Tuesday, 20 May 2014

मैं आशान्वित हूं कि मोदी जी बदलाव लाएंगे...


आज  दिल बहुत खुश है। कुछ भी एक पत्रकार या बुद्धिजीवी के तौर पर लिखने या कहने का मन नहीं...। और कृपया मेरे इस लिखे को एक बुद्धजीवी की नज़र से देखें या जज भी ना करें। आज मैं बहुत खुश हूं, मोदी जी ने जो इतना अच्छा भाषण दिया, उससे खुश हूं, मोदी जी ने संसद में घुसने से पहले मंदिर की सीढ़ियों की तरह जो सजदा किया, उससे खुश हूं, उनकी ऊर्जा और आशावादिता की बातों से खुश हूं...।

 हम लोग चाहे कितनी भी बुद्धिजीवियों की तरह बातें कर लें जो हर काम के पीछे का मकसद ढूंढने की कोशिश में लगे रहते हैं, लेकिन यह सच है कि हमारे दिल हिन्दुस्तानी हैं। बुद्धि और दुनियादारी, हमारी भावनाओं पर हावी ज़रूर हो गई है, लेकिन यह सच है कि भावनाएं आज भी हमारे दिलों में, उनकी जड़ों में जिन्दा हैं। हम उस देश के वासी हैं जहां हमें दिल की सुनने और दिमाग की करने की शिक्षा मिली है... दिमाग का स्थान भले ही सबसे ऊंचा हो लेकिन अहमियत हम दिल को ही देते हैं... और आज मेरा दिल की सुनने और लिखने का मन है..।

और दिल पर हिन्दुस्तानियत हावी है, देशप्रेम हावी है, आंखों में वो दृश्य जिसने नरेन्द्र मोदी को संसद की सीढ़ियों का नमन करते देखा-हावी है, नरेन्द्र मोदी जी का सेंट्रल हॉल में बोलते समय गला रुंध जाने वाली स्पीच हावी है, उनके देखा-देखी बहुत से नेताओं की आंखे नम हो जाने वाली बात हावी है... वो आशा हावी है जो उ्न्होंने बंधाई है, वो सकारात्मकता हावी है जिसका उल्लेख उन्होंने किया है... आज मन मोदीमय है...

हैरानी की भी कई वजहें हैं..एक तो हम लोगों को ऐसे भाषण सुनने की आदत नहीं है। ऐसी अथॉरिटी से बोलने वाले लोगों की आदत नहीं है। हम ऐसे भाषण या फिल्मों में सुनते हैं या फिर डीडी न्यूज़ की आर्काइव में से निकली आज़ादी के समय के सच्चे नेताओं की बातों में...। हमें तो एक परिवार की तारीफों वाले भाषण सुनने की आदत है, या फिर बेबसी की बातें सुनने की आदत है, या एक दूसरे को कोसने वाली चीज़े सुनने की आदत है और या फिर धर्म निरपेक्षता और सांप्रदायिकता की बातें सुनने की आदत है क्योंकि अब से पहले राजनेता हमें यहीं तो सुनाते आए हैं। लेकिन ऐसा पहली बार हुआ जब हमने आशा की बात सुनी, कुछ कर गुजरने की गुंजाइश देखी और एक नेता को पार्टी नहीं हिन्दुस्तान के नेता और हिन्दुस्तानियों के प्रतिनिधि के तौर पर बोलते सुना.. तो हज़म नहीं हो रहा ना..?

हम इतने नकारात्मक हो चुके हैं, कि अब कुछ अच्छा होने की उम्मीद से भी डरते हैं। और हो भी क्यों ना अच्छे तंत्र और जन सरकार के नाम पर हमने इतने धोखे जो खाए हैं...।  लेकिन आज उम्मीद लगाने का फिर से मन कर रहा है। और मैं जानती हूं, हममें से कितने ही लोग, कितने ही बुद्धिजीवी भले ही मन ही मन मोदी का मान करते हों, उसकी बात पर विश्वास करना चाहते हों, उन्हें एक अच्छे नेता के रूप में स्वीकार करना चाहते हों... पर वो ऐसा नहीं करेंगे। क्योंकि उनका डर, धोखों से मिला डर उन्हें ऐसा करने से रोकता है।

मन से हम चाहते हैं कि मोदी की उम्मीदों पर उम्मीदें रखें, पर दिमाग उन पुराने धोखों और गिरगिट की तरह रंग बदलते नेताओं को भूला नही है, सो चाहकर भी शक करना नहीं छोड़ सकते। पर मैं आज शक को छोड़कर सिर्फ एक  भाव की बात करना चाहती हूं जो इस समय दिल में है और वो है उम्मीद का भाव, आशा का भाव, खुशी का भाव और गर्व का भाव की मोदी की जीत में मेरा भी योगदान है...

मेरे इतना कुछ लिखने को आप भावों का वेग कह सकते हैं, कुछ हद तक एक बेवकूफ आम इंसान की बातें कह सकते हैं, लेकिन आज एक आम इंसान के तौर पर मैं बेहद खुश हूं। आज मुझे अपना भविष्य अंधकारमय नहीं दिख रहा। मेरा सकारात्मक होने का मन कर रहा है, आप सब बुद्धिजीवियों से भी अनुरोध है कि इस सकारात्मक बदलाव को फेस वैल्यू पर, ऐसे ही स्वीकार करें, एक विश्लेषक और खबर के पीछे की खबर तलाशने वाले इंटलैक्चुअल की तरह नहीं.. अब तक निराशा मिली है इसका मतलब यह तो नहीं कि हम आशा करना छोड़ दें, आगे क्या होगा यह कोई भी नहीं जानता, लेकिन भविष्य के कयास अभी से लगाकर, उम्मीद छोड़ने  में कम से कम मेरी तो रुचि नहीं... मैं आशान्वित हूं...  

Monday, 12 May 2014

सुपरमार्केट के एन्ट्री गेट से लेकर बिलिंग काउन्टर तक, हर कदम पर फैला होता है ग्राहकों को फंसाने के लिए बुनी गईं मनोवैज्ञानिक तरकीबों का जाल जिससे आप ज्यादा से ज्यादा खरीददारी करने के लिए प्रेरित हो सकें... सुपरमार्केट के लुभावने ऑफर्स और कस्टमर फ्रेंडली माहौल के पीछे का कड़वा सच...






आपके साथ कई बार ऐसा होता होगा ना, जब आप कुछ निश्चित राशि लेकर, और घर के सामान की लिस्ट बनाकर विशाल, बिग बाज़ार, सस्ता बाज़ार, ईज़ी डे या रिलायंस जैसे सुपरमार्केट जाते हैं.., और जब वापस आते हैं तो बहुत सारे पैसे खर्च करके बहुत सारी चीज़े खरीद लाते हैं। आटा लेने जाते हैं, लेकिन साथ में चिप्स, बटर, चॉकलेट्स, मैगी और सूप खरीद लाते हैं। 200 रुपए का सामान लेने जाते हैं और 2000 रुपए का सामान लेकर आ जाते हैं.. और जब कोई आपसे पूछता है कि तुम तो केवल दालें लेने गए थे, इतना सारा सामान कैसे ले आए, तो आप कहते हैं कि यार ऑफर में सस्ता मिल गया आगे काम आ जाएगा...।

 यकीन जानिए ऐसा करने वाले आप अकेले नहीं, अगर आप अपने जानने वाले मित्रों से पूछेंगे तो वो भी यहीं कहेंगे कि उनके साथ भी कुछ ऐसा ही होता है वो खरीदने कुछ और जाते हैं और खरीद कुछ और लाते हैं या फिर जितना सोच कर जाते हैं उससे दोगुना-चौगुना खर्च करके आते हैं।
इसे हम इम्पल्सिव बाइंग या हिन्दी में कहें तो प्रेरित या जल्दबाज़ी की खरीददारी कहते हैं। यह वो खरीददारी है, जिसके बारे में आपने सोचा नहीं होता लेकिन सुपरमार्केट जाकर वहां के माहौल और ऑफर्स से प्रेरित होकर आप यह खरीददारी कर लेते हैं। भले ही बाद में आप खुद को कोसते रहते हैं कि यार इतने पैसे खर्च हो गए, क्या ज़रूरत थी यह सब सामान लाने की... और अधिकतर समय तो आप सस्ते के लालच में ऐसा सामान ले आते हैं, जिसका कोई इस्तमाल ही नहीं होता।

पर हम आपको बता दें, इसके लिए खुद को कोसने की जरूरत बिल्कुल नहीं है। क्योंकि इस तरह की खरीददारी में आपका नहीं उन सुपरमार्केट्स का दोष है जो ग्राहकों के मनोविज्ञान को ध्यान में रखकर बेहद बारीकी से ऐसी रणनीतियां बनाते हैं जो सीधे आपकी जेब पर असर करती हैं और आपको ज्यादा से ज्यादा पैसे खर्च करने के लिए यानि इम्पल्सिव बाइंग के लिए प्रेरित करती हैं। आपको पता भी नहीं चलता और आप बड़ी आसानी से ग्राहक की मानसिकता पर असर करने वाली इन चालबाज़ियों का शिकार बन जाते हैं और खुशी-खुशी व्यर्थ की चीज़े या ज्यादा सामान खरीद कर चले आते हैं।
मनोवैज्ञानिक सिंद्धातों पर आधारित यह तरकीबें पूरे सुपरमार्केट का हिस्सा होती हैं। जी हां, आपको जानकर हैरानी होगी कि सुपरमार्केट के चटख एक्सटीरियर से लेकर अंदर सजाए गए उत्पादों के काउंटर, ट्रॉली की उपलब्धता, पीले या लाल रंगों के ऑफर बैनर्स और यहां तक कि वहां का शांत और सुरम्य वातावरण सबकुछ इसी मार्केटिंग रणनीति का हिस्सा है जो आपको हर हाल में ज्यादा से ज्यादा पैसे खर्च करने के लिए उकसाता है। याद रखिए पार्किंग लॉट में घुसते ही यह माइंडगेम्स शुरू हो जाते हैं जो बिलिंग काउंटर तक चलते है। हर हिस्सा केवल और केवल इसलिए सज्ज होता है कि आपको पैसे खर्च करने के लिए प्रेरित कर सके।


ये होते हैं ग्राहकों की मानसिकता प्रभावित कर उन्हें खर्चा करने के लिए उकसाने वाले निर्दयी माइंडगेम्स


1-       एन्ट्री गेट यानि रिलेक्सिंग ज़ोन, खरीददारी के लिए जोश भरने वाला ज़ोन- जैसे ही आप सुपरमार्केट में प्रवेश करते हैं आपको ऊपर से ठंडी ताज़ी हवा के झोंके मिलते हैं। यह एयरी डीकम्प्रेशन ज़ोन होता है। प्रवेश द्वार के सामने ही ताज़े खाने के सामान, बेकरी प्रोडक्ट्स या फिर सुगंधित फूलों के काउंटर होते हैं। जो आपको रिलैक्स फील कराते हैं और आपमें सुपरमार्केट से खरीददारी करने के लिए जोश भर देते हैं। आप वहां ज्यादा से ज्यादा रुकना चाहते हैं। ध्यान रखिए आप अभी अभी खरीददारी करने घुसे हैं, आपके पास पैसे भी हैं और अब आपका मूड भी अच्छा हो गया... बस और क्या चाहिए हो गई खरीददारी की शुरूआत।

2-       स्टेटस सिंबल से जुड़ी है सुपरमार्केट की लोकेशन- भारत जैसे देश में जहां लोग सुपरमार्केट से खरीददारी करने को स्टेटस सिंबल मानकर चलते हैं, उनको ठगना और भी आसान होता है। भई कौन नहीं चाहेगा कि अपने पास वाली दुकान से एक एक चीज़ मांग कर लेने की बजाय और दुकानदार से एक एक चीज़ की मूल्य पूछने की बजाय आप को एयरकंडीशन्ड सुपरमार्केट में खुद सामान चुनने और देखने की आज़ादी मिले और फिर ट्रॉली में सामान लेकर पार्किंग तक जाने की तो बात ही और है। मॉल में जाकर खरीददारी करना स्टेटस सिंबल होता है जिसके कारण लोग अपने पड़ौस की सालों पुरानी दुकाने छोड़ कर सब्ज़ी तक सुपरमार्केट से खरीद कर लाते हैं।

3-       पार्किंग लॉट से शुरू हो जाती है मार्केटिंग- अगर आपने कभी ध्यान दिया हो तो जब किसी मॉल में सुपरमार्केट होता है तो अक्सर उसका एक एन्ट्री और एक्जिट गेट पार्किंग से ही होता है। और वहीं सामने सेल और ऑफर्स के चटख रंगों के बैनर लगे रहते हैं जिन्हें आप चाहकर भी नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते और वहीं से ये आपके मन में सुपरमार्केट में खरीददारी के लिए प्रेरणा जगाना शुरू कर देते हैं। कई सुपरमार्केट कुछ खास कीमत की खरीददारी पर पार्किंग मुफ्त करने का ऑफर देते हैं। यह भी ग्राहकों को सुपरमार्केट में आने के लिए प्रेरित करने का तरीका होता है। बस आप एक बार किसी तरह यहां पहुंच जाएं, फिर तो आपकी जेब ढीली होनी तय हैं।

4-       बाहरी दीवारें दूर से आकर्षित करने वाले शोख रंगों की और अंदर होता है सौम्य रंग का इंटीरियर- सुपरमार्केट के एक्सटीरियर और इंटीरियर दोनों ही ग्राहकों को लुभाने के हिसाब से तैयार किया जाते हैं। बाहर की तरफ हमेशा चटख या वॉर्म रंग जैसे- लाल, पीले या नीले रंग इस्तमाल किए जाते हैं जो दूर से दिखाई देते हैं, और लोगों को अपनी ओर खींचते हैं। जबकि अंदर के माहौल को रिलैक्सिंग और खुशनुमा बनाने के लिए सौम्य रंगों का इस्तेमाल किया जाता है जिससे लोग वहां ज्यादा रुकना चाहें। अंदर के काउंटर पर बैनर्स हमेशा पीले या चटख रंगों के होते हैं जिन पर ऑफर्स लिखे होते हैं और आप की नज़र ना चाहते हुए भी उन पर पड़ जाती है।  

5-       ट्रॉली का रोल बहुत अहम् है-  
   सुपरमार्केट में आपकी आसानी के लिए उपलब्ध ट्रॉली वास्तव में आपको ज्यादा शॉपिंग के लिए प्रेरणा देती है। आसानी से आप इसके साथ पूरे मार्केट में घूम सकते हैं, इसमें छोटे बच्चों के बैठने की भी सुविधा होती है, आप पर्स वगैरह भी रख सकते हैं और इसका बड़ा साइज़ आपको इसे पूरा भरने के लिए प्रेरित करता रहता है। आपके हाथ खाली हुए, आप हर चिंता से मुक्त हुए तो बस शॉपिंग करे जाएं।


6-       रोज़मर्रा की चीज़े और दुग्ध उत्पाद रखे जाते हैं आखिरी के काउंटर्स पर- आपके ज़रूरत की महत्वपूर्ण चीज़े, रोजमर्रा का सामान जिसे खरीदने के लिए ही अक्सर आप बिग बाज़ार या रिलायन्स या किसी अन्य सुपर मार्केट जाते हैं, वो दरअसल सबसे आखिरी के कोनों में रखी जाती हैं, ताकि उन तक पहुंचने से पहले आप पूरे सुपरमार्केट का चक्कर लगा सकें, आपकी नज़र में हर ऑफर आ जाए और आप दूसरी चीज़ों की खरीददारी भी कर लें।

7-       आई लेवल पर रखे सामानों का महत्व- सुपरमार्केट में अलग अलग काउंटर्स पर सामान रखने के लिए भी बाकायदा रणनीति बनाई जाती है। इसके लिए आई लेवल का बहुत महत्व होता है। आई लेवल यानि वो ऊंचाई जहां आपकी नज़र सबसे पहले जाती है। वो मसल याद है ना- जो दिखता है, वो बिकता है..। जी हां इसी तर्ज पर सुपरमार्केट आई लेवल को बाई लेवल मान कर चलते हैं। महंगे सामान और ब्रांडेड उत्पाद जिन्हें सुपरमार्केट ज्यादा से ज्यादा बेचना चाहते हैं इन आई लेवल की रैक्स पर रखे जाते हैं जैसे मैगी, जूस, मूस्ली पावर, नए और महंगे उत्पाद आदि। पोषक और अच्छे सामान लेकिन जो कदरन सस्ते हों, वो बीच की रैक्स पर होते हैं। बल्क में सामान सबसे ऊपर और सबसे ज्यादा मांग वाले, कम प्रॉफिट देने वाले और सस्ते सामान नीचे की रैक्स पर या कई बार अन्य ब्रांडेड सामानों के पीछे छिपे रहते हैं। भूलिए मत चलते चलते सबसे नीचे की रैक में से झुक कर सामान निकालना या फिर उनमें सामान ढूंढना अक्सर मुश्किल होता है और लोग अक्सर आई लेवल पर प्रदर्शित सामानों की शानदार पैकेजिंग या ऑफर से प्रभावित होकर उन्हें ही खरीद लाते हैं।


8-       बच्चों के आई लेवल का महत्व- विक्रेताओं के लिए बच्चों के आई लेवल का भी बहुत महत्व हैं। बच्चों के आई लेवल पर अक्सर चॉकलेट, बिस्किट्स, केक्स, खिलौने या अन्य सामान रखे जाते हैं जिन्हें देखकर बच्चे अपने माता-पिता से उन्हें खरीदने की ज़िद करते हैं और उन सामानों की आसानी से बिक्री हो जाती है।


9-       बैनर्स और सैम्पल स्टेशन- कई बार सुपरमार्केट्स में बड़े बैनर्स और सैम्पल स्टेशन लगे होते हैं जो लोगों को नई चीज़ आज़माने और फिर उन्हें खरीदने के लिए प्रेरित करते हैं। एक बार उपभोक्ता की नज़र में एक काउंटर आ जाता है तो वो अपने आप ही अन्य काउंटर और उस पर लिखे ऑफर देखते हुए चलता है और अपने मनमाफिक चीज़ खरीदने की कोशिश करता है। कई बार तो अगर किसी चीज़ की ज़रूरत ना भी हो तो केवल ऑफर्स कारण उपभोक्ता अपने आप उस सामान की ज़रूरत बना लेता है और उसे खरीद लेता है। और अगर वो उस वक्त खरीद ना भी पाएं, तो मनोविज्ञान के तहत वो ऑफर आपके दिमाग में बैठ जाता है और आप उसे कई बार घर जाकर भी भूलते नहीं हैं और अगली बार उसे खरीदने आते हैं या किसी और को उसे खरीदने के लिए भी सलाह दे सकते हैं।


10-   एक्ज़िट गेट और बिलिंग काउंटर है सबसे प्रॉफिटेबल क्षेत्र-  जब आप सुपरमार्केट में घुसे अच्छा माहौल देखकर आपका मूड बन गया और आपने जी भर कर खरीददारी कर ली, लेकिन बिलिंग काउंटर पर जब आप थके हुए होते हैं तो आपको सामने दिखते हैं बहुत सी चॉकलेट्स, चिप्स, स्नैक्स आदि चीज़ों के ऑफर जो आपको लास्ट मिनिट की इम्पल्सिव खरीददारी के लिए प्रेरित करते हैं और आप सोचते हैं कि चलो यह भी खरीद लेते हैं। एक्जिट गेट या पेमेन्ट काउन्टर पर लगी लाइन वाला हिस्सा सबसे प्रॉफिटेबल हिस्सा माना जाता है। यहीं वो जगह है जहां चॉकलेट्स, चिप्स या अन्य कम शेल्फ लाइफ वाले आइटम्स डिस्प्ले में लगे रहते हैं। लाइन में खड़े जब आप बोर हो रहे होते हैं तो इन उत्पादों को देखते और खरीदते हैं। यह पूरी तरह जबरदस्ती की खरीददारी होती है। क्योंकि आप केवल पैसे देने के लिए लाइन में लगे हैं और जितना खरीदना था, खरीद चुके हैं, लेकिन फिर भी इन सामानों को खरीदते हैं।

11-   सुपरमार्केट का साइज़ और भीड़ है महत्वपूर्ण- सुपरमार्केट का साइज़ और उसमें उपस्थित भीड़ भी बहुत महत्व रखती है। ज्यादा भीड़ में लोग कम घूमते हैं और कम सामान खरीदते हैं जबकि कम भीड़ होने पर लोग ज्यादा खरीदारी करते हैं। इसलिए सुपरमार्केट का साइज़ बड़ा होना बहुत ज़रूरी है।

12- चालबाज़ियों से भरे सेल और लुभावने ऑफर्स-  कभी आपने सुपरमार्केट के ऑफर्स पर ध्यान दिया हैयहां अधिकतर सेल लगी होती है या फिर इनके ऑफर इस कुछ इस तरह से होते हैं-
-दो के साथ एक फ्री
-दो चीज़े खरीदने पर तीसरी चीज़ पर 50 फीसदी का डिस्काउन्ट
-2000 रुपए की खरीददारी पर एक किलो चीनी फ्री
-पांच हज़ार रुपए की खरीददारी पर 10 प्रतिशत का एक्सट्रा डिस्काउन्ट
-एक कुर्ता 300 रुपए में जबकि 2 कुर्ते केवल 500 रुपए में...
-एक्सचेंज ऑफर- पुराना लाएं और नए पर 20 फीसदी की छूट पाएं..




अगर आप ध्यान दें तो पाएंगे कि इन सब ऑफर्स पर आपको फायदा तब मिलता है जब आप एक निश्चित रकम खर्च करते हैं। उदाहरण के तौर पर अगर आप केवल एक कुर्ता खरीदने आए हैं तो यहां यह ऑफर देखकर कि आप को दो कुर्ते खरीदने पर एक फ्री मिल जाएगा आप दो कुर्ते खरीद लेते हैं। एक किलो चीनी मुफ्त पाने के लालच में ज़रूरत ना होने पर भी 2000 रुपए की खरीददारी कर लेते हैं। सेल के चक्कर में या आगे लाभ लेने के चक्कर में वो सामान खरीद लेते हैं जिसकी आपको ज़रूरत ही नहीं। अगर आप ध्यान दें तो वास्तव में यह ऑफर्स आपको ज्यादा खरीदने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। बचत के चक्कर में आप इन लुभावने ऑफर्स के जाल में फंसकर दरअसल ज्यादा पैसे खर्च करके आ जाते हैं। भूलिए मत इन सुपरमार्केट की सफलता ज्यादा से ज्यादा सामान बेचने पर ही निर्भर है।

12-   संबंधित उत्पाद आस-पास रखे जाते हैं- ग्राहकों को इम्पल्सिव खरीददारी के लिए प्रेरित करने के लिए सुपरमार्केट में एक दूसरे से संबंधित उत्पादों को आस-पास ही रखा जाता है ताकि ग्राहक अगर एक उत्पाद ले तो दूसरा उत्पाद लेने के लिए भी प्रेरित हो जाए। जैसे दूध के पास ही ब्रेड और बटर भी होता है और ग्राहक- अरे यार यह ब्रेड- बटर भी ले लेते हैं, सोचकर वो सामान खरीदते हैं जो वो खरीदने के लिए नहीं आए होते।

13-   शॉपर कार्ड यानि कस्टमर के फिर से आने की गारंटी- एक्जिट काउंटर या बिलिंग काउंटर पर आती है, कस्टमर कार्ड की
बारी। जिसे आपको यह कहकर दिया जाता है कि इसका कोई मूल्य नहीं और इस पर आपको पेबैक प्वॉइन्ट्स या कुछ डिस्काउन्ट मिलेगा। लेकिन याद कीजिए यह डिस्काउन्ट या पेबैक प्वॉइन्ट्स आपको कभी भी उसी समय की खरीददारी पर नहीं मिलते बल्कि अगली बार की खरीददारी के लिए काम आने वाले होते हैं। यानि यह शॉपर कार्ड आपने एक बार ले लिया तो अगली बार ज्यादा डिस्काउन्ट और पेबैक प्वॉइन्ट के लोभ में आपका वहां आना तय है। और एक सबसे ज़रूरी बात जो शायद आप नहीं जानते कि इस शॉपर कार्ड के ज़रिए आपका सारा डेटा कि आपने क्या खरीदा, कितने पैसों का खरीदा समेत आपका मोबाइल नंबर तक कंपनी को उपलब्ध हो जाता है जिसका उपयोग वो आगे मार्केटिंग की रणनीतियां बनाने में करती हैं।


14-   एमआरपी का खेल-  आपने अक्सर सुपरमार्केट के ऑफर्स देखे होंगे कि सामान एमआरपी से कम दामों में उपलब्ध। तो हम आपको बता दें कि बहुत से सामान खासकर खाने-पीने की चीज़े जिनमें दूध या ब्रेड बटर जैसे कुछ उत्पादों को छोड़ दिया जाए, तो वो आपको आपके पड़ौस वाली दुकान पर भी एमआरपी से कम मूल्य में ही मिलते हैं। उत्पाद पर छपी एमआरपी यानि अधिकतम बिक्री मूल्य में सभी का प्रॉफिट जुड़ा होता है। यह किसी भी चीज़ का अधिकतम मूल्य होता है जिससे ज्यादा मूल्य में उस उत्पाद को नहीं बेचा जा सकता, ना कि असली मूल्य। सुपर मार्केट आपको एमआरपी से कम मूल्य में सामान बेचने का लालच देकर असल में तो लोकल दुकानदार से ज्यादा कीमत में सामान बेच देते हैं। उदाहरण के तौर पर अगर आधा किलो सूजी का मूल्य पैकेट पर छपा है 32 रुपए तो लोकल दुकानदार वो बिना आपके कहे आपको 25 से 28 रुपए में दे देगा। जबकि सुपरमार्केट में बैनर पर लिखा होगा- सूजी का मूल्य 32 रुपए, सुपरमार्केट मूल्य 30 रुपए। और आप बड़ी खुशी-खुशी एमआरपी से दो रुपए कम में सूजी खरीद कर ले आते हैं और खुश होते हैं कि हमने तो सस्ती शॉपिंग कर ली। बल्कि सच तो यह है कि सुपरमार्केट की ऐसी तरकीबों के कारण आजकल अन्य खुदरा दुकानदारों ने भी एमआरपी पर ही चीज़े देनी शुरू कर दी हैं।

15-   कुछ सामानों पर पचास प्रतिशत की छूट लेकिन वैट अलग से- कई बार आपको इस तरह के ऑफर मिलते हैं कि कुछ विशेष सामानों, खासकर कपड़ों पर 50 फीसदी की छूट और नीचे बहुत छोटे अक्षरों में लिखा होता है- वैट अलग से लगेगा। आप तो 50 फीसदी की छूट का लाभ पाने के लिए वहां आ जाते हैं और बहुत सी चीज़े खरीद लेते हैं लेकिन जब बिलिंग होती है तब आपको पता चलता है कि उसमें वैट भी जोड़ा गया है जो एमआरपी पर लिया जाता है। यानि 400 रुपए की चीज़ आपको 50 फीसदी डिस्काउंट के बाद मिली 200 रुपए में, और आपने इतना ही मूल्य समझकर इसे खरीद लिया। लेकिन अब बिलिंग के समय इस पर लगता है वैट, यानि 400 रूपए पर 5 फीसदी... मतलब 20 रुपए। और अब वो चीज़ आपको पड़ती है 220 रुपए की। वैट का यह खेल जब तक आपको समझ में आता है तब तक अक्सर आप बिलिंग काउंटर पर होते हैं और लौटने या सामान वापस रखने की गुंजाइश बहुत कम होती है और आप ज्यादा पैसे अदा करके वो सामान ले लेते हैं। ये कुछ छिपी हुई शर्तें होती हैं जो बिग बाज़ार के लुभावने ऑफर्स के आगे आपको दिखती नहीं।


16-  

जंक सामान पर मिलने वाले वैल्यू प्वॉइन्ट्स का सच- और अब बात करते हैं बिग बाज़ार की एक बहुत बड़ी स्कीम जंक बेचो और सामान खरीदो स्कीम की। जिसे लेकर लोग बेहद उत्साहित रहते हैं। पास के कबाड़ी की दुकान से कहीं ज्यादा मूल्य पर बिग बाज़ार में कबाड़ बिकने का लोभ ऐसा होता है कि लोग ढूंढ ढूंढ कर घर से कबाड़ इकट्ठा करते हैं और उसे बेचकर बिग बाज़ार से वैल्यू प्वॉइन्ट्सके कूपन लेकर आते हैं। यह कूपन इस तरह से होते हैं कि कूपन के मूल्य से चार गुना खरीददारी करने पर आपको छूट मिलती है और यह छूट कुछ सामानों पर ही मिलती है। पर अब आप ज़रा देखें, आपने रद्दी वाले को सामान बेचा, आपको तुरंत पैसे मिल गए और आप उनको खर्च करने के लिए आज़ाद हो। लेकिन आपने अपनी कबाड़ बिग बाज़ार में बेचा, आपको पैसे नहीं मिले बल्कि मिले वैल्यू प्वॉइंट्स के कूपन। अप इन कूपन का लाभ भी आपको तभी मिलेगा जब आप चार गुना पैसे और बिग बाज़ार में खर्च करोगे। यानि एक तो आपकी दोबारा बिग बाज़ार में आने की गारंटी हो गई दूसरे यह भी पक्का हो गया कि आपको कूपन का लाभ पाना है तो और ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ेंगे.. अब ज़रा सोचिए कबाड़ से असली फायदा कौन कमा रहा है..?  

तो अगली बार जब आप सुपरमार्केट जाएं तो इन चीज़ों को खुद नोटिस करें। अपने मन को काबू में रखें और अपनी जेब ढीली होने से खुद को बचाएं।




एमबीए करने के बाद चार दोस्तों ने लाखों की नौकरी छोड़ कर खोली गन्ने के रस की दुकान, पूरे भारत में गन्ने के रस के प्रति जागरूकता लाने और गन्नावाला कैफे श्रंखला स्थापित करने की चाह...

अंकित, विकास, संदीप और अमित (बांए से दाएं)

क्या गन्ने का रस !!!! सबसे पहले आप हरी भरी गीली घास के मैदान का स्वाद महसूस करते हैं... उसके बाद मिठास धीरे-धीरे जेहन और स्वाद में उतरती है ..यह ना गरिष्ठ है और ना बिल्कुल सादा... यह रंगीला और चमकदार भी नहीं है... 300 मिलीलीटर के गिलास में कोई आकर्षण नहीं छिपा है... आप कभी इसके आदी नहीं बनेंगे.. यह सॉफ्ट ड्रिंक से कहीं ज्यादा बेहतरी से आपकी प्यास बुझाता है और इसमें प्राकृतिक चीज़ों के अलावा और कुछ भी नहीं..यह गर्ल-नेक्स्ट-डोर-पेय है – (www.gannnawala.in से)




गन्ने के रस का ऐसा विवरण आपने आज तक कहीं भी नहीं पढ़ा होगा। एक कवि की कविता की भांति गन्ने के रस का ऐसा वर्णन केवल वहीं कर सकते हैं जिन्होंने गन्ने के रस को अपने जीवन का आधार बनाया हो। जी हां, यहां हम बात कर रहे हैं ‘जी’ से ‘गन्नेवाले’ रायपुर निवासी- संदीप जैन, विकास खन्ना, अमित अग्रवाल और अंकित सरावगी नाम के चार मित्रों की, जिन्होंने एमबीए की डिग्री हासिल करने के बाद लाखों के सालाना पैकेज पर लगभग एक वर्ष तक नौकरी की और फिर अपनी-अपनी नौकरियां छोड़कर अपने ही गृह नगर रायपुर में गन्ने के रस का कैफे खोलने का निश्चय किया। 

मिलिए गन्नेवालों से - 


1- संदीप जैन- आरआईटी, रायपुर से इंजीनियरिंग और एफएसएम दिल्ली से एमबीए उत्तीर्ण, फिलहाल छत्तीसगढ़ की एक इंडस्ट्री में कार्यरत 

2-विकास खन्ना- टीए पाई मैनेजमेंट इन्स्टीट्यूट, मनिपाल से एमबीए और सीएफए इंस्टीट्यूट से उत्तीर्ण, पूर्व में सिटी ग्रुप में इन्वेस्टमेन्ट एनालिस्ट रह चुके हैं 

3-अमित अग्रवाल- सिंबयोसिस, पुणे से एमबीए उत्तीर्ण, पूर्व में जे पी मोर्गन में एनालिस्ट रह चुके हैं 

4- अंकित सरावगी- प्रोटॉन बिजनिस स्कूल इंदौर से एमबीए उत्तीर्ण, रोहा डाईकैम मुम्बई में जॉब कर चुके हैं। 


अपने आश्चर्य से खुले मुखों को बन्द कीजिए। और सुनिए इन गन्नेवालों की कहानी। 25 से 26 साल की उम्र के यह चारों दोस्त नामचीन संस्थानों से एमबीए करने के बाद लाखों के सालाना पैकेज पर अलग अलग नौकरी कर रहे थे। लेकिन कुछ नया करने की चाह और अपने गृह नगर में अपने परिवारों के साथ जिंदगी गुज़ारने की हसरत ने इन्हें एक रचनात्मक और मौलिक बिजनिस को शुरु करने की प्रेरणा दी। 

‘गन्नेवाले’ संदीप जैन बताते हैं “ हम चारों सालेम स्कूल में एक साथ पढ़े हैं। बचपन के दोस्त हैं। हम सभी अलग अलग जॉब कर रहे थे। कुछ समय पहले जब मिले, तो हमने अपने शहर में ही कुछ करने की बात पर विचार किया और चूंकि हम सबको खाने-पीने का बहुत शौक है तो इससे जुड़ा बिजनिस शुरु करने की ही सोच रहे थे और तभी हमारे दिमाग में यह गन्नावाला कैफे शुरु करने का आईडिया आया”। 

और आखिरकार काफी सोच-विचार और अपनी-अपनी नौकरियों से कमाई बचत से इन्होंने इसी वर्ष फरवरी में रायपुर की समता कॉलोनी में अपना पहला ‘गन्नावाला कैफे’ खोल लिया। चूंकि संदीप इस काम के साथ छत्तीसगढ़ की इंडस्ट्री में कार्यरत हैं और बाकी तीनों दोस्त साथ-साथ अपने- अपने घरेलु बिजनिस को भी संभाल रहे हैं, इनके अभिभावकों को भी इनके द्वारा नये और कदरन रिस्की बिजनिस को शुरु करने पर कोई परेशानी नहीं हुई। 

गन्नावाला कैफे में साफ सुथरे ढंग से निकाला जाने वाला शुद्ध और पोषक गन्ने का रस लोगों को तेज़ी से अपनी तरफ खींचने लगा। यह कैफे युवाओं, वृद्धों और आस पास के निवासियों में इस कदर लोकप्रिय हुआ कि दो महीने के अंदर ही, 2 मई 2014 को, इन दोस्तों ने लोगों की बेहद मांग पर रायपुर के कटोरा तालाब इलाके में इसकी दूसरी शाखा भी खोल ली। उनके इस मौलिक और रचनात्मक बिजनिस आईडिया को लोग बेहद पसंद कर रहे हैं और उन्हें पूरे देश से फ्रेंचाइज़ी के ऑफर मिल रहे हैं। 




गन्ने के रस के ढेर सारे फ्लेवर मौजूद 

चारों दोस्तों ने लोगो को विविध स्वाद उपलब्ध कराने के लिए इंटरनेट पर रीसर्च और एक्सपेरिमेंट करके गन्ना रस के नए फ्लेवर ईजाद किए हैं जैसे- निंबूड़ा, क्लासिक, अदरकी, लप टप, जलजीरा, झाल रस, चटपटा, ग्लोरोमिंट और मिलीभगत। यहां स्नैक्स के तौर पर गन्ने की शुद्ध, छिली हुई गंडेलिया भी मौजूद हैं जिन्हें इन्होंने नाम दिया है ‘गिलीपुट।’ रेगुलर ग्लास 20 रुपए और जम्बो गिलास 30 रुपए का मिलता है। यहीं नहीं, 30 रुपए देकर आप इस कैफे में अपना खुद का फ्लेवर भी बना सकते हैं। 


साफ सफाई और शुद्धता का खास ख्याल 

संदीप बताते हैं कि उनके यहां साफ सफाई का खास खयाल रखा जाता है। गन्ना रस निकालने वाले कर्मचारी साफ-सुथरे रहते हैं और हमेशा कैप और दास्ताने पहनकर काम करते हैं। गन्नारस की शुद्धता और पोषण बरकरार रखने के लिए, गन्नावाला कैफे में गन्ने का रस निकालकर उसमें बर्फ नहीं मिलाई जाती, बल्कि पहले गन्ने को डीप फ्रीज़र में रखकर ठंडा किया जाता है और फिर उसका रस निकाला जाता है। जिससे रस ठंडा रहता है और उसमें बर्फ मिलाने की ज़रूरत नहीं पड़ती। 


जैविक गन्ने का इस्तमाल 

गन्नावाला कैफे में रासायनिक खेती से उपजे गन्नों की जगह, जैविक खेती से उगाए गए गन्नों का इस्तमाल किया जाता है। संदीप के अनुसार इन्होंने अंबिकापुर में एक किसान से करार किया है जो पूरे साल जैविक खेती द्वारा उगाई गई गन्ने की फसल इन्हें उपलब्ध कराएगा। भविष्य में इनकी खुद भी गन्ने की खेती करने की योजना है। 

सर्दी में गन्ना रस की चाय और सूप शुरू करने की योजना 

गन्नावाला कैफे का बिजनिस केवल सीज़नल ना रह जाए, इसके लिए भी इनके पास योजनाएं हैं। संदीप बताते हैं कि वैसे तो गन्ने का रस बहुत पोषक होता है और पूरे साल इसे पीना चाहिए, लेकिन चूंकि सर्दियों में ठंडे गन्ने के रस की मांग कुछ कम हो जाती है इसलिए सर्दियों में इनकी गन्ने रस की चाय और सूप शुरू करने की योजना है। 

पूरे देश से मिल रहे हैं फ्रेंचाइजी के ऑफर- 

आज जब पूरे देश के लोग यह जानते हुए भी कि सॉफ्ट ड्रिंक अच्छी नहीं होती, उसी से अपनी प्यास बुझाते हैं, क्योंकि उनके पास कोई और विकल्प नहीं है, ऐसे में गन्नावाला कैफे के रूप में इन चारों दोस्तों ने एक नया, बेहतर और पोषक विकल्प प्रस्तुत किया है। जिसे लोग काफी पसंद कर रहे हैं। अब तक ठेलों और गंदगी से भरपूर जगहों पर प्रोसेस किया जाना वाला गन्ने का जूस लोग चाहकर भी पी नहीं पाते थे, वहीं गन्नावाला कैफे ने यह समस्या भी हल कर दी है। और शायद यहीं वजह है कि गन्नावाला कैफे की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है और पूरे देश से लोग इनकी फ्रेंचाइज़ी पाने के क्वेरीज़ रहे हैं। 

पूरे देश में खोलेंगे गन्नावाला कैफे चेन 

क्या इस बिजनिस से उन्हें प्रॉफिट हो जाता है, इस सवाल के जवाब में संदीप कहते हैं कि -लोग हमें इतना पसंद कर रहे हैं कि हम आसानी से रोज़ सैकड़ों गिलास गन्ने का रस बेच लेते हैं। दो महीने के अन्दर ही हमने दूसरा कैफे खोला है और अब हम पूरे देश में गन्नावाला कैफे की चेन खोलना चाहते हैं, बिना प्रॉफिट और लोगों की पसंद के यह कहां मुमकिन है? 


(गन्नावाला कैफे की फ्रेंचाइज़ी संबंधी जानकारी के लिए देखें साइट- www.gannawala.in )