Sunday, 31 August 2014

ऐसा होता है गर्ल्स होस्टल का संडे

भोपाल गर्ल्स होस्टल

भोपाल। आज ना बाथरूम के बाहर लम्बी लाइन लगी है और ना मैस के बाहर भीड़.., किसी को ना तो नहाने की जल्दी है और ना ही पानी चले जाने का डर। सब जगह सन्नाटा छाया हुआ है। मैस में रोज़ाना सुबह 6 बजे ही गैस चढ़ा दी जाने वाली चाय की केतली आज नौ बजे भी एक तरफ पड़ी हुई है। माहौल में रोज की तरह शोर-शराबा नहीं है, बल्कि खामोशी बिखरी हुई है.. क्योंकि आज छुट्टी का दिन है.. जी हां, टुडे इज़ सन्डे।

यह है गर्ल्स होस्टल का सन्डे.., कुछ विशेष, कुछ अलग..। नौ बज रहे हैं लेकिन कोई भी सोकर नहीं उठा है,..और फिर अचानक रूम नंबर नाइन से आवाज़ सुनाई देती है..
"ऊssss (उबासी), घड़ी कहां हैं मेरी?  ओह, नौ बज गए.. ऐश उठ, यार ऐश, ऐ...श , उठ ना..नौ बज रहे हैं, कपड़े नहीं धोने हैं तुझे?"
और ऐश थोड़ा सा नानुकर करने के बाद उठती है, कुछ अलसाई सी, सोई सी...। ऐश से रितु, फिर जया, फिर नेहा, फिर वंदना.. तक सभी धीरे-धीरे नींद की दुनिया से बाहर निकलने लगते हैं। धी-धीरे हलचल बढ़ रही है। हर कमरे में कुछ जीवंतता आती दिख रही है। साढ़े नौ बजने को हैं और अब कहीं जाकर पूरे होस्टल के लोग जागे हैं।
जी हां, लगभग इसी समय शुरू होता है हर सन्डे.., गर्ल्स होस्टल का संडे।
दिन चढ़ने के साथ- साथ माहौल में तेज़ी आ रही है। बहुत सारे काम निपटाने को हैं, और देखते ही देखते हर तरफ से आवाज़े आनी शुरू..
 "यार मीता, मेरे मेहंदी लगा दे ना.., यार मुझे सिर धोना है, पहले मुझे नहाने दे..., भैया चाय बन गई क्या..., टीवी पर देखो ना क्या आ रहा है.., यार जब भी जाले साफ करने की सोचो यह झाड़ू कहां चली जाती है..., मेरे कपड़े बहुत ज्यादा है, पहले मैं धो लूं...., ".. जैसे स्वर हर तरफ से गूंजने लगते हैं। आज के दिन फोन की घंटी भी पूरे दिन बजती है.. यह देखो फिर बजी... "नेहा तुम्हारा फोन"....

और कुछ ही देर में पूरे होस्टल का नज़ारा बदल जाता है। सीमा, माधवी के सिर पर मेहंदी लगा रही है तो मिताली झाड़ू लगाने में व्यस्त है और सोफिया को तो भई सबसे पहले अखबार पढ़ना है।

पूरे होस्टल में कहीं किसी कमरे में इंग्लिश गाने चल रहे हैं, कहीं नए हिंदी फिल्मी गाने तो कहीं जगजीत सिंह की गज़लें.. और म्यूजिक की तानों पर थिरकते हुए हर कमरे के बाथरूम में कपड़े धोए जा रहे हैं।  हां जी, पूरे हफ्ते व्यस्त रहने वाले होस्टलर्स रविवार के दिन ही कपड़े धोते हैं और वो भी म्यूजि़क सुनते हुए। काम के बीच में ही चाय-नाश्ता वगैरह भी निपटा लिया जाता है। इस सारे शोर-शराबे के बीच सुबह की खामोशी कहीं खो गई सी लगती है।
अब एक बजने को है और होस्टल की छत धोबीघाट नज़र आने लगी है। सभी नहा-धो चुके हैं। सबके कपड़े भी धुल चुके हैं। और अब आई खाने की बारी...।

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मैस में लाइन लगना शुरू। थाली-कटोरी, चम्मचों के शोर के बीच लड़कियों की आवाज़ें गूंज रही हैं... "भैया जल्दी करो ना, पुलाव बनाने में इतनी देर क्यों लग रही है...?, बहुत जोर से भूख लगी है।"... हर कोई भूख से बेहाल खड़ा है और यह खाना है कि बनने का नाम ही नहीं ले रहा। " अरे हां आज तो सेकेंड सन्डे है, आज तो फीस्ट मिलनी है हम सबको, पता नहीं क्या होगा फीस्ट में"... अरुणिमा चिल्लाती है और अचानक ज़ोर से घंटी बजने लगी... यानि, य़ानि, यानि खाना तैयार हो गया है..। और फिर दो मिनट में सब एक साथ खाना खाते हुए दिखते हैं। कुछ लोग तो टीवी भी खाना खाते वक्त ही देखते हैं... " यार देखो ना, कोई नहीं मूवी तो नहीं आ रही, .. गाने चलने दो ना.., अरे यार कुटुम्ब लगाओ.. ".. यह सब टीवी रूम से आ रही आवाज़े हैं।

खाना खाने के बाद लगभग दो ढाई बजे से फिर से होस्टल में खामोशी छानी शुरू हो जाती है, क्योंकि अब सोने का समय है। सुबह से ही ढेर सारा काम करके सब थक चुके हैं और फिर केवल सन्डे को ही तो दिन में सोने का मौका मिलता है तो सोना ज़रूरी है।

कुछ लोग ऐसे हैं जो शॉपिंग करने, मूवी देखने या फिर आउटिंग पर निकल जाते हैं। कुछ को अपने लोकल गार्जियन के यहां भी जाना होता है, और जो कहीं नहीं जाते वो सो जाते हैं..और फिर सबके सोने के साथ ही फिर से चुप्पी और सन्नाटे का साम्राज्य छा जाता है, फोन आने भी बन्द..।

इस चुप्पी को तोड़ती है शाम पांच बजे की चाय की घंटी। फोन आने एक बार फिर शुरू हो जाते हैं और धीरे-धीरे सब कप हाथ में पकड़े मैस में आ जुटते हैं। चाय आराम से पी जाती है। इस दौरान ढेर सारी बातें, गपशप और गॉसिप का दौर भी चलता है.. और अब शुरू होती हैं होस्टल में मस्तियां।

हर कोई फ्रेश, चाय पीकर तैयार.. सब खुश और मस्त नज़र आने लगते हैं। इस वक्त या तो तेज़ म्यूजिक पर डांस पार्टी हो सकती है या फिर साथ बैठकर टीवी पर कोई मूवी देखी जा सकती है, या हो सकता है कि घूमने का प्लान बन जाए तो लेक पर भी जाया जा सकता है। सात साढ़े सात बजे तक लगभग सभी होस्टल लौट आते हैं और तब जमता है पार्टी का असली रंग... डांस का रंग और शोर-शराबे का रंग। किसी भी एक कमरे में सब इकट्ठे हो जाते हैं और चलता है तेज़ म्यूजिक और फिर डांस...
" पारुल आ ना.., चलो ना श्वेता डांस करते हैं,... अच्छा फिज़ां के गाने लगा दूं.., किसी और पे डांस करना है तो बोल.. " .. पूरे होस्टल में खुशनुमा माहौल छा जाता है।
गाने और डांस के माहौल के बीच एक बार फिर बजती है रात के खाने की घंटी, दिन की आखिरी घंटी...लगभग नौ, साढ़े नौ बजे और सब फिर दौड़ते हैं मैस की तरफ।  उसके बाद डिनर का दौर.., उसके बाद मूड हुआ तो फिर टीवी, नहीं तो टैरेस पर घूमते हुए बातों का दौर और या फिर ... टाटा, बाय, बाय.. हम तो चले सोने..।

तो कुछ यूं बीतता है छुट्टी का दिन, गर्ल्स होस्टल में सन्डे का दिन.., और जैसे जैसे दिन खत्म हो रहा है, रात गहरा रही है, सन्नाटा फिर से छाने लगा है। खामोशी फिर बढ़ने लगी है, सुबह के इंतज़ार में...।

(मेरे द्वारा अपने होस्टल पर लिखा गया यह फीचर नवभारत, भोपाल में 2002 में प्रकाशित हुआ था। )

Thursday, 28 August 2014

सड़कों पर कान्हा की झांकी बनाकर खूब पैसा कमाते हैं बच्चे...


   
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वो ज़माने और थे जब हम कृष्ण जन्माष्टमी के दिन मिट्टी के खिलौनों, रेता, लकड़ी के बुरादे और कागज़ का इस्तमाल करके घर घर में झांकिया बनाया करते थे। पहले इसे हिंडोला सजाना भी कहा जाता था, क्योंकि झांकी के बीचो-बीच एक छोटी सी लकड़ी या मिट्टी की पालकी में लड्डू गोपाल जी को खीरे में रखा जाता था और तमाम के तमाम लोग जो झांकी देखने आते थे उस झूले को झुलाते थे। तब झांकी की तैयारियां महीनों पहले की जाती थी। बाज़ार से मिट्टी के खिलौने जैसे गुजरिया, सिपाही, टैंक, बाराती, गाय, घोड़ा, हाथी, मोर से लेकर हनुमान जी, सरस्वती जी, माखनचोर आदि खरीदे जाते थे। झांकी में एक जगह मंदिर बनता था, तो एक जगह चिड़ियाघर... कहीं सड़क होती थी और कहीं हवाई अड्डा.. कहीं गांव तो कहीं शहर..थाली या टबों में पानी भर कर स्टीमर भी तैराया जाता था.. तब कमरों में जन्माष्टमी के दिन पूरा शहर बसाया जाता था। नंदलाल के जन्मोत्सव की खुशी में.. पूरी कॉलोनी या गली मोहल्लों के परिवार बारी बारी से सब घरों में झांकियां देखने जाते थे और इन्हें लगाने वाले अपनी झांकी की तारीफ सुनकर फूले नहीं समाते थे।

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झांकी खतम होते ही सारे खिलौने, गत्ते के डब्बों में भर कर ताड़ या दुछत्ती पर पहुंचा दिए जाते थे ताकि अगले साल की झांकी के लिए निकाले जा सकें। हर साल डिब्बे में कुछ खिलौने बढ़ जाते थे और हर तीन चार सालों में एक डिब्बा और जुड़ जाया करता था... और जन्माष्टमी पर जिस घर में सबसे ज्यादा खिलौने वहीं, सबसे ज्यादा अमीर.. धीरे-धीरे कमरे छोटे होने लगे, कुछ मिट्टी के खिलौने गायब हो गए और कुछ टीवी का प्रभाव.. पहले जहां मंदिरों में फूल-बंग्ले बनते थे, वहां झांकियां भी सजने लगी और फिर मंदिरों से निकलकर यह झांकिया सड़कों पर पहुंच गईँ।

और शहरों का तो मालूम नहीं लेकिन दिल्ली की जन्माष्टमी की झांकियां सड़क पर ज़रूर पहुंच चुकी है। झांकियां अभी भी बनती हैं, बच्चे ही बनाते हैं, बहुत सुन्दर बनाते हैं.. केवल उनको बनाने का उद्देश्य बदल गया है। वो तारीफ पाने की बजाय, दो तीन घंटे में ईज़ी मनी कमाने में बदल गया है...

 जन्माष्टमी के दिन कॉलोनी के बच्चे चार-पांच टोलियां बना लेते हैं और पार्क की बाउन्ड्री के पास एक जगह चुन लेते हैं। हर समूह में आठ से नौ बच्चे होते हैं। कोई रेता लाता है और कोई अपने घर से खिलौने और खाने-पीने का सामान। पूरे दिन मेहनत करके बच्चे झांकी सजाते हैं और शाम होते होते जब लोग अपने घरों से बाहर निकलकर इन झाकियों को देखने निकलते हैं तो इन बच्चों के हाथ में एक थाली होती है जिसमें दिए में जलती लौ के साथ होता मिश्री का प्रसाद और एक तरफ होती है रोली।

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बच्चे हर आने जाने वाले के सामने थाली लेकर खड़े हो जाते हैं, उसके माथे पर टीका लगाते हैं और फिर थाली में से प्रसाद देते हैं। थाली में पहले से पड़े हुए रुपए इस बात की गारंटी होते हैं कि आपको भी उसमें कुछ ना कुछ चढ़ावा चढ़ाना है। वैसे भी बच्चों की मेहनत देखकर और इस तरह से आपको तिलक और प्रसाद देते देखकर कोई बेशरम ही होगा जिसका मन चढ़ावे के तौर पर बच्चों की थाली में कुछ डालने का नहीं करेगा... यह प्रथा कुछ कुछ शीतला माता के मंदिर पर बैठे गरीब बच्चों की तरह ही है जो हर आने जाने वाले के माथे पर टीका लगाते हैं और उनसे कुछ मांगते हैं, यहां फर्क केवल इतना है कि बच्चे केवल टीका लगाते हैं, प्रसाद देते हैं और थाली आगे कर देते हैं। कुछ मांगते नहीं... और हम लोग भले ही उन मंदिरों के गरीब बच्चों को एक पैसा भी ना दें लेकिन इन बच्चों की थालियों में बड़े आराम से दस, पांच, 20 और कई बार तो सौ-सौ के नोट भी डाल देते हैं, बिना यह जाने कि बच्चे इन पैसों का क्या करेंगे।

शाम छै बजे से रात लगभग 10 बजे तक यहीं चलता रहता है.., और इसके बाद शुरू होता है कॉलोनियों में
जन्माष्टमी के अवसर पर बच्चों के समूह द्वारा बनाई गए एक झांकी
झांकियां बनाने वाले बच्चों में पैसों का बंटवारा। सारे बच्चे चढ़ावे में चढ़े रुपए जो लगभग 400-500 हो चुके होते हैं, आपस में बराबर-बराबर बांट लेते हैं और बड़ी खुशी-खुशी उन्हें लेकर घर आ जाते हैं। 14-15 साल के बच्चे इसमें अहम् भूमिका निभाते हैं और बंटवारे में सहायता करते हैं.. उन्हें भी दो-तीन घंटो में पचास साठ रुपए कमाने का यह तरीका बड़ा भाता है। कुछ बच्चे तो खासतौर से अपने ग्रुप में कम लोग रखते हैं ताकि ज्यादा से ज्यादा पैसे हर एक के हिस्से में आएं। यह सच है कि कुछ बच्चे अपने घर से 50 या 100 रुपए लेकर भी आते हैं जिससे यह जन्माष्टमी की झांकी के लिए सामान खरीदते हैं लेकिन उसके पीछे भी प्रयोजन ज्यादा से ज्यादा अच्छी झांकी बनाकर ज्यादा से ज्यादा चढ़ावा पाने का ही होता है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि बहुत से माता-पिता भी बच्चों द्वारा कमाए गए इन पैसो से बड़े खुश होते हैं और उन्हें आगे और अच्छी झांकी बनाने और पैसे कमाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।

हांलाकि पहले यह परम्परा झुग्गी झोपड़ी तक ही सीमित थी जहां मोहल्ले के कुछ युवक पंडाल लगाकर झांकी बनाते थे और चढ़ावे के रूप में आने वाला पैसा आपस में बांट लेते थे लेकिन आजकल यह प्रथा कॉलोनियों के बच्चों में भी खूब चल पड़ी है।

तो साहब यह है दिल्ली का हाल, पहले त्यौहार के लिए तैयार की जाने वाली झांकी आजकल त्यौहार के अवसर पर पैसे कमाने के लिए तैयार की जाती है...।

Tuesday, 5 August 2014

पचास साल तक लोहे की बेड़ियों में जकड़े रहने के बाद मिली आज़ादी....राजू हाथी की आत्मकथा

    प्रस्तावना (प्रोलॉग)

    मैंने तो कभी जाना ही नहीं कि हाथी होना क्या है। पचास साल तक लोहे की कंटीली बेड़ियों में बंधा रहा। 27 बार बेचा और खरीदा गया। हर बार एक नया महावत.. हर बार नए मालिक द्वारा स्वामित्व दिखाने और अनुशासन सिखाने के घंटो मारना..., महावत भीख के लिए पूरे दिन सड़कों पर घुमाता था.. चिलचिलाती धूप हो, कड़ी सर्दी हो या बारिश, मैं हर समय खुले आकाश के नीचे रहा.. खाने को मिला कागज़ और प्लास्टिक,  भूख या दर्द से कराहने पर मिली बेडि़यों और नुकीले अंकुश की मार... और डॉक्टर येदुराज कहते हैं कि मेरा मानवीयता से भरोसा उठ गया है...

    जब पचास साल बाद राजू की आजादी की घड़ी आई तो उसकी आंखों से आंसू निकल पड़े

    आप लोग मेरे विशालकाय शरीर को और साढ़े पांच टन वज़न को देखकर सोचते होंगे कि मैं बहुत बलशाली हूं, मुझे दर्द नहीं होता..., लेकिन मेरे दर्द की कहानी सुनकर आप भी सिहर उठेंगे। आज मैं आज़ाद हूं और आपको अपनी कहानी सुना पाने की हालत में हूं। मेरी इस कहानी के दो ही चैप्टर्स हैं। एक मेरे पहले पचास साल जब बेड़ियों में रहना ही मेरी जिंदगी थी और एक आज का दौर जब मैं धीरे-धीरे जान रहा हूं कि हाथी होना क्या है...


    मार पिटाई, बेड़ियों का बचपन और 27 बार बिकना-   

     मैं पचास साल का मखना नर हाथी हूं। मेरा नाम राजू है। शायद महावत ने ही मुझे यह नाम दिया होगा या पता नहीं यह नाम कैसे पड़ा पर अब मैं इसी नाम से जाना जाता हूं। अपने बचपन के बारे में ज्यादा कुछ याद नहीं। तब शायद मैं बहुत छोटा था, कुछ महीने का.. तभी शिकारी मुझे जंगल से पकड़ लाए थे और मुझे मेरे पहले मालिक को बेच दिया। तब पहली बार उसने मुझे जंजीर से बांधा। मुझे मारा, इतना मारा कि डर के मारे मुझे उसकी हर बात मानने को मजबूर होना पड़ा। वो जो कहता था मैं करता था, वरना मार पड़ती थी। नुकीले अंकुश की मार या फिर कंटीली झाड़ियों की मार। दो साल तक मैं उसके पास रहा और फिर जब मैं दो साल का हुआ तो उसने मुझे बेच दिया।

     फिर एक नया स्वामी, नया अनुशासन, फिर से मार... मेरी बेड़िया जो एक बार पैरों में पड़ गई थीं , मुझे नहीं पता था कि अब यह पचास साल बाद खुलेंगी। उस नए मालिक ने मेरे चारो पैरों को जंजीर से बांध दिया और मुझे घंटो मारता रहा। तब तक मारता रहा जब तक मैंने उसके इशारे समझने नहीं सीख लिए। वो जब कहे तब बैठने का इशारा, वो जब कहे तब उठने का इशारा, सूढ़ उठाने का इशारा, सिर हिलाने का इशारा....। इतना सिखाकर दो साल तक  उसने भी मेरे से खूब मेहनत करवाई.. पैसे कमाए.., और फिर मुझे बेच दिया एक नए मालिक के हाथों.. थोड़े से ज्यादा पैसो के लालच में। 

    कभी एक साल में तो कभी दो सालों में... 27 बार मुझे बेचा गया। उत्तर प्रदेश के 29 गांवों में रहा मैं। एक बार तो मेरा मालिक मुझे बेचने के लिए बिहार के सोनपुर हाथी मेले में भी ले गया था। वहां भी मेरे जैसे बहुत थे। बेड़ियों में बंधे हुए लाचार हाथी। उन्हें देखा तो बस लगने लगा कि यहीं शायद हम हाथियों की किस्मत होती है। बार बार बिकना... बार-बार मार खाना, मालिक का पेट भरने के लिए दिन भर कड़ी मेहनत करना और खुद भूखे पेट सो जाना।  हर बार नयी जगह, नया मालिक, नया अनुशासन का पाठ और बेरहम पिटाई। कुछ नहीं बदलता था तो मेरे पैरों की बेड़ियां... वो कांटेदार बेड़िया जिन्हें मनुष्य स्पाइक्ड शैकल्स कहते हैं। 


    पचास साल तक इन्हीं लोहे की कांटेदार जंजीरों में जकड़ा रहा मैं

    मुझे याद है मेरे सारे मालिक अपनी खोली में सोते थे लेकिन मैं हमेशा खुले आसमान के नीचे ही रहा। कड़ाके की ठंड हो, चिलचिलाती धूप या फिर रिमझिम होती बारिश... मेरी बेड़ियां खुले आसमान के नीचे ही बंधती थी। रात हो या दिन मैं वहीं मैदान में बांध दिया जाता था। 

    महावत के लिए भीख मांगी, और मुझे प्लास्टिक और कागज़ पर गुजारा करना पड़ा
    मालिक के लिए दिन भर भीख मांगने के बाद भी मुझे हमेशा भूखा रहना पड़ता था
    एक के बाद एक बिकते हुए मैं अपने आखिरी मालिक तक पहुंचा जो एक ड्रग एडिक्ट था। उसने इलाहाबाद के एक गांव में मुझे रखा था। मेरे पैर की बेड़ियों में जाने कब की जंग लग चुकी थी। वो मेरे सीधे पैर के मांस में इस कदर पैबस्त हो गई थीं कि वहां एक खोह जैसी बन गई थी। मेरे पैर में पस पड़ गया था। चलने में बहुत तकलीफ होती थी। पर क्या करूं नहीं चलता, महावत का आदेश नहीं मानता तो फिर से पिटाई सहनी पड़ती। इसलिए मैं चलता था.. पैर से पस रिसता रहता था, शरीर पर पिटाई के और भी खुले जख्म थे, पर चलना पड़ता था.. करतब दिखाने के लिए, भीख मांगने के लिए.., जो महावत कहे वो करने के लिए.. ।

     मेरा महावत मुझे संगम किनारे ले जाता था। वहां कई लोग मेरी पूजा करते थे और मेरे महावत को पैसे देते थे। लोग मुझे मिठाई या पूरियां वगैरह दे देते थे, और मैं भूख का मारा उन्हें खा लेता था। मेरे किसी भी महावत ने मुझे कभी भरपेट तो क्या थोड़ा सा भी खाना नहीं दिया। जिंदगी भर लगभग भूखा रहा मैं। क्या करता..,  सड़क पर जो कागज या प्लास्टिक पड़ा मिल जाता था.., या फिर सब्जियों के छिलके,.. बस उसी को खाकर अपना पेट भरना सीख लिया। सड़क पर चलते कभी पेड़ दिखते तो वो भी खाने के लिए महावत नहीं रुकने देता था। जब संगम पर नहीं जाता था तो मुझे लेकर सड़कों पर घूमता था और मुझसे सूढ़ उठाकर भीख मंगवाता था। 
    मुझे कई बार लोगों को घुमाने के लिए भी इस्तेमाल किया... लेकिन मेरे खाने और आराम का कभी ध्यान नहीं रखा। वो खुद थक जाता था तो आराम करता था, लेकिन मेरा आराम उसे मंजूर नहीं था। मेरे लिए तो बस वही बेड़ियों वाला बाड़ा था जहां मुझे हर शाम थक कर चूर होने के बाद बांधा जाता था और खाना या पानी भी नहीं दिया जाता था।... रात को भूख के कारण जब मैं कई बार चिंघाड़ता था तो कभी कभार आस-पास के लोग आकर सब्जी के छिलके या बचा खाना डाल जाते थे जिसे खाकर किसी तरह काम चलता था ...और कई बार तो इस पर भी महावत की मार ही पड़ती थी। 
    मेरे दांत और पूछ के बात तक बेच दिए मालिक ने- 

    उसने मेेरे दांत तोड़कर तो बहुत पहले बेच दिए थे। लोगों को कहता था कि हाथी की पूंछ के बालों को घर में रखने से अच्छा भाग्य आता है... और लोग कुछ सौ रुपए देकर मेरी पूछ के बाल खरीदने को तैयार हो जाते थे। तब बड़ी बेरहमी से वो मेरी पूंछ के बाल तोड़कर उन लोगों को बेच देता था। 


50 साल बाद आई आज़ादी की घड़ी-  


मैंने तो कभी आज़ादी का मतलब जाना ही नहीं था। लेकिन पचास साल तक ऐसी ही दशा में रहने के बाद शायद किसी को मेरी हालत पर रहम आ गया होगा और उसने जुलाई  2013 में वाइल्डलाइफ एसओएस नाम की समाजसेवी संस्था को मेरे बारे में बता दिया। वो लोग अच्छे थे। जब उन्हें मेरे बारे में पता चला तो उन्होंने मुझे छुड़ाने की कोशिशें शुरू कर दीं। उन्होंने कागज़ी कार्यवाही की और कोर्ट का आदेश प्राप्त किया। मेरा इंतज़ार एक साल और चला और आखिरकार एक साल बाद कोर्ट ने मुझे छुड़ाने का आदेश दिया और तब वो लोग मुझे छुड़ाने के लिए आए। 


2 जुलाई, 2014 को शुरू हुई मुझे आज़ाद कराने की मुहिम- 

2 जुलाई शाम को साढ़े छ बजे के लगभग वाइल्डलाइफ एसओएस के पशु चिकित्सक डॉक्टर येदुराज, चार महावतों, एक वाइल्डलाइफ बायोलॉजिस्ट, और चार आपातकालीन स्टाफ के साथ मुझे छुड़ाने आए। उनके साथ उत्तर प्रदेश के 20 फॉरेस्ट ऑफिसर और पुलिस के जवान भी थे। वो मुझे ले जाने के लिए एक दस पहियों वाला बहुत बड़ा ट्रक लेकर आए थे। 

पहले तो मैं उन लोगों को देखकर डर गया लेकिन फिर उनका व्यवहार मुझे मेरे महावत से कुछ अलग लगा। उनकी आंखों में मेरे लिए प्यार था। जब वो लोग मुझे छुड़ाने की कोशिश कर रहे थे तभी मेरा महावत उनसे लड़ने आ गया, उसने मेरे चारों पैरों में और बेड़ियां बांध दी, इतनी कसकर कि मुझे बेहद दर्द होने लगा। इतना दर्द कि मैं बयान नहीं कर सकता। और फिर महावत ने मुझे उन लोगों पर हमला करने का आदेश दिया...। मैं हमला कर भी देता लेकिन एक तो मेरे पैरों में दर्द और दूसरे वो लोग बिना डरे वहां खड़े हुए थे, मुझे छुड़ाने की जिद कर रहे थे... । मैंने हमला नहीं किया। उस दिन पहली बार मुझे लगा कि शायद मेरी आज़ादी के दिन आ गए हैं और मेरी आंखों से खुशी के आंसू बहने लगे..। बहुत रोया मैं उस दिन। 

और आखिरकार उन लोगों ने मेरे महावत से लड़कर मुझे छुड़ा ही लिया। वो लोग मुझे अपने ट्रक में ले गए। उन्होंने मुझे खाने को आम, केले और कटहल दिए। जब मैं ट्रक में चढ़ गया तो उन्होंने मुझे कुछ दवाएं भी दी जिससे मुझे नींद सी आने लगी थी। 

4 जुलाई, 2014 को कटी मेरी बेड़ियां और मिली आज़ादी- 

3 जुलाई की रात को लगभग 16 घंटे की यात्रा करके हम 350 मील दूर मथुरा, उत्तर प्रदेश के 'ऐलीफेन्ट केयर एंड कंजर्वेशन सेंटर' पहुंचे। मुझे वहां पहुंचकर पता चला कि डॉक्टर येदुराज पूरे रास्ते मेरे ही ट्रक पर बैठकर आए थे ताकि वो मेरा ख्याल रख सकें। मैं अभिभूत था। समझ नहीं आ रहा था कि ये लोग क्या करना चाहते हैं। फिर वो लोग मुझे ट्रक से उतारकर एक जंगल जैसी जगह ले गए..., और फिर डॉक्टर येदुराज ने मेरे पैर की कांटेदार बेड़ियां खोलने की शुरूआत की।

डॉक्टर येदुराज ने मेरे पैरों की बेड़ियां काट दी
वो समय इतना कठिन और दर्द भरा था.. कंटीली लोहे की बेड़िया मेरे पैर के मांस में घुस गईं थी। डॉक्टर येदुराज ने धीरे-धीरे करके उन्हें निकाला। मुझे बहुत दर्द हो रहा था, लेकिन वो बड़े प्यार से मेरे पैरों से वो जंग लगी बेड़ियां निकालने में लगे रहे। पूरे पैंतालीस मिनट बाद मेरी बेड़ियां निकली और मैं पांच दशकों की गुलामी से मुक्त हो गया। चार जुलाई की सुबह मेरे लिए आज़ादी लेकर आई। डॉक्टर और उनके साथियों ने मेरे पैर पर दवाईयां लगाई, मुझे फल खाने को दिए जो पहले मुझे कभी मिले ही नहीं थे। इतना प्यार मैंने कभी देखा ही नहीं था...। जानते हैं उस रात वहां सात और भी हाथी थे जो मुझे देखने के लिए वहां आ गए थे। और जब मेरे पैर से बेड़ियां खुल गईं तब पहली बार मैं अपने होश में बिना बेड़ियों के ज़मीन पर चला...

50 साल बाद मिली बेड़ियों से आज़ादी... 'बिना बेड़ियों के पहला कदम'

पैरों में बिना लोहे के बोझ के विचरने का सुख क्या होता है, कितना हल्कापन महसूस होता है... यह मैंने उस दिन जाना। भरपेट खाना क्या होता है, सिर के नीचे छत का मतलब क्या होता है, यह मैंने उस दिन जाना। उस दिन मुझे पता चला कि मारपीट नहीं करने वाले लोग भी होते हैं...

अब लगभग एक महीना हो चला है। मैं धीरे-धीरे ठीक हो रहा हूं। मेरे शरीर पर बहुत सारे जख्म थे जिन पर मेरे किसी भी मालिक ने कभी ध्यान नहीं दिया। लेकिन यहां के लोग बड़े प्यार से मेरी देखभाल करते हैं। मुझे खाने को देते हैं। मेरे जख्मों पर दवाई लगाते हैं। मुझे नहलाते हैं, खिलाते हैं... और सबसे बड़ी बात यह सब करने के बाद वो मुझे लोहे की जंजीर से नहीं बांधते, मेरी नाक, कान या बगल में अंकुश नहीं चुभाते और ना ही मुझे भीख मांगने के लिए पथरीली सड़कों पर ले जाते हैं। मैं आत्मसम्मान की जिंदगी जी रहा हूं और शायद अब मेरी जिंदगी खुशी खुशी गुजरेगी।

अपने दोस्तों के साथ राजू (हर्ड ऑफ होप)
यहां मेरे और भी दोस्त हैं। दो मेरी ही तरह नर हाथी हैं- भोला और राकेश और पांच मादा हाथी भी हैं। जिनमें से चंचल, लक्ष्मी और साईं गीता मेरी अच्छी दोस्त हैं। मुझे पता चला है कि मेरी ही तरह इन सबको भी बुरे मालिकों और स्वार्थी लोगों से आज़ाद करवाकर यहां रखा गया है। मेरे और पांचो मादा हथिनियों के ग्रुप को यहां के लोग 'हर्ड ऑफ होप' कहते हैं। यहां पूल भी है, जिसमें हम सब खूब नहाते हैं, खेलते हैं, मस्ती करते हैं...। हम साथ घूमते हैं, खाना खाते हैं और हमेशा खुश रहते हैं।

उपसंहार (एपिलॉग)
जब मैं यहां आया था तो बेहद डरा हुआ था, तब डॉक्टर येदुराज कहते थे कि मेरा मानवता से विश्वास उठ चुका है। लेकिन अब उनके साथियों और खुद उनके प्यार और देखभाल के कारण मैं फिर से अपने आप से और मनुष्यों से प्यार करना सीख रहा हूं। मेरा अच्छाई में विश्वास फिर से बनने लगा है।

अगर आप भी मुझसे और मेरे दोस्तों से मिलना चाहते हैं तो मथुरा में हमारे ऐलीफेन्ट केयर एंड कंजर्वेशन सेंटर आईए। यह आगरा स्थित ताजमहल से केवल 45 मिनट की दूरी पर है। और अगर आप मेरे जैसे अन्य मुश्किल में पड़े हाथियों की सहायता करना चाहते हैं, या मेरे और मेरे साथियों की देखभाल के लिए अनुदान देना चाहते हैं या फिर मेरे बारे में और जानना चाहते हैं तो इस वेबसाइट को विज़िट कीजिए-  http://www.wildlifesos.org/



('वाइल्डलाइफ एसओएस डॉट ओआरजी' और 'डेली मेल, यूके' की रिपोर्ट पर आधारित)