उन सभी बातों को किसी की करनी बनाने के लिए जो कि उनकी समझ से परे थी, भगवान, धर्म और विभिन्न पूजा विधियों का अविष्कार किया। अजय कंसल ने अपनी किताब में जिक्र किया है कि किस तरह मनुष्य ने भगवान और उसके स्वरूप को गढ़ा। किताब में सभी धर्मों जैसे ईसाईं, हिन्दू, सिख, यहूदी, बौद्ध धर्म आदि की शुरूआत, विकास और वर्तमान स्वरूप के बारे में विस्तार से  चर्चा की गई है। नास्तिकों के लिए तोहफा समझी जाने वाली इस किताब में साफ लिखा है कि भगवान नहीं है बल्कि लोगों ने अपनी सुविधानुसार उन्हें गढ़ा है। 

अजय कंसल ने सभी धर्मों और उनकी कमियों के बारे में खुलकर लिखा है। उनकी किताब में यह भी कहा गया है कि हिन्दू धर्म के स्तंभ माने जाने वाले वेदों में कोई ज्ञान वगैरह की बातें नहीं बल्कि देवताओं की चापलूसी से भरे मंत्र हैं जिन्हें पुराने ज़माने में लोग अनदेखे देवताओं को खुश करने के लिए और अपनी संतुष्टि के लिए बोला करते थे। वो दावा करते हैं कि रामायण और महाभारत केवल कहानियां हैं जिन्हें महाकाव्य के रूप में लिखा गया है। राम और कृष्ण केवल इन कहानियों के नायक हैं ना कि भगवान। खास बात यह है कि सभी धर्मों के रूप और उसकी विसंगतियों पर बात करने वाली इस किताब में इस्लाम को केवल छूआ भर गया है। इसके बारे में या इसकी विसंगतियों के बारे में कोई बात नहीं की गई। इस किताब के विषय, लेखन आदि को लेकर हमने लेखक अजय कंसल से बात की। प्रस्तुत हैं उसके अंश-


-क्या वजह थी कि आपने धर्म और भगवान जैसे विषय को अपनी पहली किताब के लिए चुना?
  
कॉलेज के दिनों से मैं ओशो, रजनीश को काफी पढ़ता था। ये हमेशा कहते थे कि भगवान तुम्हारे अंदर है। इस विषय में दिलचस्पी तभी से शुरू हुई। फिर मैंने केरेन आर्मस्ट्रॉंग की मशहूर किताब 'हिस्ट्री ऑफ गॉड्स' पढ़ी। जिसके बाद मुझमें इस विषय को पढ़ने और इस पर लिखने की इच्छा जागी। अपने डॉक्टरी पेशे के दौरान भी मैंने बहुत से मरीजों को दुखी होते देखा, वो भगवान को मानते थे, सुखी रहने के लिए उनकी पूजा करते थे, तब भी दुखी रहते थे। उनको देखकर लगता था कि भगवान कहां है और अगर वो है तो उसका यह कैसा न्याय है। वो खुद को मानने वाले लोगों को इतने दुख कैसे दे सकता है। इस दौरान  कर्म, पुर्नजन्म, आत्मा जैसी कई अवधारणाओं के बारे में मेरी दिलचस्पी बढ़ने लगी। जैसे जैसे पढ़ता गया, समझ में आता गया कि यह सारी बातें लोगों ने खुद गढ़ी हैं। काफी किताबों में इनका ज़िक्र है लेकिन उनमें बहुत गरिष्ठ भाषा में यह सब लिखा गया है। इन सब बातों को एक साधारण आदमी की भाषा में समझाने के लिए  अौर अपनी सोच को शब्द देने के लिए मैंने इस पर किताब लिखने का निर्णय किया।  

-आपने कहा कि लोगों को दुखी होते देखकर आपके अंदर प्रश्न उठा कि भगवान निर्दोषों को सज़ा क्यों देता है, लेकिन गीता इसका जवाब देती है। गीता में लिखा है कि दुख-सुख आदि सब पूर्वजन्मों के कर्मों का फल है। 

इस सवाल के जवाब में मैं अपने एक नाटक का ज़िक्र करना चाहूंगा, जिसमें रामलाल नाम के एक शख्स को इतने दुख मिलते हैं कि वो परेशान होकर भगवान से लड़ने पहुंच जाता हैे। रामलाल, भगवान से पूछता है कि क्यों आप मुझे इतने दुख दे रहे हो जबकि मैंने कभी किसी का बुरा नहीं किया, आपको इतना मानता हूं। इस पर भगवान कहते हैं कि तेरे दुखों का कारण तेरा पिछला जन्म हैं। तू पिछले जन्म में जग्गा डाकू था और तूने बहुत से निरपराधों को मारा था इसलिए इस जन्म में तुझे दुख मिल रहा है। इस बात पर रामलाल भगवान से पूछता है कि जिस जग्गा ने इतने अपराध किए वो तो ऐश-ओ-आराम की ज़िंदगी भोग के 70 साल में मरा, उसको तो तुमने दंड दिया नहीं और अब मुझे उसका अगला जन्म बताकर सज़ा दे रहे हो, यह कैसा न्याय है तुम्हारा? और फिर मैं तो रामलाल हूं। मुझमें जग्गा डाकू का क्या है?
इस प्रश्न के जवाब में भगवान कहते हैं कि तुझमें जग्गा की आत्मा है इसलिए तू उसके किए का पाप भोग रहा है। अब रामलाल बिफर उठता है और गुस्सा होकर कहता है कि -  कैसी बात कर रहे हो भगवान, तुम्हीं कहते हो कि आत्मा अजर-अमर हैं, वो कोई पाप या पुण्य नहीं करती, जो करता है शरीर करता है। जग्गा डाकू का शरीर तो अब रहा नहीं, फिर तुम इस शरीर को कैसे उसके हिस्से का दंड दे सकते हों...? 
रामलाल की तरह यह सवाल हम सबको भी खुद से पूछने की ज़रूरत है। हम कैसे मान सकते हैं कि पूर्वजन्म के पापों के कारण हमें इस जन्म में सजा मिल रही है? सच तो यह है कि कर्मों और आत्मा की यह अवधारणा ही गलत है।

-अच्छा यह बताईए, आपने अपनी किताब में हिन्दु, सिख, ईसाईं, बौद्ध समेत लगभग सभी धर्मों की बात की है फ़िर इस्लाम के ऊपर कोई भी सवाल क्यों नहीं उठाया? आपने इस्लाम को क्यों छोड़ दिया?

भैया, मुसलमान अपने धर्म के बारे में कुछ भी सुनने या समझने को तैयार नहीं हैं, यह सभी जानते हैं। वो बहुत जल्दी इस्लाम के खिलाफ कुछ भी कहने वालों के दुश्मन बन जाते हैं। और मेरा मानना है कि भारत सरकार मुझे इस्लामिक लोगों के कोप से बचाने में समर्थ नहीं हैं। ऐसे में इस्लाम के बारे में लिखकर मैं अपनी जान के ऊपर आफत क्यों मोल लूं। मैंने इस्लाम के ऊपर भी एक चैप्टर लिखा था लेकिन बाद में उसे किताब से हटा दिया क्योंकि यह सभी जानते हैं कि और सभी धर्मों के लोग टॉलरेंट हैं, लेकिन इस्लाम को छूने पर भी जान मुश्किल में आ जाती है। उसके बारे में लिखकर अपने घर पर पत्थर थोड़े पड़वाने हैं। 

-मतलब आप यह मानते हैं कि इस्लाम में भी विसंगतिया हैं लेकिन मुस्लिमों के डर के कारण उसके बारे में आपने लिखा नहीं। 

बिल्कुल विसंगतियां तो सभी धर्मों में हैं, सभी धर्म और भगवान इंसान ने ही बनाए हैं। लेकिन अपनी जान की बाज़ी लगाकर लेखन करने का मेरा कोई इरादा नहीं। 

-आपने अपनी किताब में गणेश जी द्वारा दूध पीने की घटना का ज़िक्र किया है और इसे सोची समझी स्कीम के तहत की गई घटना करार दिया है। इस बारे में आपके तर्क मान भी लिए जाएं तो अभी भी ऐसी बहुत सी घटनाएं हैं जिनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं हैं। उदाहरण के तौर पर ज्वाला जी में ज्वाला का जलना और अमरनाथ जी में हर साल बर्फ का शिवलिंग बनना आदि। 

इन दोनों ही घटनाओं के वैज्ञानिक आधार हैं, यह बात अलग हैं कि हिन्दु मान्यताओं और प्रोपेगेंडा के चलते वो आधार जनता तक पहुंचे नहीं हैं। और भी अन्य ऐसी बातें या चमत्कार अगर हैं भी तो सिर्फ इसलिए हीं वो भगवान की लीला नहीं बन जातीं क्योंकि विज्ञान उनका जवाब देने में असमर्थ है। विज्ञान का निरंतर विकास हो रहा है, आज नहीं तो कल बाकी सभी चमत्कारों का भी वैज्ञानिक आधार ज़रूर साबित होगा।  

-आपने लिखा है कि गायत्री मंत्र, महामृत्युंजय मत्र और अन्य सभी मंत्र दरअसल देवताओं की चापलूसी से भरी कविताएं हैं और उनकी प्रशंसा करके उन्हें खुश करने के लिए लिखे गए हैं, इसके अतिरिक्त उनका कोई महत्व नहीं है। जबकि योग करने वाले और बहुत से साउन्ड शोधकर्ता इन मंत्रों के मस्तिष्क पर  पड़ने वाले सकारात्मक प्रभाव को मानते हैं, सिद्ध कर चुके हैं, इस बारे में आप क्या कहेंगे? 

ऐसा कुछ भी नहीं है, यह सब बेकार की बाते हैं। यह सारी बातें व्यावहारिक कम और मनोवैज्ञानिक ज्यादा हैं। जब कोई योगा करते समय आपसे कहता है कि आप इस मंत्र को बोलकर शांत महसूस करेंगे तो आप पर मनोवैज्ञानिक असर होता है और आपको लगता है कि आप शांत महसूस कर रहे हैं जबकि हकीकत में ऐसा कुछ नहीं है। इनका ऐसा कोई शोध भी कहीं उपलब्ध नहीं हैं। यह सब प्रॉपेगेंडा है और कुछ नहीं। 

-आप रामायण और महाभारत को भी केवल कहानियां बताते हैं जबकि द्वारका नगरी के तो पुरातत्ववेत्ताओं को प्रमाण भी मिल चुके हैं।

जी हां, रामायण और महाभारत केवल कहानियां हैं, बड़ी कहानियां जिन्हें सामान्य भाषा में नॉवेल भी कहा जा सकता है। अगर इनका वाकई कोई प्रमाण होता तो यह माइथोलॉजी में नहीं बल्कि इतिहास में पढ़ाई जातीं। 

-आपकी किताब हिन्दू धर्म को बहुत से धर्मों का मिश्रण कहती है जबकि लोगों का मानना है कि हिन्दू धर्म सबसे प्राचीन धर्म हैं। 

जी नहीं, हिन्दू धर्म का वर्तमान स्वरूप बौद्ध धर्म से विकसित हुआ है। पुनर्जन्म, कर्म और कर्म के अनुसार फल मिलने की बातें भी सबसे पहले बुद्ध ने ही की थीं। हिन्दू धर्म धीरे-धीरे विकसित हुआ है। हमें जिस धर्म की जो बात अच्छी लगती गई, उसे हम अपनाते गए। जैसे पहले हिन्दू धर्म में बलि का प्रावधान था, लेकिन गौतम बुद्ध ने जब अहिंसा का संदेश दिया और वो धर्म तेज़ी से फैला तो हिंदु धर्म में इसी शिक्षा को अपना लिया गया। चूंकि बुद्ध इतने प्रभावशाली थे, उनकी शिक्षाओं का इतना असर था इसलिए हिन्दू धर्म ने उन्हें भी विष्णु का अवतार बताकर अपना लिया जबकि यह दोनों बिल्कुल अलग धर्म थे। बुद्ध ने कभी मूर्ति पूजा या मंदिरों को प्रोत्साहन नहीं दिया जबकि हिन्दू धर्म में मन्दिर बनाए जाते थे और मूर्ति पूजा होती थी। 

-आगे आपकी क्या योजनाएं हैं। और क्या लिखने वाले हैं? 

फिलहाल तो मैं एक रोमांटिक फिक्शन पर काम कर रहा हूं। यह आजकल के व्यावहारिक प्यार और प्यार करने वालों पर आधारित होगी। यह लगभग पूरी हो चुकी है, हिंदी अनुवाद भी तैयार है। इसका हिंदी नाम फिलहाल जो मैंने सोचा है वो है- झूठमेव जयते। अंग्रेजी नाम अभी फाइनल नहीं हुआ है, फिलहाल इसके लिए पब्लिशर्स से बात चल रही है।  आगे मैं आजकल के ढोंगी बाबाओं पर भी एक किताब लिखने के बारे में सोच रहा हूं।  

अपनी तरफ से कुछ कहना चाहेंगे। 
 मैं अपने पाठकों से बस यहीं कहना चाहूंगा कि किसी भी विषय को वर्जित समझकर नकारें नहीं बल्कि खुले दिमाग से उसके बारे में लिखी गई बातों को पढ़े, समझें और फिर किसी निष्कर्ष पर पहुंचे। दूसरों की कहीं हुई बातों पर नहीं बल्कि अपनी बौद्धिक और तार्किक क्षमता पर भरोसा रखिए। बाकी खुश रहिए, पढ़ते रहिए।   

आपके अगर लेखर अजय कंसल से कुछ सवाल हैं तो आप उनसे ट्विटर पर जुड़ सकते हैंं।  
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