Friday, 19 September 2014

बिहार को मिला ‘मोहन भार्गव’ ......लंदन की जगमगाती जिदंगी और लाखों की नौकरी छोड़, अपने पिछड़े गांव को एक आदर्श गांव बनाने के लिए हिन्दुस्तान लौट आए आनंद


लेंकेस्टर यूनिवर्सिटी, लंदन में आनंद

रामपुर गांव के किसान आनंद

लंदन यूनिवर्सिटी के स्कॉलर से कटिहार के किसान तक और विदेश में बेफिक्र जिंदगी बसर करने से गांव में समेकित खेती करने तक एक व्यक्ति की जिंदगी में आमूल-चूल बदलाव की यह कहानी, सपनों के सफर कहानी है, ज़िद की कहानी है, जो चाहो उसे पाने की कहानी है...। हम आपके लिए लाए हैं बिहार के निवासी, आनंद चौधरी की दास्तान, जो असल जिंदगी में स्वदेस फिल्म के मोहन भार्गव को साकार कर रहे हैं। इन्होंने लंदन की लैकेंस्टर यूनिवर्सिटी से एमबीए किया और वहीं 15 लाख रुपए तन्ख्वाह की नौकरी कर रहे थे कि पिताजी के देहांत के कारण इन्हें भारत आना पड़ा। लेकिन जब आनंद ने यहां आकर अपने गांव का पिछड़ापन और खराब हालत देखी तो उन्होंने विदेश की नौकरी छोड़ अपने गांव के उत्थान के लिए काम करने का फैसला ले लिया। और अब आनंद अपने गांव को देश का पहला सर्व साधन संपन्न- पांच सितारा गांव बनाने में जुटे हैं...


अपने पिछड़े गांव की किस्मत बदलने निकला एक एमबीए किसान..

सीढ़ियां उन्हें मुबारक, जिन्हें छत तक जाना है, जिनकी मंज़िल आसमां है, उन्हें रास्ता खुद बनाना हैं... कटिहार, पटना के हसनगंज प्रखण्ड के गांव रामपुर निवासी आनंद चौधरी की मंजिल आसमां ही है। अपने छोटे से गांव को- जहां एक स्वास्थ्य केन्द्र और अच्छी शिक्षा प्रदान करने वाले स्कूल तक नहीं है, फाइव स्टार विलेज बनाने का सपना देखना आसमां को पाने की कोशिश करने जैसा ही है। लेकिन आनंद की ज़िद है कि वो इस सपने को पूरा करेंगे। वो कहते हैं कि अगले दो सालों में इस गांव में एक अच्छा अस्पताल होगा, एक ग्रामीण बिक्री केन्द्र या आम भाषा में कहें तो रूरल शॉपिंग कॉम्प्लेक्स होगा, जिम होगा, किसान विकास केन्द्र होगा, विश्व स्तर की पुस्तकों से परिपूर्ण पुस्तकालय होगा और अच्छी इंटरनेट कनेक्टिविटी युक्त साइबर कैफे होगा जिससे यहां के लोग दुनिया से जुड़ सकें। आनंद का सपना हैं कि रामपुर देश के सभी गांवों में सबसे ज्यादा प्रति व्यक्ति आय रखने वाला गांव बने, हिन्दुस्तान के लिए एक मॉडल गांव बने और वो हर हालत में इस सपने को हकीकत बनाने के लिए पूरी मेहनत और जोश से लगे हुए हैं।



32 साल के आनंद चौधरी के सपनों की कहानी शुरू होती है जनवरी 2012 से। लंदन की लैकेंस्टर यूनिवर्सिटी से एमबीए करने के बाद आनंद वहीं एक कंपनी में मोटी तन्ख्वाह पर एच आर मैनेजर के तौर पर काम कर रहे थे कि पिता की आकस्मिक मृत्यू के कारण आनंद को 31 जनवरी 2012 को अपने गांव रामपुर आना पड़ा। लेकिन जब यहां प्रवास के दौरान आनंद ने गांव की बदहाली, गरीबी और पिछड़ापन देखा तो उन्हें लैकेंस्टर यूनिवर्सिटी में अध्ययन के दौरान पढ़े गए गरीबी उत्थान बिजनिस मॉडल की याद आई और गांव का यह हाल उन्हें चुनौती की तरह लगने लगा। अचानक से ही आनंद ने निर्णय ले लिया कि अब वो किताबी पढ़ाई को प्रैक्टिकल जिंदगी में अपनाकर अपने गांव के उत्थान और खुशहाली के लिए काम करेंगे। एक बार मन बना लेने के बाद आनंद वापस नहीं गए और उन्होंने वहीं से अपना इस्तीफा कंपनी को भेज दिया। आनंद के दोनों बड़े भाईयों ने भी आनंद को प्रोत्साहित किया लेकिन उन्हें सबसे ज्यादा सहयोग अपनी मां स्वर्गीय श्रीमती सुधा रानी सिन्हा से मिला जिन्होंने ना केवल आनंद के इस फैसले को सराहा बल्कि हर कदम पर उनका साथ दिया। और अब पिछले दो सालों में अपनी कोशिशों से आनंद इस गांव के लिए प्रगति का द्वार खोल चुके हैं। उन्होंने यहां एक हाई डेन्सिटी आमों का बागीचा और एक एकड़ ज़मीन बनवाए गए तालाब पर मत्स्यपालन शुरू करके लगभग 20 बेरोजगार युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराया है। आगे भी आनंद की जो योजनाएं हैं, जो उनका बिजनिस मॉडल है, उसके लागू और पूरा होने के बाद यह गांव एक आदर्श गांव होगा।


ऐसा है आनंद के बिजनिस मॉडल का स्वरूप जिसके ज़रिए होगा रामपुर का सम्पूर्ण विकास- 

रामपुर गांव को पांच सितारा गांव बनाने के लिए आनंद ने जो पांच वर्षीय बिजनिस मॉडल विकसित किया है। उसके बारे में बात करते हुए आनंद बताते हैं- “मेरे पास मेरी लगभग 30 एकड़ ज़मीन थी, मेरा अनुभव था, मेरी स्किल्स थीं, लंदन में काम के दौरान कमाई हुई राशि थी और अपने सपने के प्रति दीवानगी थी। मैंने उपलब्ध साधनों, अपनी क्षमताओं, समझ और अनुभव को ध्यान में रखकर एक बिजनिस मॉडल तैयार किया है,जिसके अंतर्गत पांच साल में गांव का पूरा विकास हो जाएगा”। आनंद के इस बिजनिस मॉडल के तीन चरण हैं-

पहला चरण- समेकित खेती से लगाया गया आमों का बागीचा- 


आनंद ने 8 हेक्टेयर की ज़मीन पर सफेदा मालदह आमों का बागीचा लगाया है। यह बागीचा पूरी तरह से वैज्ञानिक तरीके से लगाया गया है। इसमें 3,200 आम के पौधे लगाए गए हैं, जिन्हें राष्ट्रीय बागवानी मिशन के सहयोग से लगाया गया है। राष्ट्रीय सघन बागवानी मिशन के अंर्तगत लगाए गए इस बागीचे की शुरूआत 3 मई से हुई। सबसे पहले यहां जेसीबी से 3200 के लगभग गढ्ढे करवाए गए और उसके बाद उन्हें एक महीने के लिए ऐसे ही छोड़ दिया गया जिससे ज़मीन के कीड़े मकौड़े और खरपतवार खुद-ब-खुद मर जाएं। लगभग डेढ़ महीने बाद उन्होंने इन गढ्ढों को 35 से 40 किलो सड़े हुए गोबर से भरवाया। इन गढ्ढों को बन्द करने के बाद दो बारिश तक उन्हें ऐसे ही छोड़ दिया गया और इसके बाद कृषि विश्वविद्यालय से आनंद ने इकट्ठे 32,00 आम के पौधे मंगाए और उन्हें ज़मीन में रोप दिया। आनंद का यह हाई डेन्सिटी ऑर्चर्ड तीन सालों में अवधि में पूरी तरह तैयार हो जाएगा जिनमें से दो साल बीत चुके हैं। इस बागीचे के तैयार होने पर बढ़िया आमों की जो उपज होगी उसे देश भर में और बाहर भी भेजा जा सकेगा जिससे गांव में पैसा आएगा और रोजगार के अवसर भी उत्पन्न होंगे।

दूसरा चरण- एक एकड़ में मत्स्यपालन 

रामपुर में एक पोखर है जिसे मत्स्यपालन के लिए एक बड़े और साफ सुथरे तालाब के रूप में तब्दील किया जाना है ताकि उसमें मछलियां पाली जा सकें। इसकी शुरूआत भी आनंद कर चुके हैं। फिलहाल छोटे स्तर पर मत्स्यपालन उद्योग का काम चल रहा है लेकिन आनंद चाहते हैं कि इसे बड़े स्तर पर किया जाए। इससे रामपुर में एक उद्योग विकसित होगा। 

तीसरा चरण-रूरल मार्केटिंग कॉम्प्लेक्स या ग्रामीण मॉल 

आनंद चाहते हैं कि जिस तरह मेट्रो शहरों में मॉल्स या बड़े शॉपिंग कॉम्प्लेक्स होते हैं उसी तरह इस गांव में भी एक सर्व सुविधा सम्पन्न ग्रामीण खरीद-फरोख्त केन्द्र हो जिसमें ग्रामीणों की खरीद क्षमता के अनुसार हर तरह का सामान उपलब्ध हो और वो अपना सामान विक्रय भी कर सकें।

सुधा रानी सिन्हा फाउंडेशन के जरिए कर रहे है गांव की शिक्षा और स्वास्थ्य की दिशा में काम 

हांलाकि आनंद यह साफ शब्दों में कहते हैं कि वो समाज सेवी नहीं बल्कि एक अर्थशास्त्री, एक बिजनिसमेन हैं लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि वो स्थानीय बच्चों को शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करने और ग्रामवासियों के
अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने की दिशा में भी उल्लेखनीय काम कर रहे हैं। इसके लिए उन्होंने अपनी मां स्वर्गीय प्रोफेसर सुधा रानी सिन्हा- जो कि एन सिन्हा संस्थान, पटना में मनोविज्ञान विभाग की विभागाध्यक्ष व रीडर थी, के नाम से एक फाउंडेशन शुरु की है।

अस्पताल का निर्माण- इस फाउंडेशन की राशि से आनंद गांव में एक अस्पताल का निर्माण करवा रहे हैं जो अगले दो सालों में बन कर तैयार हो जाएगा। आनंद कहते हैं कि इस अस्पताल में सारी सुविधाएं वो अपने पैसों से देंगे, ज़रूरी लाइसेंस और कागज़ी प्रक्रिया भी वहीं पूरी करेंगे। स्थानीय प्रशासन और राज्य सरकार से केवल वो इतनी मदद की दरकार रखते हैं कि वहां अच्छे डॉक्टरों की नियुक्ति में वो उन्हें सहायता दें। इस अस्पताल के निर्माण के बाद गांववालों को इलाज के लिए शहर नहीं जाना पड़ेगा बल्कि दूसरे गांव के लोग भी यहां इलाज के लिए आएंगे।

प्रतिभाशाली बच्चों के प्रोत्साहन के लिए नकद पुरस्कार- 

गांव में बच्चों को पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित करने के लिए भी आनंद ने योजना बनाई है जिसके तहत वो हर साल आठवी कक्षा में सबसे ज्यादा अंक लाने वाली छात्रा को 2100 रुपए का नकद पुरस्कार और छात्र को 1100 रुपए का नकद पुरस्कार देते हैं। हाईस्कूल में सबसे ज्यादा अंक लाने वाले छात्र या छात्रा को भी सुधा रानी फाउंडेशन की तरफ से 5100 रुपए का नकद पुरस्कार दिया जाता है।

किसान विकास केन्द्र- आनंद की योजनाओं में किसान विकास केन्द्र खोलना भी शामिल हैं जहां किसान अपनी समस्याओं का समाधान पाएंगे।

आनंद जो कुछ भी कर रहे हैं वो अपने साधनों, अपनी सोच, अपने पैसों, अपनी समझ और हुनर के बलबूते कर रहे हैं। जब हमने उनसे पूछा कि क्या उन्हें अब तक अपने इन्वेस्टमेन्ट के रिटर्न्स मिलने शुरू हुए हैं तो उनका जवाब था कि- मेरे प्रोजेक्ट्स को कमर्शियली वाइबल होने में पांच साल लगने हैं जिनमें से दो साल बीत चुके हैं। अपने रिटर्न्स के लिए मुझे तीन साल और इंतज़ार करना है जिसके लिए मैं तैयार हूं क्योंकि एक बार जब यह प्रोजेक्ट पूरे होंगे तो इस गांव में खुशहाली आएगी, रोजगार बढ़ेगा और शायद और भी गांव मेरे इस सफल बिजनिस मॉडल को अपनाना चाहें। यह चुनौती मेरे खुद के लिए हैं और मैं इसको पूरा करूंगा।”

खुद को सामाजिक उद्यमी (सोशल ऑन्ट्रीप्रिन्योर) कहने वाले आनंद कहते हैं कि “मेरी वजह से अगर लोगों को रोजगार मिला, मैं अपनी कोशिशों से अगर 50 लोगों की जिंदगी भी बेहतर बना पाया तो यह मेरी बड़ी सफलता होगी। मैं यह साबित करना चाहता हूं कि अगर आप वाकई चाहे तो कुछ भी मुश्किल नहीं। अगर मैं अकेला इंसान अपनी कोशिशों से एक गांव को बिहार का सर्वश्रेष्ठ गांव, देश का मॉडल गांव बना सकता हूं, जो कि मैं करके रहूंगा तो बाकी लोग भी ऐसा कर सकते हैं”।


कितने शिक्षित हैं आनंद 

2005 में एएन कॉलेज पटना (मनोविज्ञान) से ग्रेजुएट

2007 में आईआईएमसी, दिल्ली से जर्नलिज्म का कोर्स

2010 में लैंकेस्टर यूनिवर्सिटी, इंग्लैंड से एमबीए

जनवरी 2012 तक इक्विटी प्वॉइंट लंदन में एच आर मैनेजर रहे (पैकेज- 15 लाख)

फिलहाल- एक सोशल ऑन्ट्रिप्रिन्योर एवं रामपुर गांव के किसान