Tuesday, 6 August 2013

एक तलाकशुदा महिला का साक्षात्कार

कहते हैं भारतीय समाज बहुत आधुनिक हो गया है, लोग खुले विचारों और खुलेपन के साथ सबकुछ स्वीकार करने लगे हैं लेकिन फिर भी कुछ सच हैं जो कभी नहीं बदलते और उन्हीं में से एक सच यह भी है कि आज भी हमारा भारतीय समाज तलाकशुदा महिलाओं के मामले में पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं और उनके प्रति पक्षपात पूर्ण रवैया रखता है। सच क्या है यह जानने के लिए हमने आज के ज़माने की सफल और आधुनिक नारी का प्रतिनिधित्व करने वाली एक तलाकशुदा महिला मिस गीता आहूजा से बात की। मिस आहूजा एक सफल इंटीरियर डिज़ाइनर हैं, दिल्ली में उनका अपना ऑफिस हैं। तलाकशुदा होने के बावजूद मिस गीता आहूजा आज खुश हैं, आज़ाद है लेकिन उनकी यह खुशी, दर्द की जिन सीढ़ियों पर चलकर हासिल हुई है, उनके बारे में जब हमने उनसे पूछा तो उन्होंने दिल खोलकर हमसे बात की। आप भी जानिए कि इस समाज की हकीकत क्या है और तलाकशुदा महिलाओं को किस नज़र से देखा जाता है...
एक सफल इंटीरियर डिज़ाइनर- गीता आहूजा

आपने अपने पति से तलाक क्यों लिया? कैसे हुआ यह सब, क्यों हुआ?

मैंने जिस लड़के से शादी की थी वो एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर था। हम नेट पर मिले थे। और फिर हम दोनों के परिवारों की मर्ज़ी से हमारी शादी हो गई। शादी के बाद से ही उसने अपना काम करना छोड़ दिया था, हांलाकि मैं शादी से पहले भी इन्टीरियर डिज़ाइनिंग के प्रोजेक्ट्स लेती थी लेकिन शादी के बाद उसने मेरा यह काम भी छुड़वा दिया। वो भी काम छोड़ चुका था, मुझे भी काम नहीं करने देता था तो ज़ाहिर है घर में आर्थिक तंगी चल रही थी। जब हमारी इस बात पर लड़ाई होने लगी तब उसने कहा ठीक है तुम किसी जगह नौकरी कर सकती हो। मैं नौकरी तलाश करती थी तो वो हर बात पर नज़र रखता था, बहुत टोका-टाकी करता था कि यह नौकरी ऐसी है, यह बहुत दूर है, यह कंपनी अच्छी नहीं है या यहां के लोग अच्छे नहीं हैं वगैरह-वगैरह। हद तो तब हो गई जब वो नौकरी के लिए इंटरव्यू देने जाते समय भी मेरे साथ जाने लगा। हर समय मेरे साथ ही घूमता था। मुझे अगर पूरा दिन भी इंटरव्यू के लिए बैठना पड़े तो भी मेरे साथ बैठा रहता था। मैं किसी से फोन पर बात करती थी तो सुनता था। कोई सहेली मेरे घर आती थी तो हमारे साथ बैठ जाता था और जब मौका मिलता था कोई भी छोटी से छोटी बात पकड़कर मुझे जली-कटी सुनाते रहता था। मुझे लगता था जैसे मैं किसी जेल में बन्द हूं। मैं काफी डिप्रेशन में आ गई थी। पागल सी हो गई थी। समझ नहीं आ रहा था क्या करूं। मैंने कभी छिप कर मम्मी पापा से बात की भी तो वो भी मुझे ही समझा देते थे कि यह कोई बड़ी बात नहीं सब ठीक हो जाएगा पर उन्हें पता नहीं था कि मैं कितनी परेशान थी। आखिरकार एक दिन मैं लड़-झगड़ कर किसी तरह अकेली अपने मायके मेरठ चली गई। और दो दिन बाद लौटी तो देखा वो अपना सारा सामान लेकर घर छोड़ कर चला गया था। बस उसी दिन मैंने पक्का फैसला कर लिया कि अब मुझे इस बोझ बनते रिश्ते को खत्म करना है। मैंने महिला आयोग में अर्जी दी और 2006 में म्यूचुअल अंडरस्टैंडिंग से हमारा तलाक हो गया।

क्या तलाक का फैसला करना आपके लिए मुश्किल था, क्या किसी ने आपकी बात सुनी, आपका साथ दिया?
बहुत बहुत मुश्किल था वो वक्त, वो फैसला लेना। उस समय समझ ही नहीं आता था मैं क्या करूं। मैं मम्मी पापा से बात करती थी तो वो मना कर देते थे, समझाने लगते थे। लोग क्या कहेंगे यह सोच कर भी डर लगता था। पूरे समय मन में यही उलझन रहती थी कि क्या करूं। मन में बुरे-बुरे खयाल आते थे। लेकिन फिर मैंने ही अपने आपको हिम्मत दी। मैंने सोच लिया कि मुझे इस तरह मर-मर के नहीं जीना है। मुझे इस बोझ से आज़ादी चाहिए थी और फिर मैंने फैसला कर लिया कि चाहे जो हो जाए मैं अब तलाक लेकर रहूंगीं। मैंने अपनी छोटी बहन को सारी बातें बताईं और तब किसी ने पहली बार मेरे दुख को समझा और मेरा साथ दिया। जब मैंने मम्मी-पापा को इस फैसले के बारे में बताया तो वो तो बहुत गुस्सा हुए थे, मुझसे बात करना छोड़ दिया था वो बोलते थे कि बच्चे के बारे में सोचो बच्चा आ जाएगा तो ज़िंदगी आसान हो जाएगी। लेकिन मैं जानती थी कि बच्चे के बाद मेरे लिए इस रिश्ते को तोड़ना और मुश्किल होगा। मैं अपने फैसले पर अडिग रही और तलाक ले लिया।

तलाक के बाद भी ज़िंदगी आसान नहीं रही होगी?
नहीं बिल्कुल नहीं, बल्कि ज़िंदगी की असली जंग तो अब शुरू हुई थी। तलाक लेने के बाद तो मेरे प्रति लोगों के तेवर ही बदल गए। मेरे बहुत से रिश्तेदार जैसे मेरी बुआ जो मुझे बहुत प्यार करती थीं, ने मुझसे रिश्ता तोड़ दिया। सब लोग मुझे ही ग़लत ठहराते थे। जिस भी रिश्तेदार को इस बारे में पता चलता था वो मेरी ही गलती निकालता था। लोग कहते थे कि मुझमे ही कुछ कमी होगी इसलिए शादी टूट गई। मैं मम्मी-पापा के पास जाती थी तो वो मुझे घर से बाहर नहीं निकलने देते थे। उन्होंने मुझे कहीं भी ले जाना बन्द कर दिया। उन लोगों ने भी जाना-आना छोड़ दिया क्योंकि उनसे भी लोग सौ सवान करते थे। वो तो शुक्र हैं कि उन्होंने शादी पर दिल्ली में मुझे एक मकान भी दिया था। मैं यहीं आ गई और यहीं रहना शुरू कर दिया। छः महीने तक मैं घर नहीं गई। कितने समय मैं यह सोचकर घर में बन्द रहती थी कि अब क्या होगा। मैं जाऊंगी तो लोग मुझे कैसे देखेंगे, कैसी कैसी बाते करेंगे। पर कहते हैं ना समय बहुत बड़ा मरहम होता है। धीरे-धीरे मैंने अपने आपको संभाला, नौकरी शुरू की तो काफी हद तक मैं इस तनाव से बाहर आने लगी।

 जीवन की इस घटना ने क्या आपको कुछ बदला भी, सिखाया भी?
सबसे बड़ी बात तो यह सिखाई कि ज़िंदगी हर चीज़ की कीमत वसूलती है। आज़ादी आपको यूंही नहीं मिलती, बड़ा संघर्ष करना पड़ता है इसके लिेए। और असली आज़ादी तब मिलती है जब आप आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो जाओ। शुरूआत मे तलाक के बाद मैं पापा-मम्मी से खर्चा लेती थी, क्योंकि मैं नौकरी तो कर नहीं रही थी, तो ज़ाहिर है मुझे उनकी सुननी भी पड़ती थी आखिर मैं उनकी मोहताज़ जो थी। मैं एक गलत शादी से ज़रूर आज़ाद हो गई थी लेकिन अपने परिवार के तानों से आज़ाद नहीं थी। यह आज़ादी मुझे तब मिली जब मैंने खुद कमाना शुरु किया। जब मैंने अपने पापा से खर्च लेना छोड़ दिया, उनकी बातें सुनना छोड़ दिया तब जाकर जिंदगी में थोड़ा सुकून आया। अकेली महिला का जीवन बहुत मुश्किल भरा होता है, यह अब तक मैंने सुना था लेकिन अब यह सब मेरे साथ घट रहा था। आस-पास के लोग, पड़ौसी, ऑफिस के सहयोगी इस बात का बड़ा फायदा उठाते थे। कोई भी कुछ भी बोल कर निकल जाता था। आसानी से मेरा काम नहीं होता था। लेकिन इन्हीं बातों ने मुझे मज़बूत बनाया। धीरे-धीरे मैंने अपने लिए लड़ना और जीतना सीख लिया और आज तो लोग मुझसे डरते हैं (मुस्कुराहट के साथ)। आज की गीता और सात साल पहले की गीता में ज़मीन आसमान का फर्क है।

क्या कभी दूसरी शादी के बारे में नहीं सोचा?
सोचा, कभी -कभी जब दूसरों के परिवारों और बच्चों को देखती हूं तो मेरा भी बड़ा मन करता है कि मेरा भी परिवार हो, बच्चे हों, ज़िम्मेदारियां हों। मम्मी-पापा, रिश्तेदार भी बहुत ज़ोर देते हैं कि दूसरी शादी कर लो, अकेले ज़िंदगी नहीं कटती। लेकिन अब जब मैं अपने आप से सवाल करती हूं कि मुझे ज़िंदगी में क्या ज्यादा ज़रूरी लगता है तो बस एक ही जवाब मिलता है- आज़ादी। और फिर इस बात का डर भी है कि कहीं फिर से मेरे साथ वैसा ही कुछ हुआ तो, इसलिए शादी करने का मन नहीं करता।

पर अकेलापन तो लगता होगा, जीवनसाथी की कमी तो महसूस होती होगी?
हां होती है, तब होती है जब अकेलापन नहीं कटता। लेकिन अब मैंने अपने आप को काम में इतना डुबो दिया है कि मुझे वक्त ही नहीं मिलता यह सब सोचने का। कभी अकेलापन लगता भी है, तो दोस्तो से बात कर लेती हूं, अपनी बहन से बात कर लेती हूं। फिर सब ठीक लगने लगता है।

कोई अच्छा लड़का मिला तो दोबारा शादी करेंगी?
(हंसते हुए) आज तो मैं सफल हूं, आत्मनिर्भर हूं अगर सही लड़का मिला जो मुझे और मेरे करियर को भी उतना ही सम्मान दे जितना अपने को देता है तो सोचूंगी।

अपनी तरफ से कुछ कहना चाहेंगी
बस यहीं कि जिंदगी में कुछ भी, खासतौर से अपनी खुशी और आज़ादी, वो भी एक लड़की के लिए पाना बहुत मुश्किल होता है। अगर अपनी शर्तों पर ज़िदंगी जीनी है तो बहुत लड़ाईया लड़नी पड़ती हैं, खुद को पत्थर जैसा मज़बूत बनाना पड़ता है, कुर्बानियां देनी पड़ती हैं और सबसे ज़रूरी बात समाज में रहना सीखना पड़ता है... और यकीन मानिए एक तलाकशुदा औरत के लिए यह समाज बहुत कठोर है।