Wednesday, 18 September 2013

इनसे मिलिए....3000 रुपए में कृपा बेचने वाले निर्मल बाबा !!!!


लाल रंग की बड़ी स्टेज पर फूलों की मालाओं की सजावट, दोनों तरफ शानदार मेजे, एक तरफ की मेज पर फूल और दूसरी तरफ की मेज पर बिसलरी की पानी की बोतल और कांच का गिलास... बीचो-बीच सिंहासननुमा वृहद् कुर्सी पर अधलेटे, सिल्क का कुर्ता पहने और बढ़िया शॉल कंधे पर डाले निर्मल बाबाजी....

बाबाजी के समागम में पूरा हॉल भरा हुआ है, कुर्सियों पर बाबाजी के भक्तों में लगभग सभी सभ्रांत, सम्पन्न परिवारों के पढ़े लिखे लोग...  और हाथों में माइक लेकर अपनी परेशानियां "पूज्य निर्मल बाबा" को बताते भक्तगण....और वहीं हॉल के चारों ओर मौजूद काले कपड़े पहने और गले में लाल फीते वाला आइडेंटिटी कार्ड डाले बाउंसर नुमा दिखने वाले बाबाजी के ब़ॉडीगार्ड्स।


निर्मल बाबा के दरबार में भक्त एक-एक कर के माइक पकड़कर अपनी परेशानी पूछते हैं और बाबा कभी काले रंग का बैग रखने की सलाह में तो कभी गरीबों को कुल्फी खिलाने की बात कहकर तो कभी किसी भक्त को होटल में खाना खाने की आज्ञा देकर दोनों हाथों से "कृपा" बांटते हैं.... ।

निर्मल बाबा की बात और बाबाओं से बिल्कुल अलग है। इनके समागम में ऐसे कोई ऐरा-गैरा नहीं जा सकता। बाबाजी के समागम में जाने का पास 3000 रूपए का मिलता है और उसके लिए पहले से बुकिंग करानी पड़ती है वो भी फोन या इंटरनेट पर। यहीं नहीं अगर आपकी परेशानी खत्म हो जाए तो अपनी मासिक आय का दसवां हिस्सा भी बाबाजी को देना पड़ता है। बाबाजी ने अपना खाता नंबर नेट पर डाला हुआ है और बाबा इन्कम टैक्स रिटर्न भी भरते हैं ताकि किसी सवाल की कोई गुंजाइश ना रहे।
अब यह बात अलग है कि बाबा के दो खाते हैं एक भक्तों के लिए जिसकी जानकारी सबको है और एक बाबा का अपना निजी खाता जिसकी जानकारी बाबा और उनके परिवार के अलावा किसी को नहीं। आज के इंटलैक्चुअल इंसान को बाबा का इस तरह कृपा बरसाना और मज़ेदार बातें करना अखर सकता है लेकिन बहुत से ऐसे लोग हैं जिन्हें बाबा के पेड समागम में आकर मुश्किलों से निजात मिलती है।

 बाबाजी की सलाहों की दुनिया दीवानी है। अपने सिंहासन पर अधलेटे बाबाजी जब अपना सीधा हाथ उठाकर भक्तगणों को आशीष देते हैं और चुटीले अंदाज़ में अजीब लगने वाली सलाहें बताते हैं तो भक्त प्रसन्न हो उठते हैं। निर्मल बाबा के नाम की जय-जयकार गूंजने लगती है।

बाबा की सलाहें होती ही ऐसी हैं...
पीर की मज़ार पर परफ्यूम चढ़ाओ तो घर में शांति बनी रहेगी। ...गरीबों को कुल्फी बांटोगे तो सारा कर्ज़ा उतर जाएगा। ...जिस होटेल में रात को खाना खाया था, वहीं जाकर दोबारा खाना खाओगे तो घर में कभी अन्न की कमी नहीं पड़ेगी। वाइफ को फेस क्रीम लाकर दोगे तो घरेलू परेशानियों से छुटकारा मिलेगा। बड़ी लोहे की कढ़ाई में कुछ भी बना कर गरीबों को वितरित करोगे तो कर्जें से मुक्ति मिल जाएगी।

बाबा के भक्तगणों की परेशानियां भी ऐसी होती हैं... मेरे बेटे को यूएसए का वीज़ा नहीं मिल रहा, आपकी कृपा हो जाए तो मिल जाएगा बाबाजी..., बेटी को विदेश पढ़ने भेजा है वहां कोई भारतीय परिवार मिल जाए जहां वो रह सकें...., मुझे इंटरव्यू में पास करवा दो बाबा..., नौकरी में प्रमोशन दिलवा दो बाबा....एक्ज़ाम में अच्छे नंबर नहीं आ रहे बाबा...

और बाबा, कभी सिल्क का स्कार्फ पहनने की सलाह देकर, कभी अच्छे टेलर से सूट सिलवाने की बात कहकर और कभी माता को चौड़े गोटे वाली चुन्नी चढ़ाने की सलाह देकर लोगों को कृपा बांटते हैं।

 और वो लोग जो शायद ऑटो वालों से दस रुपए ज्यादा मांगने पर मारपीट पर उतर आते होंगे या सब्ज़ी वाले से दो रुपए के लिए लड़ाई करते होंगे.. बड़े आराम से, बल्कि खुशी-खुशी बाबा की कृपा पाने और उनके समागम में आने के लिए 3000 रुपए की टिकिट खरीद लेते हैं, कृपा पात्र होने पर उन्हें अपनी मासिक आय का हिस्सा देने को तैयार हो जाते हैं और यहीं नहीं दशवंत के नाम पर भी "स्वेच्छा" से दान देने में आगे रहते हैं। मतलब बाबा कृपा दे रहे हों या ना दे रहे हों, दोनों हाथों से कृपा बटोर ज़रूर रहे हैं... :-)

तीसरी आंख रखने वाले बाबाजी की यूएसपी या कहें टैग लाइन है...
"यंत्र चले ना तंत्र- मंत्र, ना रहे दुःखो का घेरा, भाग्य उदय हो जाएगा, जब हो निर्मल बाबा आर्शीवाद तेरा। "

बाबाजी पर बहुत से न्यूज़ चैनल स्टोरी कर चुके हैं, अखबार खबरे छाप चुके हैं। बाबा की कृपाएं और बाबा के समागम संदेह के घेरे में हैं।  यहां तक कहां जा चुका है कि बाबा पैसे देकर अपने समागम में लोगों सवाल पुछवाने के लिए बुलवाते हैं। लेकिन यह भी सच है कि यहीं न्यूज़ चैनल्स बाबा के समागम दिखाकर और अखबार बाबा के विज्ञापनों को छापकर बाबा से पैसा भी बना रहे हैं। आप न्यूज़ चैनल्स लगाकर देख लीजिए किसी ना किसी चैनल पर किसी ना किसी समय बाबा जी का समागम दिख ही जाएगा।

अब लोग भोली-भाली जनता को मूर्ख कह सकते हैं जिनके पास परेशानियां बहुत हैं और बाबा के पास वो अपनी परेशानियों का हल ढूंढने पहुंच जाते हैं या फिर न्यूज़ चैनल्स को चालाक कह सकते हैं जो उनकी असलियत पर खबरे दिखाते हैं और उन्हीं से पैसा भी कमाते हैं।

अब यह आपके विवेक पर है कि किसे सही माने और किसे गलत....? मेरे अपने अनुभव की कहें तो एक बात पक्की है कि अगर आप दुखी है तो एक बार बाबा का समागम देख कर जी भर कर हंस ज़रूर सकते हैं।

Saturday, 14 September 2013

दो बूंद ज़िंदगी की..या दो बूंद अपंगता की...?


पोलियो टीकाकरण अभियान में भाग लीजिए, बच्चों को दीजिए बस दो बूंद ज़िंदगी की... आपने बहुत बार बॉलीवुड महानायक अमिताभ बच्चन को टीवी पर यह संदेश देते सुना होगा। लगभग दो दशकों से भारत को पूर्ण रूप से पोलियो मुक्त देश बनाने के लिए पोलियो टीकाकरण अभियान जोर-शोर से चलाया जा रहा है। साल में दो बार या कभी तीन या चार बार ओरल पोलियो की दो बूंदे पिलाने का अभियान चलाया जाता है जिसमें पूरे देश के लोग बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं। देश पोलियो मुक्त राष्ट्र बनने जा रहा है। पिछले दो सालो से भारत में एक भी पोलियो का मामला नहीं आया.....यह सब बहुत लुभावनी बातें है लेकिन इन सबके पीछे एक बेहद खतरनाक सच्चाई छिपी है।
 क्या आप जानते हैं कि भले ही हिन्दुस्तान में पोलियो खत्म हो रहा है लेकिन पोलियो से मिलती-जुलती, लेकिन उससे कहीं ज्यादा खतरनाक  "नॉन पोलियो एक्यूट फ्लैसिड पैरालिसिस (एएफपी)" के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं और जिसका कारण पोलियो टीकाकरण अभियान के तहत बच्चों को पिलाई जा रहीं पोलियो वैक्सीन की वो दो बूंदे हैं जिनमें कमज़ोर लेकिन ज़िन्दा पोलियो वायरस उपस्थित रहता है। 
2012 में प्रकाशित एक रिसर्च पेपर में यह साफ किया गया है कि भारत के बच्चों को दी जा रही पोलियो वैक्सीन के बढ़ने के अनुपात में ही एक्यूट फ्लैसि़ड पैरालिसिस के मामले भी लगातार बढ़ रहे हैं।

क्या है नॉन पोलियो एक्यूट फ्लैसिड पैरालिसिस

नॉन पोलियो एक्यूट फ्लैसिड पैरालिसिस यानि एएफपी, पोलियो की तरह ही एक बीमारी है जो नर्वस सिस्टम पर हमला करके व्यक्ति के शरीर के अंगो को जीवन भर के लिए लकवाग्रस्त कर देती है और बहुत से मामलों में मौत का भी कारण बनती है। इसके प्रभाव पोलियो से मिलते जुलते हैं लेकिन वास्तव में यह पोलियो से कहीं ज्यादा घातक और अनियंत्रित बीमारी है।  फिलहाल भारत में विश्व में सबसे ज्यादा नॉन पोलियो एएफपी के मामलों की दर दर्ज की गई है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के आंकड़े गवाह हैं-

विश्व स्वास्थ्य संगठन के राष्ट्रीय पोलियो सर्विलांस प्रोजेक्ट के आंकड़ों के मुताबिक
  •  वर्ष 2003 में भारत में लगभग आठ हज़ार एएफपी के मामले  दर्ज किए गए
  • इसके अगले साल यह आंकड़ा 12,000 मामलों तक पहुंच गया
  •  2005 में 26,000 और 2007 में 40,000 से भी ज्यादा इस तरह के मामले भारत में देखने को मिले 
  • जबकि 2011 में 60,000 से ज्यादा नॉन पोलियो एएफपी के मामले सामने आए।
  • भारत में इस तरह के सबसे ज्यादा मामले बिहार और उत्तर प्रदेश में दर्ज किए गए हैं
  •  2012 में पूरे देश में पाए गए 53,000 एएफपी के मामलों में 61 फीसदी मामले बिहार और उत्तर प्रदेश से थे
  • फिलहाल भारत में अनुमान से 12 फीसदी ज्यादा एएफपी के मामले हैं और ओरल पोलियो वैक्सीन की लगातार बढ़ती खुराकों के अनुपात में हैं।
  • 2011 में भारत में चलाया गया पोलियो मुक्ति अभियान साढ़े सैंतालीस हज़ार पोलियो टीका प्रेरित पक्षाघात (पोलियो वैक्सीन इंड्यूस्ड पैरालिसिस) से हुई मौतों का कारण बना।

यह डाटा ऑनलाइन उपलब्ध है इसमें साफ दिख रहा है कि एक्यूट फ्लैसिड पैरालिसिस की दर विभिन्न क्षेत्रों में वितरित पोलियो वैक्सीन खुराकों के सीधे अनुपात में है

पोलियो टीकाकरण अभियान के साथ बढ़ रही हैं बच्चों में पोलियो जैसी बीमारी 

इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल एथिक्स में सेंट स्टीफन्स अस्पताल, दिल्ली की डॉक्टर नीतू वशिष्ठ और डॉक्टर जैकब पुलियल द्वारा प्रकाशित एक ताज़े रिसर्च पेपर ने पूरे विश्व में हंगामा कर दिया। इस पेपर में बताया गया है कि जितनी तेज़ी से बच्चों को ज़िदंगी की दो बूंदे दी जा रही है उतनी ही तेज़ी से पोलियो जैसी घातक बीमारी एक्यूट फ्लैसिड पैरालिसिस फैल रही है।  2011 में हज़ारो पोलियो जैसी बीमारी के मामले उन बच्चों से जुड़े हुए थे जिन्होंने इस साल पोलियो की बार-बार खुराके ली थी।

इस रिसर्च के अनुसार -
" भारत पिछले एक साल से पोलियो मुक्त है लेकिन नॉन पोलियो एक्यूट फ्लैसिड पैरालिसिस के मामलों में बहुत ज़्यादा वृद्धि देखी गई है। 2011 में एएफपी के 47,500 अतिरिक्त मामले हुए। चिकित्सकीय तौर पर पोलियो जैसी, लेकिन पोलियो से दोगुनी घातक और संक्रामक एएफपी के मामले बच्चों को दी गई ओरल पोलियो वैक्सीन के सीधे अनुपात में थे। हांलाकि यह आंकड़े पोलियो सर्विलांस सिस्टम द्वारा इकट्ठे किए गए थे लेकिन इनकी कभी विवेचना नहीं की गई।"
 ज़िन्दा पोलियो वायरस वाली ओरल पोलियो वैक्सीन के ज़रिए असंख्य बच्चो और बड़ों में वैक्सीन स्ट्रेन पोलियो पैदा हो रहा है। एक अनुमान के अनुसार, हर साल लगभग 180 भारतीय बच्चे वैक्सीन से जुड़े पोलियो पक्षाघात का शिकार बनते हैं।


क्या है ओरल पोलियो वैक्सीन (ओवीपी) और क्यों है यह खतरनाक

क्या आप जानते हैं कि जिस ओरल पोलियो वैक्सीन की खुराकें आप अपने बच्चों को नियमित तौर पर पिलाते हैं, उनमें है क्या...
दरअसल इन ओरल पोलियो वैक्सीन में 2002 में वैज्ञानिकों द्वारा प्रयोगशाला में बनाए गए कृत्रिम पोलियो वायरस को डाला जाता है। यह पोलियो वायरस शक्ति में प्राकृतिक पोलियो वायरस से कमज़ोर होता है लेकिन यह ज़िन्दा वायरस होता है। 
ओरल वैक्सीन से शरीर में पहुंचने के बाद यह ज़िन्दा पोलियो वायरस आपके गले में एक से दो हफ्ते रह सकता है और उसके बाद अगर यह मल के ज़रिए आपके शरीर से निकल जाता है तो उसमें भी यह दो महीने तक बना रह सकता है।
 भारत जैसे देशों में जहां सीवेज की व्यवस्था ठीक नहीं है, वहां मल के द्वारा निकले पोलियो वायरस का पानी को दूषित करना बहुत आसान होता है। यह आसानी से पानी के ज़रिए एक जगह से दूसरी जगह विचरता रहता है और अपने नए शिकार ढूंढ लेता है। और चूंकि यह लैब में बना कृत्रिम वायरस है इसका प्रभाव और ज्यादा घातक होता है।
पहले जहां इस बीमारी का संक्रमण उन बच्चों से होता था जिनको वैक्सीन नहीं लगी होती थी वहीं अब यह बीमारी उन बच्चों से फैल रही है जिनका ओरल पोलियो वैक्सीन पिलाकर टीकाकरण किया गया है।

अमेरिका रोक चुका है ओरल पोलियो वैक्सीन का प्रयोग

1991  में फेडरल सेंटर फॉर डिसीज कंट्रोल एंड प्रीवेन्शन (सीडीसी) ने प्रकाशित किया था कि जिन्दा वायरस वाली पोलियो वैक्सीन अमेरिका में पोलियो फैलने का मुख्य कारण बन चुकी है। 1979 से जितने भी पोलियो के मामले आए हैं वो सभी ओरल पोलियो वैक्सीन के कारण हुए हैं।  इसकी वजह से 540 मौते हुई और 6,364 लोगों को पोलियो घात का सामना करना पड़ा। इन रिपोर्ट्स के बाद ही वर्ष 2000 में अमेरिका के इम्यूनाइजेशन कार्यक्रम से ओरल पोलियो वैक्सीन को हटाया गया।

 ओवीपी के खतरों से वाकिफ होने के बाद लगभग 35 अन्य धनवान देशों ने भी अगले सालों में ओरल पोलियो वैक्सीन का इस्तमाल रोककर इनऐक्टिव पोलियो वैक्सीन(आईवीपी) का प्रयोग करना शुरू कर दिया।

आईवीपी में निष्क्रिय पोलियो वायरस होता है इसलिए इसके द्वारा दुबारा बीमारी फैलने का खतरा नहीं रहता। लेकिन चूंकि एक तो यह इंजेक्शन के ज़रिए दी जाने वाली वैक्सीन है और दूसरे यह ओरल पोलियो वैक्सीन से दोगुनी कीमत पर मिलती है इसलिए तीसरी दुनिया के देश या यूं कहिए की गरीब देश अभी भी सस्ती ओरल पोलियो वैक्सीन को ही टीकाकरण अभियान के तहत वितरित करते हैं।

वैसे भी एक बच्चे को इंजेक्शन लगाने से कहीं आसान है उसके मुंह में पोलियो वैक्सीन की दो बूंदे डालना। पर चूंकि इनमें जिन्दा वायरस होते हैं, इनसे हमेशा लोगों में वैक्सीन स्ट्रेन पोलियो होने का खतरा बना रहता है। खासतौर से उन लोगों में जिन्हें स्वास्थ्य समस्याएं हैं, जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता अच्छी नहीं या जो कुपोषण का शिकार हैं मतलब ऐसे लोगों में जिनकी संख्या भारत जैसे देशों में बहुत अधिक होती है।

खतरों के बावजूद ओरल पोलियो अभियान को प्रोत्साहित कर रही हैं वैश्विक स्वास्थ्य एजेंसिया

यह बेहद हैरानी की बात यह है कि ओवीपी से होने वाले खतरों और चिकित्सा समुदाय की चिंताओ के बावजूद पोलियो वैक्सीन उत्पादक और वैश्विक स्वास्थ्य एजेंसिया ओरल पोलियो वैक्सीन अभियान को और तेज़ी के साथ प्रोत्साहित करने में लगे हूए हैं। इसके ऊपर रोक लगाने के लिए कोई प्रयास नहीं किए जा रहे।

 बल्कि बिल एंड मेलिन्डा गेट्स फाउंडेशन द्वारा तो इसको तीसरे विश्व के देशों में और ज्यादा बढ़ावा दिया जा रहा है। आपको बता दें कि बिल गेट्स ने इस प्रोजेक्ट पर बहुत ज्यादा पैसा लगाया है। हांलाकि उनका कहना है कि वो पूरे विश्व से पोलियो को खत्म करना चाहते हैं लेकिन यह बात भी सोचने की हैं कि खुद उनके देश में ओवीपी का प्रयोग रोक दिए जाने के बावजूद खुद बिल गेट्स विकासशील देशों में ओरल पोलियो वैक्सीन के ही इस्तमाल के पक्षधर हैं।
उन्हीं की फाउंडेशन द्वारा 2011 में भारत में उच्च शक्ति की पोलियो वैक्सीन शुरू की गई थी जिसके बाद एएफपी के मामलों में बहुत ज़्यादा बढ़ोत्तरी हुई है।   

भारत में पोलियो टीकाकरण अभियान के अठारह साल- 

वैश्विक पोलियो मुक्त पहल (पोलियो ग्लोबल इरैडिकेशन इनीशिएटिव) की शुरूआत 1988 में विश्व स्वास्थ्य संगठन, रोटरी इंटरनेशनल, यूनिसेफ और अमेरिकी रोग नियंत्रण एवं रोक केन्द्र (सीडीसी) द्वारा की गई थी जिसके तहत विश्व भर में भारी पोलियो टीकाकरण अभियान चलाया गया। हांलाकि उस वक्त भारत में पोलियो का प्रकोप इतना ज़्यादा नहीं था लेकिन फिर भी भारत ने इस मुहिम में शामिल होने के लिए मंज़ूरी दी।
रिपोर्ट के अनुसार भारतीय सरकार ने पूरे भारत में 200 मिलियन घरों में 2.3 मिलियन पोलियो टीका लगाने वालों को भेजा जिसके तहत 5 साल या उससे कम उम्र के लगभग 170 मिलियन भारतीय बच्चों को पोलियो दवा पिलाई गई।
यह अभियान इस तेज़ी से यहां चलाया जा रहा है कि कई बार तो ज़रूरत से ज्यादा खुराकें बच्चों को दे दी जाती हैं। यहीं कारण है कि यहां पोलियो तो खत्म होने की कगार पर आ गया लेकिन पोलियो वैक्सीन के कारण प्रकट होने वाली एक्यूट फ्लैसिड पैरालिसिस जड़े जमाने लगी।

1952 में जब यह बीमारी अपने चरम पर थी तब इसने अमेरिका में 24,000 से ज्यादा लोगो को मारा या अपाहिज बना था लेकिन भारत में हुए पोलियो टीकाकरण अभियान ने तो सिर्फ साल 2011 में ही 47,500 लोगों को अपाहिज बना दिया या उनकी जान ले ली।

हमेशा चलता रहेगा पोलियो उन्मूलन अभियान
इंडियन जर्नल में छपी रिपोर्ट के अनुसार भले ही विश्व स्वास्थ्य संगठन और बिल गेट्स पोलियो को जड़ से समाप्त करने की मुहिम के लिेए विश्व भर से समर्थन जुटाने में लगे हैं लेकिन सच यह है कि पोलियो को जड़ से समाप्त करना असंभव है।
 2002 में वैज्ञानिक प्रयोगशाला में पोलियोवायरस बना चुके हैं। अब यह विलुप्त नहीं हो सकता क्योंकि इसके जीनोम का क्रम पता लगाया जा चुका है और इसे कभी भी प्रयोगशाला में तैयार किया जा सकता है। वास्तविकता यह है कि 18 साल पहले पोलियो को नष्ट करने के लिए शुरू किया गया यह अभियान किसी ना किसी रूप में हमेशा चलता रहेगा।



Friday, 6 September 2013

घरों में काम करने वाली बाईयों, नौकरानियों और हाउसकीपिंग स्टाफ के लिए ट्रेनिंग स्कूल...


अब घर में काम करने वाली बाईयों को गृहकार्य में दक्ष बनाने के लिए भी एक स्कूल की शुरूआत हूई है.....घरों में काम करने की इच्छुक महिलाएं, अपनी शिक्षा, काम के अनुभव और कार्य कुशलता के मुताबिक इस स्कूल में अत्याधुनिक  गैजेट्स से साफ-सफाई करने, बच्चों को संभालने, नए-नए तरीके के खाना और नाश्ते बनाने, टेलीफोन पर इंग्लिश में तहज़ीब से बात करने और यहां तक कि कॉकटेल पार्टीज़ के समय ड्रिंक्स और ग्लासेज को संभालने का भी प्रशिक्षण ले सकती हैं...।

प्रशिक्षण को देने वाले प्रौफेशनल प्रशिक्षक इन हाउस मेड्स को काम-काज ढंग से संभालने के साथ-साथ आत्मविश्वास से रहने, तहज़ीब से बात करने और व्यक्तिगत साफ-सफाई व ग्रूमिंग की भी ट्रेनिंग देते हैं।

इस ट्रेनिंग को पूरा करने के बाद अपनी इन घरेलू काम सीखने वाली छात्राओं को उनकी योग्यता के अनुसार अच्छे घरों में अच्छी तन्ख्वाह पर नौकरी दिलवाने की जिम्मेदारी भी इसी एजेंसी की होती है। कंपनी के अनुसार एक बार घरेलू कार्य का प्रशिक्षण लेने के बाद यह आत्मविश्वास से भरपूर आधुनिक बाईयां छः हज़ार रुपए महीने से 35,000 रुपए महीने तक कमा सकती हैं और साथ ही विदेशों और बड़े औद्योगिक घरों में काम करने का अवसर भी प्राप्त कर सकती हैं।

काम वाली बाईयों को वोकेशनल ट्रेनिंग देने वाले इस इंस्टीट्यूट का नाम है 'रेडी मेड (Ready Maid)'।

यह भारत में अपनी तरह की पहली एजेंसी है। गुड़गांव के सुशांत लोक में स्थित इस कंपनी के ऑफिस के साथ ही 12,000 स्कवायर फिट में एक आधुनिक गैजेट्स और सुख सुविधाओं से पूर्ण ट्रेनिंग सेन्टर बना हुआ है जिसमें योग्य अध्यापक, घरेलू काम करने वाली  नौकरानियों या हाउसकीपिंग स्टाफ को अच्छी हाउसकीपिंग, कुकिंग और बच्चों को संभालने जैसे कामों का प्रशिक्षण देते हैं।

यह एजेंसी मूल रूप से सिनर्जी रिलेशनशिप मैनेजमेंट सर्विसेज़ प्राइवेट लिमिटेड ( एसआरएमएस) नाम की  संस्था द्वारा भारत में शुरू की गई है। जो पिछल कई सालों से घरेलू काम करने वाली महिलाओं को ट्रेनिंग देकर उन्हें अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों और कॉरपोरेट घरानों में काम दिलवाने में सहयोग कर रही है।

यहां घरेलू काम करने की इच्छुक महिलाओं को एक हफ्ते की वोकेशनल ट्रेनिंग दी जाती है जिससे वो अच्छी तरह से घर के सारे काम-काज सीख सके।  ट्रेनिंग के दौरान काम सीखने वालों को यहीं रहना पड़ता है। प्रशिक्षण देने से पहले हर महिला के बारे में पूरी जांच पड़ताल और हैल्थ चैकअप करवाया जाता है। प्रशिक्षार्थियों का पुलिस वैरिफिकेशन भी कराया जाता है और इसके बाद ही इन्हें ट्रेनिंग देकर कहीं काम पर लगवाया जाता है।

कम्पनी की वेबसाइट (www.readymaid.in) पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार यहां मुख्यतः चार तरह के प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जाते हैं-
  • रेडी मेड- उनके लिए जिनको घरेलू काम करने का लगभग तीन साल का अनुभव हो और जिन्होंने या तो केवल प्राथमिक शिक्षा ली हो या फिर अनपढ़ हों। इनके प्रशिक्षण में कपड़े धोना, वैक्यूम क्लीनर इस्तमाल करना, बाथरूम- घर वगैरह साफ करना, बिस्तर बिछाना, रसोई की सफाई, खाना पकाना, खाने पकाने के आधुनिक उपकरणों जैसे माइक्रोवेव, टोस्टर आदि का इस्तमाल करना..., और इसके अलावा टेलीफोन एटीकेट्स और सामान्य तहज़ीब आदि शामिल हैं। 

  • रेडी मेड प्रीमियम-  इस प्रोग्राम में दाखिला लेने वाली लड़कियों को वॉशिंग मशीन से कपड़े धोना, आयरन करना, बेसिक साफ-सफाई के साथ फ्लावर अरेंजमेंट, आधुनिक घरेलू उपकरणों को इस्तमाल करना और उनको संभालना आदि सिखाया जाता है। इनको पार्टी आयोजित करना, बेसिक अंर्तराष्ट्रीय खाना बनाना, सीफूड और अन्य तरीके के खानों की पहचान करना, टेबल सजाना, स्वास्थ्यवर्धक खाना बनाना, हार्ड ड्रिंक्स और ग्लास वगैरह को संभालना सिखाने के साथ पर्सनल ग्रूमिंग की भी ट्रेनिंग दी जाती है।



 





  • रेडी मेड इलीट- यह सबसे उच्चवर्गीय प्रशिक्षण है जिसमें और सब बातों के साथ इंग्लिश स्पीकिंग, राइटिंग, आधुनिक रेसिपीज़ बनाना (सीफूड, बेकरी उत्पाद, कॉकटेल्स, मॉकटेल्स, फाइव कोर्स मील आदि) और आधुनिक घरों में रहने के सारे तौर-तरीके सिखाए जाते हैं। इन्हें बेसिक विदेशी भाषा जैसे इटैलियन, चाइनीज़, मंदारिन आदि भी ज़रूरत और मांग के अनुसार सिखाई जा सकती है।

  • रेडी नैनी- इनको नवजात शिशु से लेकर बड़े बच्चों तक की देखभाल की सारी जानकारी और उनके लिए ज़रूरी भोजन आदि तैयार करने का पूरा प्रशिक्षण दिया जाता है।
प्रशिक्षण पूरा होने के बाद इन्हें सर्टिफिकेट ऑफ कम्पलीशन दिया जाता है और इसके बाद इन्हें काम के लिए घरों में भेजा जाता है।



Tuesday, 3 September 2013

आधुनिक भारत की एक बच्ची के सपने, सीखें और सरोकार...

 साक्षात्कार की कड़ी में इस बार प्रस्तुत है देश की राजधानी दिल्ली में पढ़ने वाली एक ग्यारह वर्ष की बच्ची का साक्षात्कार।  आधुनिक भारत और  कम्प्यूटर युग में जीने वाले बच्चों की इच्छाएं, उम्मीदें, रोष और आक्रोश को लेकर जब हमने एक ग्यारह साल की बच्ची से सवाल पूछे तो बहुत रोचक जवाब मिले। इनकी दुनिया बिल्कुल अलग होती है, उसमें सपने भी है, आगे बढ़ने की इच्छा भी और यथार्थवादिता भी। यह बच्चे अपनी नज़र से दुनिया को देखते हैं, अपने तरीके से उसकी विवेचना करते हैं और अपने तरीके से ही उसमें ढलने और उसे बदलने की चाहत भी रखते हैं। यह जो कहते हैं मन से कहते हैं। झूठ बोलना और लाग-लपेट करना इन्हें नहीं आता.... किसी भी बात से इन्हें जज मत कीजिए। बस इस बच्ची के सपनों, सीखों और सरोकारों के बारे में पढ़िए, अपना बचपन याद कीजिए और आनंद लीजिए...


आपका परिचय..
मेरा नाम साक्षी बंसल है। मैं डीपीएस स्कूल, दिल्ली में सिक्स्थ क्लास में पढ़ती हूं। मेरे पापा और मम्मी दोनों डॉक्टर हैं और मैं उनको बहुत प्यार करती हूं। और मैं मार्स और स्विटज़लैंड घूमना चाहती हूं।

क्या बात है..., आपकी हॉबीज़..
डांस करना, गाना गाना, टेस्टी खाना खाना, एक्टिंग करना, बास्केट बॉल खेलना और फैशन करना।

फैशन करना...! आपके हिसाब से यह फैशन होता क्या है?
फैशन मतलब अच्छे और स्टायलिश कपड़े पहनना, सुंदर दिखना, स्मार्ट दिखना... जिससे सब आपकी तारीफ करें।

आप बड़े होकर क्या बनना चाहती हो साक्षी?
 वैसे तो मुझे बड़ा होकर आईएएस बनना है ताकि मैं सारे लोगों को कंट्रोल कर सकूं। लेकिन मुझे मालूम है आईएएस का एक्ज़ाम बहुत डिफिकल्ट होता है, इसलिए इसके साथ ही मैं इंजीनियरिंग की भी तैयारी करूंगी जिससे आईएएस ना बन पाऊं तो इंजीनियर बन जाऊं।

और इंजीनियर बनकर क्या करोगी?
मैं खूब सारी मशीन्स बनाऊंगी जैसे एक ऐसा बॉटल कैप बनाऊंगी जिसको लगाने से किसी भी बॉटल का पानी हमेशा ठंडा रहे। एक पोर्टेबल फ्रिज बनाऊंगी जिसे जब जाहे बड़ा करके रूम में रखा जा सके और जब चाहे छोटा करके कहीं भी ले जाया जा सके।

गुड...। आपने अपने मम्मी-पापा से क्या सीखा हैं?
पापा ने मुझे यह सिखाया है कि अगर हम एक्चुली में कुछ चाहे तो उसे जरूर अचीव कर सकते हैं। जैसे मैं दो सालों से अपने स्कूल में मार्कर कप के लिए कोशिश कर रही थी जो उसे मिलता है जिसके सारे सब्जेक्ट्स में सबसे अच्छे ग्रेड्स आएं...मैंने कोशिश की और आखिरकार मुझे मार्कर कप मिल ही गया। मेरी मम्मी ने मुझे यह सिखाया है कि हमें सबकी रेस्पेक्ट करनी चाहिए चाहें वो अमीर हो या गरीब, बड़ा हो या छोटा।

 आपको अपने मम्मी-पापा में क्या सबसे अच्छा लगता है और क्या खराब? 
सबसे अच्छा यह लगता है कि मम्मी पापा मुझे बहुत प्यार से समझाते हैं। गलती करती हूं तो थोड़ा डांटते हैं पर फिर प्यार भी करते हैं और मेरी गलती भी बताते हैं। और जो बात मुझे पापा की अच्छी नहीं लगती वो यह है कि वो मुझे मूवीज़ नहीं दिखाते और मम्मी की यह बात खराब लगती है कि वो पापा से रिक्वेस्ट नहीं करती कि साक्षी को मूवीज़ दिखाओ।

और कौन सी चीज़े हैं जो आपको अच्छी नहीं लगती?
जब मम्मी-पापा डांटते हैं तो मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगता। मुझे डांट खाने से नफरत हैं। इसके अलावा मुझे घर में शांति अच्छी नहीं लगती। शांति रहती है तो मैं बोर हो जाती हूं। मुझे दूध पीना और सुबह-सुबह उठकर स्कूल जाना भी अच्छा नहीं लगता क्योंकि जल्दी उठने के कारण मेरी नींद पूरी नहीं होती।

हीरोइन्स कौन सी पसंद हैं?  
करीना, केटरीना और आलिया। मुझे कैटरीना का स्टाइल पसंद है, करीना का टैलेंट और आलिया की सुंदरता...

आपके लिए दुनिया में सबसे ज़रूरी क्या है?
मेरी फैमिली, फ्रैंड्स और मेरी रेप्यूटेशन।

रेप्यूटेशन से क्या मतलब है आपका?
मतलब, सभी लोगों की नज़र में मैं हमेशा एक अच्छी लड़की बन कर रहूं। सब लोग यह कहें कि कितनी इंटैलीजेंट, स्वीट और अंडरस्टैन्डिंग लड़की है। अच्छी रेप्यूटेशन होनी बहुत ज़रूरी है। रेप्यूटेशन नहीं तो कुछ नहीं।

और आपके हिसाब से ज़िंदगी में सबसे महत्वपूर्ण क्या चीज़े होती हैं?
स्टडीज़- अगर आप लाइफ में कुछ बनना चाहते हो तो स्टडीज़ बहुत ज्यादा ज़रूरी हैं। और इसके बाद टीवी, टैबलेट्स, फेसबुक, मोबाइल, मूवीज़ और फैशन...

आप अपने फ्रैंड्स कैसे चुनती हो, मतलब कैसे लोगों को फ्रैंड बनाना पसंद करती हो?
जो मेरी एज के हों, स्वीट हो, लविंग हो, फ्रैंडली हो, मेरी तारीफ करे, मुझे कॉम्पलिमेंट्स दें। मुझसे चिढ़े ना और मेरी किसी बात पर ओवररिएक्ट ना करे।

आपको अपने भारत देश की किस चीज़ से चिढ़ है?
गंदगी से। और कंट्रीज इतनी नीट एंड क्लीन होती हैं पर हमारा इंडिया बहुत गंदा रहता है। यहां के लोग कितना क्राइम करते हैं। इतना प्रोटेस्ट होता रहता है लेकिन लोग सुधरते ही नहीं हैँ। यहां ब्लैक मनी भी बहुत हैं। लोग सिर्फ आपको तभी सपोर्ट करते हैं जब आप रिच हों। और एक जो सबसे बड़ी प्रॉब्लम जो मुझे लगती है वो यह कि यहां के लोगों को एंगर कंट्रोल करना नहीं आता। ज़रा-ज़रा सी बात पर कहीं भी खड़े होकर लड़ने-झगड़ने और चिल्लाने लगते हैं।

अगर आपको इंडिया का प्राइम मिनिस्टर बनाया जाए तो आप क्या क्या काम करोगी?
मैं कंट्री को नीट रखने के लिए स्ट्रिक्ट कानून बनाऊंगी। इसके बाद इतने सारे केसेज जो लटके रहते हैं और जिनका फैसला नहीं होता उनके लिए कानून बनाऊंगी कि केस जल्दी से जल्दी सॉल्व किए जाएं। और सबसे इम्पॉर्टेन्ट बात, मैं यह कानून बनाऊंगी कि इंडिया में हर तीन घंटे में फैशन बदलना चाहिए और सारे लोगों को उसे फॉलो करना चाहिए।  मैं यह कानून लागू करूंगी कि सारे बच्चों को उनके मम्मी-पापा उनके मनपसंद गेम्स दिलाएं, उन्हें मना ना करें। स्कूल की सारी क्लासेज में स्मार्ट बोर्ड और एसी होना ही चाहिए, मैं इसे भी कम्पलसरी कर दूंगी।

अगर तुम्हें एक बार मौका मिले कि तुम अपनी मर्जी से कुछ भी चेंज कर सकती हो तो क्या चेंज करोगी।
पहले तो मैं अपने घर को बंग्ले में कन्वर्ट कर दूंगी और दूसरे अपनी गाड़ी मर्सिडीज़ गाड़ी में बदल दूंगी और वो भी पांच करोड़ साठ लाख रुपए वाली मर्सिडीज़ में।

भगवान तुमसे तीन दुआएं मांगने को कहे तो क्या मांगोगी?
पहली यह कि कभी मेरे गन्दे मार्क्स ना आएं। दूसरी कॉपी में सारा काम हमेशा कम्पलीट रहे और तीसरी यह कि मुझे मम्मी-पापा कभी भी डांटे नहीं।

(For Sakshi :-))



Sunday, 1 September 2013

ईकोनॉमिक हिटमैन... विकासशील देशों को विकसित देशों का गुलाम बनाने वाले पेशेवर...



किसी भी देश की रीढ़ होती है उसकी अर्थव्यवस्था, और ईकोनॉमिक हिटमैन इसी रीढ़ को तोड़कर विकासशील देशों को विकसित देशों का गुलाम बनने पर मजबूर करते हैं। यह वो पेशेवर हैं जिनका काम थर्ड वर्ल्ड कन्ट्रीज़ को आर्थिक रूप से इतना कमज़ोर करना है कि यह राष्ट्र खुद अपने प्राकृतिक संसाधनों का नियंत्रण धनवान मुल्कों के हाथ में देने के लिए तैयार हो जाए जो मुफ्त में उनका भरपूर दोहन कर सकें। 

मद्रास कैफे में एक शब्द सुना- इकोनॉमिक हिटमैन। शब्द नया था। पहली बार सुना था। जानने की इच्छा हुई तो गूगल पर ढूंढा और जो चौंकाने वाली जानकारियां मिली उन्हें सबके साथ शेयर कर रही हूं।

गूगल पर 'ईकॉनोमिक हिटमैन' की कोई परिभाषा नहीं है। लेकिन विकीपीडिया पर जॉन पर्किन्स की आत्मकथा "कन्फैशन्स ऑफ एन ईकोनॉमिक हिटमैन" की विवेचना दी गई  है जिसमें पर्किन्स ने ईकोनॉमिक हिटमैन क्या होता है, यह समझाया है।

ईकोनॉमिक हिटमैन काफी अच्छी सेलरी पाने वाले वो लोग होते हैं जो पूरे विश्व के कई देशों के अरबों-खरबों रुपए धोखे से हड़पने का काम करते हैं। यह लोग विश्व बैंक, यूनाईटेज स्टेट्स एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवेलपमेंट (USAID) और अन्य विदेशी सहायता संगठनों से पैसे निकालकर उनसे विश्व की  बड़ी-बड़ी कॉरपोरेशन्स और कुछ अति धनवान परिवारों की तिजोरिया भरते हैं जो इन पैसों और रसूख से पूरे विश्व की प्राकृतिक सम्पदाओं को नियंत्रित करते हैं। इसके लिए यह लोग झूठी फाइनेंशियल रिपोर्टस, जबर्दस्ती थोपे गए चुनाव, रिश्वत, फिरौती, सेक्स और यहां तक कि हत्या जैसे कामों का भी सहारा लेते हैं।

इन पेशेवरों का काम विकासशील देशों के राजनीतिक और आर्थिक नेताओं को वर्ल्ड बैंक या यूएसएड सरीखी वैश्विक संस्थाओं से भारी-भरकम विकास कर्ज लेने के लिए राज़ी करना है। और जब यह देश इन भारी-भरकम कर्ज़ों को लौटा पाने की स्थिति में नहीं होते तब कर्ज़ माफ़ी के नाम पर अमेरिका जैसे बड़े देश उनसे अपनी शर्ते मनवाते हैं।




 कर्ज नहीं चुका पाने के कारण इन छोटे राष्ट्रों के नेता राजनीतिक, आर्थिक और अन्य आंतरिक मामलों पर विकसित देशों की दखलंदाजी सहने के लिए विवश हो जाते हैं। इस तरीके से यह ईकोनॉमिक हिटमैन विकासशील देशों और विकसित देशों के बीच की आर्थिक खाई को और गहरा करने और गरीब देशों की अर्थव्यवस्था को पंगु बनाने का काम करते हैं ताकि विकसित देश अपनी मनमानी कर सकें।

उदाहरण के तौर पर जी-आठ देश जब थर्ड वर्ल्ड कन्ट्रीज़ के कर्ज़ों को माफ करते हैं तो इन देशों से बहुत सी शर्तें भी मनवाते हैं जैसे-

  • देश की मुख्य जन सेवाओं जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा, बिजली, पानी आदि का निजीकरण करना
  •  विभिन्न सेवाओं और वस्तुओं पर दी जा रही सब्सिडी को धीरे-धीरे खत्म करना
  • वो सभी व्यापार प्रतिबन्ध या सब्सिडी हटाना जो लोकल बिजनिस को बढ़ावा दें
  • जी 8 देशों और अमेरिका द्वारा इनके देश में किए जा रहे उद्योगों और व्यवसायों पर सब्सिडी और सहायता देना
  •  वो सभी व्यापार नीतियां बदलना जो जी-8 देशों से आयातित चीज़ों और सेवाओं को बढ़ावा नहीं देती

कॉरपोरेटोक्रेसी कहलाती है यह व्यवस्था 

 जॉन पर्किन्स ने इस व्यवस्था को 'कॉरपोरेटोक्रेसी' का नाम दिया है।  कॉरपोरेटोक्रेसी- यानि विकसित देशों की सरकारों,  बैंकों और अत्यन्त धनवान कॉरपोरेशन्स का संगठन जो विकासशील देशों का पैसा धोखे से हड़पकर उनसे अपनी मांगे मनवाने का काम करता है।

 यह होते हैं एक इकोनॉमिक हिटमैन के काम-


जॉन पर्किन्स ने अपनी आत्मकथा "कन्फेशन्स ऑफ एन ईकोनॉमिक हिटमैन" में बताया है कि उन्हें एक अतर्राष्ट्रीय कंसल्टिंग फर्म के अर्थशास्त्री के रूप में नियुक्त किया गया था लेकिन वास्तविक तौर पर वो अमेरिका के ईकोनॉमिक हिटमैन थे और उन्हें निम्न काम सौंपे गए थे-

 -उन सभी देशों जो कि अमेरिका के लिए कूटनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण थे, को आधारभूत विकास के लिए अमेरिका या विश्व बैंक से भारी विकास कर्ज लेने के लिए तैयार करना।
-साथ ही यह भी सुनिश्चित करना कि विकासशील देशों में इस कर्ज़े से शुरू होने वाले सारे प्रोजेक्ट्स अमेरिकी कॉरपोरेशन्स को ही मिलें।
-इन देशों को दिवालिया होने के कगार तक पहुंचाना जिससे वो कभी भी कर्ज़  लौटाने की स्थिति में ना आ पाएं और हमेशा अमेरिका के एहसानों तले दबे रहें।

 (इसके बदले में अमेरिका इन देशों को अपनी गलत मांगे मानने के लिए मजबूर करता है जैसे अमेरिकन मिलिट्री के लिए अपने देश में बेस बनाने की अनुमति देना। संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका का समर्थन करना और अपने देश के प्राकृतिक संसाधनो जैसे तेल, गैस आदि का अमेरिका को इस्तमाल करने देना...) 

विकासशील राष्ट्रों को कर्जा लेने को तैयार करने के लिए पर्किन्स ऐसी फाइनेंशियल रिपोर्ट तैयार करते थे जो कि यह दिखाती थी कि कर्ज़ के इन पैसों से देश में जो इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास होगा उससे देश की जीएनपी (ग्रॉस नेशनल प्रोडक्ट) बढ़ेगी। पर्किन्स के अनुसार जीएनपी के आंकड़े इन कामों के लिए काफी उपयुक्त होते हैं क्योंकि अगर सिर्फ एक व्यक्ति या कंपनी की आय में भी वृद्धि हो जाए तो जीएनपी में वृद्धि दिखने लगती है।

इन सभी प्रोजेक्ट्स के ज़रिए अमेरिकी कॉन्ट्रैक्टर्स, कंसट्रक्शन कंपनिया और कॉरपोरेशन्स खूब पैसा कमाती हैं। संबंधित देश के कुछ धनवान परिवारों, जो कि राजनीति में भी हस्तक्षेप रखते हैं, को भी इन डील्स से अच्छे पैसे मिलने का लालच रहता हैं और इसलिए वो भी विकसित देशों की इन गलत नीतियों का समर्थन कर देते हैं।

इन देशों के राजनेता भी यह सोचकर यह कर्ज लेने को तैयार हो जाते हैं कि इसके ज़रिए आधारभूत संरचना जैसे सड़को, हवाईअड्डों, यातायात साधनों आदि का जो विकास होगा उसका क्रेडिट उन्हें मिलेगा और राजनीति में उनकी जगह पक्की रहेगी जबकि असलियत यह है कि कर्ज़ मछली को फंसाने के लिए चारे की तरह इस्तमाल किए जाते हैं।

विकासशील राष्ट्र अक्सर यह कर्ज चुका पाने की स्थिति में नही ंहोते। धनवान देशों की मांगे मानी जाती हैं और देश के नागरिक सालों तक कर्ज में डूबे रहते हैं। सरकारी धन की कमी के चलते उन्हें स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी आधारभूत सुविधाओं के साथ महत्वपूर्ण वस्तुओं पर मिलने वाली सब्सिडी से भी हाथ धोना पड़ता है।

पर्किन्स ने यह भी बताया है अमेरिका इन्हीं ईकोनॉमिक हिटमैन की बदोलत इतना धनवान देश बना है और लगभग सभी विकसित देश इनका प्रयोग करते हैं। हांलाकि प्रत्यक्ष रूप से कोई देश स्वीकार नहीं करता कि वो इन पेशेवरों का इस्तमाल करता है लेकिन सच्चाई यहीं है कि ऐसे हिटमैन होते हैं। देश के नागरिकों को भनक तक नहीं लगती, कोई युद्ध नहीं होता, कोई खून-खराबा नहीं और छोटे देश धनवान देशों के अनकहे गुलाम बन जाते हैं।