Friday, 18 October 2013

सकारात्मक सोच, ऊंचे सपनों और बुलंद हौसलों का नाम है "मलाला"


अब तक कई बार मलाला का नाम सुना था लेकिन कभी ठीक से जानने की कोशिश नहीं की कि क्यों मलाला युसुफज़ई इतनी मशहूर हो गई, क्यों दुनिया भर में लोग उसकी ज़िंदगी की दुआएं मांग रहे हैं और क्यों उसके नाम से पुरुस्कारों की घोषणा की जा रही हैं....
 सिर्फ कुछ ऐसा ही पता था कि उसने तालिबानी हुक्म के खिलाफ लड़कियों के स्कूल जाने का अभियान चलाया था जिसके बाद तालिबानी आतंकियों ने उसे गोली मार दी और बहुत मुश्किल के बाद उसे बचाया जा सका। आज इत्तिफाक से सीएनएन पर उसका इंटरव्यू देखने को मिला। तब पहली बार सोलह साल की इस जीवट किशोरी को देखा, सुना तो जाना कि कौन और "क्या" है मलाला...।

पहली बार जाना कि हिम्मत का उम्र से कोई वास्ता नहीं। हिम्मत कभी भी आ सकती है और कहीं भी आ सकती है। संगीनों और तालिबानी आतंक के साये में एक किशोरी के पढ़ने का जुनून जीत गया। गोली खाकर भी वो ज़िदा रही और आज मिसाल बनकर तमाम दुनिया को हिम्मत दे रही है। इस सोलह साल की लड़की के आत्मविश्वास से लबरेज चेहरे पर मुस्कान थी और वो हर सवाल का बहुत शांति, मुस्कुराहट और विश्वास के साथ जवाब दे रही थी।

मलाला से जब पूछा गया कि क्या सोचकर तुमने तालिबानी फरमान के लड़कियों को स्कूल ना जाने देने वाले फतवे के खिलाफ जाने का फैसला किया तो इस बहादुर किशोरी का जवाब था कि "मार तो वो हमें वैसे भी देते मैंने सोचा कि क्यों ना मरने से पहले अपनी आवाज़ लोगों तक पहुंचाई जाए।"....इतनी हिम्मत होना वो भी इस नादान उम्र में...तो यह है मलाला

उसने बताया कि जब गोली लगने के बाद अस्पताल में उसकी आंखे खुली तब उसे सबसे ज्यादा इस बात की खुशी हुई कि वो ज़िन्दा हैं। गोली ने उसके कान और शरीर के कुछ अन्य हिस्सों को स्थायी नुकसान पहुंचाया है, लेकिन वो यह सोचकर परेशान नहीं थी कि गोली ने उससे क्या छीन लिया बल्कि यह सोचकर खुश थी कि गोली क्या नहीं छीन पाई.... उसकी रीढ़ की हड्डी को नुकसान नहीं पहुंचा..., वो ज़िन्दा है.., सबके सामने हैं, सबसे बात कर रही है और अपना संदेश दुनिया तक पहुंचा रही है इससे बढ़कर खुशी की बात उसके लिए कोई नहीं.....-सकारात्मक सोच से भरपूर मलाला।

और जब उससे यह पूछा गया कि आप दुनिया को क्या संदेश देना चाहेंगी तो उसने कहा  कि "मैं सभी देशो के लोगों से कहना चाहूंगी कि वो पढ़े,आगे बढ़े, क्योंकि हमारे लिए यह आसान बिल्कुल नहीं है। दुनिया में आपमें से जिस जिस को पढ़ने का मौका मिला है उसका पूरा फायदा उठाइए। आप नहीं जानते कि जब आपका पढ़ने का अधिकार छीन लिया जाता है तो कैसा लगता है। यह बहुत बड़ी बात है कि आपको स्कूल जाने का, अध्यापको को जानने और उन्हें समझने का मौका मिला है। इसका खूब उपयोग करिए और खूब पढ़िए".... तालीम की रौशनी से रौशन होने का संदेश देने वाली मलाला

 पहले डॉक्टर बनने की चाह रखने वाली मलाला अब राजनीतिज्ञ बनना चाहती है। उन्हीं के शब्दों में "जब मैं स्वात में थी तो हमारी क्लास में हर लड़की डॉक्टर या टीचर बनना चाहती थी। वहां लड़कियों की ज़िंदगी का यहीं हाल होता है। या तो पढ़ लिखकर डॉक्टर या टीचर बन जाओ या ज़िंदगी भर एक गृहिणी बन कर रहो और अपने बच्चे पालो, इसलिए मैं भी डॉक्टर बनना चाहती थी। लेकिन अब जब मुझे अपने मुल्क से बाहर आने का और बहुत सी चीज़े जानने और समझने का मौका मिला तो मैंने जाना कि डॉक्टर बनकर तो मैं सिर्फ कुछ लोगों की मदद कर सकती हूं लेकिन एक राजनीतिज्ञ बनकर मैं पूरे देश की मदद कर सकती हूं।" बेनज़ीर भुट्टो को अपना आदर्श मानने वाली मलाला अब पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बनने का और अपने मुल्क की सभी लड़कियों को शिक्षा दिलवाने का सपना देखती हैं... छोटी उम्र में बड़े सपनों वाली मलाला

एक सोलह साल की बच्ची वाले सारे शौक है मलाला के। वो इस बात का ख्याल रखती है कि अपनी आवाज़ अपने भाईयों से ऊंची रखें क्योंकि पाकिस्तान में ऐसा कम होता है कि महिलाओं की आवाज़ पुरुषों के सामने निकले इसलिए वो अपने भाईयों से ऊंची आवाज़ में झगड़ा करके यह इच्छा पूरी करती हैं। पश्तो संगीत और गानों के अलावा मलाला को जस्टिन बीबर को सुनने का भी शौक है और जब भी मौका मिलता है वो अपना यह शौक पूरा करती हैं......तो एक आम किशोरी की तरह ही है मलाला।

अपनी मां द्वारा पर्दा रखने पर जोर देने पर बोलते हुए मलाला ने बताया कि उनकी मां जब भी उनके साथ बाहर कहीं जाती थी वो हमेशा मलाला को यहीं बोलती रहती थी कि अपना चेहरा ढको अपना चेहरा ढको... देखो यह आदमी तुम्हें देख रहा है, देखो वो आदमी तुम्हें देख रहा है और मलाला कहती थी कि देखनो दो ना अम्मी मैं भी तो उन्हें देख रही हूं... मलाला का यह रूप भी है

और जब मलाला यूसुफजई के सामने यह सवाल आया कि क्या उसे आतंकियो से डर नहीं लगता वो तो ताक में बैठे हैं, उसे दोबारा मारने की कोशिश भी तो कर सकते हैं। तो मलाला का जवाब था "वो मेरे शरीर को ज़रूर मार सकते हैं लेकिन मेरे सपनों को नहीं.. मेरे सपने हमेशा जिन्दा रहेंगे।".... जी हां ऐसी है मलाला।  

well... I am impressed :-)




Wednesday, 9 October 2013

एक देसी दशहरा मेले की सैर...

कितना वक्त हो गया आपको किसी मेले में गए हुए...? ..यहां मैं लायन्स क्लब या आरडब्ल्यूए, या मंदिर समिति या किसी समाजसेवी संस्था द्वारा आयोजित मेले में जाने की बात नहीं कर रही हूं जिनकी दिल्ली जैसे महानगरों में त्यौहार आते ही बाढ़ आ जाती है और जहां ब्रांडेड खाना, ब्रांडेड खिलौने, महंगे झूलों, स्टेज पर हो रहे सांस्कृतिक कार्यक्रमों और सज संवर कर आए लोगों का हुजूम होता है....। यहां बात उन मेलों की हो रही है जिन्हें दिखाने के लिए बचपन में हम अपनी मम्मी-पापा से ज़िद किया करते थे और खूब भीड़-भाड़ वाले ऐसे मेलों में वो हमें ले जाते थे। वहां बहुत सी ऐसी चीज़े होती थी जो आज के सुसभ्य और सुसंस्कृत मेलों से गायब हो चुकी हैं।
खैर कल मेरे बेटे की ज़िद पर हम लोग उसके स्कूल के रास्ते में लगने वाले ऐसे ही एक मेले में गए। और यकीन मानिए जब हम उस मेले में गए तो बहुत सी तो पुरानी यादें ताज़ा हो गई और बहुत सी चौंकाने वाली चीज़े भी दिखी...

आदर्श रामलीला कमेटी द्वारा आयोजित इस दशहरा महोत्सव मेले का आयोजन पूर्वी दिल्ली के त्रिलोकपुरी इलाके में चांद सिनेमा के पास हर साल किया जाता है। यह मेला दिल्ली की एलीट सोसाइटी के लिए नहीं है क्योंकि इसमें ज्यादातर त्रिलोकपुरी निवासी, शशि गार्डन निवासी या सीधे शब्दों में कहें तो निचले तबके के लोग आते हैं। इसलिए यह मेला भी दिल्ली के इलीट मेलों से बिल्कुल अलग था बिल्कुल देसी और देहाती टाइप मेला था। यहां दर्शक वर्ग भी वैसा ही था।

 यहां हमें बहुत सी ऐसी चीज़े देखने को मिली जो अब या तो मेलो से गायब हो चुकी है या फिर कस्बाई इलाकों या छोटे शहरों के मेलों में ही देखने को मिलती हैं,और कुछ ऐसी भी जो बदलते समय के साथ इनमें शामिल हो गई हैं लेकिन जो कभी भी इन मेलों की पहचान नहीं रहीं...।

यह देखिए फूलों की बैकग्राउन्ड में तस्वीर खिंचवाता एक परिवार। इस मेले में अलग अलग बैकग्राउन्ड के साथ तस्वीरे खिंचवाने की व्यवस्था की गई थी। जैसे मोटरसाइकिल के साथ, कार के साथ, पहाड़ी बैकग्राउन्ड में या फिर रेगिस्तानी बैकग्राउन्ड में। 50 रुपए में अपने मनपसन्द स्टाइल में तस्वीरे खिंचवाओं और 15 मिनट में उस तस्वीर को ले जाओ। आपके घर में पापा, मम्मी, दादा या दादी की ऐसी कोई ना कोई तस्वीर ज़रूर होगी...। आजकल भले ही हमें ऐसी तस्वीरे देखकर हंसी आएं लेकिन एक ज़माने में इन तस्वीरों का ज़बरदस्त क्रेज़ हुआ करता था।


और यह  रंग-बिरंगे गुब्बारों पर निशाने लगाने वाला खेल। पहले पांच रुपए में पांच बार निशाना लगाते थे लेकिन अब महंगाई के कारण 10 रुपए में चार निशाने लगाने को मिलते हैं। यह निशाने मैंने भी बचपन में खूब लगाए हैं, आप सबने भी लगाए होंगे, वरना आपके मम्मी-पापा ने तो शर्तिया लगाए होंगे। आज के मेलों से यह निशाने वाले रंगीन गुब्बारे लगभग गायब हो गए हैं। लेकिन यकीन मानिए इन गुब्बारों पर लंबी नाल वाली बंदूक से निशाना लगाने में बड़ा मज़ा आता है। कभी मौका मिले तो लगा कर देखिएगा।


यहां का एक मुख्य आकर्षण था मौत का कुंआ। यह लकड़ी की खपच्चियों से बनी विशाल कुंए जैसी आकृति होती है जिसकी गोल दीवारों पर ऊपर तक मोटरसाइकिलें और कारें दौड़ती हैं।बीस रुपए की टिकिट में मौत के कुंए का यह खेल देखने का रोमांच आपको शानदार एक्शन फिल्म देखकर भी नहीं मिलेगा। इस कुंए में मोटरसाइकिल दौड़ाने के लिए तो हिम्मत चाहिए ही लेकिन देखने के लिए भी बहुत हिम्मत की दरकार है। गोल गोल चलती हुई मोटरसाइकिल और कारें कई बार ऊपर दर्शकों के पास तक आ जाती हैं और अगर आप खुश होकर इन्हें पैसे देना चाहें तो यह जांबाज खिलाड़ी ऊपर रेलिंग तक आकर आपके हाथ से खुद वो ईनाम ले जाते हैं।

 और यह हैं इस मेले की सबसे ज्यादा चौंकाने वाली चीज़ जो मैंने पहले कभी किसी मेले में नहीं देखी थी। यह है एम के बूगी बूगी संस्कृत आदर्श कला केंद्र का पंडाल। था तो यह आदर्श कला केंद्र लेकिन दरअसल यहां कोमल धमाका के नाम से दस मिनट तक फिल्मी गानों पर मॉडल जैसी दिखने  वाली लड़कियों द्वारा डांस किया जा रहा था।  20 रुपए की टिकिट लेकर अंदर जाने की इजाज़त सिर्फ पुरुषों को थी। किसी भी महिला को पंडाल में जाना मना था।
आयोजक दर्शकों को आकर्षित करने के लिए विशेष तरीका अपना रहे थे। जब पंडाल पूरा भर जाता था और नाचने के लिए मॉ़डल आ जाती थी तो ज़रा सा पर्दा हटा दिया जाता था ताकि बाहर खड़ी भीड़ को उसकी झलक मिल जाए और फिर एक मिनट में ही पर्दा खींच दिया जाता था। कुछ कुछ टीज़र एडवर्टाइज़िंग जैसा...। इस पंडाल के बाहर सबसे ज्यादा भीड़ थी। सारे शो हाउसफुल जा रहे थे और यहां बहुत से पुलिसवाले भी जमा थे। सीटियों और तालियों की आवाज़े बाहर तक आ रही थीं।
वैल... मुझे कहना पड़ेगा कि यह पुराने तरह के मेलों में एक नई उपस्थिति है क्योंकि मैंने बचपन में देखे किसी भी मेले में ऐसे पंडाल नहीं देखे।
    यह है रिंग फेंककर ईनाम जीतने वाला गेम। यह खेल तो बहुत आम है और बहुत मज़ेदार भी। आप सभी ने खेला होगा। यहां 20 रुपए में तीन बार रिंग्स फेंकने का मौका मिल रहा था। जो भी चीज़ आपकी रिंग में आ गई वो आपकी। ध्यान से देखिए यहां पीछे की तरफ एक सौ रुपए की गड्डी भी रखी है। यानि 20 रुपए में 100 रुपए की गड्डी जीतने का मौका...।

इसके अलावा भी यहां बहुत से ऐसे खेल थे जिनमें हर किसी को खेलने और जीतने का मौका मिलता है। जैसे बॉल मारकर गिलास गिराने का खेल, नंबर की सीरीज बनाने का खेल, माचिस से मोमबत्ती जलाने का खेल.. इत्यादि। यहां झूलों की भी कोई कमी नहीं थी और जाइन्ट व्हील तो इतना ज्यादा जाइंट था कि बैठने के ख्याल से ही डर लगने लगे।
कोलम्बस, मैरी गो राउंड, ड्रैगन ट्रेन जैसे लगभग सारे झूले यहां थे और हर झूले कि टिकिट थी मात्र 20 रुपए। यहां एक मैजिक शो भी था जिसमें देखते देखते एक लड़की नागिन में बदल जाती है। मैं वो शो भी नहीं देख पाई क्योंकि हाउसफुल था और साथ ही एक शीशों का घर जिसमें तरह तरह के शीशे लगे थे जो आपको अलग अलग शेप और शक्ल का दिखाते हैं।



Tuesday, 8 October 2013

तब लोगों ने तंदूर का खाना तक खाना छोड़ दिया था...

तब मैं शायद नाइन्थ में थी। आज भी याद है, मैं स्कूल जाने के लिए तैयार हो रही थी कि अचानक पापा की तेज़ आवाज़ सुनाई दी..".हद हो गई यह तो। पत्नी को मारकर तंदूर में जला दिया...।" जब यह शब्द कानों में पड़े तो तुरंत पापा के पास आई। वो अमर उजाला का दूसरा पेज पढ़ रहे थे जिस पर पूरी खबर विस्तार से छपी थी। नैना साहनी, सुशील शर्मा और 'उस' तंदूर की फोटो छपी थी। जब पापा ने पेपर छोड़ा तब मैंने उस घटना को पूरा पढ़ा। पेपर में पूरी घटना विस्तार से ब्लैक एंड व्हाइट फोटो के साथ छपी थी। उसमें लिखा था कि कांग्रेसी नेता ने अपनी पत्नी के टुकड़े करके अपने ही रेस्टोरेंट के तंदूर में जला दिए...

इतना खतरनाक और वीभत्स हत्याकांड था यह जिसके बारे में इससे पहले ना तो मैंने कभी पढ़ा था और ना ही सुना था। जब मैं स्कूल पहुंची तब भी दो अध्यापिकाएं इसी के बारे में चर्चा कर रही थीं। तब चौबीस घंटे वाले बहुत सारे न्यूज़ चैनल्स नहीं होते थे सिर्फ दूरदर्शन पर रात को न्यूज़ आती थी इसलिए अधिकतर लोगों को सारी डिटेल्स अखबार पढ़कर ही पता चलती थी और इसके बावजूद यह खबर आग की तरह फैली थी।

काफी दिनों तक यह खबर अखबार की सुर्खियों में रही।  इसे तंदूर कांड का नाम दे दिया गया था।मुझे अच्छी तरह से याद है कि इस खबर को पढ़ने के बाद लोगों को तंदूर से घृणा हो गई थी। अखबार में अक्सर यह खबरे छपती थी कि बहुत सारे लोगो ने तो तंदूर का खाना खाना ही छोड़ दिया था।

तब तक जहां तक मुझे याद है इस बात का जिक्र ज्यादा नहीं था कि सुशील शर्मा ने नैना साहनी की पहले गोली मार कर हत्या की थी। बस तंदूर में टुकड़े करके जलाने का जिक्र था। जो बड़े ठंडे दिमाग और क्रूरता से हत्या के साक्ष्य मिटाने के लिए किया गया था। इस मामले में उसके रसोईए और मैनेजर का भी जिक्र था जिन्होंने इस काम में उसकी सहायता की थी।

पति द्वारा इस क्रूरता से अपनी पत्नी को मारने के कारण तो यह केस सुर्खियों में था ही इसके अलावा जो एक और बात थी वो यह कि नैना साहनी पायलट का प्रशिक्षण ले चुकी थी। विदेश में रह चुकी थी। मतलब वो एक आधुनिक और पढ़ी लिखी महिला थी जिसने अपनी मर्ज़ी से प्रेमविवाह किया था। और सुशील शर्मा कांग्रेसी नेता था। यानि दोनों ही सभ्य, पढ़े लिखे और आधुनिक समाज का प्रतिनिधित्व करते थे और सभ्य समाज मे इस तरह की क्रूरता पहली बार सामने आई थी।

और मैं आपको बता दूं कि उस समय नेताओं के भ्रष्टाचार, दुर्वव्यवहार, हत्याओं और अपराधों के मामले इतने आम नहीं हुआ करते थे जितने कि आज होते हैं और हर दूसरे दिन हम किसी अपराध में किसी नेता की भूमिका के बारे में सुनते हैं। इसलिए भी यह मामला बेहद अहम हो गया था क्योंकि इसमें एक युवा कांग्रेसी नेता की भूमिका थी।

 तब हर मीटिंग, किटी पार्टी और और गली मोहल्लों और पान की दुकानों पर होने वाले गॉसिप्स में यह केस ही डिस्कस हुआ करता था और लोग इस तंदूरकांड से इतने दहशतजदां थे कि तंदूर का खाना खाना पसंद नहीं करते थे।


वो आते हैं...


-बेबी जी आप ऑपरेशन के लिए चली जाईए, क्यों बार बार नर्स को वापस भेज रही हैं...?
-पहले मॉम को आने दो, उन्होंने प्रॉमिस किया था वो ऑपरेशन से पहले मुझसे मिलने आएंगी। वो आएंगी तभी मैं ऑपरेशन के लिए जाऊंगी। रात से वेट कर रही हूं। 
-लेकिन बेबी जी, आपके शरीर में सैप्टिक फैल सकता है, आपका ऑपरेशन होना ज़रूरी है। मालकिन को दिल्ली से आने में देर लग सकती है। मान जाईए बेबीजी, कहते हुए गोपाल काका की आंखे छलक आईं...
-कहा ना नहीं जाऊंगी, आज मम्मी को ही आना पड़ेगा, चाहे मैं मर जाऊं पर उनसे मिलने के बाद ही जाऊंगी। ... कहते हुए सिमरन ने मुंह फेर लिया।

गोपाल काका रोते हुए बाहर आए। सामने से महेश बाबू आते दिख गए। "बाबूजी आप गए। बेबी जी से मिल लीजिए, उन्हें अब तो बताना ही पड़ेगा, वो ऑपरेशन के लिए नहीं जा रहीं...."
-लेकिन यह नहीं हो सकता गोपाल, सिमरन कमज़ोर है हम उसे नहीं बता सकते...

तभी रूम का दरवाज़ा खुला और सिमरन स्ट्रैचर पर बाहर आती दिखाई दी। पास से गुज़री तो पापा और गोपाल काका को देखकर बोली... मैंने कहा था ना, मम्मी आएंगी। वो मुझसे मिलकर चली गईं।  
क्या....! गोपाल काका और महेश बाबू दोनों अवाक... ऐसा कैसे हो सकता है..
अभी-अभी तो महेश बाबू श्यामली की बॉडी को आग देकर रहे हैं...पुलिस वाले बता रहे थे, वो अस्पताल पहुंचने की जल्दी में गाड़ी बहुत तेज़ चला रही थी... ट्रक ने टक्कर मारी तो वहीं उसकी तुरंत मौत हो गई... फिर वो कैसे सकती है... ?????”
तभी गोपाल का हाथ महेश बाबू के हाथों को दबाने लगा, …....ऐसा होता है बाबूजी, कभी कभी लोग मरने के बाद भी जा नहीं पाते, कोई काम अधूरा रह जाता है...मालकिन भी शायद इसलिए आई होंगी एक बार... ताकि बेबी जी की जान बच सकें...

रिश्ते

"आज चाहे कुछ हो जाए, मैं बात नहीं करूंगी। हमेशा मैं ही क्यों शुरूआत करूं.. यह कोई बात है क्या..? राज अपनी गलती कभी नहीं मानते। मैं ही हमेशा क्यों झुकती रहूं। अब ऐसा नहीं होगा। मैं महीने भर तक बात नहीं करूंगी। पहले उनको मुझसे सॉरी कहना पड़ेगा। आज भी बिना बात ऐंठ दिखा रहे थे। मैं हर बार चुप रहती हूं ना, इसलिए। अब कि बार मैं भी दिखा दूंगी कि मुझे भी गुस्सा आता है। मेरे हाथ का खाना पसंद नहीं है ना, तीन दिन तक खाना नहीं दूंगी तो होश ठिकाने आ जाएगा..."

सुबह ऑफिस जाते समय राज से हुई लड़ाई याद कर-करके सीमा का गुस्सा सातंवे आसमान पर था। सुबकते हुए सो गई।
शाम 7 बजे--- ट्रिंग-ट्रिंग...
सीमा गुस्से में भनभनाती हुई उठी " आ गए, अब सीधी सीधी बात करती हूं... ऐसे नहीं चलेगा"... दरवाज़ा खोला..
सामने राज खड़े थे। आंखे चार हुई। राज मुस्कुराए.. पिक्चर देखने चलोगी क्या?
और सीमा का सारा गुस्सा काफूर... पहले खाना खा लो फिर चलते हैं...

नज़रिया

सीन-1- त्रिपाठी जी का घर
-चलो जल्दी तैयार हो जाओ। डॉक्टर साहब को वेट कराना अच्छा नहीं लगता। 
-उनके लिए क्या ले चलें? केले ठीक रहेंगे...?
-अरे क्या बात करती हो। केले जैसे सस्ते फल ले जाना अच्छा लगता है क्या इतने बड़े आदमी के घर। सेब और अंगूर लेलो और एक किलो मिठाई भी ले लेना। दोस्त अब बड़ा आदमी हो गया है, उसके घर ढंग से जाएंगे। 
(दो महीने बाद)
सीन-2 डॉक्टर साहब का घर
-इतनी जल्दी क्यों तैयार हो गए? आराम से चलेंगे। और उनके लिए केले ले लेना वो हमेशा कुछ ना कुछ लेकर आते हैं। हम खाली हाथ जाएंगे तो अच्छा नहीं लगेगा।
-लेकिन केले, अच्छे लगेंगे क्या। कोई ढंग के फल या मिठाई ले लेते हैं। फिर आपके इतने पुराने दोस्त से होली मिलने जा रहे हैं।
-ठीक है यार। इतना मत सोचो। ऐसी कोई बहुत बड़ी चीज़ नहीं है वो। उसके घर जा रहे हैं यहीं कम हैं क्या।

यथार्थ....

-श्यामली याद है, अरे वो कॉलेज की मोस्ट स्टायलिश गर्ल...।

-श्यामली...(नाम लेते ही पीयूष के दिमाग में कॉलेज की तस्वीर ताज़ा हो गई। श्यामली- सांचे में ढला फिगर, लंबे, घने बाल, बड़ी- बड़ी आंखे, खूबसूरत मुस्कान... सभी उसको पसंद करते थे। वो खुद भी उससे शादी करना चाहता था, पर वो कह भी नहीं पाया और ग्रेजूएशन के तुरंत बाद उसकी शादी हो गई)... हां हां याद है। बिल्कुल याद है। 
-इन पांच सालों में दुनिया बदल गई उसकी। डेढ़ साल में एक्सीडेंट में हसबेंड की डेथ हो गई। ससुराल वालों ने घर से निकाल दिया। चार साल से छोटी-मोटी नौकरियां करके खुद और अपने बेटे को पाल रही है। तुम तो बड़े ओहदे पर हो, उसकी कहीं नौकरी लगवा दो...
-हां हां क्यों नहीं, मेरी ही सेक्रेटरी की जगह खाली है। तन्ख्वाह भी अच्छी मिलेगी। कल बुला लो उसे। 

(दूसरे दिन श्यामली से मिलने की खुशी में पीयूष जल्दी ऑफिस पहुंच गया।) 

बारह बजे श्यामली आई। पांच सालों में काफी मोटी हो चुकी थी। पति के गुज़रने के बाद रोज़ी रोटी कमाने की फिक्र में लगी श्यामली के चेहरे पर समय से पहले झुर्रिया दिखने लगी थी। खूबसूरत हंसी की जगह उदासी भरी फीकी मुस्कान ने ले ली थी। पतली सी चोटी और साधारण सूती साड़ी में श्यामली पीयूष की यादों से बिल्कुल अलग, बेहद आम दिख रही थी। शानदार ऑफिस में असहज बैठी 
श्यामली सकुचाते हुए बोली- कल सीमा का फोन आया था। बता रही थी तुम मुझे अपने यहां सेक्रेटरी रख लोगे....?

पीयूष- हां मैंने सोचा था, लेकिन मेरे बॉस ने मना कर दिया। कहा तुम्हारी क्वालिफिकेशन नहीं हैं...। मुझे कुछ काम है तुम चाय पीकर जाना....(आंखे चुराते हुए पीयूष निकल गया)