Saturday, 24 August 2013

काश फिर लौट आए मेरी अनगिनत प्रतिभाओं का बचपन....

कभी हम भी ऐसे कार्यक्रमों का हिस्सा हुआ करते थे
एक ज़माना वो भी था जब हम भी राधा-कृष्ण, गोपियां, पन्ना धाय, डांडिया नर्तक या कैटवॉक करते मॉडल बन कर मंच पर उतरा करते थे। जब मेकअप रूम में नई-नई पहचानें और पात्र गढ़े जाते थे और भारी-भरकम कपड़े-गहने पहनकर और साज श्रंगार करके हम अनुशासित तरीके से मंच पर जाने का बेसब्री से इंतज़ार करते थे। एक बार मंच पर पहुंचे नहीं कि हमारा प्रदर्शन देखने लिए बाहर कुर्सियों पर इतंज़ार करते लोगों के चेहरे पर मुस्कान खिल जाती थी और हम मंच पर चाहे आगे हों या पीछे, मुख्य पात्रों का हिस्सा हों या बैकग्राउंड की भीड़ का भाग...... अपने हिस्से का अभिनय कुशलतापूर्वक करके खुद को बेहद गौरवान्वित महसूस करते थे। सैकड़ो तालियों की गूंज में हम अपने लिए प्रशंसा और खुशी ढूंढ लेते थे।

डांस के लिए बेहद उत्साह से तैयार हुआ मेरा बेटा
कल अपने बेटे के स्कूल में जन्माष्टमी उत्सव के लिए गई और उसके साथ इतने सारे अन्य छोटे-छोटे बच्चों को मंच पर अपनी नाट्य प्रतिभा का प्रदर्शन करते देखा तो दिल खुश हो गया। सहसा ही बीते हुए उन स्कूली दिनों की याद आने लगी जब हम भी स्कूल में थे और अध्यापक-अध्यापिकाओं द्वारा तैयार किए गए स्टेज कार्यक्रमों का हिस्सा बनते थे। बच्चों की परफॉर्मेंस में मुझे अपना बचपन याद आने लगा।

जब मेरा बेटा स्कूल में अपने डांस के लिए इतने उत्साह से तैयार हो रहा था तो पहले तो उसे डांट दिया कि क्यों इतने एक्साइटिड हो यह तो सभी करते हैं... लेकिन फिर अचानक ही अपने वाक्य पर खुद ही सोचने लगी। सभी कहां करते हैं... बचपन में शायद करते हों लेकिन बड़े होकर तो नहीं किया... और आज अगर वो उत्साहित है तो यह होना लाज़िमी है... भूल गईं अपने स्कूली दिन चित्रा जब अगर छोटा सा भी तुम्हारा रोल हो तो उसकी तैयारी में और उसके लिए तैयार होने में रातों की नींद उड़ जाया करती थी। आखिर मंच पर प्रदर्शन देने वाले हम अपने आपको कक्षा के बाकी छात्र-छात्राओं से अलग जो समझते थे... और लोग कक्षा में पढ़ाई करेंगे और हम अपनी परफॉर्मेंस की तैयारी करने जाएंगे... कितने गर्व से टीचर को बताया करते थे कि मैम हमें एन्युअल फंक्शन की तैयारी के लिए जाना है....

अब सोचती हूं कि बड़ा होकर हमने यह मज़ा और उत्साह तो खो ही दिया। वो मंच पर पहुंचने से पहले का डर, कि कहीं कुछ गलती ना हो जाए... वो अपना कार्यक्रम पूरा होने के बाद की खुशी कि हमने तो सब कुछ सही सलामत कर लिया अब बाकियों की बारी... अब यह अनुभव क्या फिर कभी होगा..

कल अनमोल के स्कूल के इतने सारे बच्चों को मंच पर अभिनय करते देखकर लगा कि दरअसल स्कूल का मंच ही ऐसा मंच है जो बच्चों के इतने सारे टैलेंट बाहर निकालकर लाता है। हमारे भी लाया था... चाहे अभिनय की प्रतिभा हो या वाद-विवाद, या नृत्य या गान, रंगोली या पेन्टिंग.. या एथलेटिक्स हो या फिर फुटबॉल, बास्केट बॉल या बैडमिंटन का गेम.. या एनसीसी और एनएसएस ही क्यों ना हो.. हममें से कितने ही ऐसे लोग हैं... जिन्होंने स्कूल या कॉलेज में तो इन विधाओं में शायद जीत दर्ज की हो, कीर्तिमान स्थापित किए हों लेकिन अब याद भी नहीं होगा कि कभी हम भी ये सब किया करते थे...
कभी हममे से किसी ने भी मंच पर ऐसे मटकी फोड़ी होगी
जब तक स्कूल में थे अपनी प्रतिभाओं के प्रदर्शन पर तालियां पाकर मन खुश हो जाता था, हम खुद को सातंवे आसमान पर पाते थे और आज हमारी प्रतिभाएं ही बदल गईं है... शायद आज वो अच्छा स्टेटस, आत्मविश्वास, सेलरी, फैशन और हम अपनी जॉब और घर को कितना संतुलित कर सकते हैं, कितना अच्छे से अपने आपको प्रेज़ेंट कर सकते हैं... के प्रदर्शन पर आकर टिक गईं है... पर यह भी वक्त की मांग है और डार्विनिज़्म के अनुसार टिक वहीं पाता है जो खुद को बदलते वक्त के साथ ढाल पाता है।

खैर अपने बेटे के स्कूल का प्रोग्राम देखकर मुझे भी अपने दिन याद आ गए। काश कोई जादू की छड़ी मेरे पास होती और मैं कुछ समय के लिए उन दिनों को वापस लौटा पाती...अपनी अनगिनत प्रतिभाओं को जान और प्रदर्शित कर पाती... सजती-संवरती, मंच पर जाती, तालियां बटोरती और वापस आ जाती....