Sunday, 11 August 2013

Confessions of a wife.... एक पत्नि का कुबूलनामा...

समाज में पत्नियों के बारे में बहुत कुछ कहा और सुना जाता रहा है। लोग अपने हिसाब से पत्नी को नई नई उपमाएं देते हैं। कोई कहता है हम तो अपनी पत्नी से बहुत डरते हैं और कोई कहता है कि पत्नी तो बस लड़ती रहती है। पत्नी के ऊपर खूब चुटकुले बने, खूब मज़ाक उड़ाए गए और जितना कहा जा सकता था कहा गया। कभी पत्नी, पति के जीवन में ज़हर घोलने वाली बनी, कभी सास को सताने वाली बनी, कभी हिटलर बनी तो कभी जासूस के नाम से उसे नवाज़ा गया। चुटकुलो, कहानियों, कविताओं और व्ययंगो में उसे जी भर के इज़्जत बख्शी गई। उसे पूजा गया तो सिर्फ मां के रूप में पूजा गया जबकि पत्नी के रूप में उसने कभी बेइज़्जती सही, कभी व्यंयग के बाण सहे, कभी गालियां खाई, कभी मार, कभी फटकार और शायद हमेशा ही बचा हुआ खाना, वो भी सबसे आखिरी में। आज ऐसी ही एक शिक्षित पत्नी से के कुबूलनामे को लेकर हम आपके सामने उपस्थित हैं। इस पत्नी की तस्वीर माफ कीजिएगा, नहीं दे पाएंगे क्योंकि वो नहीं चाहती।

क्या आप एक आदर्श पत्नी है।
बिल्कुल नहीं। जब मेरा पति आदर्श पति नहीं है तो मैं भी तो उसी की पत्नी हूं। पति के रास्ते ही चलूंगी। लेकिन फिर भी मैं उससे बहुत बेहतर हूं।

आपके पति तो काफी पढ़े लिखे इंसान हैं, आप भी नौकरी करती हैं, तो क्या आप दोनों के बीच अच्छा सामंजस्य है?
शादी से पहले तक मैं भी यहीं समझती थी कि पढ़ा-लिखा इंसान एक अच्छा इंसान होता है लेकिन शादी के बाद मेरा भ्रम टूट गया। मुझे समझ में आ गया कि पढ़ा लिखा इंसान दरअसल ज्यादा खराब होता है क्योंकि एक गंवार इन्सान जब अपनी पत्नी को गालियां देता है, चीखता चिल्लाता है तो हम यह कह देते हैं कि यह तो गंवार है इसे अपनी पत्नी से बोलने की अक्ल नहीं लेकिन वहीं काम अगर एक ऐसा पढ़ा लिखा इंसान करे जिसने सोसाइटी के तौर तरीके सीखे हैं, ऊंची पढ़ाई पढ़ी है, गाड़ी में घूमता है, अच्छे कपड़े पहनता है तो उसे हम क्या कहेंगे। एक गंवार है इसलिए ग़लती कर रहा है और दूसरा पढ़ा लिखा होकर भी ज़ाहिलो जैसी हरकत कर रहा है। आपको किस पर ज्यादा अफसोस होगा?

आजकल पति काफी सहायता करते हैं घर पर पत्नियों की। आपके भी करते होंगे?
बिल्कुल करते हैं। लेकिन सिर्फ उतनी ही जितनी करना चाहते हैं और सिर्फ तब तक, जब तक उनका मन करें। लेकिन मेरे साथ ऐसा नहीं है, मैं चाहूं ना चाहूं मुझे काम करना ही पड़ता है। आराम करना चाहूं तो भी और नहीं करना चाहूं तो भी।

क्या आप अपने पति की इज़्जत करती हैं?
हां सबके सामने तो इज़्जत से ही बोलना पड़ता है। और फिर मेरे संस्कार है तमीज़ से बोलने के तो मैं तमीज़ से ही बोलती हूं लेकिन जहां तक मन से इज़्जत करने की बात है मैं नहीं करती।

क्यों...
क्योंकि मेरे पति ने एक भी पति धर्म नहीं निभाया है। शादी के सात फेरों के समय उन्होंने वचन दिया था कि वो जब भी कोई खर्चा किसी भी समय, किसी भी चीज़ पर या किसी के लिए भी करेगें , उसमें मेरी मंत्रणा लेगें, लेकिन वो तो ऐसा कभी नहीं करते बल्कि अगर मैं पूछती भी हूं तो मुझे जली कटी सुनने को मिलती है। दूसरा वचन- वो मेरे मायके वालों को भी उतनी ही इज़्जत देंगे जितनी कि अपने घरवालों को देते है लेकिन यह वचन भी हमेशा ही टूटता है। वो यह चाहते हैं कि मैं उनके मां बाप की पूजा करूं लेकिन मेरे माता-पिता को वो जब चाहे बेइज़्जत कर देते हैं। और एक वचन यह भी था कि वो कभी भी मुझे चार लोगों, मेरी सहेलियों के बीच बेइज़्जत नहीं करेगें, कभी कुछ गलती निकालनी होगी या डांटना होगा तो अकेले में बोलेगें लेकिन यह वचन भी मेरे पति ने नहीं निभाया। वो तो किसी के भी सामने मेरे से कुछ भी बोल देते हैं। मेरे बराबर वालों और बड़ो के सामने तो छोड़ो, मुझसे छोटे बच्चों तक के सामने मुझे डांट देते हैं। आप ही बताईए वचन लेकर ही तो हम पति-पत्नि बने थे लेकिन जब वो अपने वचन निभा ही नहीं रहे तो हम पति पत्नि तो बस नाम के ही हुए ना। बल्कि मैं तो यह कहूंगी वो मेरे पति रहे ही नहीं सिर्फ मेरे बच्चों के पिता हैं। फिर मैं उनकी पति के तौर पर इज़्जत क्यों करूं।

पर आप के पति में कोई तो खूबी होगी?
पति में नहीं एक बेटे में हैं। वो दुनिया के सबसे अच्छे बेटों में से एक हैं। अपनी मां की बहुत इज़्जत करते हैं लेकिन सवाल यह है कि यह कैसी इज़्जत है कि वो अपनी मां की तो इज़्जत कर रहे और दूसरों की मां की बेइज़्जती। और मां की इज़्जत करने वाला क्या पत्नि की इज़्जत नहीं करता। कैसा दोगला चरित्र है तुम्हारा। तुम मां की इज़्जत करते हो और अपनी जीवनसाथी पत्नि को गालियां देते हो जो तुम्हारे ही बच्चे की मां है।

तो आप सास की वजह से परेशान हैं?
नहीं बिल्कुल नहीं। सास तो बहुत बाद में आती है। मेरे और उनके बीच की कड़ी तो बेटा है। जब वो मेरी इज़्जत नहीं करेगा तो सास-ससुर या कोई भी और रिश्तेदार क्यों करेगा। यह तो मानी हुई बात है कि मायके में पति की इज़्जत करवाना पत्नि के हाथ में है और ससुराल में पत्नि की इज़्जत करवाना पति के हाथ में। आज अगर ससुराल में कोई मुझ पर हावी हो रहा है या मेरे से बदतमीज़ी कर रहा है तो यह उसकी गलती नहीं है, मेरे पति की गलती है जो उसे ऐसा करने दे रहा है। सास और पत्नी के बीच संतुलन कायम करना तो पति का काम है ना।

अगर ऐसा है तो आपके सास से तो काफी मधुर संबंध होंगे।
कैसे होंगे। अगर सास मुझसे कुछ कहे तो मेरे पति कहते हैं कि कोई बात नहीं बड़ी हैं सुन लो और अगर मैंने रोज़मर्रा के काम के दौरान छोटी सी भी बात बोल दी तो आप इसको लेकर मुझसे झगड़ोगे, यह बोलोगे कि तू तो मेरी मां को घर से निकालना चाहती है, लड़ना चाहती है तो इस तरह से तो आप खुद अपनी पत्नि को मां से दूर कर रहे हो ना। मतलब अगर बेटा अपनी मां को कुछ बोले तो ठीक लेकिन हम तो दूसरे घर के हैं हम कैसे बोल सकते हैं... तो यह भेद तो बेटा ही पैदा कर रहा है ना।

इसकी वजह आप क्या मानती है?
पूर्वाग्रह से ग्रसित नज़रिया। पति यह मानकर चलते हैं कि उनकी मां कभी कोई गलती कर नहीं सकती और  पत्नि कभी सुधर नहीं सकती। वो हमेशा ही गलत होगी। जबकि वो यह भूल जाते हैं कि शादी के बाद पत्नि के प्रति तो उनका कर्तव्य और बढ़ जाता है। हमारे शास्त्रों में पूजा भी तब पूरी होती है जब पति और पत्नि मिल कर उसे अंजाम दें। मां अगर देवी है तो पत्नि भी गृहलक्ष्मी होती है। अगर तुम गृहलक्ष्मी की इज़्जत नहीं करते तो कभी तु्म्हें बरकत नहीं मिलती।

आपको क्या लगता है। घर में आप दोनों के झगड़े का असर बच्चो पर भी पड़ता है?
हां पड़ता है ना। मेरे बच्चे देखते हैं ना कि कैसे पापा और मम्मी आपस में लड़ते रहते हैं। कैसे पापा नानी-नाना और मामा मौसी के बारे में गलत बोलते रहते हैं और कैसे पापा हमेशा दादी को फेवर करते हैं। और वो यह भी देख रहा है कि इन वजहों से घर में सब अलग थलग रहते हैं। ना पापा मम्मी से बोलते हैं ना मम्मी पापा से। जिस के पास जाओ वो उन्हें डांट देता है। सारा गुस्सा उन पर निकलता है। घर में प्यार और एक दूसरे को इज़्जत देने का कोई माहौल ही नहीं है। देखते हैं बच्चे सब और वहीं सीख रहे हैं।

तो आपको तो इस दिशा मे कुछ करना चाहिए।
कैसे करूं। अकले कितना करूं। इंसान कहां तक और कितना चुप रहेगा। कोई गंदगी उड़ाएगा तो छींटे तो उस के साथ साथ आस-पास खड़े सारे लोगों पर पड़ेंगे ना। बच्चे गाली देना सीख रहे हैं, लड़ना झगड़ना सीख रहे हैं और आगे जाकर वो भी यहीं करेंगे जो हम लोग कर रहे हैं। इसका हल मैं अकेले तो नहीं कर सकती ना। बच्चों की दुनिया तो मां-बाप दोनों होते हैं ना। किसी एक से तो वो नहीं सीख सकते। उन्हें तो दोनों का प्यार और साथ चाहिए जब वो नहीं मिल रहा है तो वो कैसे एक प्यार के सौहाद्रपूर्ण वातावरण में बड़े होंगे। कैसे अच्छे इंसान बनेंगे और कैसे अपने परिवार से प्यार करना सीख पाएंगे।

शादीशुदा ज़िंदगी के बारे में कुछ कहना चाहेंगी।
सिर्फ इतना कहना चाहूंगी कि शादीशुदा ज़िंदगी नसीब से मिलती है। इसे ग्रांटेड नहीं लेना चाहिए। कितने ही लोग है जो शादी के लिए तरस रहे हैं। एक ज़िंदगी है, छोटा सा जीवन है और उसमें भी हम एक दूसरे की इज़्जत नहीं कर सकते। वो पल जिन्हें हम यादगार बना सकते हैं जिनमें अपने बच्चों का भविष्य संजो सकते हैं, संवार सकते हैं,  उन्हें इस तरह एक दूसरे से लड़ाई झगड़े में बेकार कर रहे हैं। प्यार से रहने के लिए बस एक दूसरे को इज़्जत ही तो देनी पड़ती है लेकिन हम पूरी दुनिया को तो इज़्जत देते है पर जो हमारा जीवनसाथी है उसी को इज़्जत देना भूल जाते हैं। और जब आंख खुलती है तब तक अक्सर बहुत देर हो चुकी होती है।