Thursday, 29 August 2013

चौरासी कोसी से चौरासी कोस दूर अयोध्यावासी..बेवजह पिसी जनता, रोजी रोटी की जुगाड़ मुश्किल

विहिप द्वारा चौरासी कोसी परिक्रमा करने की मांग उठाने और सपा सरकार द्वारा उसे रोकने का प्रबंध करने के बीच अयोध्या के आम आदमी का भविष्य एक बार फिर अधर में है। सड़कों पर पुलिस वालों का पहरा, राजनेताओं की हलचल, लगातार कम होते पर्यटक और इन सबके बीच पिसती स्थानीय जनता...  अयोध्या और फैज़ाबाद के लोगों के लिए रोजी-रोटी कमाना मुहाल हो गया है। रामलला के दर्शन करने या घूमने आने वाली जनता से होने वाली कमाई पर टिकी शहर की अर्थव्यवस्था चरमराने लगी है। दुकाने बंद पड़ी हैं या ग्राहकों से खाली...और यह सारा हंगामा उस चौरासी कोसी परिक्रमा को लेकर हो रहा है जिसका ना तो अभी वक्त है और ना ही स्थानीय जनता से रत्ती भर भी समर्थन। 



  

छावनी बना शहर, स्थानीय लोगों के लिए रोजी-रोटी कमाना हुआ मुश्किल

रामेश्वर दास की सरयू नदी के पास एक छोटी सी पूजा सामग्री की दुकान है, जो उसकी रोज़ी रोटी का एकमात्र साधन है। इस दुकान से ही रामेश्वर अपने पांच लोगों वाले परिवार का पेट पाल रहा है... अपनी बीमार मां का इलाज करा रहा है। बेटे को हाईस्कूल में पढ़ा रहा है और बेटी की शादी की तैयारी कर रहा है। उसने सोच लिया था कि इस बार सावन और भादों के मौसम में इतना कमा लेगा कि बेटी की शादी के लिए पैसा जुट जाएगा। लेकिन कम्बख्त राजनीति और राजनेता.... जो मौसम कमाने का है... उस सीजन में तो लोगों का आना ही बन्द हो गया।

सूना पड़ा सरयू का तट
विहिप की चौरासी कोसी परिक्रमा की गूंज क्या गूंजी... अयोध्या थर्रा गया। पुलिस ने अयोध्या समेत फैज़ाबाद और आस-पास के इलाकों, रास्तों और कस्बों को छावनी बना दिया है। जगह-जगह बैरीकेडिंग हो गई है, नतीजा... लोगों ने यहां आना बन्द कर दिया और सामान्य दिनों में एक दिन की दुकानदारी में चार- पांच हज़ार रोज की कमाई कर लेने वाले रामेश्वर की दुकान पर आजकल 300-400 रुपए भी मुश्किल से आ रहे हैं।

 सरयू का तट जो हमेशा चहल-पहल से भरा रहता था, लगभग सुनसान सा हो गया है...सड़क पर कर्फ्यू जैसा माहौल है, कोई यहां आना नहीं चाहता। क्या सब्ज़ी वाले, क्या रिक्शा वाले, क्या फेरी वाले, क्या दुकानदार.. सभी परेशान है।

 छोटे दुकानदार और फेरी वालों पर पड़ी सबसे ज्यादा मार


लगभग यही हाल फैज़ाबाद में लकड़ी के छोटे-छोटे खिलौने, करछुल, मसाजर, स्पैटुला, तस्वीरें, खड़ाऊ, रई वगैरह बेचने वाले रघु का है। आस-पास के ग्रामवासी और दूसरे राज्यों से आने वाले पर्यटक रघु का यह सामान शौक से खरीद कर ले जाते हैं लेकिन अब पुलिस और राजनेताओं की हलचल और इसके कारण विवादों में घिरी राम लला की नगरी से लोगों ने कन्नी काटनी शुरू कर दी है। लोग कम आते हैं तो रघु की बिक्री भी कम ही होती है। पता नहीं इस महीने कहीं फांको की नौबत ना आ जाए।

यह कहानी यहीं खत्म नहीं होती, पन्नू गाइड, गिरधारी पान वाला, विष्णु तस्वीर वाला, सुनील मछलियों के लिए आटे की गोलियां बेचने वाला,  नाव चलाने वाले मल्लाह, गले की मालाएं, जंजीरे, कड़े, चूड़ियां आदि बेचने वाला अन्तु और यहां तक कि सरयू नदी के पास ही सुलभ शौचालय चला कर रोज़गार कमाने वाले मानस जैसे सभी लोग विहिप के इस चौरासी कोसी परिक्रमा के चक्कर में उलझ कर परेशान हो रहे हैं।

ढाबे. धर्मशालाओं और चाय-समौसों की दुकानों का कारोबार भी प्रभावित

फैज़ाबाद से अयोध्या के रास्ते में बने बहुत से ढाबों पर आजकल खाना कम बनता है। अयोध्या में सड़क किनारे बनी चाय, समोसे, जलेबी और पूरी सब्ज़ियों की दुकानों पर भी मेज़े खाली पड़ी हैं
जहां पहले इस सीजन में इन दुकानों और ढाबों के बाहर लोगों की लाइन लगी रहती थी, आजकल मुश्किल से भीड़ जुटती है। कारीगर खाली बैठे हैं, चूल्हे ठंडे पड़े हैं और आटा ऐसे ही रखा है।

होटल वालों और धर्मशालाओं की हालत तो और भी खराब है। यहां कमरे खाली पड़े हैं। नए लोग तो आए नहीं बल्कि जब से चौरासी कोसी का मामला गर्माया है पहले से रह रहे लोग और होटल छोड़ कर चले गए।

  • यहां हिन्दू-मुस्लिमों के बीच सौहाद्रपूर्ण वातावरण
  • मुस्लिम आज भी बनाते हैं खड़ाऊं और रामलला की तस्वीरें
फैज़ाबाद के निवासी विकास अग्रवाल बेहद रोष के साथ बताते हैं कि राजनीतिक पार्टियां अपने स्वार्थ के लिए अयोध्या का इस्तमाल करती हैं। कभी कोई राम मंदिर बनाने की मांग को लेकर आ जाता है तो कभी असमय चौरासी कोसी परिक्रमा की बात चलती है और इन सब के बीच यहां के स्थानीय निवासी पिस जाते हैं।

विकास साफ कहते हैं कि फैज़ाबाद और अयोध्या में कहीं भी हिन्दू-मुस्लिम के बीच कोई झगड़ा नहीं है। दोनों प्यार और एकता के साथ रहते हैं। बल्कि असलियत तो यह है कि यहां आज भी मुसलमान खड़ाऊ बनाते हैं और रामलला की तस्वीरों को फ्रेम में जड़ते हैं। बाकी हिन्दुस्तान या दुनिया में कुछ भी चल रहा हो लेकिन यहां कम से कम हिंदू-मुसलमान के बीच कोई तनाव नहीं। और वैसे भी यहां किसी के पास इन सब लड़ाईयों में उलझने का वक्त ही नहीं है। लेकिन बाहर के कुछ आसामाजिक तत्व या राजनीतिक पार्टियों द्वारा भटकाए गए कार्यकर्ता ज़रूर यहां आकर माहौल को गंदा करते हैं और यहां के शांति और सौहाद्रपूर्ण वातावरण में ज़हर घोलने का काम करते हैं।

यहीं के एक अन्य निवासी सचिन शर्मा जो फैज़ाबाद में एक छोटे होटल के मालिक हैं बताते हैं कि यहां के लोगों को राजनीति से इतना सरोकार नहीं है कि वो जब तब राजनेताओं के बहकावे में आकर उन्हीं लोगो से लड़ाई करें जिनके साथ वो रह रहे हैं या फिर छोटी-छोटी बातों पर दंगा करने पर उतर आएं। यहां कोई बहुत अमीर लोग नहीं रहते। मध्यमवर्गीय इलाका है, मध्यमवर्गीय लोग है जिनकी आय का मुख्य साधन यहां आने वाले पर्यटकों से होने वाली कमाई पर निर्भर है। और यह पर्यटक भी कोई बहुत उच्चवर्गीय नहीं होते। यहां अग्रेज़ या बाहर के देशों से तो लोग आते नहीं, मुख्यतः आस-पास के शहरों. गांवो, राज्यों या भारत के ही अन्य राज्यों से लोग आते हैं जिनका आने का कारण मुख्यतः धार्मिक रहता है।

यह मध्यमवर्गीय लोग ही यहां के निवासियों की रोजी कमाने का साधन है जो इन्हें पूजा सामग्री, लकड़ी की छोटी-मोटी वस्तुएं, आर्टिफिशियल गहने, तस्वीरे आदि बेच कर अपना काम चलाते हैं। और जब अयोध्या राजनीतिक क्रियाकलापों की धुरी बन जाता है तब सबसे पहले यहां सैनिक उतरते हैं, पुलिस बल बढ़ता हैजैसा कि इस बार हुआ। बाहरी लोग यहां आकर टिक गए। तनाव उनकी वजह से बढ़ा, शहर छावनी उनकी वजह से बना और परेशान हो गई जनता...
  • जिस चौरासी कोसी परिक्रमा को लेकर इतना हंगामा है, वो तो अप्रैल-मई में होती है
  • स्थानीय जनता नहीं कर रही है समर्थन

विकास अग्रवाल बताते हैं कि चौरासी कोसी परिक्रमा के लिए यहां के स्थानीय़ निवासियों में से तो शायद चौरासी लोग भी ना जुटें। यह परिक्रमा साधू संत करते हैं और यह अप्रैल-मई के दौरान होती है। बाकी यहां मुख्यतः पचकोसी और चौदहकोसी परिक्रमाएं होती हैं और वो भी दीवाली के आस-पास। इसलिए इस वक्त यह मुद्दा उठाना गलत है और सिर्फ राजनीतिक फायदे के लिए किया गया जान पड़ता है।