Wednesday, 24 July 2013

तस्वीरों में सिमटा मेघों का घर... मेघालय

इस वर्ष मई माह में दिल्ली से लगभग 1500 किमी दूर उत्तर पूर्व में मेघालय भ्रमण पर जाने का मौका मिला। मेघों के इस खूबसूरत घर में प्रकृति की सुंदरता कदम-कदम पर छिटकी पड़ी है। राजधानी ट्रेन में 27 घंटे के सफर के बाद हम गुवाहटी पहुंचे और फिर वहां से प्रसिद्ध कामाख्या देवी के दर्शन के बाद गाड़ी लेकर शिलांग, मेघालय के लिए निकले जो यहां से लगभग 100 किमी दूर है। तीन घंटे के सफर के बाद शिलांग पहुंचकर मेघों से घिरे पहाड़ो और इन विशालकाय पहाड़ों पर जड़े जमाए हरे-भरे पेड़ों को देखा तो सारी थकान उतर गई। लापरवाही से बिखरी पड़ी इस बेजोड़ खूबसूरती को तस्वीरों में कैद कर लाएं हैं हम। इन तस्वीरों से आप भी मेघालय की सैर कीजिए।




दूर तक जहां नज़र जाएं अठखेलियां करते हुए बादल दिखते हैं यहां। शायद इसीलिए इसका नाम मेघों का घर रखा गया है। आसाम की ब्रह्मपुत्र घाटी के उत्तर पूर्व और बांग्लादेश के दक्षिण पश्चिम में बसा मेघालय इतना खूबसूरत है कि एक बार यहां जाए तो वापस आने का मन नहीं करता।





समुद्र तट से 1965 मीटर ऊंची शिंलॉंग चोटी।
यहां से शिलॉंग घाटी का नज़ारा ऐसा दिखता है, मानो किसी ने सन से सफेद रुई के फाहो के बीच हरे, काले दाने बिखेर दिए हों। हर तरफ ऊंचे ऊंचे पहाड़ और पहाड़ों पर झुके हुए बादल यहां पूरे साल नज़र आते हैं।
  

मैं चेरापूंजी में सेवन सिस्टर फॉल्स के पास खड़ी हूं । इसे नो़डकालीकाई झरना भी कहते हैं जो चेरापूंजी का सबसे प्रसिद्ध पर्यटक स्थल है। चेरापूंजी में विश्व में सबसे ज्यादा बारिश होती है। शिलॉंग से सिर्फ 60 किलोमीटर की दूरी पर बसा चेरापूंजी बेहद सुन्दर है।
नोडकालीकाई झरना बांग्लादेश के काफी करीब है यहां से बांग्लादेश की घाटी का भी नज़ारा होता है। एक ही पहाड़ी पर सात छोटे बड़े झरने बहते हुए दिखाई देते हैं। ध्यान से देखिए इस तस्वीर में भी हमने तीन धाराओं में बंटा एक झरना कैद किया है।  
 
 मेघालय की खूबसूरती में चार चांद लगाते हैं यहां हर दो कदम पर पडा़ड़ों से गिरते झरने। कल-कल बहते ये बेबाक, विस्तृत झरने बस यहीं संदेश देते हैं कि चाहे कुछ भी हो, राह में कितनी भी मुश्किलें हो, चट्टानों का सीना चीर कर आगे बढ़ते रहो। पथरीले रास्तों पर भी रुको मत।
मेघालय की खासी पहाड़ियों से गिरते यह झरने इतने तेज़ बहाव के और तेज़ आवाज़ के साथ गिरते हैं कि लगभग आधा किलोमीटर दूर से इनकी आवाज़ सुनी जा सकती है। चूंकि बादल यहां इतनी नीचाई पर हैं और उन्हीं से बरसकर पानी इन झरनों में जाता है इसलिए इन झरनों का पानी इतना शुद्ध होता है लोग पीने का पानी भी इन झरनों से भर लेते हैं।








  पूरे समय बादलों के छाए रहने और कदम-कदम पर पहाड़ों से फूटते मीठे पानी के चश्मों के कारण इस तरह के प्राकृतिक सुंदरता से भरे दृश्य दिखना यहां बेहद आम बात है।










और यह है चेरापूंजी का तामाबिल जहां बांग्लादेश की सीमा है। यह वो पत्थर है जिसके इस तरफ भारत की सीमा है और दूसरी तरफ बांग्लादेश की।पीछे सीमा के नज़दीक बैठे हुए बांग्लादेशियों को भी देखिए। दोनों सीमाओं पर भारत और बांग्लादेश की चौकियां बनीं हैं।  आखिरकार यहां पहुंचकर कर हमारा एक ही समय में दो देशों में पहुंचने का सपना पूरा हुआ।  





और यह है बांग्लादेश की सीमा पर बनी चौकी।
नीचे देखिए बांग्लादेश की सीमा पर लगे पत्थर पर बांग्लादेश का प्रतीक भी देखा जा सकता है।




 भारत की सीमा के प्रहरी, भारतीय चौकी पर मुस्तैदी से तैनात भारतीय जवान के साथ तिरंगे के नीचे खड़े होकर हमने तस्वीर भी खिंचवाई। एक यादगार लम्हा।








वापस लौटते समय हमें
  रास्ते में ट्री हाउस भी दिखा। पेड़ो पर बांस की खपच्चियों से बने इस ट्री हाउस में जाने की कीमत थी सिर्फ पांच रुपए प्रति व्यक्ति। यह ट्री हाउस काफी मज़बूत है। एक बार में कम से कम 250 किलो तक वज़न उठा सकता है। हांलाकि जब हम सर्पीली बांस की सीढ़ियों पर कदम जमाते हुए ऊपर चढ़ रहे थे तो डर भी लग रहा था कि कहीं गिर ना पड़े। पर यहां के लोगों ने, जो काफी सीधे और सरल हैं, हमें हिम्मत दी।






शिलांग स्थित यह रूट ब्रिज आपको प्रकृति की शक्ति का अहसास कराता है। यह पुल सैकड़ो वर्षों पुराने और वृहद बरगद के पेड़ की झूलती जड़ो से बना है। यह पुल बेहद मज़बूत है। ध्यान से देखिए तो इस पर खड़े लोग आपको दिखाई देंगे। प्रकृति निर्मित इस पुल पर खड़े होकर नीचे बहती साफ, पारदर्शी पानी की धारा का नज़ारा लेना कैसा अनुभव देता है, इसे शब्दों में बयां कर पाना आसान नहीं।
मेघों के इस शहर में साल भर और दिन के चौबीसो घंटे बादल अठखेलियां करते रहते हैं जिसके कारण यहां या तो बादलों का सफेद रंग नज़र आता है या फिर पहाड़ियों का कत्थई रंग। लेकिन जिस समय, थोड़ी सी देर के लिए भी बादल छंटते है, यहां बिखरी मृदुल हरी घास और हरियाले पेड़ो का रंग मटमैली पहाड़ी सड़क के रंग के साथ मिलकर अद्भुत छटा बिखेर देता है। यह तस्वीर नहीं किसी चित्रकार की बनाई गई पेंटिंग लगती है ना।  

 
स्वर्ग तो किसी ने नहीं देखा, लेकिन मेघालय आकर और यहां की मनोरम प्राकृतिक सुंदरता देखकर इतना तो अंदाज़ा लगाया ही जा सकता है कि स्वर्ग अगर होगा तो कुछ ऐसा ही होगा।  हम तो खुद को खुशकिस्मत मानते हैं कि मेघों के घर की झरनों भरी ज़मी पर हम भी अपने पैरों के निशां छो़ड़ पाए। आप भी मौका मिलने पर यहां भ्रमण ज़रूर कीजिए और स्वर्गनुमा इस धरती की खूबसूरती का आनंद लीजिए।