Wednesday, 21 August 2013

बिहार की नदियां और चचरी का साथ...

पूर्वोत्तर भारत में जब-जब सावन-भादों में नदियों का बेकाबू बहाव गांव के दो हिस्से कर डालता है तब-तब गांवों को जोड़ता है चचरी.... बिहार के सुदूर ग्रामीण इलाकों में जबसे ग्रामों के बीच में नदियां बह रही हैं तब से गामीणों की नैया पार लगा रहा है चचरी....., 2008 में कोसी मैया के विकराल रूप और प्रलय के बाद जब राज्य के जिले पानी में डूब गए और सड़के बह गई तब भी यहां के निवासियों का सहारा बना चचरी....
लोगों को सड़क से, बच्चों को स्कूल से, पनिहारिनों को कूंए से, गांव को मुखिया से, बहुओं को मायके से और बीमार को दवाखाने से जोड़ने का काम बरसों से कर रहा है 'चचरी'....

बिहार के एक गांव में नदी पार करने के लिए बना बांस का चचरी पुल
 इतना वर्णन पढ़ने के बाद आप में से बहुत से लोग सोच रहे होंगे कि आज तो माथा घुमा दिया लेखिका ने... चचरी...चचरी..चचरी की कचर-कचर लगा रखी है पर आखिर यह चचरी है क्या यह भी तो पता चले। तो जानिए चचरी क्या है....
 हममें से कुछ एक लोग तो इस नाम से वाकिफ होंगे, लेकिन बहुत सारे लोग जो चचरी को नहीं जानते उनकी जानकारी के लिए बता दें कि चचरी बांस को आपस में बांध कर बनाए गए अस्थाई पुल को कहते हैं।

भारत के अन्य हिस्सों में तो चचरी के दर्शन शायद दुर्लभ हों लेकिन पूर्वोत्तर भारत, खासकर बिहार में यह चचरी पुल लोगों के जीवन का हिस्सा हैं। यहां जितने गांव नहीं है उससे ज्यादा नदियां हैं, तिस पर भी हाल यह कि गांव का आधा हिस्सा नदी के इस पार है तो आधा उस पार। घर इस पार है तो खेत उस पार, स्कूल इस पार है तो छात्र उस पार, गांव इस पार है तो पंचायत उस पार.... हांलाकि बहुत जगहों पर ग्राम प्रधानों ने सालों से नदियों पर पुल बनाने के लिए स्थानीय अधिकारियों या सरकार को अर्जी दे रखी है लेकिन लोहे-कंक्रीट के पुल आसानी से कहां बनते हैं, उस पर भी मांग करने वाला ग्रामीण... तो पुल बनवाने की कोशिश करना तो गंगा को ज़मीन पर उतारने का प्रयास करने जैसा है जो कि यहां के ग्रामीण अच्छी तरह से जानते और समझते हैं।
               और शायद इसलिए जबसे यहां नदी के आर-पार चलने वाला जीवन अस्तित्व में आया है शायद तभी से  जीवनरेखा के रूप में चचरी पुल बनाने और उस पर चढ़कर नदी पार करने की परम्परा भी चली आ रही है।

कैसे बनता है चचरी...

चचरी को बनाना बहुत आसान है। बांस के सहारे बनने वाले इस कामचलाऊ चचरी पुल के लिए ना किसी दुष्कर अभियांत्रिकी की ज़रूरत है, ना योजना और टेंडर पास कराने की और ना ही बड़े सरकारी अनुदान की। इसे गांव के स्थानीय ग्रामीणों, श्रमिकों या मल्लाहों द्वारा जगह-जगह से बांस का जुगाड़ करके चंद घंटों में ही तैयार कर लिया जाता है। 
 
 चचरी के निर्माण के लिए पहले बांस को चीरकर बत्तियां बनाई जाती हैं और फिर उन बत्तियों को आपस में गूंथकर जालीदार और मज़बूत चचरी तैयार की जाती है। यह पुल के ऊपरी हिस्से का काम करती है। उसके बाद नदी के पानी में बांस डालकर खंबे बनाए जाते हैं जिनके ऊपर इस चचरी को टिका दिया जाता है। पुल की मज़बूती खंबो की मज़बूती और चचरी में बांस की बत्तियों की गुंथाई पर निर्भर है। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि ज़रूरत ना होने पर इस पुल को उखाड़कर भविष्य के लिए संभाल कर भी रखा जा सकता है।
चचरी बनाने की तकनीक कब और कैसे विकसित हुई, इसका तो कोई ठोस जवाब हमें नहीं मिला, लेकिन इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि चचरी पुल का ब्लू प्रिंट भी उतना ही पुराना है जितना नदियों के आर-पार गांवों में रह रहे ग्रामीणों का इतिहास। यहां कोई किसी को चचरी बनाना नहीं सिखाता बल्कि यहां के निवासियों को यह तकनीक डीएनए के ज़रिए अपने आप मिल जाती है।
 यहां का लगभग हर आदमी चचरी पुल तैयार कर लेता है। आज भी कोसी क्षेत्र में सुदूर ग्रामीण इलाकों में कई जगहों पुल-पुलिया के अभाव में लोग चचरी पुल के सहारे ही जीवन गुजार रहे हैं। 

चचरी पुल, लोहे-लंगड़ के बड़े और हिफाज़ती पुलों जैसे तो नहीं होते लेकिन इतने मज़बूत होते हैं कि इन पर से मोटरसाइकिल भी निकल सकती है। हांलाकि पुल के दोनों ओर बाड़ ना होने और पुल के लचीले होने के कारण इन पर से सावधानी से गुज़रना पड़ता है लेकिन मुख्यधारा से कटे हुए ग्रामीणों के लिए तो यहीं बड़ी बात है कि उन्हें अपने काम के लिए रास्ता मुहैया हो जाए फिर सुरक्षा की सुध किसे है।

यह भी सच है कि जिस गति से यह चचरी पुल बनते हैं उसी गति से कई बार बाढ़ का पानी इन्हें बहाकर भी ले जाता है और बहुत बार यह झूलते पुल निर्दोष ग्रामवासियों को नदी का ग्रास भी बना देते हैं, लेकिन फिर भी यह चचरी की बदौलत ही है कि यहां की ज़िदंगी पटरी पर चल रही है।

(साभार- पुष्यमित्र जी और कोसी के पत्रकार संजय कुमार जिनकी दी गई जानकारी के बाद ही चचरी की यह दास्तान आप तक पहुंच पाई है)