Friday, 26 July 2013

सरलीकरण के नाम पर गलत लिखी और पढ़ी जा रही है हिन्दी

           ग़लत हिन्दी में लिखी हुई सूचनाएं, मात्राओं की गलती से भरे हुए हिन्दी के शब्द वगैरह तो आपने काफी पढ़े होंगे और उन्हें पढ़कर हंसे भी होंगे, लेकिन यहां हम आम आदमी द्वारा लिखी हुई हिन्दी की बात नहीं कर रहे। यहां स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली हिन्दी की किताबों की बात हो रही है जिनमें हिन्दी लगातार गलत छप रही है।
आधे शब्दों की जगह बिन्दी का प्रयोग, अक्षरों में ऊपर और नीचे आधे र का ग़लत प्रयोग, मात्राओं का गलत इस्तमाल वगैरह आजकल हिन्दी का पाठ्य पुस्तकों में जमकर हो रहा है। और यह सब चल रहा है सरलीकरण के नाम पर।
 जी हां जब पाठ्य पुस्तकों के एक बड़े प्रकाशक से हमने इस विषय पर बात की तो जनाब का जवाब था कि यह सब इसलिए किया जा रहा ताकि क्लिष्ट हिन्दी भाषा को थोड़ा सरल बनाया जा सके और छात्रो को पढ़ने और याद करने में आसानी हो।
अब यह सरलीकरण कैसा है, ज़रा देखिए- मुर्गा- मुरगा बन गया है और बर्तन- बरतन, सर्दी सरदी हो गई है गर्मी गरमी, दोबारा दुबारा हो गया है, कलयुग बना है कलियुग और इस्तमाल को आजकल इस्तेमाल लिखा जाने लगा है।

हिन्दी में बिन्दी का खेल भी जमकर चल रहा है। सरलीकण के नाम पर हर अं की आवाज़ वाले शब्द में बिन्दी का प्रयोग हो रहा है चाहे वो ग़लत हो या सही। हिन्दी को हिंदी लिखा जा रहा है, और बिन्दी को बिंदी। लैंप (लैम्प) में भी बिन्दी है, घंटा (घण्टा) में भी बिन्दी है, खंड (खन्ड) में भी बिन्दी है,  चंचल (चञ्चल) में भी बिन्दी है और तो और हिन्दी और बिन्दी में भी "बिंदी" है। जहां "हैं" होना चाहिए वहां "है" चलाया जा रहा है और जहां "है" सही है वहां "हैं" लगा है। उदाहरण के लिए महमान तो आते है, लेकिन श्याम जाता हैं।

पता नहीं यह सरलीकरण के कारण ही है या खुद लिखने वालो को भी पता नहीं है कि बिन्दी कहां आती है और कहां आधा न, म, ण या ञ आता है। यहीं कारण है कि बच्चे ग़लत लिख रहे, ग़लत पढ़ रहे हैं और ग़लत ही सीख रहे हैं।
 हिन्दी की आज हालत यह है ड़ और ड के बीच का अन्तर खत्म हो गया है। कहीं कंकड़ में ड़ के नीचे की बिन्दी हट जाती है और वो कंकड हो जाता है और कहीं सांड मं ड के नीचे बिन्दी लग जाती है और वो सांड़ हो जाता है। कुछ यही हाल ढ और ढ़ का है। आपने अक्सर लिखा पढ़ा होगा काके दा ढ़ाबा और ढ़पली बजी..... 


हंसने की भाषा बन गई है हिन्दी

मेरी बड़ी भाभी लखनऊ के स्टैला मैरिस कॉन्वेन्ट स्कूल में नौंवी कक्षा के बच्चों को हिन्दी पढ़ाती है। पिछली साल अर्धवार्षिक परीक्षाओं में हिन्दी के पर्चे में एक निबन्ध लिखने को आया जिसका विषय था- मेरा प्रिय विषय... एक छात्र ने निबंध की पहली लाइन में लिखा- मेरा प्रिय विषय "भाएओ" है। मेरी भाभी ने बहुत सिर पटका, बहुत कोशिश की समझने की कि किस विषय की बात हो रही है पर समझ नहीं आया। आखिरकार उन्होंने निबंध पढ़ना शुरू किया। और दूसरे पैराग्राफ में जब उन्होंने यह पढ़ा कि मुझे भाएओ इसलिए पसंद है क्योंकि मैं डॉक्टर बनना चाहता हूं और इसके लिए भाएओ पढ़ना ज़रूरी है, तब उनकी समझ में आया कि छात्र बायो यानि जीवविज्ञान विषय की बात कर रहा था।

       यह वाक्या सुनाते वक्त मेरी भाभी बहुत हंसती हैं। जब मैंने उनसे पूछा कि क्या अधिकतर बच्चे ऐसी ग़लती करते हैं तो उन्होंने बताया कि दरअसल ऐसा ही है। हिन्दी में सभी छात्रों की हालत बेहद खराब है। बच्चे मात्राओं और शब्दों की इतनी गलती करते हैं कि कई बार अर्थ का अनर्थ हो जाता है। भाभी ने बताया  कि हिन्दी के पेपर जांचने का काम अक्सर एक अच्छा टाइमपास होता है क्योंकि उनमें हंसने के लिए बहुत सी बाते होती है। जी हां यह सिर्फ एक छोटा सा उदाहरण है लेकिन सच्चाई यहीं है कि हिन्दी आज चुटकुलों और चुटकी लेने की भाषा बन कर रह गई है। जिसे कोई गंभीरता से नहीं लेता। हिन्दी में तो कुछ भी कैसे भी लिखा जा सकता है कोई फर्क नहीं पड़ता। आप ने खुद ही कई बार हिन्दी में लिखी बातें, सूचनाएं आदि पढ़ी होंगी जो कि गलत हिन्दी में लिखी होती हैं और उन्हें पढ़कर खूब चुटकी भी ली होगी।