Monday, 30 June 2014

किशोर वाणी


“एक ऐसा व्हीकल बनाना है जो ऑक्सीजन रिलीज़ करे”

“सबसे बोरिंग होते हैं न्यूज़ चैनल्स जो एक ही बात को बार-बार रिपीट करते हैं”

“मम्मी –पापा को चाहिए कि बच्चों को डांटते समय गुस्से में कुछ भी ना बोल दें’


इस बार हम किशोर वाणी में आपके लिए लेकर आए हैं 13 साल के अक्षत गुप्ता की वाणी। अक्षत गुप्ता दिल्ली के निवासी हैं और नोएडा के एपीजे स्कूल में आठवीं कक्षा के छात्र है। इन्हें गणित से बहुत प्यार हैं और बॉक्सिंग, क्रिकेट और फुटबॉल में यह खासी रुचि रखते हैं। बहुत सारे महत्वपूर्ण मुद्दों और बातों पर अक्षत की राय बिल्कुल साफ और बेबाक है। अभी से देश और दुनिया के प्रति जागरूकता और जानकारी रखने वाले अक्षत मानते हैं कि अगर देश में बदलाव लाना है तो शुरूआत अपने आप से करनी होगी। आप भी ज़रा पढ़िए कि और क्या महत्वपूर्ण मानते है अक्षत, विश्वास मानिए 13 साल के इस बच्चे की साफगोई और सोच आपको भी सोचने पर मजबूर कर देगी।

सबसे महत्वपूर्ण हैं क्लीनिलिनेस यानि साफ सफाई



हमारे देश में सबसे ज्यादा परेशानी गंदगी की है। जहां देखो वहां गंदगी.. जिसका मन जहां आता है, वो वहीं कूड़ा फेंक देता है। यह बहुत गलत बात है। देश को अच्छा बनाने के लिए सबसे ज्यादा ज़रूरी उसे साफ रखना है। पता नहीं क्यों बड़े लोग यह बात नहीं समझते। कई जगह तो डस्टबिन भी होते हैं लेकिन लोग डस्टबिन तक कूड़ा फेंकने नहीं जाना चाहते। जिस तरह हम अपने घर को साफ रखते हैं उसी तरह देश और सड़कों को भी साफ रखना बेहद ज़रूरी है, तभी हमारा देश सुन्दर बनेगा।


करप्शन हमारे देश को बरबाद कर रहा है-


हमारा देश इतना अच्छा है, यहां सबकुछ है। यहां के लोग इतने अच्छे हैं। किसी चीज़ की कोई कमी नहीं। लेकिन फिर भी अगर हमारा देश तरक्की नहीं कर पा रहा है तो इसकी वजह है करप्शन। खासतौर से नेताओं का करप्शन। जिन पर हम लोग भरोसा करते हैं वहीं लोग इतने करप्ट होते हैं और हमारे पैसों का गलत तरीके से इस्तमाल करते हैं, जो गलत है। इन कुछ लोगों की वजह से पूरे देश का विकास प्रभावित होता है। इनको पकड़कर जेल में डालना चाहिए। यह लोग इतने ज्यादा लालची होते हैं कि अगर मान लो किसी विकास की योजना के लिए 10 करोड़ रुपए सैंक्शन होते हैं, तो दरअसल तो उस योजना में केवल 1 करोड़ रुपए ही खर्च किए जाते हैं। बाकी 9 करोड़ रुपए तो यह राजनेता ही खा जाते हैं। आप रोज़ाना के अखबार में ही देख लो, रिफॉर्म्स से ज्यादा उसमें नेताओं के घोटालों की खबरें होती है। ये लोग सुविधाएं तो सारी चाहते हैं लेकिन अपनी जेब से एक पैसा नहीं खर्च करना चाहते। जब तक नेता ईमानदार नहीं बनेंगे, मुझे नहीं लगता देश का कुछ भला हो सकता है।


लोगों को माइंडसेट बदलने की ज़रूरत-

भारत के लोगों का मांइडसेट बहुत स्ट्रॉंग बन चुका है जिसे बदलने की ज़रूरत है, उन्हें हर खबर को पढ़कर ऐसा लगता है कि यह किसी और की खबर है, किसी और के साथ ऐसा हुआ है, हमारे साथ कभी नहीं होगा। और यहीं सोचकर वो परेशानी में पड़े किसी इंसान की हैल्प नहीं करते। जबकि और देशों में लोग बहुत हैल्पफुल होते हैं, अगर किसी के साथ कुछ बुरा या गलत हो रहा होता हैं तो लोग उनकी सहायता करने पहुंच जाते हैं। इसकी वजह यहीं है कि हमारे देश में लोगों ने अपने विचार ही ऐसे बना लिए हैं कि वो हर किसी को दूसरे की नज़र से देखते हैं। जब तक वो औरों को अपने से जोड़कर नहीं देखेंगे तब तक उसकी परेशानी कम करने की कोशिश नहीं करेंगे। हमारे बड़े बच्चों को तो सिखाते हैं कि दूसरों की सहायता करनी चाहिए लेकिन जब उनके ऊपर बात आती है तो वो सही- गलत और परिस्थितियों का हिसाब लगाने लगते हैं। और कई बार तो हमें कह देते हैं कि दूसरों के मामलों में हमें बोलने की ज़रूरत नहीं है। इस चीज को बदलने की ज़रूरत है। हम बच्चे भी वरना वहीं सीखेंगे जो देखेंगे। आप अपना मांइडसेट बदलिए और जो चीज़ बच्चों से करने को कहते हैं वो खुद भी करिए।

गर्ल चाइल्ड भी ज़रूरी होते हैं

मेरे कुछ रिश्तेदार गांव में रहते हैं जहां मैंने देखा है बहुत सारे लोग गर्ल चाइल्ड होने पर बहुत दुखी होते है। बिल्कुल खुशी नहीं मनाते। य़ह चीज़ गलत है। हम स्कूल में पढ़ते हैं कि आजकल गर्ल्स इतना आगे बढ़ रही है, हर काम में योगदान दे रही हैं, फिर आप उनसे नफरत क्यों करते हैं।

मेरा रोल मॉडल है एक रिक्शा चलाने वाले का बेटा

जब हमने अक्षत से उसके रोल मॉडल के बारे में पूछा तो उसने हमें एक रिक्शा चालक के बेटे के बारे में बताया- मैंने कुछ समय पहले न्यूज़ में सुना था कि एक रिक्शा चलाने वाले के बेटे ने आईआईटी किया है और उसे अपनी पहली नौकरी में ही बहुत बड़ा पैकेज मिला है। यह स्टोरी मेरे लिए बहुत इन्सपायरिंग थी। मुझे पहली बार लगा कि अमीरी-गरीबी कुछ नहीं होती। अगर एक रिक्शा चलाने वाले का बेटा इतना कुछ अचीव कर सकता है तो कोई भी कर सकता है। आप अमीर हो या गरीब, अगर आप पढ़ते हैं तो आपको उसका फल मिलता है।

एक ऐसा व्हीकल बनाना चाहता हूं जो ऑक्सीजन छोड़े-

एक बार हमें स्कूल की तरफ से साइंस प्रोजेक्ट मिला था जिसमें हमें कुछ क्रिएटिव बनाना था। तब मैंने बहुत सोचा और मेरे दिमाग में आया कि हमारे देश में सबसे ज्यादा प्रदूषण व्हीकल्स के धुंए के कारण होता है और हमें इसे कम करने के लिए कुछ करना चाहिए। तबसे मेरी इच्छा है कि मैं बड़े होकर एक ऐसा व्हीकल बनाऊं जो लोगों द्वारा छोड़ी गई कार्बन डाई ऑक्साइड गैस पर चलता हो और ऑक्सीजन रिलीज़ करता हो। अगर कार्बन डाई ऑक्साइड ना भी हो तो वो व्हीकल किसी भी फ्यूल पर चलने लगे लेकिन हमेशा ऑक्सीजन ही छोड़े। उसको बाइक या कार में भी बदला जा सकेगा। अगर रोड छोटी है तो उसको बाइक में बदल लो और रोड बड़ी और खाली है तो गाड़ी में। इससे सड़को का ट्रैफिक भी थोड़ा कम होगा और साथ ही यह ऐसा व्हीकल होगा जिससे बिल्कुल भी पॉल्यूशन नहीं होगा बल्कि ऑक्सीजन मिलेगी। 


अंग्रेज़ी फिल्में देखना है पसंद क्योंकि हिंदी फिल्मों में कोई कहानी नहीं होती-

मुझे हिन्दी फिल्में बिल्कुल अच्छी नहीं लगती क्योंकि उन सबमें एक ही तरह की कहानी होती है जबकि अंग्रेज़ी फिल्में बिल्कुल अलग और अच्छी कहानी वाली होती हैं। उनकी कहानी में इतने ट्विस्ट्स होते हैं कि उन्हें देखने में मज़ा आता है। आपका दिमाग भी खुलता है। कितनी सारी नई बातें जानने को मिलती हैं। इसलिए हिन्दी फिल्में मैं बहुत कम देखता हूं।


मुझे कोई हीरोइन पसंद नहीं क्योंकि उनके डायलॉग्स ही नहीं होते

मुझे अंग्रेज़ी फिल्मों के हीरो रॉबर्ट डाउनी जूनियर बहुत अच्छे लगते हैं। इंडियन हीरोज़ में आमिर खान और अमिताभ बच्चन अच्छे लगते हैं, लेकिन हीरोइन कोई पसंद नहीं क्योंकि किसी भी हीरोइन का कोई काम फिल्मों में होता ही नहीं। उनको ज्यादा डायलॉग्स तक बोलने को नहीं मिलते। वो केवल हीरो के आगे-पीछे घूमती रहती हैं। उनका सपोर्टिंग रोल होता है।

सबसे बोरिंग होते हैं न्यूज़ चैनल क्योंकि वो एक ही बात को बार-बार रिपीट करते हैं- 


इस दुनिया में सबसे बोरिंग कोई चीज़ अगर है तो वो है न्यूज चैनल्स। अगर आपको समाचार जानने हैं तो अखबार पढ़ लो लेकिन न्यूज़ चैनल्स बिल्कुल मत देखो। ये लोग एक ही चीज़ को इतनी बार, इतनी देर तक रिपीट करते हैं कि इंसान बोर होकर मर ही जाए। एक बार तो मैं एक न्यूज़ चैनल पर कोई खबर देख रहा था तो एंकर बार-बार बोल रहा था कि हम बताते है इसका राज..., हम बताते हैं इसका राज... , उसने इतनी बार यह बात बोली, लेकिन राज नहीं बताया। मैंने चैनल चेंज कर दिया और घड़ी देखकर 15 मिनट बाद जब वो चैनल दोबारा लगाया, तब भी एंकर वहीं बोल रहा था...। मतलब हद है, हम लोग पागल हैं क्या। यह न्यूज वाले सारे एक्सपेरिमेंट हमीं पर क्यों करते हैं। न्यूज़ चैनल्स तो देखने ही नहीं चाहिए। इतनी बार एक ही बात बोलते हैं ये लोग कि सिर भन्नाने लगता है।

मम्मी पापा सुधारे लैंग्वेज और टीचर्स को चाहिए होमवर्क कम दें-




मेरे मम्मी-पापा वैसे तो बहुत अच्छे हैं और मुझसे बहुत प्यार करते हैं लेकिन फिर भी अगर मुझे उनमें कुछ बदलना हो तो मैं बोलूंगा कि आप अपनी लैंग्वेज सुधारो। बच्चों को डांटते समय, गुस्से में आप बहुत सारी गलत बातें बोल देते हैं जो हमें बहुत खराब लगती हैं लेकिन हम छोटे होने के कारण कुछ कह नहीं पाते। आप अगर हमें डांटते हैं तो प्यार से डांटिए, गुस्से में कुछ भी मत बोल दीजिए। जहां तक टीचर्स की बात है तो उनके लिए तो बस यहीं कहना है कि प्लीज़ हमें होमवर्क थोड़ा कम दिया कीजिए।

(हिन्द प्रहरी से)

“महात्मा गांधी की हत्या 30 अक्टूबर 1948 को हुई थी”..... “दूसरे विश्व युद्ध में जापान ने अमेरिका पर परमाणु हमला किया था” ...... “देश के विभाजन के बाद ‘इस्लामिक इस्लामाबाद’ नाम से एक नए देश का गठन किया गया”.....


यह मोदी के गुजरात का इतिहास है जनाब, सरकारी पाठ्य पुस्तकों में छपे हैं उपरोक्त सभी तथ्य, छात्र इन्हें ही पढ़ और सीख रहे हैं



अगर गुजरात के सरकारी स्कूल का कोई छात्र आपसे कहे कि द्वितीय विश्व युद्ध के समय अमेरिका ने जापान पर नहीं बल्कि जापान ने अमेरिका पर परमाणु बम गिराया था, तो
भूल कर भी उसे सही करने की कोशिश मत करिए, वरना कहीं ऐसा ना हो कि वो यह कहने लगे कि.. गलत तो आप हैं, हम सही हैं क्योंकि हमारी किताब में तो यहीं लिखा है...। और यह भी हो सकता है कि वो आपको किताब में लिखा यह तथ्य दिखा भी दे और फिर आपको ही आपके ज्ञान पर संदेह होने लगे..।

जी हुज़ूर, गुजरात के सरकारी स्कूलों में ऐसी ही गलत बातें छात्रों को पढ़ाई और सिखाई जा रही हैं। कक्षा छठी, सातवीं और आठवीं में पढ़ाई जा रही सामाजिक विज्ञान की किताबों के इतिहास खंड में ये सारी गलत बातें लिखी हैं। और ये तो मात्र कुछ छोटे से उदाहरण है। वास्तव में तो इन किताबों में 120 के लगभग तथ्यात्मक गलतियां हैं और वो भी ऐसी गलतियां जो अर्थ का अनर्थ करने के साथ-साथ पूरे इतिहास को उल्टा-पुल्टा कर देने के लिए काफी हैं। इन किताबों से अगर आपने इतिहास पढ़ लिया तो आपका दिमाग चकरा जाएगा।  

और सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह हैं, कि समाचार पत्रों और मीडिया चैनल्स द्वारा गुजरात सरकार के संज्ञान में ये बातें और गलतियां लाए जाने के बावजूद सरकार ने इन किताबों को वापस नहीं लिया है और बच्चे बदस्तूर गलत इतिहास पढ़ रहे हैं। इतिहास के ये पाठ अंग्रेजी सरकारी स्कूलों के लगभग 50,000 छात्र-छात्राओं को पढ़ाए जा रहे हैं।

शिक्षा विशेषज्ञों के पैनल ने तैयार की है यह पुस्तक


ये स्कूली किताबें गुजरात काउंसिल ऑफ एजूकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग (जीसीईआरटी) और गुजरात स्टेट बोर्ड फॉर स्कूल टेक्स्ट बुक्स (जीएसबीएसटी) के विशेषज्ञों के पैनल द्वारा अध्ययन के लिए तैयार की गईं हैं। यह पैनल विभिन्न कक्षाओं के छात्रों के लिए कोर्स निर्धारित करता है।

यह भी जान लीजिए कि इन्हीं किताबों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जीवन के ऊपर एक पाठ शामिल करने का प्रस्ताव दिया गया था, जिसे प्रधानमंत्री ने खुद मना कर दिया। उस समय यह बात हमें प्रधानमंत्री की उदारता लग रही थी लेकिन इन किताबों में गलतियों को देखते हुए तो लगता है कि प्रधानमंत्री ने बहुत सोच समझकर यथार्थपरक निर्णय लिया। भला कौन चाहेगा कि उसके जीवन के बारे में भी गलत बातें पढ़ाई जाएं।

हांलाकि मीडिया में आई खबरों के बाद राज्य सरकार की नींद टूटी है और सरकार ने प्राइवेट स्कूलों के विशेषज्ञों के एक पैनल को इन किताबों को सही करने के लिए नियुक्त भी किया है, लेकिन नई और सही किताबें नए शैक्षणिक सत्र की शुरूआत तक ही बाज़ारों में उपलब्ध हो पाएंगी और तब तक छात्र इन्हीं किताबों से गलत इतिहास ही पढ़ेंगे और पढ़ रहे हैं। 

यह सभी किताबें गुजराती किताबों से अनुवादित की गई हैं और बहुत ही खराब तरीके से अनुवादित हैं। आईआईएम, अहमदाबाद के पूर्व डायरेक्टर समीर बरुआ- जिन्हें गुजरात की स्कूली किताबों में गलतियों के ऊपर कई आर्टिकल्स लिखने के बाद राज्य सरकार द्वारा 2001 में इन किताबों की देख रेख के लिए नियुक्त किया गया था, के मुताबिक- गुजरात स्कूल किताबों के लेखक कॉम्पीटेन्ट नहीं हैं। गुजरात राज्य में मुख्य अध्ययन सामग्री हमेशा गुजराती में रही और इसके अंग्रेजी अनुवाद बहुत ही खराब क्वालिटी के होते हैं।  


आईए नज़र डालते हैं किताबों की कुछ और गड़बड़ियों पर –


 -यह सभी जानते हैं कि द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अमेरिका ने जापान पर एटम बम गिराया था, जिसके कारण हिरोशिमा और नागाशाकी शहर पूरी तरह तबाह हो गए थे, लेकिन किताबों में इसके उलट पढ़ाया जा रहा है। गुजरात बोर्ड की 8वीं कक्षा की इतिहास की किताब के मुताबिक जापान ने अमेरिका पर परमाण्विक हमला किया था। 

-महात्मा गांधी की पुण्यतिथि 30 जनवरी 1948 है, लेकिन गुजरात के स्कूलों में बच्चों को यह तिथि 30 अक्टूबर 1948 पढ़ाई जा रही है।

-पुस्तक में दादाभाई नौरोजी, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, गोपाल कृष्ण गोखले को कांग्रेस का ‘एक्स्ट्रीमिस्ट' सदस्य बताया गया है, जबकि वे नरमपंथी थे।

- किताब में लिखा है कि 1947 में विभाजन के बाद एक नए देश का जन्म हुआ जिसका नाम था इस्लामिक इस्लामाबाद और इसकी राजधानी हिंदूकुश की पहाड़ियों में खैबर घाट नाम से थी।

-किताब के अनुसार होम रूल आंदोलन आज़ादी के बाद 1961 में शुरू हुआ था जबकि यह वास्तव में 1916 में शुरू हुआ था।

-इस किताब के अनुसार संयुक्त राष्ट्र के संगठन यूनेस्को का पूरा नाम “यूनाइटेड नेशंस एजुकेशनल सोसायटी एंड चिल्ड्रन ऑर्गेनाइज़ेशन है।

-किताब के दो चैप्टर गांधी जी को समर्पित हैं. इनमें लिखा है कि महात्मा गांधी ने पहला सत्याग्रह आश्रम अहमदाबाद में मई 1925 में स्थापित किया जबकि इसकी शुरूआत का सही साल 1915 है।

-बाल गंगाधर तिलक ने अंग्रेजी में मराठी नाम का अखबार निकाला था।

-सभी दक्षिण भारतीय मद्रासी होते हैं।

-इन किताबों में केवल गलतियां ही नहीं हैं बल्कि किताबों में बहुत सी जगह ऐसी बातें कहीं गई हैं जो छात्रों की सोच को संकुचित करने का काम करती हैं जैसे कि-
कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की किताब के अनुसार- चूंकि पूर्वीभारत में बहुत बारिश होती है, वहां लोग एड़ियों (टखनों) से ऊपर कपड़े पहनते हैं, यहां महिलाएं अजीब अंदाज़ में साड़ियां पहनती हैं
-और इडली और डोसा उत्तर भारत में प्रसिद्ध हैं। मद्रासी भोजन बहुत प्रसिद्ध है

-एक अन्य संदर्भ में किताब में पुरी की रथ यात्रा को उत्तर भारतीय त्योहारों से जोड़ दिया गया है और ओणम और दीवाली को केरल से जोड़ा गया है।

-अंग्रेजी को भी नहीं बख्शा गया है। कक्षा 6 की टेक्स्ट बुक का एक सैम्पल देखिए- "You might have heared, read and seen that the Earth is round. Whereas, you stay on the Earth, you can not come to know the shape of Earth; because the Earth is too much vast. 

"Why we do not feel that the Earth is round? Is the Earth really To whom it is like? Just imagine, round? The Moon-uncle is telling. Come on to my surface and see from the edge. The travellers of the space had taken the photographs of the Earth from the space - see it." 

-एक और उदाहरण देखिए- इंसान को गेहुं, जौ आदि जैसे अनाज अपने आप भारत के विभिन्न भागों की मिट्टी से प्राप्त हो गए। तो भारत के लोगों ने (उस समय के) उनको जमा कर लिया और उन अनाजों को भोजन के लिए सुरक्षित रख लिया। वो एक दूसरे से अक्सर मिलते थे जिससे सोशलिज्म बढ़ा।

ये गड़बड़ियां ऐसी हैं कि इतिहास की शक्ल ही बदल दें। किताब की गलतियों के बारे में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार आठवी कक्षा की सामाजिक विज्ञान की 124 पन्ने की किताब में 59 तथ्यात्मक ग‌ल‌तियां हैं। अंग्रेजी में छपी इस किताब में 100 से अधिक वर्तनी की गलतियां हैं। इसके अलावा क्रांतिकारियों और समाजसुधारकों के नामों में भी तमाम ग‌लतियां की गई हैं।

तो जनाब अब आपको पता चला कि नरेन्द्र मोदी का इतिहास ज्ञान इतना कमज़ोर क्यों हैं...? अब तक मीडिया कई बार रैलियों के दौरान उनके द्वारा गलत ऐतिहासिक तथ्यों को रखने पर अंगुली उठा चुका है। लेकिन सच्चाई तो यह है कि गड़बड़ी उनके ज्ञान में नहीं, बल्कि उनके राज्य में पढ़ाई जा रही पाठ्य पुस्तकों में हैं, क्या पता मोदी जी ने भी उन्हीं पुस्तकों को बांचा हो...।



वो लड़की और मैं और हमारे आयाम...


कुछ कच्चे, कुछ पक्के..कुछ मीठे, कुछ खट्टे.., थोड़े से छोटे अनुभव और कुछ पतंग की डोर सी बारीक और लम्बी यादें... कुछ पुरानी स्कर्ट पर बिखरी ताज़ी बनी सब्जी की खुश्बू और कुछ स्वेटर के नीचे दबाकर रखे बेरों की स्वेटर पर पड़ी छाप...कुछ पक्की सहेली से पहली बार मन की बात साझा करने की खुशी और ज़रा से हाथ से बनाए गए कार्डो पर पड़ें अंगुलियों के निशान... दोस्ती की पहली कविता, रात का पहला जागरण और कहीं जल्दी पहुंचने की ढेर सारी बेचैनी.... लगा जैसे ज़िदंगी पिक्चर की रील की तरह रिवाइन्ड हो रही है और पर्दे पर वहीं पुरानी तस्वीरें और उनमें मौजूद पात्र घूम रहे हैं...। या कहीं पहाड़ सी जिंदगी से थोड़ा-थोड़ा करके भूतकाल रिस रहा है और हर पुरानी चीज़ धीरे-धीरे सामने आ रही है।

किसने कहा कि जिंदगी बदलती है...  यह तो पीरियोडिक टेबल की तरह है। थोड़े अंतराल के बाद हर तत्व और उसके गुण-धर्मों की आवृत्ति होती है, बस उसके गुण या तो एक क्रम में बढ़ते जाते हैं या फिर घटते जाते हैं...।

वैसे तो उससे केवल एक छोटा सा पर अहम सा रिश्ता है... मैं बहुत बड़ी हूं और वो बहुत छोटी। मैं समझदार हूं और वो नासमझ, नादान और जिंदगी का खुले हाथों से स्वागत करती छोटी सी लड़की जो धीरे-धीरे 'बड़े होने' की दहलीज पर पहुंच रही है। जब यूंही उसे परेशान होते, मुस्कुराते, बेफिक्र जिंदगी जीते और फिर रोते देखा तो लगा जैसे 25 साल पुरानी कहानी फिर दोहराई जा रही है... वो लम्हें वो यादें सब यहीं फिज़ा में घुल से गए थे जो एक निश्चित समय पर एकसार होकर फिर से वहीं पुरानी तस्वीर बना रहे हैं... और उन सबमें मेरी पुरानी बेफिक्र जिंदगी फिर से साकार हो रही है। मैं फिर पॉइन्ट ज़ीरो पहुंच गई हूं... और मैं गोलार्ध के बीच में अपने आज के समय के बिन्दु पर भी हूं.... धीरे-धीरे शून्य से निकलकर मेरा भूतकाल वर्तमान में बदल रहा है, मुझ तक आ रहा, आज मैं जहां हूं शायद वो कल फिर उसी बिन्दू पर पहुंचेगा....तब तक मैं और आगे बढ़ चुकी होऊंगी और इस तरह  मैं एक ही समय में दो आयामों में जी रही हूं...।

जो बातें भूल गई थी, समय के उस पार रह गईं थी, आज यह लड़की उन्हें फिर इस पार ले आई है बिल्कुल मेरे सामने। और मैं इन्हें देखकर हैरान हूं, खुश भी हूं...। क्योंकि आज मैं नहीं मेरी नादानियां मुझ पर हंस रही है। कैसे गुमान से यह लड़की आश्वस्त है कि मैं कुछ नहीं समझी बस वैसे ही जैसे कल इसी मोड़ पर मुझे कुछ ऐसा ही विश्वास था...। मुझे खुशी हो रही है। सबको एक सी जिंदगी मिलती है। वहीं कुछ, वैसा ही देता है भगवान अगर मन के भावों और जिंदगी के मोड़ो से तोलो तो...शायद इसलिए आज इससे बहुत लगाव और जुड़ाव हो गया है। अब तक समाज का रिश्ता था अब दिल का रिश्ता बन गया है। बेटी सी, बहन सी, सहेली सी दिखती है वो मुझे..

ऐसे में कभी यह भी सोचती हूं कि जिंदगी में सबसे महत्वपूर्ण है गोल आकृति... जिस वक्त इस गोल गोल शेप के बारे में पढ़ा था नहीं सोचा था कि जीवन की सबसे अहम सच्चाई के बारे में पढ़ रहे हैं..., पर अब जाकर इस वृत्त का अर्थ समझ आता हैं। कहीं कोई ठहराव नहीं.. कहीं ना शुरूआत और ना ही अन्त...बस अनन्त चलनशीलता.....कितना भी दूर निकल जाओ लौटकर वहीं आना है...


Thursday, 19 June 2014

आंखों में सपने हो और कुछ करने की तमन्ना हो तो बिहार से बॉलीवुड का सफर दूर नहीं...

सप्ताह का साक्षात्कार- रवि भूषण भारतीय


पान सिंह तोमर फिल्म के गुस्सैल और आक्रोशित बलराम सिंह तोमर याद हैं आपको....?... और अगर आपने हाल ही में रिलीज़ नेशनल अवॉर्ड विजेता फिल्म ‘फिल्मिस्तान’ देखी है तो उसके बंदूकधारी पाकिस्तानी किडनैपर को भी नहीं भूले होंगे आप.....! इन किरदारों में जान फूंकने वाले युवक का नाम है रवि भूषण भारतीय। बिहार के पूर्णिया जिले के रवि की आंखों में बचपन से बॉलीवुड में जाने के सपने सजते थे, और अब वो अपनी मेहनत, हिम्मत और प्रतिभा के दम पर अपनी मंजिल के बहुत करीब पहुंच चुके हैं। वो दिन दूर नहीं जब भोपाल के माखनलाल विश्वविद्यालय का यह छात्र आपको बॉलीवुड के चमकते सितारे के रूप में दिखेगा..., क्योंकि जहां हुनर हो, आजमाइश की तैयारी हो, खुद को उस चीज़ के लिए झोंकने की चाह हो, जिसका सपना आंखों में सजता हैं, वहां सफलता में कहां इतना दम कि वो पीछे-पीछे ना आए।

हमने जब रवि से उनके सफर, सपनों और अनुभव के बारे में बात की तो उन्होंने बेहद ईमानदारी और बेबाकी से अपने अनुभव हमारे साथ साझा किए। आप भी यह साक्षात्कार पढ़ेंगे तो जान पाएंगे कि अगर चाह हो और इरादा पक्का हो तो रास्ता मिल ही जाता है... फिल्मी अंदाज में कहें तो- अगर आप किसी चीज़ को दिल-ओ-जान से चाहों तो पूरी कायनात आपको उससे मिलाने में लग जाती है..

शुरूआत आपके अतीत से करते हैं। कहां से हैं आप और बॉलीवुड तक पहुंचने का खयाल कैसे आया?

मैं बिहार के एक छोटे से गांव पूर्णिया का रहने वाला हूं और मेरी स्कूलिंग जवाहर नवोदय विद्यालय से हुई है। शुरूआत से ही अभिनय का शौक था और स्कूली रंगकर्म में भाग लिया करता था। 1998 की बात है, तब मैं बारहंवी कर चुका था, हमारे यहां एनएसडी का वर्कशॉप हुआ जो आलोक चटर्जी ने करवाया था। मैंने उसमें भाग लिया और उन्होंने मेरे काम की काफी सराहना की। मैंने उनसे पूछा कि मैं अभिनय को अपना प्रॉफेशन बनाना चाहता हूं और मुझे कहां जाना चाहिए। तब उन्होंने मुझे भोपाल या दिल्ली जाने की सलाह दी। बस रास्ता मिल गया था और मैं भोपाल आ गया। यहां मैंने माखनलाल विश्वविद्यालय में दाखिला ले लिया।

लेकिन आपने माखनलाल विद्यालय को ही क्यों चुना?

इसकी दो वजहें थीं। पहली तो मैं आगे एनएसडी में दाखिला लेना चाहता था जिसके लिए ग्रेजुएट होना ज़रूरी था, दूसरे मैंने जिस कोर्स में दाखिला लिया था- बैचलर ऑफ जर्नलिज्म, वो भी ऐसा था जो मेरे लिए सहायक होता। मेरे कुछ सीनियर्स ने भी मुझे काफी प्रोत्साहित किया था और आलोक चटर्जी की बात भी मुझे याद थी। तो बस उस समय माखनलाल विद्यालय ही सबसे सही विकल्प लगा और उसमें दाखिला ले लिया। यहां आकर भी मैं लगातार रंगमंच से जुड़ा रहा। मैंने कभी अभिनय को नहीं छोड़ा।

फिर एनएसडी में दाखिला लिया?
नहीं एनएसडी में नहीं एफटीआई में दाखिला लिया। दरअसल साल 2003 में मैं एनएसडी में दाखिले के लिए गया था। इंटरव्यू तक पहुंचा लेकिन वहां मेरा दाखिला नहीं हुआ। वो मेरे लिए मायूसी का वक्त था। मैं वापस भोपाल लौट आया और थिएटर से जुड़ गया। लगभग 6 महीने मैंने जमकर थिएटर किया। मैं हबीब तनवीर से जुड़ा, अलखनंदन जी के ग्रुप नट-बुंदेले से जुड़ा। वहां मैंने अंडोरा नाम से एक नाटक किया था जिसके लिए मुझे मध्यप्रदेश की तरफ से बेस्ट एक्टर के लिए भी नामित किया गया था। छ: महीने वहां रुकने के बाद मैं एफटीआई में दाखिला लेने पुणे चला गया। और यह मेरा सौभाग्य था कि एफटीआईआई में 28 साल पहले बंद हुआ एक्टिंग का कोर्स उसी साल दोबारा शुरू किया गया था। एफटीआई के डायरेक्टर त्रिपुरारी शरण ने इसे शुरू किया था। पूरे देश से केवल 20 लोगों का उसमें सलेक्शन हुआ था जिनमें से एक मैं था।

आपको पहला ब्रेक कम मिला?

2007 की शुरूआत में मेरा एफटीआई का कोर्स खत्म हुआ और तभी मुझे मेरी पहली फिल्म मिली- ‘वो सुबह किधर निकल गई’। 86 मिनट की यह फिल्म पांच दोस्तों की कॉलेज लाइफ और उसके बाद की जिंदगी पर आधारित थी। इसे गोवा फिल्म फेस्टिवल में दिखाया गया था। अभी हाल में ही इंडिया हैबिटेट सेंटर में भी इसकी स्क्रीनिंग की गई थी। फिलहाल इस फिल्म को स्टार गोल्ड ने खरीद लिया है।

उसके बाद का सफर कैसा रहा। ‘वो सुबह किधर निकल गई‘ से ‘पान सिंह तोमर’ और ‘फिल्मिस्तान’ तक कैसे पहुंचे? 


उसके बाद का सफर बिल्कुल आसान नहीं था। 2007 में मैं मुम्बई आ गया। मैंने सोच लिया था कि अब वापस नहीं जाना है और हर हाल में अपनी मंजिल को हासिल करना है। मैं लगातार अच्छे रोल की तलाश में था। इस दौरान सीआईडी, क्राइम पेट्रोल जैसे सीरियल्स में कुछ छोट-मोटे रोल्स भी किए। लेकिन पान सिंह तोमर तक पहुंचते पहुंचते एक डेढ़ साल लग गया। मुझे पता चला कि तिग्मांशु धूलिया को एक एग्रेसिव चेहरे की तलाश थी। वो लगभग पूरी इंडस्ट्री का ऑडिशन ले चुके थे। मुझे मालूम था कि इस रोल के लिए मैं ही सबसे फिट हूं। मैंने उन्हें एसएमएस किया, तब जवाब नहीं आया। दोबारा एसएमएस किया, तब उन्होंने मुझे बुलाया और डेढ़ घंटे तक खुद मेरा ऑडिशन लिया। उसके बाद भी उन्होंने कुछ बताया नहीं। दूसरे दिन उन्होंने मुझे बुलाकर कहा कि मुझे बलराम के रोल के लिए चुन लिया गया है। उस वक्त इतनी ज्यादा खुशी हो रही थी कि बयान नहीं कर सकता। पहली बार इतने बड़े बैनर में, बड़े अभिनेताओं और डायरेक्टर के साथ काम करने का मौका मिला था। मैं बहुत खुश था। बस इसके बाद फिल्मिस्तान और अन्य फिल्में मिली।

और कौन सी फिल्में कर रहे हैं?
रणदीप हूडा के साथ शूटर नाम की फिल्म कर रहा हूं जिसके डायरेक्टर विश्राम सावंत हैं। इसके अलावा स्प्रिंग थंडर नाम से एक फिल्म कर रहा हूं जो बिल्कुल तैयार है। एक और फिल्म है, जिसका नाम शायद बुल, बुलबुल, बंदूक होगा। इसका पोस्ट प्रोडक्शन चल रहा है। इसमें मैंने केके मेनन, जैकी श्रॉफ और जिमी शेरगिल जैसे अभिनेताओं के साथ काम किया है। इसके अलावा मेरी पहली लीड रोल की जो फिल्म है वो है ‘खेलमंत्रा’। इस फिल्म का हीरो मैं हूं। यह फिल्म पूरी तरह से मेरे कंधो पर टिकी है। सटोरियो और सट्टेबाज़ी की कहानी है। पूरी तरह कमर्शियल फिल्म है। य़ह फिल्म पूरी हो चुकी है और बस इसके डिस्ट्रीब्यूशन की बात चल रही है। उम्मीद है कि सितम्बर-अक्टूबर तक यह फिल्म रिलीज़ हो जाएगी।



फिल्म इंडस्ट्री में आपका अनुभव कैसा रहा? लोग कहते हैं यह चकाचौंध की दुनिया है, यहां जमना आसान नहीं। फिर आपके तो परिवार में भी कोई दूर दूर तक फिल्म इंडस्ट्री से जुड़ा हुआ नहीं है। ऐसे में आपको कितनी मुश्किलें हुईं?
देखिए यहां दिखावा वाला मामला बहुत चलता है। फिल्म इंडस्ट्री में दो तरह की चॉकलेट्स हैं। एक बहुत बढ़िया क्वालिटी की और बढ़िया चॉकलेट है लेकिन उसकी पैकेजिंग बड़ी लोकल टाइप है। मार्केटिंग अच्छी नहीं। इसलिए उसकी मांग कम है। ज्यादा लोग उसे नहीं खरीदते और दूसरी ओर एक कामचलाऊ, ठीकठाक चॉकलेट है लेकिन उसकी पैकेजिंग बड़ी जबरदस्त है, शानदार दिखती है तो लोग उसे खरीदने चले आते हैं। यहां लॉबीज़ भी बहुत चलती हैं। आपने किस डायरेक्टर के साथ काम किया है, यह भी महत्वपूर्ण होता है। मुझे यह बातें हालांकि देर से समझ आईं लेकिन अब आ गई हैं। दूसरे, मुझे अपने काम पर हमेशा से भरोसा था। मैं जानता था कि मुझमें टैलेंट है और देर से ही सही मौका मिलेगा। मैं हमेशा सकारात्मक रहा, हिम्मत कभी नहीं हारी। बस दीवार में से एक ईंट उखाड़ने की देर है, पूरी दीवार टूटती चली जाती है। मुझे भी एक ब्रेक मिला, लोगों ने काम देखा तो अब यकीन है कि मंजिल दूर नहीं।

लेकिन स्ट्रगल का दौर कैसा रहा। आर्थिक तंगी के दौर में कैसे अपने आपको संभाला।
मेरे भैया डॉक्टर हैं और जब मैंने अपने घर में इस प्रॉफेशन को चुनने के बारे में बताया था तो पापा खुश नहीं थे। क्योंकि वो यहीं चाहते थे कि मैं भी भैया की तरह डॉक्टर बनूं। लेकिन मैं सबकुछ छोड़कर आ गया। जब तक भोपाल में था, थिएटर के साथ हमेशा कुछ काम करता रहा ताकि कोई फाइनेंशियल दिक्कत ना हो। लेकिन मेरे मम्मी-पापा और भैया ने भी मेरा पूरा साथ दिया। वो लोग भले ही नहीं चाहते थे कि मैं यह काम करूं लेकिन उन्होंने कभी मेरा साथ नहीं छोड़ा। मुझे याद है जब मेरा एफटीआईआई में एडमिशन हुआ था तो उसकी सालाना फीस ढाई लाख रुपए थी। तब मैं बहुत परेशान हो गया था। सोचता था कि मुझे दाखिला नहीं लेना। तब मेरे भैया ने मुझसे कहा कि- लोगों को तो यहां एडमिशन नहीं मिलता और तुम्हें मिल गया है तब तुम मना कर रहे हो। तुम फीस की चिंता क्यों कर रहे हो। यह सब हम देख लेगें। तब मेरे भैया ने सारी जिम्मेदारी ली। उन्हीं लोगों का प्यार और विश्वास है कि मैं यहां तक पहुंचा हूं। हर कदम पर वो लोग मेरे साथ रहे।

जो लोग आपकी तरह आंखों में सपने लिए बॉलीवुड का रुख करते हैं, उनके लिए कोई सलाह?

बस यहीं कहूंगा कि चकाचौंध से प्रभावित होकर यहां बिल्कुल मत आओ। यहां आओ तो पूरी तैयारी और होमवर्क के साथ आओ। और यह भी याद रखों कि यहां सफल होने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति की ज़रूरत है। मायूसी मिलती है लेकिन निराश नहीं होना है। कोशिश करते रहना है तो सफलता ज़रूर मिलती है। हमेशा पॉजिटिव एटीट्यूड के साथ काम करो। साथ ही घरवालों का सहयोग और साथ भी बहुत ज़रूरी है।

अपनी तरफ से कुछ कहना चाहेंगे?

मैं यहीं कहना चाहता हूं कि सफलता के रास्ते पर आपको बहुत सारे झूठे और दिखावटी लोग भी मिलते हैं जो आपको पहले तो नीचा दिखाते हैं और जब आप किसी मुकाम पर पहुंच जाते हैं तो वहीं लोग आपकी बढ़ाई करते हैं। आप कभी भी ऐसे लोगों की बातों में आकर खुद को मत परखिए। अपने हुनर पर यकीन रखिए। अपनी ज़मीन कभी मत छोड़िए और हमेशा जैसे हैं, वैसे ही बनकर रहिए। आपको सफलता ज़रूर मिलेगी।

चित्रलेखा अग्रवाल