Saturday, 6 September 2014

एक घर के बिकने की कहानी...



यह उसी घर के बाशिंदे हैं, जो बिक गया, आखिरी दिन की तस्वीर

घर के बिकने के पीछे की कहानी बहुत बड़ी है
यह पीली साड़ी पहने बीच में जो महिला है ना.. कान्ता देवी,
इन्होंने अपने पति के साथ 28 साल पहले लिया था यह घर
पति त्रिलोकपुरी में किराने की दुकान चलाते हैं, जब ब्याह कर आंटी घर में आईं थी तब भी चलाते थे।
दोंनो ने मिलकर मयूर विहार में घर लिया। तब शायद एक लाख का पड़ा था।
आंटी अंकल की किस्त बनी केवल ढाई हज़ार रुपए महीने की।
दो लड़के हुए और एक लड़की
लड़की की शादी की और लड़कों की भी, सारे फर्ज पूरे किए बस बच्चों को पढ़ाना लिखाना भूल गईं। लड़की तो अपने घर चली गई और लड़के...
...दोनों निकम्मे निकले।
एक का पढ़ने में मन नहीं लगा, और दूसरा किराने की दुकान पर बैठने के चक्कर में पढ़ाई खुद छोड़ आया।
अंकल को पहले लगा दोनों लड़को को किराने की दुकान पर बिठा लेंगे
लेकिन फिर दो जनों की गृहस्थी, 'नौ' जनों की गृहस्थी हो गई।


6 बड़े और तीन बच्चे.. और दुकान केवल एक...
फिर छोटा लड़का गल्ले में हेराफेरी भी करता था...
अंकल अकेले चलाते थे तो दुकान अच्छी चलती थी और तब त्रिलोकपुरी में थी भी एक उनकी ही दुकान।
फिर धीरे-धीरे समय बदला, दुकाने और खुली, कॉम्पिटीशन बढ़ गया,
तो अंकल की बिक्री भी कम हो गई।

पर गृहस्थी तो बढ़ती जा रही थी धीरे-धीरे...
वो तो बड़ी बहू को बीमारी की वजह से डॉक्टर ने मना कर दिया,

वरना तो आंटी चाहती थी, उसका भी एक बेटा और हो जाए।
छोटी बहू के दो बेटे हैं,

अब आंटी क्या करें, जब छोटे ने गल्ले में घपला शुरू किया तो उसे दुकान पर जाने से रोकना पड़ा
वो रुका तो, बड़े को कैसे जाने देते,
सो आंटी-अंकल ने फैसला किया दोनों को अपना अलग-अलग काम करने को कहा जाए। 
अलग-अलग काम देखने की बारी आई तो बस
बड़े ने कुछ समय काम किया, लेकिन छोटे ने केवल घर पर रहकर काम देखा
कहीं काम नहीं मिला और वो बैठा रहा....,, बस बैठा रहा..।
 छ महीने बस ऐसे ही बीते। हारकर अंकल ने छोटे को पान-बीड़ी, गुटखे का खोखा खुलवा दिया..

खोखा गोलचा सिनेमा के पास था,
सो खूब चलने लगा, खूब चलता है..., पैसा आने लगा।

लेकिन जब अपना पैसा आने लगे, तो उसे सबके साथ बांटने की इच्छा शायद कम हो जाती है..
और अपनी खुद की दबी इच्छाए पूरी होने के लिए सर उठाने लगती हैं।
सो यहीं छोटी बहू के साथ हुआ।
अब तक तो सास घर चला रही थी, सारा पैसा उसके पास जाता था, खर्चने के लिए भी वहीं देती थी,
पर अब पति कमाने लगा तो सास को हिस्सा मिलता और बचे पैसे बहू अपने पास जमा करती और उससे अपनी और अपने बच्चों की इच्छाएं पूरी करने की कोशिश करती..।
केवल अपनी और अपने बच्चों की... 
घर बिकने से पहले उसने साढ़े नौ हज़ार रुपए जमा कर लिए थे। 
पर नए घर में शिफ्ट होने से पहले पड़ौस में अपनी सहेली के घर रखवा आई।
कहा, घर शिफ्ट होने के बाद ले लेगी..।
यह हिदायत भी दी थी सहेली को, कि किसी को बताना मत।  

यह बड़ी बहू का इकलौता लड़का है, वहीं बड़ी बहू जो आंटी के बाएं तरफ हरे सूट में बैठी है।

चेहरा ध्यान से देखो, मायूसियत दिखेगी
पहले छोटी बहू की तरह अच्छी सेहत वाली थी,
इसका पति जो शुरू से काम में मन लगाने वाला था ठीक-ठाक कमा लेता था..
फिर शायद किसी की नज़र लग गई।
 ना जाने क्या हुआ।
देवर का गुटखे, बीड़ी-सिगरेट का खोखा चला, और इधर इनके पति का काम बन्द हो गया।
तीन साल होने को आए, बहुत काम देखे...

एक बार तो बने बनाए ट्राउजर्स और टीशर्ट को बेचने का काम शुरू किया था, पर पता नहीं क्या हुआ, माल भी लेकर आएं, फिर वापस लौटाना पड़ा।
काम चला नहीं।

फिर यहीं पास में कोटला में किराये की दुकान लेकर समोसे, बेढ़ई, नमकपारे, कचोड़ी और छोले भठूरे की दुकान खोल ली।

स्वाद बहुत था, इनके खाने में, पर दुकान सस्ते इलाके में थी, सो सामान भी सस्ता ही बेचना पड़ता था..।

समोसा पांच रुपए का, बेढ़ई 15 की 2 और छोले भठूरे 20 रुपए की एक प्लेट..
इतनी कमाई नहीं होती थी कि दुकान का किराया और कच्चे माल का पैसा निकालने के बाद ज्यादा कुछ बच जाए।
फिर एक किराए का आदमी भी था, जो दुकान में भैया और भाभी की मदद किया करता था,
ब्रेड पकोड़े बना देता, समोसे तल देता, मैदा का आटा लगाता था और हलवाई वाले अन्य कामों में भी मदद करता था,
पर बर्तन वगैरह भैया-भाभी खुद ही धोया करते थे। दुकान की साफ सफाई भी भाभी खुद कर लिया करती थी...।

बात बस इतनी सी थी कि किसी तरह ज्यादा पैसे बचा सके और घर खर्च में दे सकें।
तीन साल से बस ऐसे ही तो काम चल रहा था... हांलाकि मम्मी (कान्ता आंटी) ने हमेशा उनका ख्याल रखा। पापा के ज्यादा और थोड़े से देवर के दिए हुए थोड़े पैसों से घर चल रहा था। सबको बराबर हिस्सा  मिल रहा था।
पर पति के नहीं कमाने का गम बड़ी भाभी को खाने लगा। तीन साल में सेहत भी गंवा के रख दी।
चमकदार चेहरे पर झुर्रियां और मायूसी दिखने लगी।
कितने ही वक्त तो ऐसा हुआ जब भाभी ने अगल-बगल सब जानने वालों के पास जाकर भैया को कोई काम दिलाने की बात की..
जब भैया को नहीं काम मिला तो यह भी कहकर आईं कि मेरे लायक कोई काम हो तो वहीं दिला दो,
कम से कम मैं ही कुछ काम कर लूं।
कितने व्रत रखे, धनलक्ष्मी की पूजा की
पर शायद भगवान रूठ गया था.. या भाभी की पूजा में ही कुछ कमी थी
कहीं काम नहीं बना और भैया अब तक बेरोज़गार हैं।

जिंदगी में कभी भी अपने परिवार या अपने बच्चों के बारे में एक शब्द भी नहीं बोलने वाली आंटी भी अब तो कभी-कभी कह देती हैं कि 'बड़ा पता नहीं कब काम करेगा।'

आंटी-अंकल ने बीच में मकान के ऊपर कर्ज लिया था। शायद बेटी की शादी के समय .या फिर कभी कोई और काम पड़ा होगा। पता नहीं, इस बारे में आंटी स्पष्टता से नहीं बताती।
पर इतना पता है कि कर्ज बढ़ता जा रहा था धीरे-धीरे...

बड़े लड़के की बेरोज़गारी, छोटे लड़के का कुछ-कुछ स्वार्थीपन, तीन बच्चों की पढ़ाई लिखाई, नौ आदमियों का परिवार तिस पर घटती दुकानदारी और बढ़ता कर्ज़....

बहुत कोशिश की कि घर बिकने से बच जाए, पर आखिरकार वो करना पड़ा जो नहीं सोचा था।

चार कमरों का घर जो आंटी अंकल ने बड़े प्यार से बनाया था, और जो आंटी के नाम था और जिसमें आंटी बड़ी ठसक से रहती थी, सबको बताया करती थी कि- 'मैं तो 28 साल से इस कॉलोनी में रह रही हूं। सबसे पुराने हम ही हैं यहां...,'
वो बिक गया।

आंटी ने शशि गार्डन में एक पहली मंजिल का मकान किराए पर लिया है। वहां दो ही कमरे हैं। पर एडजस्ट करना होगा, किसी तरह।
क्या करें मजबूरी हैं।
मकान बेच कर जो पैसा आया है, उससे पहले का कुछ कर्ज चुकाया है और कुछ चुकाना है।
बाकी जो बचा, शायद दिल्ली में उसमें मकान ना आए...।

जिस दिन की यह तस्वीर है ना, जबकि आंटी और बहुओं ने मिलकर मकान खाली  किया था और सामान शिफ्ट करवाया था,
उस दिन बड़ा बेटा काम ढूंढने गया था, छोटा अपने काम पर और अंकल को आंटी ने ही जबरदस्ती दुकान पर भेज दिया था,
ताकि उन्हें पाई पाई जोड़ कर बनाया गया मकान बिकता देखकर दुख ना हो।

जब पड़ौसी आंटी को विदाई देने गए तो आंटी ने कहा---
"देखो क्या दिन दिखाया है मेरे बच्चों ने। गुप्ता जी ने इतना कर दिया था कि घर बना लिया लेकिन मेरे बेटों ने सब डुबो दिया। अब घर बस इसलिए बेचा है ताकि जो पैसे मिले उनसे कम से यह तीन बच्चे तो बन जाए। भगवान ने यह घर तो ले लिया पता नहीं अब दूसरा देगा या नहीं...."

कहते हुए आंटी खाली हो चुके कमरे की दीवार पर देखने लगी और फिर शून्य में घूरने लगी... उनका मकान बिक चुका था..।