Wednesday, 19 November 2014

वो मास्टर स्प्रेयर बनना चाहता है ताकि एक दिन में पांच घरों में पेस्टिसाइड्स का छिड़काव कर सकें और उसकी तन्ख्वाह साढ़े पांच हज़ार से आठ हज़ार रुपए हो जाए... 'एक पेस्ट कंट्रोलर की कहानी'

कुछ ऐसे लोग होते हैं जिन्हें हम शायद लोगों में गिनते ही नहीं। वो भीड़ का हिस्सा भी नहीं होते, बल्कि शायद उनका किनारा होते हैं... भीड़ में सबसे पीछे खड़े लोग जिन्हें भीड़ में भी जगह नहीं मिलती... यह कहानी भी ऐसे ही इंसान प्रदीप की है.. जिनकी इस दुनिया में उपस्थिति को हमने कभी शायद एक सोच भी नहीं बख्शी होगी...


19 साल का प्रदीप, लक्ष्मी नगर दिल्ली की एक पेस्ट कंट्रोल कंपनी में काम करता है- और एक महीने में लगभग 78 घरों में ज़हरीले पेस्टिसाइड्स, इन्सेक्टिसाइड्स और अन्य दवाईयों का छिड़काव करता है, यानि रोज़ लगभग 2 से ज्यादा घरों में।

'पेस्टिसाइड स्प्रेयर' बनना प्रदीप का सपना कभी भी नहीं था। वो तो मधुूबनी, बिहार के अपने गांव से दिल्ली इसलिए आया था कि कहीं चपरासी या कोई और छोटी मोटी नौकरी करके अपनी गुजर कर सके और अपने मां-बाप के पास पैसा भेज सके। 17 साल का प्रदीप यहां अपने एक दूर के रिश्तेदार के भरोसे चला आया था जो कहीं चपरासी की ही नौकरी करता था। प्रदीप जब यहां आकर अपने उस रिश्तेदार से मिला तो हकीकत पता लगी। पता चला कि वो तो दरअसल पेस्ट कंट्रोल कंपनी में काम करता है और घरवालों को झूठ बता रखा है कि कहीं चपरासी का काम करता है। रिश्तेदार ने जब प्रदीप को जिंदगी की कड़वी सच्चाई का आईना दिखाया तो उसने जाना कि नौकरी मिलना कितना मुश्किल है। आखिरकार मिन्नतें करके उसी रिश्तेदार की मदद से  प्रदीप ने खुद को भी एक पेस्ट कंट्रोल कंपनी में लगवा लियां। 



अब यहां काम करते तीन साल होने को आए। एक हरे कपड़े के थैले में ज़हरीले पेस्टिसाइड्स और पीतल की स्प्रे कैन... अब यहीं प्रदीप के साथी हैं। अपने इन औजारों से प्रदीप को बड़ा प्यार है। रोज़ इन्हीं को लेकर प्रदीप आधुनिक, सजे-धजे, दिल्ली, नौएडा, गाज़ियाबाद और गुड़गांव के घरों में जाता है और वहां पेस्टिसाइड्स का छिड़काव करता है।

प्रदीप इन खतरनाक पेस्टिसाइड्स का छिड़काव बिना किसी मास्क या दस्तानों के करता है। प्रदीप का कहना है कि अब यह ज़हरीली दवाईयां मेरी दोस्त बन गई हैं। मुझे इनमें सांस लेने की और मेरे हाथों को इन्हें छूते रहने की इतनी आदत पड़ गई है कि अगर मैं मास्क और दस्तानों का इस्तमाल करूंगा तो शायद मुझे बीमारी हो जाए, वरना तो होने से रही। शुरूआत में एक आध बार बेहोशी जैसा लगता था तो मालिक डॉक्टर को तुरंत बुला देता था। पर अब तो आदत पड़ गई है। 

 वो बताता है कि पैसा ज़रूर कम है लेकिन इस काम में कोई टैंशन नहीं है। महीने में तीन दिन की छुट्टी मिलती है और साढ़े पांच हज़ार की तन्ख्वाह, अगर छिड़काव करवाने वाले घरों से दोबारा कीड़े, दीमक, खटमल आदि पैदा होने की कोई कम्प्लेन्ट महीने भर तक ना आए तो मालिक पांच सौ रुपए ऊपर से ईनाम बतौर देता है। 

अपने रिश्तेदार की तरह अपने घरवालों को अपने काम की सच्चाई प्रदीप ने भी नहीं बताई है, कहता है कि उन्हें पता चलेगा तो बड़ा दुख होगा। गांव में उसके माता-पिता, एक बड़ा भाई हैं। भाई वहीं नौकरी करता है और थोड़ा बहुत खेत है जिससे  मां-बाप का गुज़ारा होता है। प्रदीप चाहकर भी उनके लिए पैसे नहीं भेज पाता। कहता है कि मेरे लिए ही पूरा नहीं पड़ता, उनके लिए क्या भेजूं। 

प्रदीप का सपना है कि वो जल्द ही एक मास्टर स्प्रेयर बन जाए और कम से कम एक दिन में पांच घरों को कवर करने लगे, तब मालिक उसकी तन्ख्वाह में ढाई हज़ार की बढ़ोत्तरी कर देगा और उसे नए लोगों को काम सिखाने का मौका भी मिलेगा और तब शायद कुछ बचे तो वो अपने घरवालों को भेज भी सकता है...।






Getting my 9 year old son enrolled in a new school is the biggest worry I have in mind while moving in my Home that is 20 kilometers away from the home we have been staying for past 8 years



Yes, that is true... Gone are the days when you are happy while moving into your own home as it brings stability to your life & peace in your mind. Things are different if you are a resident of Delhi/NCR. Here, moving into your own home does not give more happiness than it gives a reason to worry about. With my own base, I'll also have to Shift My son's base... His school. Any number of Parents who have gone through the trauma of finding a good education institute (esp in Delhi, NCR) for their young ones, can easily understand my woes.

I still remember those days, six years back when we were looking for a good school for our son. We went to all the schools in vicinity & filled forms. Finally he got admission in nursery in Bal Bhawan school (that was listed 2nd lowest in the schools list) . Once his admission was confirmed,  school staff -in a very sophisticated manner, started  punching a big hole in our pocket. They asked us to submit admission fees- that included registration fee, tuition fee, enrollment fee, annual charges & several other charges. They also asked us to pay 8 thousand rupees more, of which they did'nt give any receipt of ....; but we were happy & relaxed.., finally our admissionathon had finished.

And now we again have to take part in that maddening admissionathon. We are moving in a new house, so have to register our child in a new school. Bracing ourselves for the battle ahead... we'll be going school to school, filling costly admission forms (they cost from 1000 rs to 3500 rs). Mind it, this admission form fee is non refundable & doesn't guarantee your ward's admission in the same school. This, actually, is fee for applying for admission in the  school. But this fee & and money part actually are no big issues..., the most scary thing is the humiliation that school authorities cause to the parents while the admission process goes on.

Even if you have fed them with a big amount just to fill that registration form... you can't call them to ask if your child has been selected..., no matter what, you have no right to question their decision of choosing other children over your child... Come what may, you have to be there on interview call otherwise your application will become a subject to cancellation... & once, if by the grace of school authorities, your child gets a nod of them, you have to submit hefty sum of money within the stipulated time frame of 10 to 20 days (this fee figure is somewhere between 70,000 to 1.5 lacs & that is non refundable. in case you change your mind & don't want your child to enroll in the same school you'll have to bear the loss of that amount. Also, if you want to wait for selection list of another school, you can't).      
    
Same is gonna happen again... my condition can better be described as....
..  own home (wooooow), better home ( wooooow), shifting (just ok), packing shacking (can be done as we are moving to our own home).,  change of school for your child (.. noooooooo, be ready to take the pain... hours of searching for a good school ..., long queues in front of form windows... & oohh, aahhh, oouch...G...O....D)... why are we moving, we should better live in rented home here.... bu..hu..huhu..sob..sob..

Monday, 29 September 2014

प्रधानमंत्री ने तो और भी बहुत कुछ कहा और स्पष्ट शब्दों में कहा.. भारतीय मुसलमान और अलकायदा से ऊपर उठकर तो देखो...



हमारी परेशानी यह है कि हम कभी प्रधानमंत्री मोदी द्वारा मुसलमानों के लिए कहे गए कथन से आगे बढ़ते ही नहीं, इसलिए हमने सोमवार, 28 सितम्बर 2014 को काउंसिल ऑफ फॉरन रिलेशन्स में मोदी द्वारा कही गई बहुत सी बातों में से केवल इसे महत्व दिया कि -' भारत का मुसलमान अल कायदा को फेल कर देगा..।'

और इस चक्कर में हमने कई महत्वपूर्ण मुद्दे छोड़ दिए जिनके बारे में बहुत ही साफ तौर पर और बेहद निडरता, बेबाकी और सफाई से प्रधानमंत्री ने अपनी बात की.., मत भूलिए कि यह एक बहुत महत्वपूर्ण मंच था जिस पर प्रधानमंत्री बोल रहे थे और उनका एक-एक शब्द केवल भारतीय मीडिया ही नहीं अमेरिकी मीडिया और दोनों देशों के बीच नीति निर्धारण करने वाले लोग सुन और देख रहे थे। भले ही आपको सर्च करने पर अमेरिकी अखबारों और मीडिया में इसके बारे में ज्यादा कुछ ना मिले, जिसकी वजह शायद यह हो सकती है कि अमेरिका जानबूझ कर प्रधानमंत्री मोदी की खबर को बहुत बड़ी नहीं बनने देना चाहता, लेकिन सच यह है उनकी हर बात और कथन को बहुत गौर से सुना, समझा और जज किया गया होगा।

एक एक बात साफ तौर पर कहकर प्रधानमंत्री ने अपनी इच्छा और इरादा दोनों ज़ाहिर कर दिए।


अपने ऊपर बम गिरता है तब सबको आतंकवाद का पता चलता है.., गुड टैररिज़म और बैड टैररिज़म कुछ नहीं होता... 

प्रधानमंत्री ने बहुत ही साफ और चुटीले अंदाज में अमेरिका से कह दिया कि जब तक और देशों में आतंकवाद होता रहा, अमेरिका को कोई फर्क नहीं पड़ा और वो उसे लॉ एंड ऑर्डर की समस्या कहकर टालता रहा लेकिन जब ट्रेड सेंटर पर बम गिरा, तब अमेरिका को समझ आया कि आतंकवाद क्या है। उन्होंने गुड टैररिज़म और बैड टैररिज़म की बात कहकर सीधे सीधे अमेरिकी नीतियों पर व्ययंग कसा, जो कुछ आतंकवादी घटनाओं को गुड टैररिज़म की श्रेणी में रखती हैं।


भारत में गरीबों की संख्या बहुत है और उनके लिए फूड सिक्योरिटी होना ज़रूरी है, ट्रेड फेसिलिटेशल भी ज़रूरी है लेकिन दोनों चीज़ों को साथ लेकर चलना है.. इसलिए यह नहीं हो सकता कि यह हम पहले कर लें, और दूसरा काम बाद में...  

- यह कहकर प्रधानमंत्री ने स्पष्ट कर दिया कि अगर अमेरिका यह आस लगाए बैठा है कि भारत का मुद्दा देखे बगैर वो भारत को ट्रेड फेसिलिटेशन एग्रीमेंट पर साइन करने के लिए मना लेगा तो यह गलत है, उसे भारत की चिन्ताओं को भी देखना और समझना होगा तभी बात बन सकती है।



चीन-भारत सीमा विवाद मुद्दे पर किसी बाहरी मध्यस्थता की ज़रूरत नहीं- 

प्रधानमंत्री ने स्पष्ट कर दिया कि उन्हें अपने देश के विवाद सुलझाने आते हैं और वो अपने पड़ौसी देश चीन के साथ सीमा विवाद सुलझाने के लिए किसी बाहरी संस्था की मध्यस्थता स्वीकार नहीं करेंगे।




सार्क देशों के लिए सैटेलाइट- 

प्रधानमंत्री ने बताया कि भारत सार्क देशों के लिए एक सेटेलाइट विकसित कर रहा है जिसके विकास के बाद सभी सार्क देशों के बीच सहयोग बढ़ेगा और मैत्रीपूर्ण संबंधों में प्रगाढ़ता आएगी। यह कहकर प्रधानमंत्री ने एक तरह से यह भी संदेश दिया कि अगर विकसित देश विकासशील देशों के साथ नहीं आते हैं तो विकासशील देश भी आपस में सहयोग पूर्ण रवैया अपनाकर एक बड़ी शक्ति के रूप में उभर सकते हैं। जिसके लिए उन्हें केवल आपसी सहयोग और समझ की ज़रूरत है ना कि किसी विकसित देश की सहायता की।


'प्रधानमंत्री जी मैंने आपसे सीखा कि किसी सवाल का जवाब कैसे नहीं देना है.. '


मंच पर सवाल पूछ रहे अधिकारी ने प्रधानमंत्री मोदी को धन्यवाद देते हुए आखिरी में जब यह कहा कि- 'one thing I learned from you Prime Minister, how to not answer a question...'  तो मोदी जी हंस दिए और उन्होंने कहां थैंक यू..। यहां इस बात का ज़िक्र करना इसलिए ज़रूरी है कि इस दौरान बहुत से ऐसे सवाल पूछे गए थे जिनका सीधे-सीधे ताल्लुक भारत के अंदरूनी मुद्दों  और नीतिगत फैसलों से था और जिनका प्रधानमंत्री मोदी ने बड़े ही टालू अंदाज़ में घुमा-फिरा कर जवाब दिया और कुछ के जवाब वो पूरी तरह से गोल कर गए ;-) .. और इसके लिए वो बधाई के पात्र हैं क्योंकि चाणक्य नीति कहती है कि किसी भी बाहरी संस्था या व्यक्ति को ना तो अपने अंदरूनी मुद्दों और नीतियों के बारे में बताना चाहिए और ना ही अपने संभावित फैसलों के बारे में। प्रधानमंत्री जानते थे कि इस मंच से वो अगर कुछ बोलेंगे तो उसे बेहद गम्भीरता से लिया जाएगा, इसलिए उन्होंने अपने पत्ते खोले बिना बात टाल दी और केवल वहीं बातें कहीं जो वो कहना चाहते थे या बताना चाहते थे।


Wednesday, 24 September 2014

बस एक क्लिक और घर बैठे खरीद लो ईद-उल-अज्हा पर कुर्बानी के लिए बकरा


ओएलएक्स और क्विकर पर हो रही है बकरों की खरीद-फरोख्त, खरीददारों को घर बैठे कुर्बानी के लिए बकरे मिल रहे हैं और बिक्रीकरों को अच्छे दाम




जी हां, अब तक कपड़े लत्तों से लेकर टीवी, फ्रिज और ऑनलाइन त्यौहारों के लिए खरीददारी तो आप ऑनलाइन करते ही थे, अब इस लिस्ट में बकरीद पर कुर्बानी के लिए खरीदे जाने वाले बकरे भी शामिल हो गए हैं।

ओएलएक्स और क्विकर जैसी वेबसाइट्स पर लॉग इन करके आप पूरे देश में कहीं पर भी अपनी पसंद और बजट के हिसाब से घर बैठे बकरे खरीद सकते हैं, और यह भी ज़रूरी नहीं कि आप उसी शहर से बकरा खरीदें, चाहे तो किसी अन्य शहर से भी आप इंटरनेट साइट्स के जरिए बकरे खरीद सकते हैं।

यहां पर कोई बकरा हैदराबाद से बिकने के लिए आया हुआ है, कोई दिल्ली से और कोई अजमेर, बैंगलोर या फिर राजस्थान से।
क्विकर साइट पर दिल्ली की ऑनलाइन मंडी में 5,000 रुपए से एक 1 लाख रुपए तक के बकरे खरीद के लिए उपलब्ध हैं।

यह बकरा दिल्ली के मालवीय नगर से हैं। इसकी कीमत 40,000 रुपए रखी गई है। बकरे की चार-पांच फोटो व अन्य जानकारी भी दी गई है, बाकी जानकारी दिए गए नंबर पर फोन करके प्राप्त की जा सकती है। 

ओएलएक्स डॉट इन (olx.in) वेबसाइट पर भी पूरे भारत से  1,151  बकरे की बिक्री के विज्ञापन दिए गए हैं।  यहां सबसे अधिक बकरों के विज्ञापन  मध्य प्रदेश (333)  और महाराष्ट्र (320) से हैं। दिल्ली में 55 बकरों के विज्ञापन दिए गए हैं।
बकरों की कीमत भार और नस्ल के हिसाब से लगाई गई है। 25 किलो से लेकर 200 किलो तक के बकरे दिल्ली में बिकने के लिए मौजूद हैं।
बकरों की नस्लों में राजस्थानी, जमनापरी, टाइगर बकरा, अजमेरी बकरा, अन्डुआ बकरा, दुम्बा बकरा, दुम्बा, अजमेरी, मेवाती आदि किस्म के बकरे मौजूद हैं।

एक 5 लाख रुपए का बकरा भी बिक्री के लिए साइट पर है, जिसके पेट पर कुदरती अल्लाह लिखा हुआ है। यह बकरा बरेली का है।

 इसके अलावा एक और बकरा जिसकी गर्दन पर मुहम्मद लिखा है भी बिकने के लिए ओएलएक्स पर है। यह बकरा कानपुर का है और इसकी कीमत नहीं दी गई है।




फेसबुक पर भी ऑनलाइल बकरा मंडी नाम से भी एक पेज बना हुआ है जो मूलत: पाकिस्तान का पेज है।

ओएलएक्स और क्विकर के अलावा भी बहुत सी वेबसाइट्स है जिनसे कुर्बानी के लिए बकरे खरीदे जा सकते हैं। जैसे दुम्बाबकरा डॉट कॉम ( http://dumbabakra.com/ ) वेबसाइट जहां नसीराबाद, अजमेर, राजस्थान के शेर मोहम्मद मंसूरी साहब की अपनी बकरा मंडी है। इनके पास एक ऐसा बकरा भी है जिसकी गर्दन पर चांद तारा बना हुआ है। 


इस वेबसाइट पर दिए गए हज़ारों बकरों में से आप अपना मनपसंद बकरा चुनकर उसे ऑनलाइन पेमेंट या अन्य पैसा अदायगी के माध्यम से खरीद सकते हैं। अगर आप भारत में कहीं और हैं तो आपको खुद अपने खरीदे गए बकरे की कुर्बानी करने की ज़रूरत नहीं है बल्कि इस वेबसाइट में आपको उस बकरे की कुर्बानी का लाइव वीडियो दिखाने का इंतज़ाम है। यानि आप घर बैठकर बकरे की कुर्बानी दे सकते हैं। 


इसके अतिरिक्त 'बड़ा बकरा डॉट कॉम' '( http://badabakra.com/contact-us )' साइट शुद्ध जमनापरी नस्ल के बड़े बकरे बेचने का दावा करती है। कंपनी का मुख्यालय हैदराबाद में हैं और यहां से बकरे खरीदने के लिए जनाब शेख अहमद मोइनुद्दीन साहब से सम्पर्क साधने की ज़रूरत है। 
इस वेबसाइट पर सानिया, सलमान, गब्बर नामों के बकरे बिक्री के लिए मिलते हैं। इन बकरों के वीडियों भी दिए गए हैं।

कुछ अन्य वेबसाइट्स भी हैं, जैसे कि


यहां भी ऑनलाइन कुर्बानी के लिए बकरी, गाय या अन्य जानवरों की बिक्री होती हैं। 
 माई कुर्बानी डॉट कॉम इलिनॉइस, केन्सास और एटलांटा में बेस्ड वेबसाइट है। साइट पर दी गई जानकारी के अनुसार इनका पाकिस्तान में वृहद नेटवर्क है जिसके जरिए ये यूरोप, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा के लोगों को कुर्बानी के लिए बकरे बेचते हैं। भारत में गुजरात, हैदराबाद और कश्मीर में इनका नेटवर्क है। 

आप जिस देश में, जिस जगह, जिस समय और जिसके नाम पर चाहे कुर्बानी कर सकते हैं। आपको आपके पसंद किए गए जानवर की कुर्बानी की तस्वीरें और वीडियो भेज दिया जाता है। आप चाहे तो कुर्बानी के बाद गाय या बकरी का गोश्त अपने घर पर डिलीवर भी करवा सकते हैं। 


Sunday, 21 September 2014

ठंडी मौत...? कोल्ड ड्रिंक्स के रूप में धीमा ज़हर पी रहे हैं आप...


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- हार्वर्ड स्कूल ऑफ पब्लिक हैल्थ की स्टडी से पता चला है कि अति मीठे सॉफ्ट ड्रिंक्स केवल मोटापा ही नहीं बढ़ाते बल्कि जान के दुश्मन भी हैं। मीठे सॉफ्ट ड्रिंक्स का सेवन पूरे विश्व में हर साल लगभग पौने दो लाख (1,80000) लोगों की मौत का कारण बनता हैं। इनके सेवन के चलते हर साल लगभग एक लाख तैंतीस हज़ार लोग डायबिटीज़ के शिकार होकर, लगभग 6000 लोग कैंसर का शिकार होकर और लगभग 44,000 लोग दिल की बीमारियों का शिकार होकर मर जाते हैं। इस स्टडी के परिणामों को अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन की मीटिंग में प्रस्तुत किया गया था। (डेली मेल यूके की 19 मार्च 2013 की रिपोर्ट)

-छत्तीसगढ़ स्थित दुर्ग, राजनन्दगांव और धमतारी जिलों के किसान बताते हैं कि वो अपने चावल के खेतों को कीटों से बचाने के लिए पेप्सी और कोक का इस्तमाल कर चुके हैं जो कि एक सफल प्रयोग साबित हुआ है। किसानों के अनुसार पानी में मिलाकर कोक और पेप्सी का फसल पर छिड़काव करना, कीटनाशकों के प्रयोग से कहीं ज्यादा सस्ता और सुलभ पड़ता है और इससे कीटों से फसल का बचाव भी हो जाता है। (बीबीसी न्यूज, 3 नवंबर 2004 की रिपोर्ट http://news.bbc.co.uk/2/hi/south_asia/3977351.stm )

-कार्बोनेटेड ड्रिंक्स को डायबिटीज़, हायपरटेंशन और गुर्दे की पथरी से जोड़ा गया है। खास तौर से कोला पेय में फॉस्फोरिक ऐसिड होता है जो यूरिनरी बदलाव और गुर्दे की पथरी का कारण बनता है। दिन में दो या ज्यादा कोला पीने से क्रॉनिक किडनी की बीमारी होने का खतरा बढ़ जाता है। रेगुलर कोला और आर्टीफिशियल स्वीटनर वाली कोला दोनों से एक जैसे परिणाम मिलते हैं। (अमेरिकी चिकित्सा शोध पत्रिका पबमेड में 18 जुलाई, 2007 को प्रकाशित, http://www.ncbi.nlm.nih.gov/pubmed/17525693?ordinalpos=1&itool=EntrezSystem2.PEntrez.Pubmed.Pubmed_ResultsPanel.Pubmed_DefaultReportPanel.Pubmed_RVDocSum )

-डेली एक्सप्रेस के मुताबिक जो लोग प्रतिदिन इस तरह के ड्रिंक्स पीते हैं उनमें दिल के दौरे या नाड़ी संबंधी रोग होने की आशंका 43 प्रतिशत तक ज्यादा होती है। शोधकर्ताओं ने अध्ययन के दौरान पाया कि जो लोग प्रतिदिन डायट ड्रिंक्स पीते हैं उनमें दिल के दौरे या नाड़ी संबंधी रोग होने की आशंका 43 प्रतिशत ज्यादा होती है। अध्ययन में यह भी देखा गया कि जो लोग सॉफ्ट ड्रिंक्स कम पीते हैं, उन्हें रोजाना पीने वालों के मुकाबले दिल के खतरे कम होते हैं।

-एक स्टडी में यह दावा भी किया गया है कि दिन में एक लीटर या उससे ज्यादा कोल्ड ड्रिंक पीने से पुरुषों की प्रजनन शक्ति घट जाती है।

उपरोक्त सभी खबरें आपकी प्रिय कोल्ड ड्रिंक्स के विरुद्ध किसी भ्रामक प्रचार या अफवाहों का नतीजा नहीं हैं बल्कि प्रतिष्ठित समाचार पत्रों व शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित खबरें हैं जो बाकायदा शोध के बाद प्रकाशित की गई हैं। जी हां, अगर आप भी कोक, पेप्सी, फ्रूटी, स्लाइस या स्पोर्ट्स ड्रिंक्स के बहुत शौकीन हैं और इन्हें अपने जीवन का अभिन्न अंग बना चुके हैं तो हम आपको बता दें कि आप अपने शरीर को बीमारियों का घऱ बनाने का पूरा इंतज़ाम कर चुके हैं। क्योंकि इन मीठे पेय पदार्थों की शक्ल में दरअसल आप एक धीमा ज़हर खुद-ब-खुद अपनी रगों में पहुंचा रहे हैं। और अगर आपके बच्चे भी इसके शौकीन हैं तो बधाई, आपकी अगली पीढ़ी भी घातक रोगों का शिकार बनने की राह पर कदम रख चुकी है। आप जानना चाहेंगे हम ऐसा क्यों कह रहें हैं, तो पढ़िए यह विस्तृत रिपोर्ट-

-कोल्ड ड्रिंक्स में सोडियम मोनो ग्लूटामेट, ब्रोमिनेटेड बैजिटेबल ऑइल, मिथाइल बेन्जीन और एंडोसल्फान जैसे ज़हर मौजूद होने की भी रिपोर्ट्स मिली हैं।



क्या हैं सॉफ्ट ड्रिंक?
सॉफ्ट ड्रिंक्स नॉन अल्कोहलिक ड्रिंक्स होते हैं अर्थात इनमें अल्कोहल नहीं होता है। इसलिए ये 'सॉफ्ट' होते हैं। सॉफ्ट ड्रिंक्स में कोला, फ्लेवर्ड, वाटर, सोडा पानी, सिंथेटिक फ्रूट ड्रिंक्स, एनर्जी ड्रिंक्स, स्पोर्ट्स ड्रिंक्स आदि आते हैं।

कोला और कोक जैसे कॉर्बोनेटेड ड्रिंक्स क्या हैं?
वो सॉफ्ट ड्रिंक्स जिनके अंदर कार्बन डाईऑक्साइड गैस होती है, उन्हें कॉर्बोनेटेड ड्रिंक्स कहते हैं। इनमें सभी तरह के सोडा, कोक, कोला, पेप्सी आदि शामिल हैं। 


क्या क्या है आपकी सॉफ्ट ड्रिंक में- कभी किसी सोडा कैन, या सॉफ्ट ड्रिंक की बोतल पर उसके इन्ग्रीडिएन्ट्स के बारे में पढ़िएगा तो आपको निम्न प्रमुख इन्ग्रीडिएन्ट्स दिखेंगे- 




शुगर (सुक्रोज और कॉर्न सीरप)- 
एक साधारण कोल्ड ड्रिंक की बोतल में अत्यधिक मात्रा में चीनी होती है जो मोटापा, टाइप बी डायबिटीज़ और मैटाबॉलिक सिन्ड्रोम का कारण बनती है। हाई ब्लड प्रेशर, हाई कॉलेस्ट्रॉल और पेट का मोटापा इससे होने वाली अन्य बीमारियां हैं।

एस्पारटेम (aspartame)- यह डाइट सोडा का मुख्य अंश है जो भूख बढ़ाता है। तो अगर आप डाइट सोडा पीकर कैलोरी लेने से बचने की सोच रहे हैं तो हो सकता है कि इसकी वजह से लगने वाली भूख के कारण आप ज्यादा खाना खा लें और ज्यादा कैलोरीज़ ले लें।

कैरेमल कलर- यह कत्थई रंग होता है जिसमें 2-मिथाइलिमाइडोजोल और 4-मिथाइलिमाइडोजोल (2-Methylimidozole & 4- Methylimidozole ) रसायन होते हैं जिन्हें प्रयोगशाला में चूहों के ऊपर प्रयोग के दौरान फेफड़ों, यकृत और थाइरॉइड कैंसर से संबंधित पाया गया है।

सोडियम- डाइट सोडा में मिलाया जाने वाला अत्यधिक सोडियम, स्ट्रोक के खतरे को बढ़ा देता है।

फॉस्फोरिक ऐसिड
 -कोल्डड्रिंक्स में मौजूद फॉस्फोरिक एसिड सबसे खतरनाक तत्वों में से एक हैं जो हड्डियों की कमज़ोरी और ऑस्टीयोपॉरोसिस का कारण है। कोल्ड ड्रिंक्स में सिट्रिक और फॉस्फोरस एसिड होता है, जिसका ज्यादा सेवन करना सेहत के लिए नुकसानदायक तो होता ही है, साथ ही यह एसिड दांतों के लिए भी नुकसानदायक होता है।

कैफीन- शायद सुनने में आपको अजीब लगे लेकिन कोल्ड ड्रिंक्स में कैफीन एक प्रमुख तत्व होता है जो बच्चों में सिरदर्द, नींद ना आना, चिड़चिड़ापन आदि तकलीफों का कारण हो सकता है।

फ्लेवर एडीटिव्स- शुगर की मात्रा और सोडे की एसिडिटी के अतिरिक्त फ्रूट ड्रिंक्स में डाले जाने वाले फ्लेवर एडीटिव्स दांतो के इनैमल के खराब होने का कारण बनते हैं।




कीटनाशक- इन कोल्ड ड्रिंक्स में हमारे शरीर के लिए हानिकारक कीटनाशकों की मात्रा निर्धारित मानकों से कहीं अधिक होती है।


सॉफ्ट ड्रिंक्स पीने पर सौगात में मिलती हैं ये बीमारियां


मोटापा : सॉफ्ट ड्रिंक्स में कैलोरीज और शुगर की मात्रा बहुत अधिक होती है इसलिए अधिक मात्रा में सॉफ्ट ड्रिंक मतलब मोटापे को निमंत्रण।

टूथ डिके : कोल्ड ड्रिंक्स में मौजूद शुगर एवं एसिड बच्चों के दाँत सड़ने के कई कारणों में से एक हैं। इन ड्रिंक्स में मौजूद एसिड दाँतों के इनेमल को धीरे-धीरे गला देता है।  

हड्डियों को कमजोर करना : कोल्ड ड्रिंक्स में मौजूद फॉस्फोरिक ऐसिड के कारण बच्चों की हड्डियों से कैल्शियम बाहर आता है जिससे उनके बोन्स कमजोर होते हैं। इस ड्रिंक्स में मौजूद अधिक मात्रा में फॉस्फोरस भी कैल्शियम को हड्डियों से बाहर निकालता है जो आगे जाकर ऑस्टियोपॉरोसिस जैसी बीमारी का कारण बनता है।

पेप्टिक अल्सर और पेट के रोग- शीतल पेय पेप्टिक अल्सर को और बढ़ाते है। यदि कोल्ड ड्रिंक्स में मिठास के लिए सैक्रीन का प्रयोग किया गया हो तो यह कैंसर पैदा कर देगा। मधुमेह, जोड़ों के दर्द और उच्च रक्तचाप वालों के लिए कोल्ड ड्रिंक्स बहुत हानिकारक है।

डायबिटीज़, कैंसर और दिल व फेफड़ो के रोग- ऊपर लिखी शोध की रिपोर्ट्स से यह स्पष्ट हो चुका है कि सॉफ्ट ड्रिंक्स इन घातक बीमारियों और कई मामलों में मौत का कारण बनती हैं।

कार्बोनेटेड ड्रिंक्स यानि कार्बन डाई ऑक्साइड के स्त्रोत- हमने बचपन से पढ़ा है कि हमारा शरीर प्राणवायु ऑक्सीजन लेता है और कार्बन डाई ऑक्साइड उत्सर्जित करता है जो शरीर के लिए हानिकारक है। लेकिन इन कार्बोनेटेड ड्रिंक्स के ज़रिए हम कार्बन डाई ऑक्साइड शरीर में ले जाते हैं। अगर आप महसूस करते हों तो कोला, कोक या पेप्सी पीते हीं एक दम से नाक में जलन का अहसास होता है जो सीधे दिमाग तक जाता है। लेकिन फिर भी उसे अनदेखा करके हम इन कार्बोनेटेड ड्रिंक्स को पीने में आनंद लेते हैं।



संसद की कैंटीन में नही मिलते कोल्ड ड्रिंक्स, लेकिन देश में खूब बिक रहा है यह ज़हर

आपको जानकर हैरानी होगी कि इन कोल्ड ड्रिंक्स में कीटनाशकों के अधिक इस्तेमाल की खबर आने के बाद से काफी समय पहले संसद की कैंटीन में इन कोल्ड ड्रिंक्स को बैन कर दिया गया था। लेकिन हैरानी की बात यह है कि पूरे देश में और खासतौर से शिक्षा संस्थानों की कैंटीन में इनकी बिक्री बदस्तूर जारी है जो युवा पीढ़ी को अपना शिकार बना रही है।

'ठण्डा मतलब टॉयलेट क्लीनर, ठंडा मतलब कीटनाशक !'

-ठण्डे पेयों (कोल्ड ड्रिंक्स) का PH मान 2.4 से लेकर 3.5 तक होता है जो कि एसिड की परिसीमा में आता है, रासायनिक रुप से हम घरों में जो टॉयलेट क्लीनर उपयोग में लाते हैं इसका भी PH मान 2.5 से लेकर 3.5 के बीच होता है इसलिए इन कोल्ड ड्रिंक्स को टॉयलेट क्लीनर के रूप में भी प्रयोग में लाया जा सकता है। सामान्य रुप से पानी का PH मान 7.5 के आस-पास होता है जो हमारे पीने के लिये सर्वोत्तम है।

-पोटेशियम सॉर्बेट, सोडियम ग्लूकामेट, कार्बन डार्इ आक्सार्इड जैसे विष इसमें मिलाये जाते हैं। इसके अलावा मेलाथियान, लिण्डेन, डीडीटी जैसे हानिकारक रसायन भी मिलाये जाते हैं जिसके कारण यह कीटनाशक के रूप में भी काम करता है।

अमेरिकी शोध में सामने आया भारत का हाल-

हमारे देश के बारे में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्था इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ मैट्रिक्स एंड इवैल्यूवेशन की ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज स्टडीज 2010 में कहा गया है कि भारत में 2010 में 95,427 लोगों की मौत की एक बड़ी वजह इन अति मीठे सॉफ्ट ड्रिंक्स का सेवन बना। इन मौतों की दर में 1990 की तुलना में 161 प्रतिशत की वृद्धि हुई है 1990 में सॉफ्ट ड्रिंक्स की लत के कारण 36,591 लोगों ने दम तोड़ा था। 2010 पर आधारित इस रिपोर्ट के अनुसार भारत में कोला पीने के आदी लोगों में से 78,017 दिल की बीमारी की वजह से मरे, 11,314 लोग सॉफ्ट ड्रिंक्स के कारण डायबिटीज के रोगी बन गये जबकि लगभग 6096 कैंसर रोगी बनकर दम तोड़ चुके हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि 1990 में 36,591 लोगों की विभिन्न गैर संक्रामक रोगों से मरने का एक प्रमुख कारण अति मीठे सॉफ्ट ड्रिंक्स थे।

कैसे किया गया था शोध
भारत में 2010 में प्राकृतिक रूप से मरने वाले लोगों के आंकड़े इकठ्ठे किये गये और इसके लिये मौत की वजह की सभी उपलब्ध जानकारियाँ जुटाई गईं असमय मौत के मामलों में उम्र, लिंग और क्षेत्र के विश्लेषण में 67 अलग-अलग रिस्क फैक्टर्स को अति मीठे सॉफ्ट ड्रिंक्स पीने की आदत से मिलान किया गया और उनकी तुलना 1990 और 2010 के आंकड़ों से की गई। ब्रिटेन की प्रतिष्ठित मेडिकल जन लैंसेट में में प्रकाशित रिपोर्ट से भी आंकड़े और जानकारियों को इस शोध में शामिल किया गया था। 


कंपनियों ने कहा गलत है रिपोर्ट
हांलाकि इस रिपोर्ट के विरोध में भारतीय कोला कंपनियों के पैरोकार संगठन इंडियन बेवरेज एसोसिएशन ने कहा था कि अति मीठे सॉफ्ट ड्रिंक्स से होने वाली मौतों की रिपोर्ट सही नहीं है इस रिपोर्ट से सिर्फ आम लोगों में भ्रम फैलाने का प्रयास किया गया है। अब यह बात अलग है ये कंपनियां इस शोध की कोई मज़बूत काट प्रस्तुत नहीं कर पाईं।

अमिताभ बच्चन ने सॉफ्ट ड्रिंक का विज्ञापन करना बन्द किया

अमिताभ बच्चन ने आईआईएम, अहमदाबाद में एक व्याख्यान के दौरान बताया था कि उन्होंने सॉफ्ट ड्रिंक का विज्ञापन करना बंद कर दिया है। इसका कारण बताते हुए उन्होंने कहा कि जयपुर में उनसे एक लड़की ने पूछा था कि जिस सॉफ्ट ड्रिंक को उनकी टीचर ने 'जहर' बताया है, वह उसका विज्ञापन क्यों करते हैं? लड़की के सवाल पर अमिताभ बच्चन निरुत्तर हो गए। लेकिन इस घटना ने उन्हें सोचने को मजबूर कर दिया और इसके बाद उन्होंने सॉफ्ट ड्रिंक का विज्ञापन करना बंद कर दिया- 'लोगों के दिमाग में यह छवि थी...इसलिए मैंने पेप्सी को इंडॉर्स करना बंद कर दिया।' 





आप भी करें यह प्रयोग- अगर आपको हमारी बातों पर यकीन नहीं तो आप खुद घर पर एक छोटा सा प्रयोग करके देखें। कोक या पेप्सी की बोतल लाईए और उसमें थोड़ा सा दूध मिला दीजिए। इसे दो तीन घंटो के लिए ऐसे ही छोड़ दीजिए। दो-तीन घंटों के बाद आप देखेंगे की बोतल की तली में सफेद मोटी कीचड़ जैसी चीज़ जमा हो जाती है जबकि ऊपर विरल और हल्के रंग का पेय दिखने लगता है।साधारण भाषा में कहें तो ऐसा इसलिए होता है कि कोक में मौजूद फॉस्फोरिक एसिड दूध के कैल्शियम को बाहर निकाल देता है। सोचिए ऐसा ही हाल ज्यादा मात्रा में कोल्ड ड्रिंक्स पीने पर शरीर में मौजूद हड्डियों के कैल्शियम का भी होता है। आप इसके बारे में गूगल पर भी पढ़ सकते हैं।


क्या है विक्रम सम्वत और क्यों है भारतीय पंचांग अंग्रेजी कैलेण्डर से बेहतर ?



विक्रम संवत की शुरूआत उज्जैन के महाप्रतापी राजा विक्रमादित्य ने की थी। उन्होंने राजसत्ता संभालने का शुभारम्भ करने के लिए सृष्टि के पहले दिन अर्थात चैत्रा शुक्ल प्रतिपदा को चुना था। आज से 2069 वर्षों पूर्व वे उज्जैन की राजगद्दी पर बैठे थे और उस दिन की याद में उन्होंने अपने नाम पर विक्रम संवत चलाया था। यह संवत चन्द्रमा की गति (कला) पर आधरित है, इसलिए इसे चन्द्र वर्ष कहा जाता है।

इसे समझने से पहले भारतीय पंचांग को समझना आवश्यक है-


दिन, वार, महीना इत्यादि की जानकारी देने वाले अंग्रेजी कालपत्र को कैलेण्डर तथा भारतीय परम्परा वाले को कालपत्र को ‘पंचांग’ कहा जाता है। पंचांग आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक कालपत्र है। इसमें काल की गणना के पांच अंग हैं जिन्हें तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण कहा जाता है। इन पांच अंगों के आधार पर काल की गणना किये जाने के कारण भारतीय कैलेण्डर को ‘पंचांग’ नाम दिया गया है।

पंचांग न केवल अंग्रेजी कैलेण्डर के समान किसी दिन विशेष को दर्शाता है, बल्कि खगोलशास्त्र के आधार पर यह उस दिन के पूरे शुभ-अशुभ काल और योग को भी दर्शाता है। पंचांग में बारह मास के एक वर्ष के प्रत्येक दिन का हिसाब सूर्य और चन्द्र की गति पर निधरित किया गया है। इसके अनुसार प्रत्येक महीने में दो पक्ष (लगभग 15.15 दिनों के) होते हैं, जिन्हें शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष नाम दिया गया है और एक वर्ष में दो आयन (उत्तरायण और दक्षिणायण) होते हैं। इन्ही दो आयनों में 12 राशियाँ और 27 नक्षत्र भ्रमण करते हैं। भारतीय काल गणना में नववर्ष की शुरुआत प्रकृति के द्वारा मनाये जा रहे नववर्ष से होती है। फाल्गुन मास की समाप्ति के साथ पतझड़ का मौसम समाप्त हो जाता है और वसन्त ऋतु आरम्भ हो जाती है। नये वर्ष के आगमन पर प्रकृति भी सभी पेड़-पौधें को नये पत्ते, फूल और फलों से अलंकृत करती है। पशु-पक्षियों समेत सभी प्राणी भी नववर्षारम्भ पर नयी आशा और उत्साह के साथ अपने-अपने कार्यों में व्यस्त हो जाते हैं।

भारत में मुख्यतः सूर्य और चन्द्र की गति पर आधरित दो अलग-अलग प्रकार से की जाने वाली काल-गणनाएं प्रचलित है। इनके अलावा एक तीसरे प्रकार की काल गणना भी कहीं-कहीं पर की जाती है जो कि नक्षत्रों के आधार पर होती है। चन्द्रमा 27 नक्षत्रों में अपने भ्रमण का एक चक्र लगभग 27 दिनों में पूरा करता है। इसी आधर पर नक्षत्रामास लगभग 27 दिनों का ही होता है। लेकिन तीनो प्रकार की काल-गणना में 12 महिनों के नाम-चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ और फाल्गुन ही है। भारतीय कालगणना को समझने के लिए पंचांग के पांचों अंगों को जान लेना आवश्यक है-

तिथि- अंग्रेजी महीनों में सामान्यतः 1 से लेकर 30/31 तक की तिथि होती है लेकिन भारतीय पंचांग में 1 से 15 तक की तिथियां ही निर्धरित की गयी है। चन्द्रमा की कला पर आधरित ये तिथियां किसी भी दिन के अंक (क्ंजम) को दर्शाती हैं। ये तिथियां हैं- प्रतिपदा (पहला दिन), द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रायोदशी, चतुर्दशी और पूर्णिमा अथवा अमावस्या।

पक्ष और मास- इन पन्द्रह दिनों के समूह को ‘पक्ष’ कहा जाता है। चन्द्रमा जब बढ़ते क्रम में होता है, तब पंद्रहवें दिन पूर्णिमा आती है और उस पक्ष को ‘शुक्ल पक्ष’ कहा जाता है। और जब चन्द्रमा घटते क्रम में होता है, तब उसके पन्द्रहवें दिन अमावस्या आती है और वह ‘कृष्ण पक्ष’ कहलाता है। ये दोनों पक्ष मिलकर एक मास बनाते हैं।

वार- पंचांग का दूसरा अंग ‘वार’ है। रविवार, सोमवार, मंगलवार, बुधवार, गुरुवार (बृहस्पतिवार), शुक्रवार और शनिवार। ये सात दिन मिलकर एक सप्ताह बनाते हैं और इनमें से प्रत्येक दिन को ‘वार’ कहा जाता है।

हिन्दू पंचांग के द्वारा निर्धरित ये सात वार आज सम्पूर्ण विश्व में उसी दिन, उसी नाम और क्रम में स्वीकृत हैं। अब प्रश्न यह उठता है कि रविवार के बाद ही सोमवार और इसी क्रम में आगे मंगलवार, बुधवार आदि क्यों आते है? या फिर जिस दिन को भारत में भी रविवार कहा जाता है उसी दिन को सम्पूर्ण विश्व रविवार क्यों कहता है? उस दिन को कोई मंगलवार या सोमवार या फिर अपने-अपने धर्म के अनुसार किसी अन्य नाम से क्यों नही पुकारता? ऐसे प्रश्नों का सीधा सा उत्तर यह है कि प्राचीन भारतीय ज्योतिषशास्त्रियों ने ग्रहों के भ्रमण की स्थिति के आधार पर इन दिनों को नाम दिया है। यद्यपि यह गणना थोडी़ जटिल है, फिर भी में इसे सरल भाषा में समझा सकता है।

भारतीय ज्योतिष में काल (समय) की गणना सृष्टि के आरम्भ से की गयी है। सृष्टि के आरम्भ का सबसे पहला दिन चैत्र शुक्ल प्रतिपदा था और इसी दिन से हमारा नववर्ष आरम्भ होता है। आरम्भ के पहले दिन सभी ग्रह (सूर्य, चन्द्र, मंगल आदि) मेष राशि (पहली राशि) में थे और उस दिन जब पहला सूर्योदय हुआ था उसी समय से हमारी काल की गणना आरम्भ होती है। इसीलिए भारतीय काल-गणना में दिन आरम्भ सूर्योदय से माना गया है।

एक सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय के समय को ‘अहोरात्रा’ कहा जाता है,जिसका पहला भाग ‘दिन’ और दूसरा भाग ‘रात्रि’ कहलाता है। काल (समय) की गणना करने के लिए दिन और रात्रि के दोनों हिस्सों को 6.6 भागों में बांटा गया है। इस भाग को ‘लग्न’ कहते हैं। और लग्न के आधे भाग केा ‘होरा’ कहा जाता है। इस प्रकार एक
  ‘अहोरात्रा’ में 12 लग्न या फिर 24 ‘होरा’ बनते हैं। इस तरह एक ‘अहोरात्रा’ यानि एक दिन में कुल 24 ‘होरा’ होते हैं। इसी ‘होरा’ को अब घण्टा कहा जाता है। सृष्टि के आरम्भ के पहले दिन सूर्योदय के समय जो सबसे पहला होरा घण्टा आया, उस पहली होरा का स्वामी सूर्य बना था और उसके बाद आने वाली 6 होराओं के स्वामी क्रमशः शुक्र, बुध्, चन्द्रमा, शनि, बृहस्पति और मंगल बनते चले गये। इस प्रकार सूर्योदय से 7 घण्टों की समाप्ति के बाद फिर से उसी क्रम में सभी ग्रह आते जाते हैं। कहने का अर्थ यह है कि 8वीं होरा का स्वामी फिर से सूर्य बना और उसके बाद शुक्र, बुध् आदि ग्रह उसी क्रम में अगली-अगली होराओं के अधिपति बनते जाते हैं। इस क्रम में पहले दिन की 24वीं होरा (पहले दिन का अन्तिम घण्टा) का स्वामी बुध् बना। यहां पहला अहोरात्रा (एक पूरा दिन) समाप्त होता है। पहला दिन सूर्य की होरा से आरम्भ होने के कारण उस दिन को रविवार कहा गया। 24वीं होरा बीतने के बाद उपरोक्त क्रम से दूसरे दिन के प्रथम होरा (सूर्योदय के समय) का स्वामी चन्द्र बनता है। इसी प्रकार पहले दिन सूर्य से आरम्भ होने के बाद प्रत्येक अगले दिन की पहली होरा (घण्टे) के स्वामी क्रमशः चन्द्र, मंगल, बुध्, बृहस्पति, शुक्र और शनि बनते चले गये। यही क्रम आज भी जारी है। इसीलिए इन दिनों के नाम आज भी उस दिन को मिलने वाली पहली होरा के अधिपति (स्वामी) ग्रह के नाम पर जाने जाते हैं।

इस प्रकार वार के दिनों के नामों (रविवार,सोमवार आदि) की देन प्राचीन भारतीय ऋषियों की है। वारों के नाम सूर्योदय के समय पड़ने वाली पहली होरा के अधिपति ग्रह के नाम पर होने के कारण ही भारतीय परम्परा में दिन का आरम्भ सूर्योदय से माना जाता है न कि रात्रि के बारह बजे के बाद। इसका अर्थ यह है कि सूर्योदय से पहले यदि सोमवार है तो सूर्योदय के बाद मंगलवार हो जायेगा।


नक्षत्र- आकाश में विभिन्न आकार में दिखाई देने वाले तारों के समूह को नक्षत्रा कहते हैं। हमारे सौरमण्डल में इस प्रकार के 27 नक्षत्रा समूह हैं। इन में से प्रत्येक नक्षत्रा में चन्द्रमा लगभग एक दिन रहता है। ये 27 नक्षत्रा निम्नलिखित हैं- अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, आद्रा, पुर्नवसु, पुष्य, अश्लेषा, मघा, पूर्वा (फाल्गुन), उत्तरा (फाल्गुन), हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराध, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वा(आषाढ़), उत्तरा (आषाढ़), श्रवण, ध्निष्ठा, शतभिषा, पूर्वा (भाद्रपद), उत्तरा(भाद्रपद) और रेवती।

इन्ही 27 नक्षत्रों के नामों के आधार पर हिन्दू पंचांग में महीनों के नाम निर्धरित किये गये है। पूर्णिमा के दिन चंद्रमा जिस नक्षत्रा में रहता है, उसी नक्षत्रा के नाम के आधर पर उस महीने का नामकरण हुआ है।


योग- सूर्य और चन्द्र की विशेष दूरियों को योग कहते हैं। योग 27 होते हैं- विष्कुम्भ, प्रीति, आयुष्मान, सौभाग्य, शोभन, अतिगण्ड, सुकर्मा, घृति, शूल, गण्ड, वृद्धि, ध्रुव, व्याघात, हर्षण, वज्र, सिद्धि, व्यातीपात, वरीयान, परिघ, शिव, सिद्ध, साध्य, शुभ, शुक्ल, ब्रह्म, इन्द्र और वैधृति। इनमें से कुल 9 योगों विष्कुम्भ, अतिगण्ड, शूल, गण्ड, व्याघात, वज्र, व्यातिपात,परिघ और वैधृति को अशुभ माना जाता है और इन योगों में शुभ कार्य न करने की सलाह दी जाती है।


करण- एक तिथि के आधे भाग को करण कहते हैं। अर्थात एक तिथि में दो ‘करण’ होते हैं। जिन्हें ‘पूर्वार्ध करण’ (पहले का) और ‘उत्तरार्ध करण’ (बाद का) कहा जाता है। ‘करण’ सूर्य और चन्द्रमा के बीच की कोणात्मक दूरी है। यह दूरी प्रत्येक चरण में 6.6 डिग्री में बढती जाती है और यही दूरी (करण) किसी तिथि का निर्धारण करती है। करण 11 हैं- बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज, विष्टि, शकुनि, चतुष्पाद, नाग और किस्तुघ्न। इन 11 करणों में से अन्तिम 4 करण (शकुनि, चतुष्पाद, नाग और किस्तुघ्न) स्थिर हैं।

पंचांग के ये पांचों अंग मिलकर किसी एक दिन के स्वरूप का निर्धारण करते हैं। भारतीय पंचांग के अनुसार दिन की शुरुआत सूर्योदय से होती है। इसलिए तिथि की गणना भी उसी समय से होती है। इसका अर्थ यह है कि जिस तिथि को सूर्योदय नही मिलता, उस तिथि का क्षय माना जाता है। इसीलिये कभी-कभी किसी तिथि को दो बार सूर्योदय मिलने के कारण उस तिथि को दो बार मनाया जाता है और किसी तिथि को सूर्योदय न मिलने के कारण उस तिथि को छोड़ दिया जाता है।

“नौसेना की नियुक्ति, नौकरी नहीं बल्कि जीने का तरीका है... जिसमें आप साल के 365 दिन, 24 घंटे देश की सेवा के लिए तैयार रहते हैं.."...


 पंचकुला, हरियाणा के निवासी युवा रोहित मण्डरवाल भारतीय नौसेना की एक्जीक्यूटिव शाखा में सब लेफ्टिनेंट हैं और फिलहाल एझिमला, केरल में नियुक्त हैं। 23 साल के रोहित एक बेहद मेधावी छात्र रहे हैं। चंडीगढ़ इंजीनियरिंग कॉलेज से 78 फीसदी अंकों के साथ बीटेक उत्तीर्ण करने के बाद रोहित का सात मल्टीनेशनल कंपनियों में कैम्पस साक्षात्कार के जरिए चयन हुआ, लेकिन रोहित ने नौसेना में जाकर देशसेवा करने को प्राथमिकता दी। रोहित उन युवाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं जो सफल है, मेधावी हैं, काबिल हैं और जोश से भरे हुए हैं, जो देशसेवा को सर्वोपरि मानते हैं और जिनके लिए जिंदगी केवल काटने का नहीं बल्कि उसे बेहतर तरीके से और अपनी शर्तों पर जीने का नाम है। हमने रोहित की पढ़ाई, रुचियों से लेकर नौसेना जैसा जोखिम भरा प्रॉफेशन चुनने के बारे में बातें की और उन्होंने बेहद बेबाकी और सरल तरीके से अपनी बातें रखीं। आप भी पढ़िए जोश और आंखो में सपने संजोए इस युवा नेवी ऑफिसर के विचार-


अपनी रुचियों के बारे में कुछ बताईए।

मेरी इंजीनियरिंग में बहुत रुचि है। मुझे यह विषय बेहद पसंद हैं। बीटेक करने के बाद कैम्पस सलेक्शन में ही मेरा सात कंपनियों में सलेक्शन हो गया था जिनमें माइक्रोसॉफ्ट और विप्रो जैसी कंपनियां भी थी। मैंने कार्डिफ यूनिवर्सिटी, लंदन में रिसर्च के लिए भी आवेदन किया हुआ था जिसमें मेरा रीसर्च टॉपिक था- डेटा इन्ट्रूजन। वो लोग मेरे रीसर्च टॉपिक और मेरी सबजेक्ट नॉलेज से काफी प्रभावित हुए। उन्होंने मुझे सीधे ग्रेजूएशन के बाद ही रीसर्च स्कॉलर बनाने के लिए सिलेक्ट कर लिया था जो बहुत कम मामलों में होता है।


तो फिर आप रीसर्च छोड़कर नेवी में कैसे पहुंच गए?


दरअसल नेवी हमेशा से ही मेरी पसंद रही है। मेरे काफी रिश्तेदार सेना में रहे हैं और हैं भी। तो इसको लेकर हमेशा ही उत्साहित रहा। मैंने एसएसबी का एक्ज़ाम दिया था। जब उसमें पास हो गया और मेरा सलेक्शन नेवी में हो गया तो बस मैं सबकुछ भूल गया और मैंने नेवी जॉइन करने का फैसला कर लिया।

लेकिन यहां आपको अपने फेवरेट विषय में कुछ करने का मौका तो मिला ही नहीं होगा। आपकी रीसर्च तो रह गई?

ऐसा नहीं है। नेवी में भी रीसर्च करने के लिए काफी कुछ है। यह मेरी रुचि का क्षेत्र है तो मैं हर जगह अपने लिए मौके ढूंढ लेता हूं। यहां मैंने अकैडमी के कम्प्यूटर पर काफी काम किया। पहले हमारे यहां क्विज़ वगैरह कम्प्यूटर पर नहीं होते थे लेकिन मैंने जावा में एक प्रोग्राम बनाया और अब क्विज़ कम्प्यूटर पर होते हैं। स्कोरबोर्ड वगैरह भी मैंने विकसित किया। फिर अब मैं नेवी की एक्ज़ीक्यूटिव ब्रांच में हूं। जो प्रशासकीय शाखा है। यहां मुझे सबमैरीन को हैंडल करने का अवसर मिलेगा। जिसे मैं और बेहतर करने के लिए अपनी तरफ से कुछ इंजीनियरिंग एक्सपेरिमेन्ट्स और रीसर्च कर सकता हूं। तो मौके तो यहां भी हैं।

लेकिन नेवी ही क्यों। आप थलसेना या वायुसेना को भी तो चुन सकते थे?

जी हां बिल्कुल। लेकिन नेवी का महत्व बहुत ज्यादा है। केवल रक्षा के संबंध में ही नहीं बल्कि कूटनीतिक मामलों में भी नेवी की भूमिका बहुत अहम् है। आप जानती हैं कि चीन, भारत से जो अच्छे और दोस्ताना संबंध रखना चाहता है, उसकी क्या वजह है। दरअसल चीन के पेट्रोलियम पदार्थों का आयात अंगोला से जलमार्ग के द्वारा होता है। यह रास्ता हिंद महासागर से होकर गुज़रता है जो भारतीय नौसेना के प्रभुत्व का क्षेत्र है इसलिए चीन के सामान को वहां से गुज़रने के लिए भारतीय नौसेना की मदद चाहिए ही चाहिए। अगर कल को चीन के हमसे अच्छे संबंध नहीं रहे तो क्यों भारतीय नौसेना चीन की मदद करेगी...? नौसेना का सामरिक महत्व बहुत ज्यादा है, इसलिए यहां काम करने का रोमांच भी ज्यादा है। बस इसलिए नौसेना को चुना।


काफी समय से नेवी में लगातार हादसों की जो खबरें आ रही हैं उसके बाद तो यह एक जोखिम भरा क्षेत्र बन गया है। जहां युद्ध के बिना भी देश में ही पनडुब्बियों पर धमाकों या उनके डूबने के हादसे होते रहते हैं और युवा ऑफिसरों की जानें चली जाती हैं। ऐसे में क्या आपको नेवी जॉइन करते समय डर नहीं लगा। क्योंकि आप जिस शाखा में हैं उसमें रहते हुए आपको भी सबमैरीन्स पर जाना ही होगा


नहीं, बिल्कुल नहीं। नेवी को लेकर डर तो कभी भी नहीं था। हां यह ज़रूर है कि सुरक्षा को ध्यान में रखना ज़रूरी है। क्योंकि जब मैं सबमैरीन पर जाऊंगा तो मेरे ऊपर केवल मेरी ही नहीं, मेरे साथियों और मेरे साथ काम करने वाले अन्य सभी लोगों की सुरक्षा की जिम्मेदारी होगी। मेरा नंबर तो बहुत बाद में आता है, सबसे पहले मुझे उन लोगों की जान की परवाह करनी है जो मेरे साथ गए हैं। इसलिए सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा है। लेकिन इसके लिए हमारी नौसेना में लगातार प्रयास चल रहे हैं। काफी सारी पनडुब्बियां रीफिटिंग के लिए गई हुईं हैं। बहुत सारी चीज़ों को ठीक किए जाने के प्रयास चल रहे हैं। तो मुझे लगता है कि आगे यह परेशानी नहीं आएगी। और दूसरे अगर मुझे मालूम है कि किसी वैसल में कोई खराबी है या बीच समुद्र में जाकर वो परेशानी का सबब बन सकती है तो अपने साथियों की जान जोखिम में डालने से बेहतर मुझे यह लगेगा कि मैं अपने वरिष्ठ ऑफिसर्स को इससे अवगत कराऊं और उस वैसल की रिफिटिंग के लिए बात करूं। तो मैं ऐसा करने की कोशिश करूंगा। क्योंकि अगर एक भी सबमरीन हादसा होता है तो केवल देश के सैनिकों की जानें ही नहीं जाती, देश को आर्थिक नुकसान भी होता है, नौसेना की छवि भी खराब होती है। इसलिए मैं कोशिश करूंगा ऐसा ना हो।


लेकिन कई बार ऐसा होता है जब आपको सबकुछ जानते हुए भी, उसी वैसल पर जाना पड़ता है जो खतरनाक है, परिस्थितियां ऐसी बन जाती हैं। कोई सुरक्षा का मामला हो सकता है, तब आप क्या करेंगे।
देखिए नौसेना की नौकरी मेरे लिए नौकरी नहीं बल्कि जीने का तरीका है, जिंदगी का मकसद है जहां हमें साल के 365 दिन और चौबीसों घंटे देश की सेवा के लिए तैयार रहना पड़ता है। हमारा उद्देश्य यहीं है, हम निस्वार्थ सेवा करने में यकीन रखते हैं। तो कल को ऐसी परिस्थिति अगर आती है तो मैं हमेशा तैयार हूं। मैंने देश की रक्षा के लिए ही नौसेना जॉइन की है। और अगर सब लोग नौसेना की दुर्घटनाओं से डर कर पीछे हटने लगे तो नौसेना का तो अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। किसी ना किसी को तो यह करना ही पड़ेगा ना। और मैं कभी भी अपना कर्तव्य निभाने से नहीं चूकूंगा। और मैं ही क्या हमारी नौसेना में एक भी इंसान ऐसा नहीं जो ज़रूरत पड़ने पर पीछे हट जाए।


लेकिन इतने समय से स्कॉर्पीन डील भी तो अटकी हुई है। नौसेना उन्हीं पुरानी पनडुब्बियों से काम चला रहा है।

नहीं ऐसा नहीं है। स्कॉर्पीन डील हो चुकी है। 2016 तक वो स्कॉर्पीन पनडुब्बियां हमें मिल भी जाएंगी। बात यह है कि उनमें तॉरपीडो नहीं है और आधुनिक सोनार सिस्टम नहीं है जो यूएस प्रयोग करता है। हमारी अधिकतर पनडुब्बियां भी रूस रीफिटिंग के लिए गई हुईं हैं।

नौसेना की ऐसी हालत की वजह आप किसे मानते हैं?

देखिए दरअसल नौसेना में हायरआर्की बहुत ज्यादा होती है। अगर मान लीजिए कि अभी मुझे किसी चीज़ की ज़रूरत है तो मैं यहां से फाइल आगे बढ़ाऊंगा, उसके बाद वो हायरआर्की के सारे अफसरों से होती हुई मंत्रालय तक पहुंचेगी और फिर फंड सैंक्शन होगा। फंड आते-आते इतना समय लग जाता है कि बहुत सी परेशानियां सुलझ नहीं पाती। लगातार देरी होती जाती है। यहीं वजह है कि कई बार तो लोग यह सोचते है कि अगर मैं अभी बैटरी की डिमांड करूंगा तो उसकी फाइल आगे बढ़ते-बढ़ते और फंड आते-आते तो काफी वक्त लग जाएगा, इससे बेहतर इसी पुरानी बैटरी को ठीक करके काम चला लूं। इसलिए ऐसी परेशानी होती है। पर अब तो हालात काफी सुधर रहे हैं। निकट भविष्य में उम्मीद है कि सबकुछ अच्छा होगा।

आप अपनी तरफ से कुछ कहना चाहेंगे?

मैं अपनी तरफ से यहीं कहना चाहूंगा कि इन हालातों पर चिंता करने की नहीं बल्कि इनका हल ढूंढने की ज़रूरत है। हमें फंड की ज़रूरत है। एक बार हमें फंड सही समय पर मिलने लगेगा तो बहुत सारी परेशानियां खतम हो जाएंगी।

Friday, 19 September 2014

बिहार को मिला ‘मोहन भार्गव’ ......लंदन की जगमगाती जिदंगी और लाखों की नौकरी छोड़, अपने पिछड़े गांव को एक आदर्श गांव बनाने के लिए हिन्दुस्तान लौट आए आनंद


लेंकेस्टर यूनिवर्सिटी, लंदन में आनंद

रामपुर गांव के किसान आनंद

लंदन यूनिवर्सिटी के स्कॉलर से कटिहार के किसान तक और विदेश में बेफिक्र जिंदगी बसर करने से गांव में समेकित खेती करने तक एक व्यक्ति की जिंदगी में आमूल-चूल बदलाव की यह कहानी, सपनों के सफर कहानी है, ज़िद की कहानी है, जो चाहो उसे पाने की कहानी है...। हम आपके लिए लाए हैं बिहार के निवासी, आनंद चौधरी की दास्तान, जो असल जिंदगी में स्वदेस फिल्म के मोहन भार्गव को साकार कर रहे हैं। इन्होंने लंदन की लैकेंस्टर यूनिवर्सिटी से एमबीए किया और वहीं 15 लाख रुपए तन्ख्वाह की नौकरी कर रहे थे कि पिताजी के देहांत के कारण इन्हें भारत आना पड़ा। लेकिन जब आनंद ने यहां आकर अपने गांव का पिछड़ापन और खराब हालत देखी तो उन्होंने विदेश की नौकरी छोड़ अपने गांव के उत्थान के लिए काम करने का फैसला ले लिया। और अब आनंद अपने गांव को देश का पहला सर्व साधन संपन्न- पांच सितारा गांव बनाने में जुटे हैं...


अपने पिछड़े गांव की किस्मत बदलने निकला एक एमबीए किसान..

सीढ़ियां उन्हें मुबारक, जिन्हें छत तक जाना है, जिनकी मंज़िल आसमां है, उन्हें रास्ता खुद बनाना हैं... कटिहार, पटना के हसनगंज प्रखण्ड के गांव रामपुर निवासी आनंद चौधरी की मंजिल आसमां ही है। अपने छोटे से गांव को- जहां एक स्वास्थ्य केन्द्र और अच्छी शिक्षा प्रदान करने वाले स्कूल तक नहीं है, फाइव स्टार विलेज बनाने का सपना देखना आसमां को पाने की कोशिश करने जैसा ही है। लेकिन आनंद की ज़िद है कि वो इस सपने को पूरा करेंगे। वो कहते हैं कि अगले दो सालों में इस गांव में एक अच्छा अस्पताल होगा, एक ग्रामीण बिक्री केन्द्र या आम भाषा में कहें तो रूरल शॉपिंग कॉम्प्लेक्स होगा, जिम होगा, किसान विकास केन्द्र होगा, विश्व स्तर की पुस्तकों से परिपूर्ण पुस्तकालय होगा और अच्छी इंटरनेट कनेक्टिविटी युक्त साइबर कैफे होगा जिससे यहां के लोग दुनिया से जुड़ सकें। आनंद का सपना हैं कि रामपुर देश के सभी गांवों में सबसे ज्यादा प्रति व्यक्ति आय रखने वाला गांव बने, हिन्दुस्तान के लिए एक मॉडल गांव बने और वो हर हालत में इस सपने को हकीकत बनाने के लिए पूरी मेहनत और जोश से लगे हुए हैं।



32 साल के आनंद चौधरी के सपनों की कहानी शुरू होती है जनवरी 2012 से। लंदन की लैकेंस्टर यूनिवर्सिटी से एमबीए करने के बाद आनंद वहीं एक कंपनी में मोटी तन्ख्वाह पर एच आर मैनेजर के तौर पर काम कर रहे थे कि पिता की आकस्मिक मृत्यू के कारण आनंद को 31 जनवरी 2012 को अपने गांव रामपुर आना पड़ा। लेकिन जब यहां प्रवास के दौरान आनंद ने गांव की बदहाली, गरीबी और पिछड़ापन देखा तो उन्हें लैकेंस्टर यूनिवर्सिटी में अध्ययन के दौरान पढ़े गए गरीबी उत्थान बिजनिस मॉडल की याद आई और गांव का यह हाल उन्हें चुनौती की तरह लगने लगा। अचानक से ही आनंद ने निर्णय ले लिया कि अब वो किताबी पढ़ाई को प्रैक्टिकल जिंदगी में अपनाकर अपने गांव के उत्थान और खुशहाली के लिए काम करेंगे। एक बार मन बना लेने के बाद आनंद वापस नहीं गए और उन्होंने वहीं से अपना इस्तीफा कंपनी को भेज दिया। आनंद के दोनों बड़े भाईयों ने भी आनंद को प्रोत्साहित किया लेकिन उन्हें सबसे ज्यादा सहयोग अपनी मां स्वर्गीय श्रीमती सुधा रानी सिन्हा से मिला जिन्होंने ना केवल आनंद के इस फैसले को सराहा बल्कि हर कदम पर उनका साथ दिया। और अब पिछले दो सालों में अपनी कोशिशों से आनंद इस गांव के लिए प्रगति का द्वार खोल चुके हैं। उन्होंने यहां एक हाई डेन्सिटी आमों का बागीचा और एक एकड़ ज़मीन बनवाए गए तालाब पर मत्स्यपालन शुरू करके लगभग 20 बेरोजगार युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराया है। आगे भी आनंद की जो योजनाएं हैं, जो उनका बिजनिस मॉडल है, उसके लागू और पूरा होने के बाद यह गांव एक आदर्श गांव होगा।


ऐसा है आनंद के बिजनिस मॉडल का स्वरूप जिसके ज़रिए होगा रामपुर का सम्पूर्ण विकास- 

रामपुर गांव को पांच सितारा गांव बनाने के लिए आनंद ने जो पांच वर्षीय बिजनिस मॉडल विकसित किया है। उसके बारे में बात करते हुए आनंद बताते हैं- “मेरे पास मेरी लगभग 30 एकड़ ज़मीन थी, मेरा अनुभव था, मेरी स्किल्स थीं, लंदन में काम के दौरान कमाई हुई राशि थी और अपने सपने के प्रति दीवानगी थी। मैंने उपलब्ध साधनों, अपनी क्षमताओं, समझ और अनुभव को ध्यान में रखकर एक बिजनिस मॉडल तैयार किया है,जिसके अंतर्गत पांच साल में गांव का पूरा विकास हो जाएगा”। आनंद के इस बिजनिस मॉडल के तीन चरण हैं-

पहला चरण- समेकित खेती से लगाया गया आमों का बागीचा- 


आनंद ने 8 हेक्टेयर की ज़मीन पर सफेदा मालदह आमों का बागीचा लगाया है। यह बागीचा पूरी तरह से वैज्ञानिक तरीके से लगाया गया है। इसमें 3,200 आम के पौधे लगाए गए हैं, जिन्हें राष्ट्रीय बागवानी मिशन के सहयोग से लगाया गया है। राष्ट्रीय सघन बागवानी मिशन के अंर्तगत लगाए गए इस बागीचे की शुरूआत 3 मई से हुई। सबसे पहले यहां जेसीबी से 3200 के लगभग गढ्ढे करवाए गए और उसके बाद उन्हें एक महीने के लिए ऐसे ही छोड़ दिया गया जिससे ज़मीन के कीड़े मकौड़े और खरपतवार खुद-ब-खुद मर जाएं। लगभग डेढ़ महीने बाद उन्होंने इन गढ्ढों को 35 से 40 किलो सड़े हुए गोबर से भरवाया। इन गढ्ढों को बन्द करने के बाद दो बारिश तक उन्हें ऐसे ही छोड़ दिया गया और इसके बाद कृषि विश्वविद्यालय से आनंद ने इकट्ठे 32,00 आम के पौधे मंगाए और उन्हें ज़मीन में रोप दिया। आनंद का यह हाई डेन्सिटी ऑर्चर्ड तीन सालों में अवधि में पूरी तरह तैयार हो जाएगा जिनमें से दो साल बीत चुके हैं। इस बागीचे के तैयार होने पर बढ़िया आमों की जो उपज होगी उसे देश भर में और बाहर भी भेजा जा सकेगा जिससे गांव में पैसा आएगा और रोजगार के अवसर भी उत्पन्न होंगे।

दूसरा चरण- एक एकड़ में मत्स्यपालन 

रामपुर में एक पोखर है जिसे मत्स्यपालन के लिए एक बड़े और साफ सुथरे तालाब के रूप में तब्दील किया जाना है ताकि उसमें मछलियां पाली जा सकें। इसकी शुरूआत भी आनंद कर चुके हैं। फिलहाल छोटे स्तर पर मत्स्यपालन उद्योग का काम चल रहा है लेकिन आनंद चाहते हैं कि इसे बड़े स्तर पर किया जाए। इससे रामपुर में एक उद्योग विकसित होगा। 

तीसरा चरण-रूरल मार्केटिंग कॉम्प्लेक्स या ग्रामीण मॉल 

आनंद चाहते हैं कि जिस तरह मेट्रो शहरों में मॉल्स या बड़े शॉपिंग कॉम्प्लेक्स होते हैं उसी तरह इस गांव में भी एक सर्व सुविधा सम्पन्न ग्रामीण खरीद-फरोख्त केन्द्र हो जिसमें ग्रामीणों की खरीद क्षमता के अनुसार हर तरह का सामान उपलब्ध हो और वो अपना सामान विक्रय भी कर सकें।

सुधा रानी सिन्हा फाउंडेशन के जरिए कर रहे है गांव की शिक्षा और स्वास्थ्य की दिशा में काम 

हांलाकि आनंद यह साफ शब्दों में कहते हैं कि वो समाज सेवी नहीं बल्कि एक अर्थशास्त्री, एक बिजनिसमेन हैं लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि वो स्थानीय बच्चों को शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करने और ग्रामवासियों के
अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने की दिशा में भी उल्लेखनीय काम कर रहे हैं। इसके लिए उन्होंने अपनी मां स्वर्गीय प्रोफेसर सुधा रानी सिन्हा- जो कि एन सिन्हा संस्थान, पटना में मनोविज्ञान विभाग की विभागाध्यक्ष व रीडर थी, के नाम से एक फाउंडेशन शुरु की है।

अस्पताल का निर्माण- इस फाउंडेशन की राशि से आनंद गांव में एक अस्पताल का निर्माण करवा रहे हैं जो अगले दो सालों में बन कर तैयार हो जाएगा। आनंद कहते हैं कि इस अस्पताल में सारी सुविधाएं वो अपने पैसों से देंगे, ज़रूरी लाइसेंस और कागज़ी प्रक्रिया भी वहीं पूरी करेंगे। स्थानीय प्रशासन और राज्य सरकार से केवल वो इतनी मदद की दरकार रखते हैं कि वहां अच्छे डॉक्टरों की नियुक्ति में वो उन्हें सहायता दें। इस अस्पताल के निर्माण के बाद गांववालों को इलाज के लिए शहर नहीं जाना पड़ेगा बल्कि दूसरे गांव के लोग भी यहां इलाज के लिए आएंगे।

प्रतिभाशाली बच्चों के प्रोत्साहन के लिए नकद पुरस्कार- 

गांव में बच्चों को पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित करने के लिए भी आनंद ने योजना बनाई है जिसके तहत वो हर साल आठवी कक्षा में सबसे ज्यादा अंक लाने वाली छात्रा को 2100 रुपए का नकद पुरस्कार और छात्र को 1100 रुपए का नकद पुरस्कार देते हैं। हाईस्कूल में सबसे ज्यादा अंक लाने वाले छात्र या छात्रा को भी सुधा रानी फाउंडेशन की तरफ से 5100 रुपए का नकद पुरस्कार दिया जाता है।

किसान विकास केन्द्र- आनंद की योजनाओं में किसान विकास केन्द्र खोलना भी शामिल हैं जहां किसान अपनी समस्याओं का समाधान पाएंगे।

आनंद जो कुछ भी कर रहे हैं वो अपने साधनों, अपनी सोच, अपने पैसों, अपनी समझ और हुनर के बलबूते कर रहे हैं। जब हमने उनसे पूछा कि क्या उन्हें अब तक अपने इन्वेस्टमेन्ट के रिटर्न्स मिलने शुरू हुए हैं तो उनका जवाब था कि- मेरे प्रोजेक्ट्स को कमर्शियली वाइबल होने में पांच साल लगने हैं जिनमें से दो साल बीत चुके हैं। अपने रिटर्न्स के लिए मुझे तीन साल और इंतज़ार करना है जिसके लिए मैं तैयार हूं क्योंकि एक बार जब यह प्रोजेक्ट पूरे होंगे तो इस गांव में खुशहाली आएगी, रोजगार बढ़ेगा और शायद और भी गांव मेरे इस सफल बिजनिस मॉडल को अपनाना चाहें। यह चुनौती मेरे खुद के लिए हैं और मैं इसको पूरा करूंगा।”

खुद को सामाजिक उद्यमी (सोशल ऑन्ट्रीप्रिन्योर) कहने वाले आनंद कहते हैं कि “मेरी वजह से अगर लोगों को रोजगार मिला, मैं अपनी कोशिशों से अगर 50 लोगों की जिंदगी भी बेहतर बना पाया तो यह मेरी बड़ी सफलता होगी। मैं यह साबित करना चाहता हूं कि अगर आप वाकई चाहे तो कुछ भी मुश्किल नहीं। अगर मैं अकेला इंसान अपनी कोशिशों से एक गांव को बिहार का सर्वश्रेष्ठ गांव, देश का मॉडल गांव बना सकता हूं, जो कि मैं करके रहूंगा तो बाकी लोग भी ऐसा कर सकते हैं”।


कितने शिक्षित हैं आनंद 

2005 में एएन कॉलेज पटना (मनोविज्ञान) से ग्रेजुएट

2007 में आईआईएमसी, दिल्ली से जर्नलिज्म का कोर्स

2010 में लैंकेस्टर यूनिवर्सिटी, इंग्लैंड से एमबीए

जनवरी 2012 तक इक्विटी प्वॉइंट लंदन में एच आर मैनेजर रहे (पैकेज- 15 लाख)

फिलहाल- एक सोशल ऑन्ट्रिप्रिन्योर एवं रामपुर गांव के किसान

Wednesday, 17 September 2014

झारखंड की एक लड़की का विवाह कुत्ते से कराया गया, ताकि उसके ऊपर से बुरी आत्मा का साया टल जाए



हमारे देश में एक कहावत है कि हर कुत्ते के दिन फिरते हैं... लेकिन सच तो यह है कि इस कहावत को कहने वाले ने भी नहीं सोचा होगा कि किसी कुत्ते के दिन इस कदर फिर सकते हैं जैसे कि झारखंड के इस लावारिस कुत्ते शेरू के फिर गए.. जी हां शेरू के दिन ऐसे फिरे हैं कि कि उसे 18 साल की सुंदर मंगली मुन्डा नाम की कन्या दुल्हन के रूप में मिल गई है...।

यह कोई मज़ाक की बात नहीं है, अगर आपको भरोसा ना हो तस्वीरें और वीडियो देखिए।



दरअसल झारखंड के सुदूर पूर्वी इलाके में बसे एक गांव की निवासी 18 साल की मंगली मुंडा ने शेरू से इसलिए शादी की है ताकि उसके ऊपर से बुरी आत्मा का साया टल जाए। गांव के ही एक गुरू ने मंगली के पिता को बताया था कि मंगली जिससे भी शादी करेगी वो अल्पायु होगा और उसकी शादी के कारण गांववासियों पर  मुसीबत आ सकती है क्योंकि मंगली के ऊपर बुरा साया है।

इसी गुरु ने मंगली के पिता को सलाह दी थी कि अगर उसका विवाह किसी कुत्ते के साथ कर दिया जाए तो बुरा प्रभाव इस कुत्ते में चला जाएगा और गांव एवं मंगली की विपत्ति टल जाएगी।



गुरू की बात मानते हुए मंगली के पिता अम्नुमुंडा उसके लिए एक स़ड़क का ही एक कुत्ता चुनकर लाए। शेरू नाम के इस कुत्ते को दूल्हे की तरह सजाया गया और पूरे सम्मान के साथ बाकायदा कार में शादी समारोह के स्थान पर लाया गया जहां पूरे रीति-रिवाज और अच्छे खासे खर्च में मंगली और शेरू की शादी सम्पन्न करायी गई। इस अवसर पर गांव की महिलाओं ने मंगलगान गाकर दूल्हे शेरू का स्वागत किया। शादी में गांव भर से लगभग 70 मेहमान भी पहुंचे जिनके लिए भोज का प्रबंध भी किया गया था।





अब मंगली शेरू की विधिवत पत्नी बन चुकी हैं। उन्हें पांच महीने तक शेरू का ख्याल रखना होगा, उसके बाद वो बिना शेरू को तलाक दिए किसी अन्य लड़के से शादी कर सकती हैं।



मंगली कहती हैं कि वो इस शादी से खुश नहीं हैं लेकिन उन्होंने यह शादी केवल इसलिए की है ताकि उनके और गांव के ऊपर कोई परेशानी ना आए। इस
रिवाज के पूरा हो जाने के बाद वो अपनी पसंद के लड़के से शादी कर सकती हैं और उनकी जिंदगी खुशी से गुजरेगी।
हम आपको बता दें कि कुत्ते से शादी करने वाली मंगली पहली लड़की नहीं हैं। मंगली के अनुसार उनके और आस पास के गांवों में अन्य लड़कियों ने भी इस तरह कुत्तों से शादी की है और अब वो अपने परिवार द्वारा चुने हुए लड़के से शादी करके सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर रही हैं।  






Tuesday, 16 September 2014

दशकों से कब्रों में सो रहे इन मुर्दों को इनकी कब्रों से निकाल कर सामूहिक कब्र में फेंका गया, केवल इसलिए कि कब्र का मोटा किराया भरने के लिए इनके रिश्तेदारों के पास पैसे नहीं थे...



यह कोई मल्टीफ्लोर सोसाइटी से झांकती बालकनियां नहीं बल्कि ग्वाटेमाला शहर का जनरल कब्रिस्तान है जहां एक के ऊपर एक कई मंजिलनुमा अंदाज में कब्रे हैं। यह कब्रें एक के ऊपर एक बने छोटे-छोटे तलघरों या तहखानों मे हैं जिन्हें अंग्रेजी में क्रिप्ट कहते हैं। इस तस्वीर में कब्रिस्तान के ऊपर जो गिद्ध मंडराता हुआ दिख रहा है, उसकी वजह है, खाने की तलाश... अगर आप यह सोच रहे हैें कि कब्रिस्तान में पत्थरों के अंदर बंद कब्रों से गिद्ध को खाना कैसे मुहैया हो सकता है, तो हम आपको बता दें, कि बिल्कुल हो सकता है। बल्कि ग्वाटेमाला के जनरल कब्रिस्तान में तो अक्सर गिद्ध मंडराते रहते हैं क्योंकि उन्हें यहां अक्सर खाना मुहैया होता रहता है।



जिस तरह सोसाइटी के घरों में रहने वाले लोगों को मकानों का किराया भरना पड़ता है ठीक उसी तरह मरने के बाद इन सोसाइटीनुमा तंग कब्रों में रहने के लिए भी मृत लोगों के रिश्तेदारों को यह कब्रें लीज़ पर लेनी पड़ती हैं और साल दर साल उनका मोटा किराया चुकाना होता है। कई बार तो लोग मरने से पहले अपनी कब्रों के लिए पैसों का इंतज़ाम करके रख कर जाते हैं।
और जैसे ही किसी कब्र की लीज़ खत्म होती है या किराया आना बंद होता है, ग्वाटेमाला के जनरल कब्रिस्तान में कार्यरत ग्रेव क्लीनर्स अपने हथौड़े लेकर संबंधित कब्र पर पहुंच जाते हैं। कब्र तोड़ कर उसमें से ताबूत निकाल लिया जाता है और वो जगह किसी नए पैसे वाले ग्राहक के लिए खाली कर दी जाती है।
उपरोक्त तस्वीर में ऐसा ही हो रहा है। लीज खत्म होने के बाद, ग्रेव क्लीनर एक कब्र को तोड़कर उसके पुराने रहवासी को निकालकर नए के लिए जगह बना रहा है।



और देशों का हाल क्या है यह तो मालूम नहीं, लेकिन डेली मेल और रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक कम से कम ग्वाटेमाला में तो आपको निजी कब्र तभी हासिल होती है जबकि पास आपके रिश्तेदारों के पास कब्र का किराया भरने के लिए पैसे हों। अगर आपके पास पैसे नहीं तो मरने के बाद भी आपको निजता हासिल नहीं होगी बल्कि आपकी मंजिल होगी सामूहिक कब्र।
इस तस्वीर में आप देख सकते हैं कि किस तरह लीज़ खत्म होने के बाद एक अन्य कब्र को तोड़ा जा रहा है।



ग्रेव क्लीनर्स कब्र को खोदकर उसमें से सड़े-गले शव, हड्डियां और बाकी सारा सामान निकाल देते हैं। यहां एक नवजात बच्चे की कब्र को खोदकर उसमें से सफेद ताबूत निकाला गया है।



एक अन्य ग्रेव क्लीनर एक ज़मीदोंज कब्र को खाली कर रहा है। जगह कम होने के कारण कई बार पहले भी खाली होने वाली कब्र के लिए बुकिंग कर ली जाती है।



कब्र से निकले ताबूतों में से विघटित हो चुकी लाश निकाल कर अलग कर ली जाती है और फिर उसे अलग प्लास्टिक के बैग में भर लिया जाता है। नीचे की कब्रों में दफनाई गई लाशें तो कई बार पूरी तरह अपघटित हो जाती हैं लेकिन ऊपर की मंजिलों में दफनाई गई लाशें धूप और नमी नहीं मिलने के कारण ममी में बदल जाती हैं। उनका विघटन नहीं होता, जैसे कि यह खोपड़ी जिसपर कि बाल भी दिख रहे हैं।



निकाले गए सड़े गले शवों को प्लास्टिक के थैलों में भरकर उस पर संबंधित जानकारी लिख दी जाती है जैसे कि मृत व्यक्ति का नाम, मौत का वर्ष, लिंग और जिस कब्र में वो दफनाया गया था उसका कोड आदि। यह सब जानकारी भी केवल इसलिए रखी जाती है ताकि अगर बाद में कोई रिश्तेदार मृत शरीर को दाह संस्कार या किसी और वजह से मांगना चाहे तो पैसे लेकर उसे वो दिया जा सके।



यहां एक ग्रेव क्लीनर एक ममी में बदल चुकी लाश को प्लास्टिक की थैली में भर रहा है। इन ग्रेव क्लीनर्स को कब्र साफ करने के लिए मास्क, दस्ताने और हथोड़े दिए जाते हैं लेेकिन कई बार ये इस काम के इतने अभ्यस्त हो चुके होते हैं कि इन्हें ना तो घिन आती है और ना ही कोई दुर्गंध महसूस होती है और बिना मास्क और दस्तानों के ही मशीनी अंदाज में इन लाशों को निकालने और प्लास्टिक थैलों में भरने का काम करते हैं।



निकाली गई लाशों को पॉलीथीन बैग्स में भरकर बिल्कुल कूड़े के ढेरों की तरह एक के ऊपर एक ट्रक में फेंक दिया जाता है, जहां से यह ट्रक इन्हें सामूहिक कब्र में दफन करने के लिए ले जाते हैं। लाशों को कब्रों और ताबूतों से निकालने की प्रक्रिया में कई बार लाशें टूट जाती हैं, बिखर जाती हैं और जगह जगह मांस, खाल हड्डियां आदि बिखर जाते हैं जिसके चलते यहां मंडराते गिद्धों को खाना मिल जाता है।



कई बार ज़मीन पर बिखरी लाशों को यह ट्रक बिना किसी सम्मान के किसी कूड़े की तरह ही इस तरह उठाकर ले जाते हैं।



यहां ग्रेव क्लीनर्स बिल्कुल इस तरह काम करते हैं जैसे कि वो कब्रों के साथ नहीं बल्कि किसी निर्माण स्थल या रीसाइक्लिंग साइट पर काम कर रहे हों। यहां ट्रक के इंतज़ार में थैलियों में भरी हुई लाशें देखी जा सकती हैं।



यहां ग्वाटेमाला ग्रेवयार्ड के पास लाशें पड़ी हैं और ऊपर खड़े हैं ग्रेव क्लीनर्स। इन ग्रेव क्लीनर्स को यहां सभी उपनामों से जानते हैं जैसे कोको,चकी, लोको, विको और नीग्रो।



कब्रों को खोद कर निकालने, उन्हें पैक करने और सामूहिक कब्र तक ले जाने के काम में इन्हें प्रति कब्र के हिसाब से काफी कम मजदूरी मिलती है। यह काम इन्हें अच्छा नहीं लगता लेकिन फिर भी करते हैं क्योंकि पैसे कमाने का यहीं एक ज़रिया इनके पास है। वैसे एक बात और भी है, नीग्रो के अनुसार अब उन्हें यहां काम करते हुए डर नहीं लगता क्योंकि उन्हें मालूम है कि मृत आत्माएंं उनकी रक्षा करेंगी।



इस तस्वीर में ग्रेव क्लीनर थैलियों में भरी लाशों को सामूहिक कब्र में डालने ले जा रहा है जहां इन शवों को इन्हीं के जैसे हज़ारों अजनबी लाशों के बीच डाल दिया जाएगा।



तीस मीटर गहरी सामूहिक कब्र को ताला लगाकर रखा जाता है क्योंकि कई बार तांत्रिक वगैरह जादू-टोने के लिए यहां से हड्डियां निकाल कर ले जाते हैं। हर लाश एक अलग लेबल्ड पॉलिथीन में होती है ताकि बाद में अगर रिश्तेदार संबंधित लाश लेना चाहे तो उसे ढूंढ कर निकाला जा सके।



शवों को हटाने के बाद बचे टूटे-फूटे ताबुतों को कब्रिस्तान के पास ही कूड़े और टूटी फूटी लकड़ियों के ढेर पर डाल दिया जाता है। वो सभी बची हुई चीज़े जो कि रिश्तेदारों को चाहिए उन्हें एक छोटे डिब्बे में भर कर कब्रिस्तान के एक कमरे में जमा करवा दिया जाता है।

ग्वाटेमाला की यह रिपोर्ट जितनी चौंकाने वाली है उससे भी ज्यादा दुखद और इस कड़वी सच्चाई का अहसास कराने वाली है कि अगर आपके पास पैसे नहीं हैं तो मरने के बाद भी आपकी निजता का हनन होना तय है। मरने के बाद आपके मृत शरीर को भी एक वस्तु की तरह ही प्रयोग किया जाएगा। हो सकता है मरने के बाद भी आपको चैन ना नसीब हो बल्कि आपका अंजाम हज़ारो अनजान मुर्दों के नीचे दबी एक प्लास्टिक की थैली में भरी टूटी-फूटी लाश के रूप में हो...


सभी फोटो-रॉयटर्स
स्त्रोत-
http://www.dailymail.co.uk/news/article-2756622/Mummified-corpses-plastic-bags-filled-decomposed-remains-Guatemalan-grave-cleaners-remove-dead-no-longer-afford-crypts.html

http://widerimage.reuters.com/story/reburying-the-dead

बचपन की कविताएं... किसी कविता से जुड़ी कहानी, किसी कविता से जुड़ी रीत, किसी कविता से जुड़ी प्रीत... खो ना जाएं कहीं, इसलिए संजो कर रख ली हैं... :-)


बचपन की कविताएं ऐसी ही होती हैं, जिनमें कहीं तीर होता है और कहीं तुक्का। कहीं कोई भी शब्द, लय या तान अपने आप आकर जुड़ जाती है। यह कविताएं हमें अपने बड़ो से मिली, उन्हें उनके बड़ों से और उन्हें उनके बड़ो से.. और पता नहीं कहां से हमारे बच्चे भी इन्हें खूब सीखते और गाते हैं। किसी किसी कविता में तो शब्दों का भी कोई मेल नहीं, कोई मतलब नहीं बनता.. बस फिर भी लय है, ताल है और मस्ती है... मतलब से मतलब भी किसे है.. इन्हें बोलने और गाने का आनंद ही सबसे बड़ी चीज़ है...



 बचपन की गाड़ी वाली कविता

पान बीड़ी सिगरेट, गाड़ी आई लेट
गाड़ी ने दी सीटी, दो मरे टीटी,
टीटी ने दिया तार, दो मरे थानेदार,
थानेदार ने दी अर्जी, दो मरे दर्जी,
दर्जी ने सिला सूट, दो मरे ऊंट,
ऊंट ने पिया पानी, दो मर गए राजा और रानी..
और खतम हुई कहानी...

(जब बच्चे कहानी सुनने की बहुत जिद किया करते थे, तो अक्सर उन्हें यह कविता दादियां या नानियां सुना दिया करती थीं। )




मोटू पेट

मोटू पेट, सड़क पर लेट,
आ गई गाड़ी,फट गया पेट,
गाड़ी का नंबर एक सौ एक,
गाड़ी पहुंची इंडिया गेट,
इंडिया गेट से आई आवाज़,
चाचा नेहरू जिन्दाबाद

(शायद हमारी पाठ्य पुस्तक का हिस्सा थी यह कविता। बड़ी मजेदार..)






टेसू- झांझी के गीत


अब तो बाज़ारों में टेसू आने ही बन्द हो गए हैं वरना पहले टेसू झांझी का त्यौहार खूब मना करता था। महानवमी से शुरू होकर पूर्णिमा पर टेसू और झांझी के विवाह के बाद इस त्योहार का समापन हुआ करता था। कहते हैं कि तीन टांग पर खड़े होकर टेसू ने महाभारत का पूरा युद्ध देखा था। वो बहुत बड़ा दानवीर और योद्धा था। खाटूश्याम जी के मंदिर में टेसू की भी पूजा होती है। शायद महाभारत काल से ही टेसू और झांझी का त्यौहार मनाने की परम्परा चली आ रही है। टेसू के ये गीत पहले खूब प्रचलित थे...


-मेरा टेसू यहीं अड़ा, खाने को मांगे दही बड़ा
दही बड़े में मिर्चे बहुत, मेरे टेसू के नखरे बहुत

-टेसू राजा बीच बाजार, खड़े हुए ले रहे अनार
एक अनार में कितने दाने, जितने कम्बल में है खाने।
कम्बल में है कितने खाने, भेड़ भला क्यों लगी बताने।
एक झुंड में भेड़ें कितनी, एक पेड़ पर पत्ते जितनी।
एक पेड़ पर कितने पत्ते, जितने गोपी के घर लत्ते।
गोपी के घर लत्ते कितने, कलकत्ते में कुत्ते जितने...
एक लाख बीस हज़ार, दाने वाला एक अनार..
टेसू राजा कहे पुकार, लाओ मुझको दे दो चार।

-टेसू रे टेसू घंटार बजईयो,
दस नगरी सौ गांव बसईयो
बस गई नगरी बस गए मोर..
बूढ़ी डुकरिया ले गए चोर.
चोरन के घर खेती भई
खाय डुकरिया मोटी भई।
मोटी हैके पीहर गई।
पीहर में मिले भाई- भौजाई।
सबने मिलकर दई बधाई


ताली वाला गेम


पता नहीं इसकी शुरूआत कब और कैसे हुई, लेकिन आज भी कहीं दो बच्चे आपको लय में एक दूसरे के साथ ताली बजाते और इस गेम को खेलते मिल जाएंगे। इसकी कविता बड़ी अलग है...भानुमती के पिटारे जैसी.. जिसमें हिरन है, धागा है, पत्ते हैं, रसमलाई है, नानी है और समोसे भी...


आओ मिलो, शीलो शालो,
कच्चा धागा, रेस लगा लो।
दस पत्ते तोड़े, एक पत्ता कच्चा।
हिरन का बच्चा,
हिरन गया पानी में,
पकड़ा उसकी नानी ने,
नानी को मनाएंगे,
रसमलाई खाएंगे।
रसमलाई अच्छी,
उसमें से निकली मच्छी।
मच्छी में कांटा।
तेरा मेरा चांटा।
चांटा पड़ा ज़ोर से,
सबने खाए समोसे।
समोसे बड़े अच्छे,
नानाजी नमस्ते...।








अक्कड़ बक्कड़ बम्बे बो

अक्कड़ बक्कड़ बम्बे बो
अस्सी नब्बे पूरे सौ
सौ में लगा धागा
चोर निकल के भागा














पट्टी सुखाने वाली कविता

हमारे मम्मी पापा, दादा-दादी के समय में कॉपी किताबों पर नहीं बल्कि लकड़ी की पट्टियों पर पढ़ाई करवाई जाती थी। स्लेट से कुछ अलग इन पट्टियों पर खड़िया से लिखा जाता था और फिर इस लिखे को मिटाने के लिए गीले कपड़े से पोंछते थे। जब पट्टी गीली हो जाती थी तो सारे बच्चे मिलकर उसे धूप में सुखाते थे और यह कविता गाते थे...

राजा आया, महल चिनाया

महल के ऊपर झंडा गड़वाया
झंडा गया टूट, राजा गया रूठ
सूख सूख पट्टी, चंदन गट्टी
झंडा फिर लगाएंगे, राजा को मनाएंगे।






गिनती सिखाने वाली कविता

 जैसे आज के बच्चों को गिनती सिखाने के लिए 'वन टू बक्कल माई शू' जैसी अंग्रेजी कविताएं हैं, वैसे ही पहले लोग एक से दस तक की गिनती ऐसी कविताओं से सीखा करते थे..


एक बड़े राजे का बेटा,
दो दिन से भूखा लेटा
तीन महात्मा सुनकर आए
चार दवा की पुड़िया लाए
पांच मिनट में गरम कराए
छै-छै घंटे बाद पिलाए
सात मिनट में नैना खोले
आठ मिनट नानी से बोले,
नौ मिनट में उठकर आए
दस मिनट में ऊधम मचाएं..





और अंत में सबको चिढ़ाने वाली यह कविता... सबने गाई होगी और अभी भी गाते होंगे...



बदतमीज, 
खद्दर की कमीज
लट्ठे का पजामा, 
बंदर तेरा मामा..


अगर आपको भी बचपन की ऐसी मजेदार कविताएं याद हैं तो शेयर करें :-)