Wednesday, 21 August 2013

आसाराम बापू की एक भक्त की अंधश्रद्धा की कहानी

आज टीवी पर आसाराम बापू से जुड़ी खबर देखी तो हाल ही में आसाराम बापू की भक्त से हुई एक मुलाकात याद आ गई। सोचा आप सब से साझा करूं।
बात एक महीने पहले की है, मेरे एक जानने वाले हैं। आसाराम बापू के भक्त हैं। हर साल नए वर्ष पर उनके द्वारा छपवाए गए आसाराम बापू के उपदेशों के कैलेंडर हमारे यहां  उपहार स्वरूप आते हैं। लगभग दो महीने पहले उनके नए घर में जाने का मौका मिला। आधुनिक गैजेट्स और सुख-सुविधाओं से परिपूर्ण घर।

सुघड़ पत्नी जो घर का हर काम खुद करती हैं और दो बेहद प्यारे बच्चे। घर के ड्रॉइंग रूप में आसाराम बापू की एक बड़ी सी तस्वीर लगी थी। चूंकि हमारे साथ भी दो बच्चे गए थे तो वो वहां पहुंचते ही परिचित के बच्चों के साथ दूसरे कमरे में चले गए। नाश्ते और चाय से फुरसत के बाद बच्चों के कक्ष में जाकर देखा तो, हैरान रह गई... उनके बच्चों के साथ मेरा बेटा और भतीजी दोनों लैपटॉप पर आसाराम बापू के प्रवचन देख रहे थे...

 कोई ढाई घंटे हम वहां रहे। उस दौरान परिचित की पत्नी की सुघड़ता और परिचित के घर की साज सज्जा की तारीफ करते रहे। घर था ही इतना साफ और सजा संवरा। पत्नी जी थी हीं इतनी सुलझी और सुघड़ कि मन प्रसन्न हो गया। उस दौरान उन्होंने अपने आसाराम बापू के अनन्य भक्त होने की बात भी बताईं। बताया कि वो बापू के हर उपदेश को मानते हैं और उनका जो कुछ भी है आसाराम बापू का ही दिया हुआ है.....। जब हम घर से विदा हो रहे थे तो पत्नी जी ने बच्चों को पहली बार घर आने के उपलक्ष्य में उपहार भी दिए।

उनके घर से निकलकर गाड़ी में वापस आने लगे तब मेरी भतीजी-  छठी कक्षा की छात्रा, बोली- चाची कैसे लोग थे, कैसे बच्चे थे, आपको पता है वो लोग लैपटॉप पर कोई गेम नहीं खेलते, सिर्फ आसाराम बापू के उपदेश सुनते हैं। टीवी पर कोई सीरियल भी नहीं देखते और जब हम लोगों ने उनसे लूडो खेलने को कहा तो उन्होंने लूडो खेलने से भी मना कर दिया। उन्होंने बताया कि उनकी मम्मी ने लूडो की गोटियां फेंक दी हैं और वो उन्हें लूडो नहीं खेलने देती...। आपको पता है चाची वो दोनों बच्चे किसी बर्थडे पार्टी में भी नहीं जाते, फिल्म भी नहीं देखते बस घर पर बापू के उपदेश सुनते हैं।

मैं हैरान... भतीजी को डांटा ऐसा नहीं कहते। अपने बेटे को भी चुप करा दिया.... लेकिन मन में सवाल उठने लगे... क्या आसाराम बापू को मानने वाले लूडो नहीं खेलते.....क्या लूडो वाकई इतना बुरा खेल है कि उसे उठाकर फेंक दिया जाए....क्या बच्चों का इस उम्र में सिर्फ उपदेश सुनना ज़रूरी है..... पत्रकार हूं, जिज्ञासु हूं और मन में सवाल उठते हैं तो एक बार पूछ कर समाधान ज़रूर ढूंढने की आदत है सो मन बना लिया कि अगली बार यहां आना हुआ तो पत्नी जी से इस बारे में पूछूंगी ज़रूर।

अगली बार लगभग एक महीने बाद जाना हुआ। इस बार साथ मेरी भाभी भी थी। रसोई में हम तीनों मिले तो सबसे पहले पत्नी जी से यही कहा कि आप आसाराम बापू की भक्त हो। इतनी अनुशासन प्रिय हो, आपके बारे में जानने और लिखने की इच्छा है। तुरंत पत्नी जी हंसते हुए बोली कि मुझे पता है पिछली बार आपके बच्चों को यहां अच्छा नहीं लगा था। आपकी भतीजी मेरे बेटे से बोल कर गई थी कि टीवी पर क्या बकवास देखते रहते हो...
उनको हंसते हुए बच्चों की बात करते देख मन प्रसन्न हो गया। सोचा यह तो बड़ी अच्छी है खुल कर बात करेंगी। खैर अपना मंतव्य उन्हें बताया। अपने बच्चो द्वारा बताई सारी बातों के साथ यह भी पूछा कि क्या लूडो खेलना आप बुरा मानती हैं...पत्नी जी मुस्कुराते हुए बोली कि नहीं बुरा नहीं मानती लेकिन अगर यह बच्चे लूडो खेलेंगे तो उन्हें लत लग जाएगी और यह मैं नहीं चाहती...। उन्होंने बताया कि उनके बच्चे टीवी देखते हैं लेकिन केवल डिस्कवरी चैनल। वो भी टीवी पर सिर्फ चुनिंदा कार्यक्रम देखती हैं जैसे दिया और बाती सीरियल जिससे कुछ सीखने को मिलता है..।यह भी बताया कि उनके धार्मिक स्वभाव के कारण कॉलोनी के बाकी महिलाएं उन्हें पसंद नहीं करती लेकिन वो चूंकि आसाराम बापू की भक्त बनकर बाकी महिलाओं से ऊपर उठ चुकी हैं, उन्हें फर्क भी नहीं पड़ता ....

रहा नहीं गया मैंने पूछ डाला कि बच्चों को आप अगर घर में रोक भी लेंगी तो स्कूल में भी तो गेम खेल सकते हैं, इतने छोटे बच्चो पर अंकुश लगाने का क्या फायदा..इस पर पत्नी जी बोली कि यह स्कूल में क्या सीखेंगे, मेरे बच्चों ने तो अपने स्कूल के बच्चों को बदल दिया है। और फिर हम घर पर तो इन्हें संस्कार देते हैं, इनका ख्याल रखते हैं कैसे बिगड़ेंगे। मैंने पूछा कि क्या आसाराम बापू ऐसा कहते हैं... तो उन्होंने बताया कि नहीं बापू सिर्फ मंत्र देते हैं। वो हमारे गुरू हैं जब उनकी शरण में गए हैं तो उनके उपदेशों को तो मानना ही चाहिए।

फिर उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या आप गुरू में नहीं मानती। आसाराम जी गुरू हैं हमारे, और गुरू के बिना भगवान नहीं मिलते.... मैंने जवाब दिया कि मैं भगवान में मानती हूं। लेकिन मुझे अब तक कोई गुरू नहीं मिला है और आसाराम बापू जैसे गुरूओं में मैं नहीं मानती जो इतनी लक्ज़ूरियस लाइफ जीते हैं....

बस मेरा इतना कहना था कि पत्नी जी के तेवर बदल गए। कहने लगी कि आपको कैसे पता कि वो ऐसी लाइफ जीते हैं। मैंने कहा कि उनकी काफी कंट्रोवर्शियल लाइफ है काफी इल्ज़ाम लगे हैं बस इसलिए पूछ रही हूं तो पत्नी जी गुस्से में बोली...सारी दुनिया आकर अगर य़ह भी कहे कि आसाराम बापू ने खून किया है हम तब भी नहीं मानेंगे। आपको शायद पता नहीं कि बिना गुरू के भगवान नहीं मिलते। आप कितनी भी कोशिश कर लो, आपको भगवान मिलेंगे ही नहीं जब तक आपके पास गुरू ना हो। और आसाराम बापू ऐसे ही गुरू हैं......

 मुझे भी अपनी गलती समझ में आ गई थी तुरन्त संशोधन किया कि मैं आपके गुरू के लिए कुछ नहीं कह रही बस अपना जिज्ञासा शांत कर रही हूं। मैंने उन्हें यह यह भी समझाया कि भगवान में मैं भी मानती हूं, बल्कि मैं गणेश जी की भक्त हूं लेकिन बस इस में नहीं मानती कि मुझे भगवान तक पहुंचने के लिए गुरू के सहारे की ज़रूरत है, और है भी तो आजकल पहले जैसे गुरू कहां मिलते हैं...। इस पर पत्नी जी और भड़क उठी... बोली कि आप खुद भगवान तक नहीं पहुंच सकते, गुरू ही आपकी पूजा भगवान तक पहुंचाता है, आपकी इच्छाएं भगवान तक पहुंचाता है और वो ही इतना ऊपर उठा हुआ होता है कि उसके ज़रिए ही भगवान आपकी बाते सुनते हैं और आपकी इच्छाएं पूरी करते हैं, वरना नहीं।

अब तक जो पत्नी जी मुझे समझदार लग रही थीं, पर उनकी इस अव्यावहारिकता पर मैं तिलमिला उठी.. वो अपने गुरू ज्ञान को सबसे बढ़कर मानती हैं यह अच्छी बात है लेकिन इसके कारण वो मेरी पूजा पर सवाल उठाएंगी इस बात की मुझे पत्नी जी से उम्मीद नहीं थी।

खैर अपने आपको भरसक शांत रखने की कोशिश करते हुए उनसे यहीं कहती रही कि मैं भगवान में मानती हूं और मैंने कई बार भगवान की उपस्थिति भी महसूस की है... और पत्नी जी यहीं जि़द करती रहीं कि चूंकि उनके आसाराम जैसे गुरू हैं उन्हें भगवान मिलेगा और इतना देगा कि उनकी झोली छोटी पड़ जाएगी लोकिन मैं कितनी भी पूजा-पाठ क्यों ना कर लूं मेरा कोई भला नहीं होने वाला.... अब तक तीखी बहस के कारण पत्नी जी का मूड काफी खराब हो चुका था।
खैर बुरा मुझे भी लगा था और फिर अप्रिय बहस होते देख हम लोग जल्दी ही विदा लेकर चले आए।

....... अब इस घटना के बारे में सोचती हूं तो लगता है कि जो लोग आसाराम बापू में यकीन करते हैं वो वाकई उनके अंधभक्त हैं... या शायद हो सकता है उन्हें ऐसा कुछ आनंद मिला हो जो  वो बापू के बारे में कोई बात नहीं सुनना चाहते और उन्हीं के रास्ते पर चलना चाहते हैं। यह भी सच हैं कि पत्नी जी ने बहुत सी अच्छी बातें भी बताईं जो कि अमल में लाने लायक थी लेकिन जो मुझे चुभा वो  थी उनकी अव्यावहारिकता और तर्कहीन विश्वास...
इस घटना के बाद मुझे यकीन हो गया कि आसाराम बापू जैसे लोग यूंही हवा में बाते नहीं करते, उन्होंने वाकई अपने अंध समर्थक बनाए हैं...और उनके ऊपर कोई आरोप सिद्ध हो भी गया तो उनके अनुयायी बापू का कुछ नहीं होने देंगे।

मैं नहीं जानती कि मीडिया में उठने वाली कंट्रोवर्सीज का कोई आधार है, या नहीं या फिर आसाराम बापू कितने अच्छे गुरू या इंसान हैं लेकिन मैं इतना ज़रूर जानती हूं कि बड़े से बड़ा अनुयायी और गुरू अपने ऊपर लगाए गए आरोपों को भी उसी गरिमा से हैंडल करता है जितना कि वो अपनी प्रशंसा को करता है...और अगर गुरू की भक्ति आपकी सोच को सिर्फ ऐसा ही बना दे कि आपको लगे कि आप जो कह रहे हैं वहीं सच है, दुनिया में कोई और सच हो ही नहीं सकता या फिर आप अपने गुरू को ही भगवान का दर्जा देने लगें और दूसरो की बातों और विश्वास को गलत बताने लगे, तर्कहीन बातें करने लगे तो यह उत्थान का इशारा है या फिर पतन का..... ...?