Friday, 21 March 2014

भारतीय पनडुब्बियां क्यों ले रही हैं अपने ही नौसेनिकों की जानें...?



पिछले 7 महीनों में नौसेना में हुए ग्यारह हादसों में 21 लोगों की जानें गईं हैं। ज्यादातर मामलों में कोई हताहत नहीं हुआ लेकिन इनमें से सिंधुघोष क्लास की पनडुब्बियों में हुई दो दुर्घटनाओं में 20 लोगों की जानें जा चुकी हैं। यह दोनों रूसी पनडुब्बियां थी। जब हमने इनकी पड़ताल की तो कुछ चौंकाने वाली जानकारियां सामने आईं।

भारत द्वारा रूस से लीज़ पर ली गई परमाण्विक पनडुब्बी नेरपा के-152 का भी कुख्यात इतिहास है। इसे भारतीय नौसेना में आईएनएस चक्र के नाम से कमीशन किया गया है।

सिंधुघोष क्लास की लगभग सभी दस पनडुब्बियां रूस से भारी रीफिटिंग के बाद तब ली गई हैं जब रूस ने इनका इस्तमाल या तो कम कर दिया था या बन्द कर दिया था मतलब नौसेना की भाषा में वो या तो डीकमीशन कर दी गईं थी या फिर डीकमीशन होने की कगार पर थी।

चूंकि यह मामला बेहद संवेदनशील है, हम इन जानकारियों को आपसे बिल्कुल वैसे ही साझा कर रहे हैं जैसे यह हमें मिली। हम यह नहीं कह सकते कि यह जानकारी नौसेना में लगातार हो रही दुर्घटनाओं के कारणों की विवेचना करती है या नहीं, लेकिन इस बात पर ज़रूर प्रकाश डालती है कि हम रक्षा खरीद उपकरणों के लिए किस तरह के सौदे कर रहे हैं और इन मामलों में किस कदर लापरवाही बरती जा रही है जिसके चलते दुर्घटनाओं की संख्या में इज़ाफा हो रहा है और हमारे सैनिक सीमा पर युद्ध में नहीं घर में शांति के दौरान शहीद हो रहे हैं।


सिन्धुघोष क्लास (किलो क्लास सबमैरीन्स)

यह सभी डीजल-इलैक्ट्रिक पावर्ड पनडुब्बियां हैं। इनमें एस्केप वाहन नहीं होता। भारत के पास सिन्धुघोष क्लास की कुल दस पनडुब्बियां है जो सभी रूस निर्मित हैं। इनमें से एक, आईएनएस सिंधुरक्षक (एस 63) पिछले साल 14 अगस्त को आग लगने से हुए धमाकों और नुकसान के बाद डूब चुकी है और अब भारत के पास केवल 13 पनडुब्बियां बाकी हैं।


आईएनएस सिंधुरक्षक (आईएनएस-63) से जुड़े कुछ तथ्य

· सिंधुरक्षक, सिन्धुघोष क्लास की नौंवी सबमैरीन थी जिसे 24 दिसम्बर 1997 को भारतीय नौसेना में कमीशन किया गया था। 2010 में इसमें एक छोटी आग लगने की दुर्घटना हुई थी जिसके बाद मॉस्को स्थित रूसी फर्म - ज्योज़डोका शिप रिपेयर कम्पनी (Russian Zvyozdochka ship repair company) को 80 मिलियन यूएस डॉलर में इसे अपग्रेड और ओवरहॉल (मरम्मत) करने के लिए ठेका दिया गया था।

· 14 अगस्त 2013 को आईएनएस सिंधुरक्षक जब मुम्बई के हाईसिक्योरिटी डॉकयार्ड में थी तब रात के समय उसमें धमाके हुए जिसमें तीन अधिकारियों और 15 नाविकों समेत कुल 18 लोग जल कर मर गए।

· यह सारे विस्फोट पनडुब्बी के अगले भाग में हुए जहां इसकी टॉरपीडोज और मिसाइल्स रखी जाती हैं।

· यह विस्फोट इतने ज़बरदस्त थे कि पनडुब्बी धमाके के साथ पानी में डूब गई। नौसैना के नाविकों ने हाई पावर अंडरवॉटर लैम्प्स इस्तमाल करके लगभग 36 घंटे तक आईएनएस सिंधुरक्षक की तलाशी ली थी और तब जाकर नाविकों के शव बरामद हो पाए थे। यह शव इस बुरी तरह झुलस चुके थे कि इनकी पहचान के लिए इनको नौसेना के आईएनएचएस अश्विनी अस्पताल में भेजकर इनका डीएनए टैस्ट करना पड़ा।

· विस्फोट से पनडुब्बी का इंटरनल हल पिघल गया था जिसके कारण दूसरे कम्पार्टमेन्ट्स में जाने में बाधा उत्पन्न हो गई थी। रास्ता रुकने के कारण एक बार में केवल एक ही नाविक इससे निकल सकता था।
· एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि 16 साल पुरानी यह पनडुब्बी जिसमें कि 2010 में भी एक हादसा हो चुका था हाल ही में रूस में ढाई साल तक इलैक्ट्रॉनिक वारफेयर और इंटीग्रेटेड वैपन्स कंट्रोल सिस्टम में अपग्रेडेशन के बाद लौटी थी।

· इस भयंकर दुर्घटना के बाद ज्योज़डोका कंपनी, जिसने कि आईएनएस सिंधुरक्षक पनडुब्बी की रिफिटिंग की थी ने बयान जारी करके कहा था कि जनवरी में जब इसे भारत भेजा गया था तो यह पूरी तरह से ऑपरेशनल थी।

· वहीं ज्योज़डोका कंपनी के एक अनजान प्रवक्ता ने आरआईए नोवोस्ती (रूसी अंतर्राष्ट्रीय समाचार एजेंसी) को बताया था-‘हमने एक लाइट ओवरहॉल और आधुनिकीकरण के लिए जून 2010 में एक अनुबन्ध पर हस्ताक्षर किए थे और जनवरी 2013 तक रीफिट पूरा कर लिया गया। मरम्मत के दौरान हमने एक नया क्लब रॉकेट कॉम्प्लेक्स लगया था और कुछ भारतीय उपकरणों के साथ विदेशी सिस्टम भी शिप पर लगाए थे। सबमैरीन के नेविगेशन और कम्यूनिकेश सिस्टम और इसके पावर जनरेटर की ओवऱहॉलिंग की गई थी”।

· और अब एक ध्यान देने लायक बात- उस प्रवक्ता ने आगे कहा था कि“जब आईएनएस सिंधुरक्षक बेरेन्ट्स समुद्र के सेवेरोनिस्क पोत (Severonisk port on the Barents Sea) पर खड़ा था तब जिन विशेषज्ञों ने इसकी जांच की थी उन्होंने कुछ चिंता के मुद्दे उठाए थे। लेकिन जब भारत में इसे रिसीव किया गया तो भारत ने इस डीजल से चलने वाली पनडुब्बी पर कोई ऐतराज नहीं उठाया।”

· जब आईएनएस सिंधुरक्षक पर विस्फोट हुआ तब वह रूसी वॉरंटी के अंतर्गत थी और रूसी कंपनी के 8 कारीगर भी मुम्बई पोत पर ही थे।

· फिलहाल समुद्र से इसे सलामत निकालने का ठेका यूएस की एक मैरीन फर्म को दिया गया है। एक बार इसे निकाले जाने और इसकी जांच करने के बाद यह फैसला लिया जाएगा कि सिंधुरक्षक वापस काम में आने लायक है या नहीं।

आईएनएस सिंधुरत्न (आईएनएस 59) की कहानी

· आईएनएस सिन्धुरत्न पिछले महीने 26 फरवरी को सीट्रायल्स के दौरान दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी जिसमें लेफ्टिनेंट कमांडर कपीश मुवाल और लेफ्टिनेंट मनोरंजन कुमार शहीद हो गए। जांच में पाया गया की स्मोक केबल्स से धुंआ उठने के कारण यह दुर्घटना हुई थी।

· सिंधुरत्न का निर्माण 1988 में हुआ था। यह 24 साल पुरानी सबमैरीन है।

· इसके बारे में कहा जाता है कि इसे काफी बड़े रीफिट के बाद तब भारतीय बेड़े में शामिल किया गया था जब रूसी नौसेना ने इसे डीकमीशन कर दिया था।


अटैक सबमैरीन आईएनएस चक्र का भी है कुख्यात इतिहास

· भारत की महत्वाकांक्षी अटैक सबमैरीन- आईएनएस चक्र जो कि भारत ने रूस से दस साल की लीज़ पर ली है एक न्यूक्लीयर पावर सबमैरीन है। यह रूसी नौसेना की चूका बी (Shchuka B) क्लास की पनडुब्बी है और सोवियत नेवी में- के-152 नेरपा के नाम से जानी जाती थी। इसका नाटो नाम अकुला सेंकड है।

· रूस में 1993 में इसका निर्माण शुरू किया गया था लेकिन फंडिंग की कमी के कारण इसे रोकना पड़ा। 2004 में भारतीय नौसेना ने इसके निर्माण और समुद्री ट्रायल के लिए इस शर्त पर आर्थिक मदद दी कि इसे 10 साल के लिए भारत को लीज़ पर दिया जाएगा।

· अक्टूबर 2008 में इसे नेरपा के-152 के नाम से लांच किया गया। जब जापान के समुद्र में इसका ट्रायल चल रहा था तब 9 नवम्बर 2008 को ब्लाडीवोस्टक के पास इसमें आग लग गई। हादसे के समय नेरपा पर 81 रक्षा जवानों के साथ 208 लोग मौजूद थे। इस जहाज का फायर सप्रेशन सिस्टम शुरू हो जाने से टॉक्सिक गैस लीक होने लगी कारण 20 नाविक मारे गए और 21 लोग घायल हो गए। यह रूसी नौसेना इतिहास का एक बड़ा हादसा माना जाता है।

· हादसे के एक ही हफ्ते बाद भारतीय नाविकों का दल इस पनडुब्बी पर ट्रेनिंग लेने जाने वाला था।

· हांलाकि इस हादसे के बाद इसे भारत में लीज़ द्वारा लेने पर कुछ विवाद ज़रूर हुआ लेकिन बाद में सहमति बन गई।
 
· इसके बाद नेरपा पर लगभग ढाई साल तक रीफिटिंग का काम चलता और जनवरी 2012 में 920 मिलियन अमेरिकी डॉलर में इसे भारत को लीज़ पर दे दिया गया।

· 4 अप्रैल 2012 को इसे औपचारिक रूप आईएनएस चक्र के नाम से नौसेना में कमीशन किया गया।

· 8,130/12,770 टन के विस्थापन और 30 नॉट्स की अधिकतम गति के साथ के-152 सबमैरीन चार 533 मिमी टॉरपीडो ट्यूब्स और चार 650 एमएम टॉरपीडो ट्यूब्स से सुसज्जित है।

· लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह सबमैरीन जब कि भारत को दी गई तो उसमें इस क्लास की सबमैरीन से अलग कुछ बदलाव किए गए थे।

· रूसी नेवी की चूका बी क्लास की पनडुब्बियां परमाण्विक या कन्वेन्शन वारहैड्स की 28 क्रूज़ मिसाइल्स के साथ होती हैं जिनकी मारक क्षमता 3000 किमी तक होती है। जबकि भारत को जो चूका बी क्लास सबमैरीन नेरपा दी गई उसमें 300-किमी तक मार करने वाली क्लब मिसाइल्स लगाई गईं जो कि पहले से ही रूस द्वारा भारत के लिए निर्मित क्रिवेक क्लास फ्रिगेट्स और किलो क्लास पनडुब्बियों में मौजूद लगी हुईं थीं (आईआरए नोवोस्ती की खबर)। 

कुछ अन्य तथ्य भी जानिए


· 17 जनवरी 2014 को आईएनएस सिन्धुघोष में भी हादसा हो चुका है जब मुम्बई डॉकयार्ड में खड़ी यह पनडुब्बी ग्राउंड पर चली गई थी। उस समय यह पूरी तरह शस्त्रों से सुसज्जित थी। हांलाकि इसमें कोई हताहत नहीं हुआ।

· सिन्धुकृति (एस 61)सबमैरीन 2007 से विशाखापटनम के रीफिट यार्ड में खड़ी है। इसमें मरम्मत का कार्य चल रहा है।

· शिशुकुमार क्लास की भी चार पनडुब्बियों समेत इस समय भारत के पास कुल 13 पनडुब्बियां हैं। लेकिन इनमें से सभी 13 पनडुब्बियां कभी भी सही और ऑपरेशनल अवस्था में नहीं रहती। केवल 7 से 9 पनडुब्बियां ऑपरेशनल रहती हैं और बाकी पनडुब्बियों में हमेशा ही मरम्मत या रीफिटिंग का काम चलता रहता है जिसके कारण वो डॉकयार्ड में खड़ी रहती हैं।

 भारत में बनी परमाण्विक शक्ति वाली पनडुब्बी आईएनएस अरिहन्त अभी तक ऑपरेशनल नहीं हो पाई है।100 मीटर से ज्यादा लम्बी इस सबमैरीन का तीन सालों से विशाखापटनम में ट्रायल चल रहा है। इसी महीने 8 मार्च, 2014 को इस पर चल रहे काम के दौरान एक ठेका मजदूर मारा गया।

· भारत के पास अब तक 24 सबमैरीन्स होनी चाहिए थी लेकिन केवल 13 सबमैरीन्स हैं। इनमें से अधिकतर अपनी आयु पूरी कर चुकी हैं। 2017 तक सभी 25 साल की अपनी उम्र को पूरी कर लेंगी।

आईएनएस विक्रमादित्य पर भी घट गई घटना

· 45,000 टन का एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रमादित्य, जिसे पहले एडम गोर्शकोव कहा जाता था और हाल ही में भारतीय नौसेना में भेजा गया है, का भी 2.3 बिलियन डॉलर्स की लागत के साथ उत्तरी रूस के शेमाश शिपयार्ड में रीफिट और आधुनिकीकरण किया गया है। 7 जनवरी 2014 को 39 दिन की यात्रा पूरी करके यह भारत पहुंचा। लेकिन यात्रा के दौरान इसके साथ भी हादसा पेश आया। इस पर मौजूद 8 में से एक स्टीम बॉयलर फेल हो गया।


भारत रूसी रक्षा संबंधों पर एक नज़र डाल लेते हैं..

· भारत और रूस के रक्षा संबंध 1960 से चल रहे हैं। हांलाकि हाल के समय में भारत ने पश्चिमी देशों खासकर यूएस और इस्त्राइल से रक्षा उपकरण मंगाने की कोशिशे की हैं लेकिन भारत का 70 फीसदी रक्षा हार्डवेयर अभी भी रूस से ही सप्लाई किया जाता है।

· भारत 80 के दशक के अंत में एक रूसी चार्ली क्लास न्यूक्लीयर सबमैरीन को भी ऑपरेट कर चुका है जो कि रूस से लीज़ पर ली गई थी।

· रूस मुख्यत ईरान, चीन, पोलेन्ड, रोमानिया और अल्जेरिया को पनडुब्बिया बेचता है। भारत भी रूस के लिए मुख्य बाज़ार है। आईएनएस चक्र की लीज़ के अलावा भारत 10 वर्शाव्यान्कास (किलो क्लास/ भारत की सिन्धुघोष क्लास) की सबमैरीन्स मंगा चुका है। जिनमें से 6, 3M-54 Klub-S मिसाइल सिस्टम से सुसज्जित थी। रूस भारत के साथ ब्राह्मोस मिसाइल भी विकसित कर रहा है।

· मुम्बई के माजेगांव डॉक्स लिमिटेज में फ्रांसीसी तकनीक से आधा दर्जन डीजल पावर्ड सबमैरीन्स को बनाने का कार्यक्रम चल रह है लेकिन मंहगी कॉस्ट और टाइम ओवररन्स के कारण यह प्रोजेक्ट फिलहाल रुका पड़ा है।

(हिन्द प्रहरी से)





Thursday, 13 March 2014

विश्व में सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश भारत, अपने इन्हीं दुधारू पशुओं के मांस के सहारे विश्व के सबसे बड़े मांस निर्यातकों में से एक बना




क्या आपको डराते नहीं यह आंकड़े...

  • · देश ने 2012-13 में विश्व को 17,400.59 करोड़ रुपये मूल्य के 11069.6 लाख टन भैंस के मांस के उत्पादों का निर्यात किया है
  • · उत्तर प्रदेश सरकार ने इस वर्ष प्रदेश में 8 नए और अत्याधुनिक बूचड़खाने खोलने को मंज़ूरी दी हैं जिनमें 10000 से 20 हज़ार दुधारू पशु प्रतिदिन काटे जाएंगे।
  • · 2013 दिसंबर में जारी फिक्की की रिपोर्ट बताती है कि उत्तर प्रदेश 67 प्रतिशत शेयर के साथ भारत से भैंस के मांस यानि बीफ का सबसे बड़ा निर्यातक बन गया है। कृष्ण कन्हैया की जन्मभूमि वाले प्रदेश में गाय भैंसों की संख्या सबसे ज्यादा होने के कारण यहां बूचड़खाने-सह मास-संसाधन इकाईयों की संख्या भी सबसे ज्यादा है। राज्य में बीफ उत्पादन लगातार बढ़ रहा है और 2010 में तो यह चालीस फीसदी तक बढ़ गया है। 
  • · बीफ उत्पादन में उत्तर प्रदेश के बाद आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और पंजाब का नंबंर आता है।
  • · इन बीफ उत्पादों को मुख्य तौर पर वियतनाम सोशल रिपब्लिक, मलेशिया, थाइलैंड, मिश्र अरब रिपब्लिक, सऊदी अरेबिया और जॉर्डन में निर्यात किया जाता है। 
  • · सरकार की 12वीं पंचवर्षीय योजना 2012-17 के लिए भारत सरकार के पशुपालन व डेयरी विभाग की सलाहकार समिति ने योजना आयोग को एक रिपोर्ट सौंपी है, जिसमें कहा गया है, ‘‘वर्तमान में गो-मांस के निर्यात पर प्रतिबंध है। अतः आयात-निर्यात नीति में आवश्यक संशोधन कर गो-मांस के निर्यात को स्वीकृति दी जाए।’’
  • · सरकारी तंत्र में पशुओं की बड़े पैमाने पर हत्या कर उसके मांस को विश्व भर में बेचने की योजना बन रही है। योजना के अंतर्गत पशुवध के आंकड़ों को तेजी से बढ़ाना, कार्यरत कत्लखानों का आधुनिकीकरण करना, ज्यादा से ज्यादा यांत्रिक कत्लखाने बनाना, मांस के निर्यात में आने वाले अवरोध हटाना और वह सब करना है जिससे भारत एक अग्रणी मांस निर्यातक देश बन सके।
  • · भैंसों को मांस के लिए काटने पर भारत सरकार अनुदान भी देती है जिसका सीधा दुष्प्रभाव दुग्ध उत्पादन पर पड़ता है। 

भारत की आयात- निर्यात नीति में पिछले 63 सालों से गो-मांस के निर्यात पर प्रतिबंध है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 48 में निहित राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत गोवंश की हत्या को पूरी तरह प्रतिबंधित करते हैं। इसके अलावा अनेक न्यायालयों व सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों में भी गोवंश की हत्या व गो-मांस के निर्यात पर रोक लगाई जा चुकी है। सरकारी आंकड़े तो यहीं बताते हैं कि इस समय देश में गाय को छोड़कर अन्य पशुओं जैसे भैंस, भेंड़, बकरी आदि के मांस का निर्यात किया जा रहा है। लेकिन सच्चाई यह है कि वर्तमान में देश में कुल 36 हजार कत्लखाने हैं, जिसमें से 10 स्वचालित हैं और इनमें प्रतिदिन 2 लाख 50 हजार पशुओं को काट दिया जाता है जिनमें गौमाता की बड़ी संख्या भी शामिल है। एक अनुमान के अनुसार एक वर्ष में 3 लाख टन मीट का उत्पादन किया जाता है, जिसके लिए 1 करोड़ गायों-भैंसों और 4 करोड़ भेड़-बकरियों को मार दिया जाता है।

दुनिया के धनी देश भारत को सबसे बड़ा मांस निर्यातक देश बनाने में जुटे हुए हैं। भारत के कृषि मंत्री का मानना है कि अन्य वस्तुओं के उत्पादन में बहुत खर्च आता है, लेकिन मांस एक ऐसा व्यापार है जिसमें हमारा कुछ भी खर्च नहीं होता है। उसे बूचड़खाने में भेजने की देर है बस, फिर तो डॉलर, यूरो और रुपयों से आपकी झोली भर जाएगी। चूंकि पशु का केवल मांस ही नहीं बिकता है बल्कि उसकी खाल, बाल, हड्डियां, आतें, खुर, सींग और चर्बी सभी बाजार में ऊंचे दामों पर बिकते हैं। मुम्बई के एक बड़े मांस निर्यातक के अनुसार, विपुल संख्या में पशुधन भारत के लिए पेट्रोल का कुआं है। जब चाहो उसका उपयोग करो।

इस समय दुनिया के 20 ऐसे देश हैं जिन्हें वह नियमित रूप से मांस की आपूर्ति करती है। इनमें पाकिस्तान का नाम भी शामिल है।  भारत से मांस खरीदने वाले प्रमुख देशों में मिस्र, मलेशिया, कुवैत, सऊदी अरब अमीरात, जोर्डन, ईरान, ओमान, लेबनॉन, पाकिस्तान और अजरबैजान मुस्लिम राष्ट्र हैं, जबकि वियतनाम, फिलिपाइंस, अंगोला, जोर्जिया, सेनेगल, घाना और आइवरी कोस्ट गैर मुस्लिम राष्ट्र हैं


इकोनोमिक टाइम्स में प्रकाशित समाचार के अनुसार, सरकार की अदूरदर्शी नीतियों से मांस की मांग में भारी वृद्धि हुई है। नई दिल्ली स्थित डेयरी के एक अधिकारी ने बतलाया कि अप्रैल 2008 से 2009 के बीच भैंस के मांस निर्यात में पिछले वर्ष की तुलना में 45 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। जब चारा और अन्य वस्तु मंहगी होती है तो भैंस का मालिक उसे सीधे कत्लखाने भेज देता है।

सुनिए क्या कहती है एपीडा की रिपोर्ट

एपीडा यानि एग्रीकल्चरल एंड प्रोसेस्ड फूड प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट डेवेलपमेंट अथॉरिटी की वेबसाइट पर प्रकाशित मीट मेनुअल के चैप्टर 2 में कहा गया है भारत में अपार पशुधन होने के बावजूद गलत धारणाओं के चलते मांस उत्पादकता में पिछड़ा हुआ है। हांलाकि भारत विश्व में सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक (117 मिलियन टन) देश होने का दर्जा हासिल कर चुका है लेकिन मांस उत्पाद जो कि डेयरी उत्पादकता से जुड़ा हुआ है अभी भी 6.5 टन मिलियन टन उत्पाद के साथ पांचवे स्थान पर है। पिछड़े समुदायो और गरीब किसानों की आर्थिक स्थिति से जुड़े होने के बावजूद मांस उत्पाद भारत के राजनेताओ, नीति निर्माताओं, वैज्ञानिकों और व्यापारियों का ध्यान पूरी तरह से नहीं खींच पाएं हैं। मांस उत्पाद करीबी तौर पर चमड़ा उद्योग से जुड़ा हुआ है जिसमें भारत इटली के बाद दूसरा स्थान प्राप्त कर चुका है। और अगर सरकार इस पर सही ध्यान दे तो विश्व चमड़ा और मांस दोनों की उत्पादकता और निर्यात में विश्व में प्रथम स्थान प्राप्त कर सकता है।

सोचिए गाय अगर नहीं रहीं तो क्या होगा। भारत फिलहाल विश्व में सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश है लेकिन जिस तेज़ी से यहां बूचड़खाने खुल रहे हैं और रोज़ गाएं काटी जा रही हैं, वो दिन दूर नहीं जब हमें दरअसल दूध का अन्य मुल्कों से आयात करना पड़ेगा..

बीफ उत्पादन का अर्थशास्त्र

भारत में गाय का मांस 120 रुपए किलो खुलेआम बिक रहा है। एक गाय-भैंस या बैल के कटने पर लगभग 350 किलो मांस निकलता है जबकि चमड़े और हड्डियों की कीमत अलग से मिलती है। एक पशु 3000 रुपए से 9000 रुपए तक में ग्रामीणों से खरीदा जाता है। लेकिन उसे काटने के बाद 350 किलो मांस निकलता है। भारत में उस मांस का दाम हुआ- 120x 350 यानि 42,000 रुपए। जबकि चमड़े का दाम हुआ एक हज़ार रुपए। विदेशों में निर्यात करने पर यहीं मांस तीन से चार गुना दामों पर बिकता है। अगर पशु खरीद का मूल्य (9000 रुपए) काट भी दिया जाए तो एक पशु काटने पर लगभग 34,000 रुपए का मुनाफा होता है।

औसतन एक बूचड़खाने में रोज़ाना 10,000 से 15,000 तक पशु कट रहे हैं। अगर 12,000 पशु भी मानें तो एक कत्लखाने के मालिक को हर रोज़ 34,000 X 12,000 यानि लगभग चालीस करोड़ रोज़ का मुनाफा होता है। उस पर सरकार से अनुदान मिलता है सो अलग। ऐसे में कोई भी बूचड़खाने को क्यों बन्द करना चाहेगा।


गाय को क्यों ना दिया जाए राष्ट्रमाता का दर्जा..? तभी बच पाएगी भारत की आस्था और अर्थव्यवस्था की प्रतीक गौमाता




क्या आप जानते हैं-
·         सारे संसार में पाए जाने वाले सभी चौपायों और पशुओं में केवल और केवल गाय ही ऐसा पशु है जिसके मल यानि गोबर को पवित्र माना जाता है और जिसका पूजा में उपयोग होता है।

·         भारतवर्ष में गाय को कभी भी पशु नहीं माना गया बल्कि हमेशा गाय को गौमाता कहा जाता है।

·         यह एक चिकित्सकीय तथ्य है कि मां के दूध के बाद गाय का दूध शिशुओं के लिए सर्वोत्तम है जो ना सिर्फ उन्हें हर तरह के रोगों और एलर्जी से बचाता है बल्कि बुद्धि के विकास में भी कारगर है।

·         उन सभी नवजात शिशुओं को जो किसी वजह से मां के दूध के सेवन से वंचित रह जाते हैं, डॉक्टर सुपाच्य, हल्का और सर्वोत्तम गाय का दूध पिलाने की सलाह देते हैं।

·         गाय के दूध, दही, घी, गोबर और गोमूत्र को मिला कर बनने वाले पंचगव्य से कब्ज़ से लेकर कैंसर तक लगभग हर रोग को ठीक किया जा सकता है और यह एक प्रमाणित हकीकत है।

·         पंचगव्य का प्रयोग हवन में भी किया जाता है। आर्युवेद में इसे औषधि माना जाता है और हिन्दुओं के धार्मिक कार्य पंचगव्य के बिना पूरे नहीं होते।

·         गाय के गोबर और मूत्र से सर्वोत्तम जैविक खाद बनती है जो ना सिर्फ मिट्टी की उपजाऊ क्षमता बढ़ाती है बल्कि उसमें उगने वाली फसलों की गुणवत्ता भी कई गुना बढ़ा देती है।

·         गाय का घी सर्वोत्तम होता है और विशेष रूप से नेत्रों के लिए उपयोगी और बुद्धि बलदायक होता है।
·         गाय के बछड़े बड़े होकर गाड़ी खींचते हैं एवं खेतो की जुताई करते हैं।

·         गाय के गोबर में अत्यधिक मात्रा में मीथेन गैस होती है जिसे बिजली और ताप के उत्पादन के साथ साथ पेट्रोल के स्थान पर गाड़ी चलाने के लिए ईंधन के रूप में प्रयोग किया जा सकता है।

·         वैदिक काल से ही सनातन धर्म में गाय का बहुत ज्यादा महत्व है। भगवान श्रीकृष्ण के साथ गाय की पूजा की जाती है। पहले मनुष्य की समृद्धि की गणना उसके यहां उपस्थित गोसंख्या से की जाती थी।

·         गौमूत्र अर्क जिसे गौमियादी अर्क या गौमियादी सर्वरोग निवारिणी कहा जाता है, एक प्रबल कैंसर विरोधी और एचआईवी विरोधी औषधि है जो शरीर के तीनों दोषों (वात, पित्त और कफ) को संतुलित करती है।

·         देसी गाय की गर्दन के पास एक कूबड़ होता है। इस कूबड़ में एक सूर्यकेतु नाड़ी होती है जो सूर्य की किरणों से निकलने वाली ऊर्जा को सोखती रहती है, जिससे गाय के शरीर में स्वर्ण उत्पन्न होता रहता है और जो सीधे गाय के दूध और मूत्र में मिलता है। इसलिए गाय का दूध भी हल्का पीला रंग लिए होता है। यह स्वर्ण शरीर को मजबूत करता है, आंतों की रक्षा करता है और दिमाग भी तेज करता है इसलिए गाय का दूध सर्वोत्तम माना गया है।

·                      भारत में गाय को देवी का दर्जा प्राप्त है। ऐसी मान्यता है कि गाय के शरीर में 33 करोड़ देवताओं का                 निवास है। यही कारण है कि दीवाली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा के अवसर पर गायों की विशेष पूजा                  की जाती है और उनका मोर पंखों आदि से श्रृंगार किया जाता है।

·         गाय के गोबर को सुखाकर ईंधन के रूप में प्रयोग किया जाता है। आज भी भारतवर्ष के ग्रामीण इलाकों में लाखों चूल्हे गाय के गोबर के उपलों से जलते हैं।
·         गाय के गोबर से लीपकर घर का पवित्रीकरण किया जाता है।

गौमूत्र से बनी कैंसर निरोधी दवा को मिला अमेरिकी पेटेंट


3 मार्च 2014 को बिजनेस स्टैंडर्ड में प्रकाशित एक खबर के मुताबिक आरएसएस के सहयोगी संगठन द्वारा गौमूत्र से बनाई गई दवा को अमेरिकी पेटेंट हासिल हुआ है। कैंसर निरोधी इस दवा को एंटी-जीनोटॉक्सिटी गुणों की वजह से तीसरी बार यह पेटेंट मिला है। नेशनल एनवायरमेंटल इंजीनियर रिसर्च इंस्टीट्यूट (नीरी) के कार्यकारी निदेशक तपन चक्रवर्ती के अनुसार संघ समर्थित संगठन गौ विज्ञान अनुसंधान केन्द्र और नीरी द्वारा संयुक्त रूप से बनाई गई दवा कामधेनु अर्क को यह पेटेंट हासिल हुआ है। यह दुर्भाग्यपूर्ण हैं कि जहां भारत ने अपनी देसी गोमूत्र चिकित्सा में विश्वास खो दिया है, पश्चिमी देश इस चिकित्सा और इससे बनी दवाईयों का पेटेंट करा रहे हैं। अनुसंधान से पता चला है कि गौमूत्र एंटीबायोटिक, रोगाणुरोधी, फंगसरोधी और तपेदिक विरोधी है। गौमूत्र अर्क संक्रमण विरोधी और कैंसर विरोधी होने के साथ-साथ बायोएक्टिव अणुओं की उपलब्धता को सुविधाजनक बनाने वाला सिद्ध हो चुका है। गौमूत्र को दवा के रूप में प्रयोग करने के लिए अमेरिका में इसे तीन या अधिक पेटेंट दिए गए हैं (5616593, 6410059 और 5972382)।

सोचिए गाय कितनी ज्यादा महत्वपूर्ण हैं लेकिन फिर भी देश के 36,000 से अधिक बूचड़खानों में हर दिन लाखों की संख्या में काटी जा रही हैं गाएं...