Sunday, 21 September 2014

क्या है विक्रम सम्वत और क्यों है भारतीय पंचांग अंग्रेजी कैलेण्डर से बेहतर ?



विक्रम संवत की शुरूआत उज्जैन के महाप्रतापी राजा विक्रमादित्य ने की थी। उन्होंने राजसत्ता संभालने का शुभारम्भ करने के लिए सृष्टि के पहले दिन अर्थात चैत्रा शुक्ल प्रतिपदा को चुना था। आज से 2069 वर्षों पूर्व वे उज्जैन की राजगद्दी पर बैठे थे और उस दिन की याद में उन्होंने अपने नाम पर विक्रम संवत चलाया था। यह संवत चन्द्रमा की गति (कला) पर आधरित है, इसलिए इसे चन्द्र वर्ष कहा जाता है।

इसे समझने से पहले भारतीय पंचांग को समझना आवश्यक है-


दिन, वार, महीना इत्यादि की जानकारी देने वाले अंग्रेजी कालपत्र को कैलेण्डर तथा भारतीय परम्परा वाले को कालपत्र को ‘पंचांग’ कहा जाता है। पंचांग आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक कालपत्र है। इसमें काल की गणना के पांच अंग हैं जिन्हें तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण कहा जाता है। इन पांच अंगों के आधार पर काल की गणना किये जाने के कारण भारतीय कैलेण्डर को ‘पंचांग’ नाम दिया गया है।

पंचांग न केवल अंग्रेजी कैलेण्डर के समान किसी दिन विशेष को दर्शाता है, बल्कि खगोलशास्त्र के आधार पर यह उस दिन के पूरे शुभ-अशुभ काल और योग को भी दर्शाता है। पंचांग में बारह मास के एक वर्ष के प्रत्येक दिन का हिसाब सूर्य और चन्द्र की गति पर निधरित किया गया है। इसके अनुसार प्रत्येक महीने में दो पक्ष (लगभग 15.15 दिनों के) होते हैं, जिन्हें शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष नाम दिया गया है और एक वर्ष में दो आयन (उत्तरायण और दक्षिणायण) होते हैं। इन्ही दो आयनों में 12 राशियाँ और 27 नक्षत्र भ्रमण करते हैं। भारतीय काल गणना में नववर्ष की शुरुआत प्रकृति के द्वारा मनाये जा रहे नववर्ष से होती है। फाल्गुन मास की समाप्ति के साथ पतझड़ का मौसम समाप्त हो जाता है और वसन्त ऋतु आरम्भ हो जाती है। नये वर्ष के आगमन पर प्रकृति भी सभी पेड़-पौधें को नये पत्ते, फूल और फलों से अलंकृत करती है। पशु-पक्षियों समेत सभी प्राणी भी नववर्षारम्भ पर नयी आशा और उत्साह के साथ अपने-अपने कार्यों में व्यस्त हो जाते हैं।

भारत में मुख्यतः सूर्य और चन्द्र की गति पर आधरित दो अलग-अलग प्रकार से की जाने वाली काल-गणनाएं प्रचलित है। इनके अलावा एक तीसरे प्रकार की काल गणना भी कहीं-कहीं पर की जाती है जो कि नक्षत्रों के आधार पर होती है। चन्द्रमा 27 नक्षत्रों में अपने भ्रमण का एक चक्र लगभग 27 दिनों में पूरा करता है। इसी आधर पर नक्षत्रामास लगभग 27 दिनों का ही होता है। लेकिन तीनो प्रकार की काल-गणना में 12 महिनों के नाम-चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ और फाल्गुन ही है। भारतीय कालगणना को समझने के लिए पंचांग के पांचों अंगों को जान लेना आवश्यक है-

तिथि- अंग्रेजी महीनों में सामान्यतः 1 से लेकर 30/31 तक की तिथि होती है लेकिन भारतीय पंचांग में 1 से 15 तक की तिथियां ही निर्धरित की गयी है। चन्द्रमा की कला पर आधरित ये तिथियां किसी भी दिन के अंक (क्ंजम) को दर्शाती हैं। ये तिथियां हैं- प्रतिपदा (पहला दिन), द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रायोदशी, चतुर्दशी और पूर्णिमा अथवा अमावस्या।

पक्ष और मास- इन पन्द्रह दिनों के समूह को ‘पक्ष’ कहा जाता है। चन्द्रमा जब बढ़ते क्रम में होता है, तब पंद्रहवें दिन पूर्णिमा आती है और उस पक्ष को ‘शुक्ल पक्ष’ कहा जाता है। और जब चन्द्रमा घटते क्रम में होता है, तब उसके पन्द्रहवें दिन अमावस्या आती है और वह ‘कृष्ण पक्ष’ कहलाता है। ये दोनों पक्ष मिलकर एक मास बनाते हैं।

वार- पंचांग का दूसरा अंग ‘वार’ है। रविवार, सोमवार, मंगलवार, बुधवार, गुरुवार (बृहस्पतिवार), शुक्रवार और शनिवार। ये सात दिन मिलकर एक सप्ताह बनाते हैं और इनमें से प्रत्येक दिन को ‘वार’ कहा जाता है।

हिन्दू पंचांग के द्वारा निर्धरित ये सात वार आज सम्पूर्ण विश्व में उसी दिन, उसी नाम और क्रम में स्वीकृत हैं। अब प्रश्न यह उठता है कि रविवार के बाद ही सोमवार और इसी क्रम में आगे मंगलवार, बुधवार आदि क्यों आते है? या फिर जिस दिन को भारत में भी रविवार कहा जाता है उसी दिन को सम्पूर्ण विश्व रविवार क्यों कहता है? उस दिन को कोई मंगलवार या सोमवार या फिर अपने-अपने धर्म के अनुसार किसी अन्य नाम से क्यों नही पुकारता? ऐसे प्रश्नों का सीधा सा उत्तर यह है कि प्राचीन भारतीय ज्योतिषशास्त्रियों ने ग्रहों के भ्रमण की स्थिति के आधार पर इन दिनों को नाम दिया है। यद्यपि यह गणना थोडी़ जटिल है, फिर भी में इसे सरल भाषा में समझा सकता है।

भारतीय ज्योतिष में काल (समय) की गणना सृष्टि के आरम्भ से की गयी है। सृष्टि के आरम्भ का सबसे पहला दिन चैत्र शुक्ल प्रतिपदा था और इसी दिन से हमारा नववर्ष आरम्भ होता है। आरम्भ के पहले दिन सभी ग्रह (सूर्य, चन्द्र, मंगल आदि) मेष राशि (पहली राशि) में थे और उस दिन जब पहला सूर्योदय हुआ था उसी समय से हमारी काल की गणना आरम्भ होती है। इसीलिए भारतीय काल-गणना में दिन आरम्भ सूर्योदय से माना गया है।

एक सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय के समय को ‘अहोरात्रा’ कहा जाता है,जिसका पहला भाग ‘दिन’ और दूसरा भाग ‘रात्रि’ कहलाता है। काल (समय) की गणना करने के लिए दिन और रात्रि के दोनों हिस्सों को 6.6 भागों में बांटा गया है। इस भाग को ‘लग्न’ कहते हैं। और लग्न के आधे भाग केा ‘होरा’ कहा जाता है। इस प्रकार एक
  ‘अहोरात्रा’ में 12 लग्न या फिर 24 ‘होरा’ बनते हैं। इस तरह एक ‘अहोरात्रा’ यानि एक दिन में कुल 24 ‘होरा’ होते हैं। इसी ‘होरा’ को अब घण्टा कहा जाता है। सृष्टि के आरम्भ के पहले दिन सूर्योदय के समय जो सबसे पहला होरा घण्टा आया, उस पहली होरा का स्वामी सूर्य बना था और उसके बाद आने वाली 6 होराओं के स्वामी क्रमशः शुक्र, बुध्, चन्द्रमा, शनि, बृहस्पति और मंगल बनते चले गये। इस प्रकार सूर्योदय से 7 घण्टों की समाप्ति के बाद फिर से उसी क्रम में सभी ग्रह आते जाते हैं। कहने का अर्थ यह है कि 8वीं होरा का स्वामी फिर से सूर्य बना और उसके बाद शुक्र, बुध् आदि ग्रह उसी क्रम में अगली-अगली होराओं के अधिपति बनते जाते हैं। इस क्रम में पहले दिन की 24वीं होरा (पहले दिन का अन्तिम घण्टा) का स्वामी बुध् बना। यहां पहला अहोरात्रा (एक पूरा दिन) समाप्त होता है। पहला दिन सूर्य की होरा से आरम्भ होने के कारण उस दिन को रविवार कहा गया। 24वीं होरा बीतने के बाद उपरोक्त क्रम से दूसरे दिन के प्रथम होरा (सूर्योदय के समय) का स्वामी चन्द्र बनता है। इसी प्रकार पहले दिन सूर्य से आरम्भ होने के बाद प्रत्येक अगले दिन की पहली होरा (घण्टे) के स्वामी क्रमशः चन्द्र, मंगल, बुध्, बृहस्पति, शुक्र और शनि बनते चले गये। यही क्रम आज भी जारी है। इसीलिए इन दिनों के नाम आज भी उस दिन को मिलने वाली पहली होरा के अधिपति (स्वामी) ग्रह के नाम पर जाने जाते हैं।

इस प्रकार वार के दिनों के नामों (रविवार,सोमवार आदि) की देन प्राचीन भारतीय ऋषियों की है। वारों के नाम सूर्योदय के समय पड़ने वाली पहली होरा के अधिपति ग्रह के नाम पर होने के कारण ही भारतीय परम्परा में दिन का आरम्भ सूर्योदय से माना जाता है न कि रात्रि के बारह बजे के बाद। इसका अर्थ यह है कि सूर्योदय से पहले यदि सोमवार है तो सूर्योदय के बाद मंगलवार हो जायेगा।


नक्षत्र- आकाश में विभिन्न आकार में दिखाई देने वाले तारों के समूह को नक्षत्रा कहते हैं। हमारे सौरमण्डल में इस प्रकार के 27 नक्षत्रा समूह हैं। इन में से प्रत्येक नक्षत्रा में चन्द्रमा लगभग एक दिन रहता है। ये 27 नक्षत्रा निम्नलिखित हैं- अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, आद्रा, पुर्नवसु, पुष्य, अश्लेषा, मघा, पूर्वा (फाल्गुन), उत्तरा (फाल्गुन), हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराध, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वा(आषाढ़), उत्तरा (आषाढ़), श्रवण, ध्निष्ठा, शतभिषा, पूर्वा (भाद्रपद), उत्तरा(भाद्रपद) और रेवती।

इन्ही 27 नक्षत्रों के नामों के आधार पर हिन्दू पंचांग में महीनों के नाम निर्धरित किये गये है। पूर्णिमा के दिन चंद्रमा जिस नक्षत्रा में रहता है, उसी नक्षत्रा के नाम के आधर पर उस महीने का नामकरण हुआ है।


योग- सूर्य और चन्द्र की विशेष दूरियों को योग कहते हैं। योग 27 होते हैं- विष्कुम्भ, प्रीति, आयुष्मान, सौभाग्य, शोभन, अतिगण्ड, सुकर्मा, घृति, शूल, गण्ड, वृद्धि, ध्रुव, व्याघात, हर्षण, वज्र, सिद्धि, व्यातीपात, वरीयान, परिघ, शिव, सिद्ध, साध्य, शुभ, शुक्ल, ब्रह्म, इन्द्र और वैधृति। इनमें से कुल 9 योगों विष्कुम्भ, अतिगण्ड, शूल, गण्ड, व्याघात, वज्र, व्यातिपात,परिघ और वैधृति को अशुभ माना जाता है और इन योगों में शुभ कार्य न करने की सलाह दी जाती है।


करण- एक तिथि के आधे भाग को करण कहते हैं। अर्थात एक तिथि में दो ‘करण’ होते हैं। जिन्हें ‘पूर्वार्ध करण’ (पहले का) और ‘उत्तरार्ध करण’ (बाद का) कहा जाता है। ‘करण’ सूर्य और चन्द्रमा के बीच की कोणात्मक दूरी है। यह दूरी प्रत्येक चरण में 6.6 डिग्री में बढती जाती है और यही दूरी (करण) किसी तिथि का निर्धारण करती है। करण 11 हैं- बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज, विष्टि, शकुनि, चतुष्पाद, नाग और किस्तुघ्न। इन 11 करणों में से अन्तिम 4 करण (शकुनि, चतुष्पाद, नाग और किस्तुघ्न) स्थिर हैं।

पंचांग के ये पांचों अंग मिलकर किसी एक दिन के स्वरूप का निर्धारण करते हैं। भारतीय पंचांग के अनुसार दिन की शुरुआत सूर्योदय से होती है। इसलिए तिथि की गणना भी उसी समय से होती है। इसका अर्थ यह है कि जिस तिथि को सूर्योदय नही मिलता, उस तिथि का क्षय माना जाता है। इसीलिये कभी-कभी किसी तिथि को दो बार सूर्योदय मिलने के कारण उस तिथि को दो बार मनाया जाता है और किसी तिथि को सूर्योदय न मिलने के कारण उस तिथि को छोड़ दिया जाता है।