Wednesday, 19 November 2014

वो मास्टर स्प्रेयर बनना चाहता है ताकि एक दिन में पांच घरों में पेस्टिसाइड्स का छिड़काव कर सकें और उसकी तन्ख्वाह साढ़े पांच हज़ार से आठ हज़ार रुपए हो जाए... 'एक पेस्ट कंट्रोलर की कहानी'

कुछ ऐसे लोग होते हैं जिन्हें हम शायद लोगों में गिनते ही नहीं। वो भीड़ का हिस्सा भी नहीं होते, बल्कि शायद उनका किनारा होते हैं... भीड़ में सबसे पीछे खड़े लोग जिन्हें भीड़ में भी जगह नहीं मिलती... यह कहानी भी ऐसे ही इंसान प्रदीप की है.. जिनकी इस दुनिया में उपस्थिति को हमने कभी शायद एक सोच भी नहीं बख्शी होगी...


19 साल का प्रदीप, लक्ष्मी नगर दिल्ली की एक पेस्ट कंट्रोल कंपनी में काम करता है- और एक महीने में लगभग 78 घरों में ज़हरीले पेस्टिसाइड्स, इन्सेक्टिसाइड्स और अन्य दवाईयों का छिड़काव करता है, यानि रोज़ लगभग 2 से ज्यादा घरों में।

'पेस्टिसाइड स्प्रेयर' बनना प्रदीप का सपना कभी भी नहीं था। वो तो मधुूबनी, बिहार के अपने गांव से दिल्ली इसलिए आया था कि कहीं चपरासी या कोई और छोटी मोटी नौकरी करके अपनी गुजर कर सके और अपने मां-बाप के पास पैसा भेज सके। 17 साल का प्रदीप यहां अपने एक दूर के रिश्तेदार के भरोसे चला आया था जो कहीं चपरासी की ही नौकरी करता था। प्रदीप जब यहां आकर अपने उस रिश्तेदार से मिला तो हकीकत पता लगी। पता चला कि वो तो दरअसल पेस्ट कंट्रोल कंपनी में काम करता है और घरवालों को झूठ बता रखा है कि कहीं चपरासी का काम करता है। रिश्तेदार ने जब प्रदीप को जिंदगी की कड़वी सच्चाई का आईना दिखाया तो उसने जाना कि नौकरी मिलना कितना मुश्किल है। आखिरकार मिन्नतें करके उसी रिश्तेदार की मदद से  प्रदीप ने खुद को भी एक पेस्ट कंट्रोल कंपनी में लगवा लियां। 



अब यहां काम करते तीन साल होने को आए। एक हरे कपड़े के थैले में ज़हरीले पेस्टिसाइड्स और पीतल की स्प्रे कैन... अब यहीं प्रदीप के साथी हैं। अपने इन औजारों से प्रदीप को बड़ा प्यार है। रोज़ इन्हीं को लेकर प्रदीप आधुनिक, सजे-धजे, दिल्ली, नौएडा, गाज़ियाबाद और गुड़गांव के घरों में जाता है और वहां पेस्टिसाइड्स का छिड़काव करता है।

प्रदीप इन खतरनाक पेस्टिसाइड्स का छिड़काव बिना किसी मास्क या दस्तानों के करता है। प्रदीप का कहना है कि अब यह ज़हरीली दवाईयां मेरी दोस्त बन गई हैं। मुझे इनमें सांस लेने की और मेरे हाथों को इन्हें छूते रहने की इतनी आदत पड़ गई है कि अगर मैं मास्क और दस्तानों का इस्तमाल करूंगा तो शायद मुझे बीमारी हो जाए, वरना तो होने से रही। शुरूआत में एक आध बार बेहोशी जैसा लगता था तो मालिक डॉक्टर को तुरंत बुला देता था। पर अब तो आदत पड़ गई है। 

 वो बताता है कि पैसा ज़रूर कम है लेकिन इस काम में कोई टैंशन नहीं है। महीने में तीन दिन की छुट्टी मिलती है और साढ़े पांच हज़ार की तन्ख्वाह, अगर छिड़काव करवाने वाले घरों से दोबारा कीड़े, दीमक, खटमल आदि पैदा होने की कोई कम्प्लेन्ट महीने भर तक ना आए तो मालिक पांच सौ रुपए ऊपर से ईनाम बतौर देता है। 

अपने रिश्तेदार की तरह अपने घरवालों को अपने काम की सच्चाई प्रदीप ने भी नहीं बताई है, कहता है कि उन्हें पता चलेगा तो बड़ा दुख होगा। गांव में उसके माता-पिता, एक बड़ा भाई हैं। भाई वहीं नौकरी करता है और थोड़ा बहुत खेत है जिससे  मां-बाप का गुज़ारा होता है। प्रदीप चाहकर भी उनके लिए पैसे नहीं भेज पाता। कहता है कि मेरे लिए ही पूरा नहीं पड़ता, उनके लिए क्या भेजूं। 

प्रदीप का सपना है कि वो जल्द ही एक मास्टर स्प्रेयर बन जाए और कम से कम एक दिन में पांच घरों को कवर करने लगे, तब मालिक उसकी तन्ख्वाह में ढाई हज़ार की बढ़ोत्तरी कर देगा और उसे नए लोगों को काम सिखाने का मौका भी मिलेगा और तब शायद कुछ बचे तो वो अपने घरवालों को भेज भी सकता है...।






Getting my 9 year old son enrolled in a new school is the biggest worry I have in mind while moving in my Home that is 20 kilometers away from the home we have been staying for past 8 years



Yes, that is true... Gone are the days when you are happy while moving into your own home as it brings stability to your life & peace in your mind. Things are different if you are a resident of Delhi/NCR. Here, moving into your own home does not give more happiness than it gives a reason to worry about. With my own base, I'll also have to Shift My son's base... His school. Any number of Parents who have gone through the trauma of finding a good education institute (esp in Delhi, NCR) for their young ones, can easily understand my woes.

I still remember those days, six years back when we were looking for a good school for our son. We went to all the schools in vicinity & filled forms. Finally he got admission in nursery in Bal Bhawan school (that was listed 2nd lowest in the schools list) . Once his admission was confirmed,  school staff -in a very sophisticated manner, started  punching a big hole in our pocket. They asked us to submit admission fees- that included registration fee, tuition fee, enrollment fee, annual charges & several other charges. They also asked us to pay 8 thousand rupees more, of which they did'nt give any receipt of ....; but we were happy & relaxed.., finally our admissionathon had finished.

And now we again have to take part in that maddening admissionathon. We are moving in a new house, so have to register our child in a new school. Bracing ourselves for the battle ahead... we'll be going school to school, filling costly admission forms (they cost from 1000 rs to 3500 rs). Mind it, this admission form fee is non refundable & doesn't guarantee your ward's admission in the same school. This, actually, is fee for applying for admission in the  school. But this fee & and money part actually are no big issues..., the most scary thing is the humiliation that school authorities cause to the parents while the admission process goes on.

Even if you have fed them with a big amount just to fill that registration form... you can't call them to ask if your child has been selected..., no matter what, you have no right to question their decision of choosing other children over your child... Come what may, you have to be there on interview call otherwise your application will become a subject to cancellation... & once, if by the grace of school authorities, your child gets a nod of them, you have to submit hefty sum of money within the stipulated time frame of 10 to 20 days (this fee figure is somewhere between 70,000 to 1.5 lacs & that is non refundable. in case you change your mind & don't want your child to enroll in the same school you'll have to bear the loss of that amount. Also, if you want to wait for selection list of another school, you can't).      
    
Same is gonna happen again... my condition can better be described as....
..  own home (wooooow), better home ( wooooow), shifting (just ok), packing shacking (can be done as we are moving to our own home).,  change of school for your child (.. noooooooo, be ready to take the pain... hours of searching for a good school ..., long queues in front of form windows... & oohh, aahhh, oouch...G...O....D)... why are we moving, we should better live in rented home here.... bu..hu..huhu..sob..sob..