Wednesday, 31 July 2013

बेटा पैदा करो, तो एड्स होने के बावजूद स्वीकार्य हो...

  • एड्स होने पर पति और बेटी समेत बहू को घर से निकाला
  • बहू को बेटा होने के बाद ससुराल वाले खुद परिवार में वापस ले गए
भारतीय समाज चाहे कितना ही आगे क्यों ना बढ़ जाए, कितना ही आधुनिक क्यों ना बन जाए, लेकिन वंश चलाने वाले बेटे की चाह आज भी दहेज लेकर दूसरे घर जाने वाली बेटी की चाह से कहीं ज्यादा और प्रबल है। इसका बहुत बड़ा उदाहरण हैं देहली नेटवर्क ऑप पॉज़िटिव पीपल नामक समाज सेवी संस्था में अच्छे पद पर कार्यरत श्रीमती ममता गौड़ (बदला हुआ नाम)।
एचआईवी पॉज़िटिव ममता फिलहाल एक आत्मविश्वास और साहस से भरी हई महिला हैं, लेकिन उनके इस स्थिति में पहुंचने का सफर काफी दर्दभरा और कठिन है।
ममता ने अपने पति के साथ प्रेमविवाह किया था। शादी के बाद एक लड़की हुई और दो साल बाद ही ममता दोबारा गर्भवती हुई। इस बार तीन महीने में जब डॉक्टर ने ममता का टेस्ट किया तो पता चला कि वो एचआईवी पॉजिटिव हैँ। ममता बेहद डर गईं, क्योंकि इस बीमारी में सीधे लड़कियों के चरित्र पर बात आती है।
 ममता ने डर के कारण अपने पति को भी इस बारे में नहीं बताया। कुछ समय में जब उनके पति की तबीयत काफी खराब हो गई और उनके बचने की उम्मीद कम नज़र आने लगी तब ममता ने अपने पति के सामने यह राज़ खोला। बात गंभीर थी। पति बेहद नाराज़ हुए और तीन दिन तक ममता से बात नहीं की। इसके बाद ममता ने किसी तरह जब अपने पति को भी अस्पताल में दिखाने को तैयार किया तो पता चला कि पति भी एचआईवी ग्रस्त थे और उन्हीं से ममता को यह बीमारी हुई थी।
दोनों ने एक मशहूर सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए पंजीकरण करवाया। ममता चूंकि गर्भवती थीं, उनका विशेष रूप से इलाज चला जिससे बच्चे को एचआईवी का संक्रमण ना हो।
इस दौरान ममता जो कि एक संयुक्त परिवार में रहती थी, को उनके पति के साथ परिवार से जाने के लिए कह दिया गया। पति-पत्नी, बेटी के साथ किसी तरह किराए के घर में बसर करने लगे। इस दौरान लगातार इलाज और सावधानी से ममता के पति की हालत भी सुधरने लगी थी। लेकिन आर्थिक रूप से कमज़ोर होने के कारण दोंनो की माली हालत खस्ता ही बनी हुई थी।ससुराल वालों में से कोई मदद करना तो दूर, हाल-चाल पूछने तक नहीं आया। पति को एड्स होने के कारण कोई नौकरी देने को भी तैयार नहीं था। मरता क्या ना करता ममता के पति को यह बात छुपानी पड़ी और तब जाकर उन्हें नौकरी मिली।
ममता को मालूम नहीं था कि उनके दिन भी फिरने वाले थे। और यह हुआ कुछ महीने बाद, जब ममता को बेटा हुआ। डॉक्टरों की देखरेख और सही दवा लेने के कारण बच्चा सामान्य हुआ था, मतलब बच्चा एचआईवी पॉजिटिव नहीं था। बेटा होने और उसके एचआईवी नेगेटिव होने की खबर सुनते ही, सास ससुर के सुर बदल गए, वो कुछ ही समय में ममता को पति समेत बड़े प्यार से घर ले गए। यानी बेटे की मां बनने के बाद उसी एड्स ग्रसित ममता को पति और बेटी समेत उसके परिवार ने दोबारा स्वीकार लिया जिसे खुद परिवार ने ही निकाला था। ममता आज भी कहती हैं, कि केवल मुझे बेटा होने के कारण ही परिवार ने मुझे वापस स्वीकारा वरना शायद हम आज भी अलग रह रहे होते।
आज ममता की बेटी 12 साल की और बेटा दस साल का है। ममता सुख से अपने संयुक्त परिवार के साथ रह रही है। साथ ही ममता ने अपने जैसे लोगों की मदद करने को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया है। वो ए़ड्स के लिए लोगो को जागरूक, सलाह देने और सहायता करने वाली संस्था देहली नेटवर्क ऑफ पॉज़िटिव पीपल में उच्च पद पर कार्यरत है। ममता की बेटी यह बात जानती है कि मां और पिता को एड्स है और ममता का कहना है कि वह थोड़ा बड़ा होने पर अपने बेटे को भी इस बारे में बता देगी।
आज ममता के परिवार के साथ अच्छे संबंध है, पर यह दुख अब भी सालता है कि बेटा होने के बाद ही उन्हें ससुराल में स्वीकार किया गया वरना उनके दुखो की चिन्ता किसी को नहीं थी।
  

कुड़ियां ही नहीं दिल्ली के कुड़े भी टैनिंग से बचने के लिए पहने रहे हैं दस्ताने

दिल्ली में गर्मी पूरी तेज़ी पर है, और उतनी ही तेज़ी से लोकप्रिय हो रही हैं कड़कती धूप में दिल्ली वालो को सांवला होने से बचाने वाली पहरनें। और इनमें सबसे ज्यादा पसंद किए जा रहे हैं, हाथ के लम्बे सूती दस्ताने। और आजकर जो इन्हें सबसे ज्यादा खरीद रहे हैं वो हैं दिल्ली के लड़के। 

पहले तो केवल कुड़ियां ही आपको सिर पर दुपट्टा लपेटे और हाथों में दस्ताने पहन कर तेज़ धूप में स्कूटी चलाती दिखती होंगी, लेकिन अब ज़माना बदल गया है जनाब, दिल्ली के कुड़े भी धूप के सांवलेपन- जिसे हम टैनिंग कहते हैं, से बचने के लिए सिर से पांव तक खुद को ढके हुए दिखने लगे हैं। यह लोग हेलमेट तो पहनते ही हैं, लेकिन साथ ही हेलमेट के नीचे चेहरे पर रूमाल भी बांध लिया जाता है ताकि हेलमेट के शीशे से होकर धूप इन तक ना पहुंच सके और साथ में दोनों हाथों में होते हैं सूती दस्ताने ताकि हाथों का रंग भी सांवला होने से बचा रहे।
 यह देखिए कुछ इस तरह का नज़ारा हमने सराय काले खां पर भी देखा जहां बाइक सवार लड़के अपने हाथों में दस्ताने पहन कर चल रहे थे।
रेड लाइट पर हाथों के लम्बे सूती दस्ताने बेचने वाले एक आदमी से हमने जब इस बारे में पूछा तो उसने मुस्कुराते हुए बताया कि मैडम आजकल लड़के लड़कियों में फर्क नहीं रह गया है। कोई काला नहीं दिखना चाहता। हमारे पास से तो बल्कि ज्यादातर लड़के ही दस्ताने खरीदते हैं। वैसे भी वो ही बाइक ज्यादा चलाते दिखते हैं। हम खुद ही हर किसी के पास यह कह कर अपने दस्ताने बेचने जाते हैं कि ले लो साहब हाथों का रंग काला नहीं होगा, तो अधिकतर लोग खरीद लेते हैं।
 

हरियाणा सरकार के विज्ञापनों में शहीद ऊधम सिंह के नाम की स्पेलिंग ग़लत



यह बेहद शर्म की बात है कि एक तरफ तो हम शहीद ऊधम सिंह जी के शहादत को याद करने के लिए उन्हें श्रद्धाजंलि दे रहे हैं, दूसरी तरफ हम उनका नाम तक ठीक से नहीं लिख सकते। जी हां आप खुद देख सकते हैं। शहीद ऊधम सिंह जी के शहीदी दिवस पर आज हरियाणा सरकार के सूचना, जन सम्पर्क एवं सांस्कृतिक कार्य विभाग द्वारा जो विज्ञापन  हिन्दी समाचार पत्रों में छपवाया गया है, उसमें शहीद ऊधम सिंह जी के नाम की वर्तनी गलत है।
   ऊधम में जहां ध होना चाहिए था वहां दूसरा अक्षर इस्तमाल किया गया है।

यह है शहीद ऊधम सिंह के नाम की सही वर्तनी
           यह शहीद का अपमान तो है ही, साथ  ही हमारी राष्ट्रभाषा हिंदी का भी अपमान है जिसका प्रयोग करके एक शहीद का नाम ग़लत लिखा जा रहा हैं।
    सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि यह ग़लती एक सरकारी विभाग (हरियाणा के सूचना,जनसम्पर्क एवं सांस्कृतिक विभाग) द्वारा की गई हैं। इतने बड़े विज्ञापन में जिसको श्रद्धांजलि दी जा रही है, अगर उसी का नाम ग़लत छपवाया जाए, और वो भी एक सरकारी विभाग द्वारा तो इससे ज़्यादा शर्मनाक बात क्या हो सकती है।



Tuesday, 30 July 2013

शिफ्टिंग के लिए मूवर्स और पैकर्स को सामान सौंप रहे हैं..? ज़रा संभल कर, कहीं ये आपको लूट ना लें

अगर आप अपना घर शिफ्ट करने के काम को आसान बनाने के लिए किसी मूवर्स एंड पैकर्स कंपनी की सेवाएं लेने की सोच रहे हैं, तो ज़रा अक्लमंदी से काम लीजिए। अपने मूवर्स और पैकर्स को चुनने और उनसे सेवाएं लेते समय आपने अगर सावधानी नहीं बरती तो कहीं ऐसा ना हो कि आसानी के चक्कर में आप परेशानी में पड़ जाए। पैसे भी गंवाए, सामान से भी हाथ धोना पड़े और मन की शांति भी जाए।
       जी हां ऐसा ही कुछ अनुभव रहा गुड़गांव में जैनपैक्ट में काम करने वाले भास्कर अग्रवाल का। कंपनी के काम से तीन साल के लिए विदेश जा रहे भास्कर ने जाने से पहले जब किराए का घर छोड़कर अपने पैतृक निवास आगरा में सामान शिफ्ट करने की सोची तो उन्हें भी इसके लिए मूवर्स और पैकर्स की सुविधाएं लेना आसान लगा। जस्ट डायल वेबसाइट से तिरुपति बालाजी मूवर्स एंड पैकर्स (पता- प्लॉट नं 1088, सेक्टर 28, द्वारका, फोन- 9313356600 / 9311405834 / 9990673021 / 011-32653508)का नंबर मिला और साढ़े आठ हज़ार में बात फाइनल हो गई। भास्कर बड़े खुश थे कि उनका सामान सुरक्षित आगरा पहुंच जाएगा और उन्हें कोई मेहनत या बेकारी का सिरदर्द भी नहीं लेना पड़ेगा। लेकिन भास्कर को क्या पता था कि उन्होंने आसानी नहीं परेशानी मोल ले ली है।
   शिफ्टिंग के दिन सामान पैक करने से ट्रक में लोड करने के समय तक तो कंपनी से आए जसपाल राना जी का व्यवहार बड़ा मृदु रहा लेकिन जैसे ही सामान ट्क में लोड हो गया राना के तेवर बदल गए। उसने भास्कर को साढ़े ग्यारह हज़ार का बिल पकड़ाया और बोला कि पूरा पेमेंट एडवांस करना पड़ेगा वरना ट्रक आगे नहीं जाएगा। जब भास्कर ने कहा कि बात तो सब मिलाकर साढ़े आठ हज़ार में तय हुई थी तो राना ने बताया  कि वो तो बेसिक खर्चा है बाकी सर्विस टैक्स वगैरह मिलाकर साढ़े ग्यारह हज़ार देना पड़ेगा और इन्श्योरेंस का खर्चा अलग से है। चूंकि सामान ट्रक में लोड हो चुका था, इसके बाद यह बात हुई थी तो भास्कर के पास ज्यादा विकल्प नहीं बचे थे, लेकिन फिर भी जब उसने राना से सामान वापस उतारने को कहा तो राना ने कहा कि सामान उतारने के पांच हज़ार रुपए लगेंगे। किसी तरह बहसबाज़ी के बाद दस हज़ार रुपए नकद लेकर राना ट्रक चलवाने को तैयार हुआ।

आखिर साढ़े ग्यारह बजे ट्रक आगरा के लिए निकला। गुड़गांव से आगरा 200 किमी है और ज्यादा से ज्यादा शाम पांच बजे तक ट्रक को आगरा पहुंच जाना चाहिए था। लेकिन ट्रक रात को बारह बजे तक भी आगरा नहीं पहुंचा। जब जब भास्कर ने राना से बात की हर बार उसने बहाना बना दिया कि ट्रैफिक में फंसा हुआ है, पहुंच जाएगा। इसके बाद रात को बारह बजे राना भास्कर को फोन करके कहता है कि ट्रक तो यूपी पुलिस ने पकड़ लिया है। आप अगर पांच-छ हज़ार रुपए देने को तैयार हो तो मैं मामला रफा दफा कर दूं वरना वो लोग रात में ट्रक लूट भी सकते हैं, मेरी जिम्मेदारी नहीं है। 
भास्कर को अब तक समझ में आ गया था कि वो बहुत गलत फंस चुका है। खैर किसी तरह पड़ौस के वकील साहब द्वारा पुलिस की धमकी देने पर राना साहब ने ट्रक छुड़वाने की बात मानी और रात डेढ़ बजे ट्रक घर पहुंचा तो पता चला उसमें किसी दूसरे व्यक्ति का शिफ्टिंग का सामान भी लदा हुआ था। खैर अपना सारा सामान उतरवा कर भास्कर ने उस समय तो ट्रक को रवाना कर दिया पर अगली सुबह जब सामान खोला गया तो पता चला कि गैस का रेग्युलेटर गायब था, दो नई शर्ट्स और घी तेल के डिब्बे गायब थे और सेंटर टेबल का मैगज़ीन ग्लास टूटा हुआ था। भास्कर ने राना जी को भी फोन लगाने की कोशिश की पर अब वो फोन नहीं उठा रहे।
चोट खाने के बाद जब भास्कर ने तिरुपति बालाजी मूवर्स एंड पैकर्स कंपनी के बिल पर छपे सर्विस टैक्स नंबर को गूगल पर डाल कर सर्च किया तो पता चला कि इस कंपनी के खिलाफ पहले ही उपभोक्त फोरम में बहुत सारी शिकायते दर्ज हैं और केस भी चल रहे हैं - http://www.grahakseva.com/complaints/12878/tirupati-balaji-cargo-packers-and-movers-lost-my-goods, http://www.consumercomplaints.in/complaints/tirupati-balaji-cargo-packers-and-movers-c341724.html

मूवर्स और पैकर्स द्वारा मानसिक प्रताड़ना और पैसों व सामान दोनों की बरबादी झेलने के बाद भास्कर ने तो कान पकड़ लिए हैं कि वो अब मूवर्स और पैकर्स के चक्कर में नहीं पड़ेंगे। लेकिन ऐसा करने से फ्रॉड करने वाली कंपनियों पर कोई असर नहीं पड़ने वाला। वो भास्कर जैसे किसी और ग्राहक को परेशान करेंगी। इसलिए बेहतर है कि आप अपनी तरफ से सावधानी बरतें। अपना सामान शिफ्ट करते समय मूवर्स और पैकर्स को जल्दबाज़ी में नहीं बल्कि अक्लमंदी से चुने। वरना आपको भी भास्कर की तरह कड़वे अनुभव का सामना करना पड़ सकता है।

मूवर्स एंड पैकर्स चुनते समय ध्यान रखें
  • अगर आप जस्ट डायल से मूवर्स एंड पैकर्स चुन रहे हैं, तो उनकी साइट पर पंजीकृत किसी कंपनी का नाम ही चुने। पॉप अप विंडो में आने वाले विज्ञापनों से बच कर रहे, इनसे अपना मूवर्स एंड पैकर्स बिल्कुल ना चुने। अधिकतर फ्रॉड कंपनिया इसी तरह पॉप विंडो से विज्ञापन करती हैं।
  •  जस्ट डायल में हर कंपनी के आगे ग्राहको की रेटिंग भी दी हुई है, बेहतर हो कि पहले आप वो रेटिंग देख लें। अगर रेटिंग अच्छी है तभी उस कंपनी को चुने।
  • एक बार कंपनी का नाम, एड्रेस वगैरह पता चलने के बाद उसे गूगल पर डाल कर देख लें। अगर कंपनी द्वारा किया गया फ्रॉड, या कंपनी कि खिलाफ शिकायत गूगल पर या उपभोक्ता फोरम में होगी तो आपको पता चल जाएगा।
  • कंपनी से पहली बार में ही साफ साफ पैसों के बारे में बात कर ले। इंश्योरेंस, सर्विस टैक्स आदि सब की जानकारी ले लें।
  • शिफ्टिंग के समय सामान पैक करवाने से पहले ही बिल अवश्य मांग ले ताकि आपको भास्कर जैसी परेशानी का सामना ना करना पड़े।
  • अगर लोकल या पास के शहर में ही शिफ्टिंग करनी है तो बेहतर है कि आप अपनी गाड़ी ट्रक के पीछे या उसके साथ ही ले जाएं।
 

Monday, 29 July 2013

सौंधी खुश्बू सा रूप सजा है और मन की गहराई में मिट्टी की बू-बांस भी है...

पीले घाघरे में सोमाली और उसकी भावज कनुआ
ना बहुत साज सिंगार, ना ब्यूटी पार्लर के चक्कर और ना ही जिम या योगा क्लासेज की भागदौड़, और हां ना ही डिज़ाइनर कपड़े... यह गांव की गोरियां हैं, रंग रंगीले राजस्थान के गांव की गोरियां। भारत की देसी खूबसूरती इन गोरियों में फिर भी छलकती है।  पतली कमर, कमर पर कसा खूबसूरत गोटे वाला पीले फूलों का घाघरा, उस पर कमर में स्टायल से बांधी गई गोटे पट्टी वाली गुलाबी चुनर जिसका पल्लू सिर पर भी ढका हुआ है.. तिस पर आत्मसम्मान से भरा चेहरा, चेहरे पर खिलती विश्वास भरी मुस्कान, सुतवां नाक, नाक में नथनी
 और बड़ी लाल माथे की बिंदिया... यह रूप है राजस्थान की सोमाली का। और यह जो गोटे वाले धानी घाघरे  और गुलाबी रंग की चूनर ओढ़े शरमाती हुई गोरी सोमाली के बगल में खड़ी है वो है कनुआ, सोमाली की भावज....
अब आप सोच रहे होंगे कि इस छोटी सी सोमाली और कनुआ में खबर कहां है, क्या है और मैं क्यों इनकी सुंदरता की तारीफ के पुल बांधे जा रही हूं... तो इसकी वजह है सोमाली का आत्मसम्मान और वो विशुद्ध देसी खूबसूरती जिसके आज मुझे दिल्ली के सरोजिनी नगर मार्केट में दर्शन हुए।
 बात बस इतनी सी थी कि आज सोमवार को सरोजिनी नगर के सोमवार बाज़ार में जब मैं खरीददारी करने पहुंची हुई थी तो घूमते हुए मेरी नज़र सोमाली की छोटी सी राजस्थानी गहनों की रेहड़ी पर पड़ी।जिस पर सोमाली अपनी मां ढपली और भावज कनुआ के साथ ग्राहकों को सामान दिखाने में लगी थी। मुझे भी एक माला पसंद आई और मैंने मोल पूछा। सोमाली ने 200 रूपए की माला बताई और मैंने बनिया स्वभाव के फलस्वरूप मोलभाव करके 150 रुपए में बात तय कर ली। मैंने सोमाली को पैसे दिए, माला ली और चल दी।
 
सोमाली की गहनों की रेहड़ी-पट्टी

 मैं बस कुछ ही दूर पहुंची होंगी कि पीछे से किसी की आवाज़ सुनाई दी... मैडम, मैडम...मैंने मुड़ कर देखा तो सोमाली और कनुआ दौड़े आ रहीं थी। पास आ कर कनुआ ने मेरे हाथ में 50 रुपए पकड़ाए और बोली मैडम आप पैसे वापस लेना भूल गईं थी। मैंने हैरानी से देखा, हंसते हुए कहा...अरे मैं भूल गई थी तो तुम रख लेती, तुम्हारा फायदा हो रहा था, वैसे भी मैंने 50 रुपए कम कर दिए थे... और सोमाली गर्व से बोली..."ऐसे कैसे रख लेते मैडम, चीज बेचते हैं, हेराफेरी थोड़े ही करते हैं, फालतू पैसे हमें ना फलेंगे"

अपनी मां ढपली के साथ सोमाली
और मैं लाजवाब हो गई। इस छोटी सी सोमाली को मैंने गौर से देखा और वो मुझे वास्तव में भारत का सच्चा प्रतिनिधित्व करती महसूस हुई। सुन्दर, सजीला, गर्व और स्वाभिमान से भरा भारत, ईमानदार भारत, सिर पर पल्लू ओढ़े लेकिन सिर ताने खड़ा भारत।

सोमाली के बारे में जानने की भी इच्छा हुई। जब पूछा तो उसने बताया कि अपने पूरे परिवार के साथ राजस्थान से आई है वो और फिलहाल मदनपुर खादर में रहती है। यहां मां ढपली और भावज के साथ वो गहने बेचती है और उसका आदमी, भाई और पापा लाजपत नगर में रेहड़ी पट्टी लगाते हैं। जब मैंने सोमाली से तस्वीर खिंचवाने को कहा तो देखिए कैसे फट से कैमरे के सामने खड़ी हो गई। अपनी भावज कनुआ, जो बहुत शरमा रही थी को भी खड़ा कर लिया। एक फोटो अपनी मां के साथ भी खिंचवाई और हां जब मैं चलने लगी तो यह कहना भी नहीं भूली कि मैडम फोटो तो दिखा दो। बात छोटी सी है लेकिन इस छोटी सी बात ने आज मुझे बहुत कुछ दिखाया, सिखाया और भारत की सुंदरता से मिलवाया भी।  

एड्स रोगियों की शादी के लिए ब्यूरो, एचआईवी पॉजिटिव लोग भी जी रहे हैं पॉजिटिव शादीशुदा ज़िंदगी



एक शादीशुदा जोड़े के साथ मिस्टर प्रसाद (बांयी ओर से पहले व्यक्ति)
हैदराबाद की सोनिया फिलहाल अपने पति अच्युत के साथ एक सामान्य ज़िंदगी जी रही है। दोनों अपनी ज़िंदगी में बहुत खुश हैं। उनकी शादी को एक साल हो गया है, दोनों बेहद प्यार से एक दूसरे के साथ रह रहे हैं और अब अपने परिवार में एक नन्हा महमान लाने की भी सोच रहे हैं। सिर्फ दो साल पहले तक यह सब सपना सा लगता था.... उसकी पहली शादी को सिर्फ 6 महीने हुए थे और जब वह गर्भवती होने के तीन महीने बाद पहली बार डॉक्टर से अपना चेकअप कराने गई तो मानो आसमान ही टूट कर गिर पड़ा। सोनिया एचआईवी पॉज़िटिव निकली। पति को पता चला तो उसने ना सिर्फ ज़िद करके बच्चा गिरवा दिया बल्कि कुछ ही समय में सोनिया को तलाक भी दे दिया। अपने घर और समाज में लोक लाज के डर से सोनिया बेहद डरी, सहमी और उपेक्षित ज़िदंगी जी रही थी। मां-बाप ने उसका घर से बाहर निकलना बंद कर दिया था। ज़िदंगी नर्क बन गई थी और अचानक एक दिन सब कुछ बदल गया। उसने हैदराबाद स्थित एचआईवी मैरिज ब्यूरो का विज्ञापन एक अखबार में पढ़ा और उसमें अपने आप को रजिस्टर करा लिया। इस ब्यूरो में उसकी काउंसलिंग की गई, उसके घर के लोगों की काउंसलिंग की गई और सोनिया में जीवन के प्रति एक नया हौसला जगाया गया। ब्यूरो ने उसे शादी के लिए उसी जैसे लड़को से मिलवाया। अच्युत से सोनिया का मन मिला और कुछ ही समय में दोनों की शादी भी हो गई। और आज दोनों खुशहाल ज़िंदगी जी रहे हैं।

   सोनिया तो सिर्फ एक उदाहरण है, लेकिन ऐसे सैकड़ो एचआईवी पॉज़िटिव लोग हैं जिनकी नेगेटिव ज़िदंगी और सोच को एक पॉज़िटिव दशा और दिशा दी है हैदराबाद स्थित एचआईवी मैरिज ब्यूरो ने।
श्री बीएचएस प्रसाद द्वारा शुरू किया गया यह मैरिज ब्यूरो पूरे भारत का पहला मैरिज ब्यूरो है जो पूरी तरह से एड्स रोगियों की शादियां करवाने के लिए समर्पित है। एचआईवी मैरिज ब्यूरो में रजिस्टर होने के बाद पूरे भारत में अब तक 500 एड्स रोगियों की शादियां करवाई जा चुकी हैं और सभी फिलहाल अच्छी ज़िदंगी जी रहे हैं।
 एचआईवी मैरिज ब्यूरो के ज़रिए सैकड़ो एड्स रोगियों की ज़िदगी को बेहतरी की तरफ मोड़ने वाले शख्स हैं  श्री बीएचएस प्रसाद। मिस्टर प्रसाद पहले एड्स रोगियों के लिए काम कर रही एक समाज सेवी संस्था से जुड़े हुए थे। इस दौरान उन्हें बहुत से ऐसे एड्स रोगी मिले जिनकी शादियां या तो असमय टूट चुकी थी या फिर जो कुंवारे थे लेकिन कोई उनसे शादी नहीं करना चाहता था। पर इन सभी लोगों की शादी करके एक खुशहाल ज़िंदगी जीने की काफी तमन्ना थी। तब मिस्टर प्रसाद ने 2006 में खुद अपना एचआईवी मैरिज ब्यूरो शुरू किया और उन सभी लोगों को पंजीकृत किया जो एड्स रोगी थे और शादी करने के इच्छुक थे। एचआईवी पॉजिटिव लोगों को एक दूसरे से मिलवायां और उनकी शादियां आपस में करवानी शुरू कर दीं।
हांलाकि शुरूआत में उन्हें काफी असफलताओं का सामना करना पड़ा लेकिन एड्स रोगियों की ज़िंदगी को बेहतर दिशा देने की ठान चुके श्री प्रसाद ने हार नहीं मानी और अपनी कोशिशों में लगे रहे। आज एचआईवी पॉज़िटिव मैरिज ब्यूरो देश का एक बेहद सफल एचआईवी मैरिज ब्यूरो है जो अब तक पूरे देश में 500 एड्स रोगियों की शादियां करवा चुका है जिनमें से अधिकतर आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु में हुई हैं। मिस्टर प्रसाद समाज से बहिष्कृत एचआईवी पॉज़िटिव लोगों के लिए एक होस्टल भी चलाते हैं जिनमें काम करने वाले लोग भी एचआईवी पॉज़िटिव हैं। आज मिस्टर प्रसाद की कोशिशों से बहुत से एचआईवी रोगी एक बेहतर, आत्मविश्वास और आत्मसम्मान से भरी हुई सुखी शादीशुदा ज़िंदगी जी रहे हैं।
अगर आप भी एचआईवी से ग्रस्त हैं, या किसी ऐसे व्यक्ति को जानते हैं, जो एड्स का रोगी है और गृहस्थ जीवन जीना चाहता है तो आप भी मिस्टर प्रसाद से सम्पर्क कर सकते हैं। आखिर ज़िंदगी सभी के लिए समान है। एड्स होने पर ज़िंदगी खत्म नहीं होती। ज़िदगी काटने नहीं बल्कि जीने के लिए आप भी हैदराबाद स्थित इस ब्यूरों में रजिस्टर करने के लिए इनकी वेबसाइट http://www.hivmarriages.org पर  जा सकते हैं।  एचआईवी मैरिज ब्यूरो के संपर्क सूत्र हैं - 9391183116, 9703527005

यहां भी मिल सकते हैं पॉज़िटिव जीवनसाथी

देहली नेटवर्क ऑफ एचआईवी पॉज़िटिव पीपल
 दिल्ली में भी एक ऐसी ही संस्था जिसका नाम है देहली नेटवर्क ऑफ एचआईवी पॉज़िटिव पीपल, एड्स के कारण समाज से बहिष्कृत लोगों को मन में आत्मसम्मान जगाने का काम कर रही है। यहां भी एचआईवी ग्रस्त लोगों की काउंसलिंग, नौकरी दिलाने और उनकी शादियां करवाने का काम किया जाता है। इस संस्था में कार्यरत सभी लोग एचआईवी पॉज़िटिव हैं और एचआईवी पॉज़िटिव लोगों के लिए काम कर रहे हैं।
संस्था का पता है- हाउस नंबर-64, गली नंबर-3, नेबसराय, दिल्ली-110068
संपर्क सूत्र- 29535239, 29534370

इनके अलावा पॉज़िटिव साथी डॉट कॉम (http://www.positivesaathi.com) भारत का पहली एचआईवी ग्रस्त लोगों के लिए बनी मेट्रिमोनियल वेबसाइट है। जिस पर एचआईवी ग्रस्त लोगों के हज़ारो प्रोफाइल मौजूद हैं, यहां जाकर एड्स ग्रस्त लोग अपने लिए उचित जीवन साथी तलाश कर सकते हैं।
जीवनसाथी डॉट कॉम पर भी एचआईवी पॉज़िटिव लोगों के प्रोफाइल और तस्वीरे मौजूद हैं, जिन्हें आप इस लिंक पर देख सकते हैं। http://www.jeevansathi.com/hiv-positive-matrimony-matrimonials
 

Sunday, 28 July 2013

यहां औरत की चिता तभी जलती है जब मायके वाले लकड़ियों के पैसे दे दें...

  •  --आगरा के बनिया समुदाय में प्रचलित है ये कुप्रथा

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  • -शादी के बाद अगर बूढ़ी होकर भी औरत की मौत हो तो चिता के लिए लकड़ी मायके वालों को ही देनी पड़ती है

आगरे की निवासी मुन्नी अग्रवाल को समझ नहीं आ रहा कि ननद की चिता तैयार करने के लिए लकड़िया कैसे खरीदें। जल बोर्ड से सेवानिवृत्त उनके पति की पेंशन से हर महीने आठ हज़ार रुपए आते हैं। महंगाई के इस ज़माने में दो प्राणियों के लिए घर का खर्च ही खींचतान कर चलता है, उस पर उनकी ननद के स्वर्गवास की खबर आ गई है और अब उसके दाह संस्कार के लिए लकड़ियों का खर्चा उठाना हैं, अर्थी पर डालने के लिए साड़ी लेनी है और इसके बाद ननद के ससुराल वालों के खाने-पीने का भी इंतज़ाम करना है, जिसमें लगभग दो-ढाई हज़ार का खर्चा आ जाएगा। हाथ भले ही तंग है पर मना भी नहीं कर सकते, आखिर लोग क्या कहेंगे .., और फिर पुरखों की बनाई रीत है कि लड़की चाहे वृद्धावस्था में ही क्यों ना मरे, उसके दाह संस्कार के लिए खर्चा मायके वाले ही वहन करते हैं इसलिए यह तो करना ही है।

बात सुनने में और पढ़ने में शायद अजीब लगे, लेकिन अगर अपने घर में मौजूद बड़े-बुज़ुर्गों से आप पूछेंगे तो शायद उन्हें इस प्रथा की जानकारी हो। ताजमहल के शहर आगरा के वैश्य समुदाय में यह प्रथा बरसों से चली आ रही है कि ब्याही हुई लड़की की मृत्यू के बाद उसके दाह संस्कार का खर्चा लड़की के मायके वालों को उठाना पड़ता है। 
इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि लड़की की उम्र क्या है, भले ही वो अभी ब्याही गई हो या शादी के दस साल बीत चुके हों, भले ही वो सास बन चुकी हो या पोते, पोतियों की दादी। और भले ही आपके बेटे या पोते कितने ही अमीर क्यों ना हो, और मायके वाले कितने ही गरीब क्यों ना हो...पुरखों की बनाई हुई रीत के अनुसार मौत के बाद शव के दाह संस्कार में लगने वाली लकड़ियों का पूरा खर्चा उसके मां-बाप या अगर वो नहीं है तो भाई-बहन या फिर मायके में जो भी रिश्तेदार मौजूद है, उसे उठाना होता है।
औरत की अर्थी तभी ससुराल से निकलती है जब उस पर मायके की तरफ से लाई गई साड़ी या चुनरी डाल दी जाती है। शव का दाह संस्कार तभी होता है जब उसे मायके द्वारा खरीदी गई लकड़ियों की चिता पर अग्नि दी जाए। वरना मरने के बाद भी उसे गति नहीं मिलती।
जी हां, लड़कियों को यूं ही घरवाले बोझ नहीं समझते। अब तक जितने भी कानून बनाए गए हैं वो दहेज प्रथा को रोकने के लिए हैं, लेकिन हिन्दू समाज में मां बाप द्वारा शादीशुदा लड़कियों पर रीति रिवाज के नाम पर किए गए खर्चो की लिस्ट दहेज के खर्चे से कहीं ज्यादा लम्बी है।
 मायके की त्रासदी सिर्फ लड़कियों के लिेए दहेज जुटाने पर खत्म नहीं हो जाती। एक बार लड़की की शादी हो जाने के बाद, साल भर तक तीज त्यौहारों पर सामान भेजना, ज़िंदगी भर होली-दीवाली पर त्यौहार भेजना, लड़की के बच्चों की शादी या नामकरण, कनछेदन समारोह से लेकर उनकी शादियों तक में अच्छा खासा सामान देने से लेकर लड़की के मरने के बाद शव को जलाने के लिए लकड़ियों तक का प्रबंध मायके वालों को करना पड़ता है।
सफदरजंग अस्पताल में डॉक्टर एकता बंसल, जिनकी ससुराल आगरा में है, की बुआ सास की मौत के बाद जब उनके लड़के डॉ बंसल की सास से अपनी मां की लकड़ियों के लिए पैसे मांगने आए, तब उन्हें इस प्रथा के बारे में पता चला। डॉ एकता बंसल ने जब अपनी सास से पूछा कि बुआजी की चिता की लकड़ियों के पैसे आप क्यों दोगी, तो उनकी सास ने बताया कि यहां ऐसा ही होता है, औरत के मरने के बाद उसके मायके वालों द्वारा दी गई लकड़ियों पर ही उसे जलाया जाता है। यही रीत है। डॉक्टर बंसल को समझ में नहीं आया कि इस बुरी प्रथा के बारे में क्या कहे। जब हमने उनसे इस बारे में बात की तो उन्होंने दो टूक कहा "यह कैसी प्रथा है। मतलब अगर किसी ने लड़की पैदा कर ली तो गुनाह ही कर लिया। मां-बाप पहले उसकी शादी, दहेज का खर्चा दे, फिर साल भर तक तीज त्यौहार भेजते रहें, फिर लड़की के बच्चों के पैदा होने पर, नामकरण पर और यहां तक कि शादी पर भी भात दें और मरने के बाद उसकी अर्थी और दाह संस्कार का खर्चा भी वहीं उठाए। हद हो गई, इसलिए तो लोग लड़किया पैदा करने से डरते हैं।"

आगरा निवासी सुमन अग्रवाल भी बड़े दुख के साथ इस प्रथा के बारे में बात करती हुई कहती हैं " क्या करें, पुरखों की बनाई रीत के नाम पर बरसों से यह प्रथा चली आ रही है। मांओ के बच्चों को भी तो शर्म नहीं आती, खुद अपनी मां का दाह संस्कार नहीं कर सकते, रीत का नाम लेते हैं और मायके वालो से लकड़ी के पैसे मांगने पहुंच जाते हैं।"
दो लड़कियों की मां और कॉन्वेंट स्कूल में अध्यापिका समीक्षा सिंघल बड़े रोष के साथ कहती हैं कि "यह प्रथा नहीं गंदगी है और मैं कभी भी अपने घरवालों को ऐसा नहीं करने दूंगी। अपनी मां के मरने के बाद मैं तो मामा से अर्थी और लकड़ियों का खर्चा लेने नहीं जाऊंगी और ना अपने भाई और पापा को जाने दूंगी। अगर मामा देंगे तो भी मना कर दूंगी। भई वो हमारी मां है, हमें पाला-पोसा,बड़ा किया और हम उनकी मौत के बाद उनके दाह संस्कार तक का खर्चा नहीं उठा सकते।"
हांलाकि बहुत से बड़े बुज़ुर्ग यह कह कर इस प्रथा का समर्थन करते हैं कि यह तो लड़कियों की भलाई के लिए ही है कि ज़िदंगी भर भले ही वो किसी दूसरे घर में रही लेकिन कम से कम मरते समय तो उन्हें अपने खुद के घर यानि मायके की चुनरी और लकड़ियां नसीब हो रही हैं।
  आपको यह भी बता दें, कि घर के पुरुष सदस्यों के मरने पर ऐसा नहीं होता। उनकी मौत पर उनके बच्चे ही सारा इंतज़ाम करते हैं क्योंकि पुरुषों का तो वह घर उनका अपना होता है,  बस महिला सदस्यों की मौत के बाद ही उनके मायके से लकड़िया मंगायी जाती है, क्योंकि वो दूसरे परिवार से आती हैं।
इसे आगरा के वैश्य परिवारों की महिलाओं की त्रासदी ही कहा जा सकता है कि पूरी ज़िदंगी एक घर और परिवार को देने के बावजूद वो पराए घर की ही बेटियां रहती है और मरने के बाद भी उनका दाह संस्कार तब तक नहीं होता जब तक मायके वाले आ कर अपने पैसों से उनकी चिता ना सजा जाएं।

 

Saturday, 27 July 2013

पाठ्य पुस्तकों में पढ़ाए जा रहे हैं धोनी, तेंदुलकर, एश्वर्या राय, सुष्मिता सेन और अमिताभ बच्चन


  • सामान्य ज्ञान की किताबों का स्वरूप बदला

  • समकालीन खिलाड़ियों, अभिनेताओं और कलाकारों को अमर बना रही हैं पाठ्य पुस्तकें


मैंने जब अपने तीसरी कक्षा में पढ़ने वाले बेटे से भारत की तीन महान हस्तियों के नाम पूछे तो उसका जवाब था- विराट कोहली, सचिन तेंदुलकर और एम एस धोनी। चौंकिए मत, आज की सच्चाई यहीं हैं। आज के प्राथमिक कक्षाओं के छात्र सामान्य ज्ञान की किताबों में भारत के महान स्वतंत्रता सेनानियों, महान गुरुओं
या अविष्कारकों के बारे में नहीं पढ़ रहे बल्कि समकालीन खिलाड़ियों, अभिनेताओं, अभिनेत्रियों और कलाकारों के बारे में पढ़ और सीख रहे हैं।
एक समय वह था जब हम सामान्य ज्ञान की किताबों में विभिन्न राज्यों, देशो की राजधानियों, भाषाओं, झंडो, वहां की प्रमुख फसलों, ऐतिहासिक स्थलों, एतिहासक प्रतीकों आदि के बारे में पढ़ते थे। सामान्य ज्ञान बढ़ाने का मतलब देश के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों, साहित्यकारों, कलाकारों, विश्व के सात अजूबों आदि के बारे में जानकारी होना माना जाता था। देश-विदेश में हुई उन प्रमुख घटनाओं के बारे में पढ़ाया जाता था जो कि विकास में अहम्  रही हैं। लेकिन आज वक्त बदल गया है,यह सारी चीज़े काफी हद तक किताबों से गायब हो चुकी है। आज प्राथमिक स्कूलों के बच्चे सामान्य ज्ञान की किताबों में समकालीन खेल सितारों, संगीतकारों, ओलंपिक पदक विजेताओं, फिल्मी सितारों और खबरिया चैनलों के सूत्रधारों (एंकर्स) और रिपोर्टर्स के बारे में पढ़कर अपना सामान्य ज्ञान बढ़ा रहे हैं। विश्व की सबसे बड़ी घटनाओं में भारत द्वारा क्रिकेट वर्ल्ड कप की जीत के बारे में पढ़ाया जा रहा है।  हांलाकि यह
सभी सितारे अपने क्षेत्र के शानदार प्रदर्शनकर्ताओं में से हैं और अभी भी काम कर हैं लेकिन यह देख कर हैरानी होती है कि जिन्हें हम अभी भी खेलते, अभिनय करते या काम  करते देख रहे हैं और जिन्हें शायद अभी भी ज़िंदगी में काफी कुछ प्राप्त करना बाकी है, वो स्कूल की पाठ्य पुस्तकों में अमर हो रहे हैं। और प्राथमिक कक्षाओं के बच्चे उन्हें सामान्य ज्ञान की किताबों में पढ़कर अपने ज्ञान में वृद्धि कर रहे हैं।
जहां पहले सामान्य ज्ञान की किताबों में स्वतंत्रता सेनानियों, अशोक चक्र, सात अजूबे आदि मुखपृष्ठ पर नज़र आते थे, आज उन किताबों के मुखपृष्ठ पर सचिन तेंदुलकर, महेंद्र सिंह धोनी, एश्वर्या राय, क्रिकेट विश्व कप 2011 की विजेता टीम आदि की तस्वीरे नज़र आती हैं।
किताबों में स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और महिला प्रधानमंत्री के साथ टेस्ट कप में हैट्रिक बनाने वाले भारत के प्रथम गेंदबाज़ हरभजन सिंह की तस्वीर मौजूद है।
भारत की विश्वविख्यात शख्सियतों में महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, गुरू नानक देव और जवाहर लाल नेहरू के साथ सचिन तेंदुलकर का नाम रखा गया है।
विश्व में सबसे प्रसिद्ध भारतीयों में अमर्त्य सेन, अमिताभ बच्चन,  धर्मगुरू श्री श्री रविशंकर के नाम और तस्वीरे हैं। और भारत के महान व्यक्तियों में संगीतकार ए आर रहमान, क्रिकेटर कपिल देव, धीरू भाई अंबानी, चित्रकार एम एफ हुसैन, तबला वादक ज़ाकिर हुसैन, स्वर कोकिला लता मंगेशकर और अमिताभ बच्चन जैसे नाम शामिल किए गए हैं।
 सिर्फ यहीं नहीं सामान्य ज्ञान में बच्चों को प्रमुख न्यूज़ चैनल के एंकर्स के बारे में भी पढ़ाया जा रहा है। आप की अदालत वाले रजत शर्मा, सीधी बात वाले प्रभू चावला और एनडीटीवी के प्रणव रॉय के बारे में पढ़कर दूसरी, तीसरी और चौथी कक्षाओं के छात्र अपना सामान्य ज्ञान बढ़ा रहे हैं।

सामान्य ज्ञान की किताबों में छाए लिविंग लेजेन्ड्स

 क्रिकेट सितारे-  सामान्य ज्ञान की किताबों के बदले हुए स्वरूप पर सबसे ज्यादा कब्ज़ा किया है क्रिकेट सितारों ने। 2011 विश्व कप जीतने वाली पूरी भारतीय क्रिकेट टीम के खिलाड़ियों के बारे में पाठ्य पुस्तकों में पढ़ाया जा रहा है। सबसे ज्यादा छाए रहने वाले सितारे हैं- सचिन तेंदुलकर, महेंद्र सिंह धोनी, युवराज सिंह और विराट कोहली। इनके अलावा राहुल द्विड़, हरभजन सिंह, सुरेश रैना, चेतेश्वर पुजारा, वीरेन्द्र सहवाग, गौतम गंभीर, राहुल द्रविड़, कपिल देव, रवि शास्त्री, सुनील गावस्कर और मंसूर अली खां पटौदी। आईपीएल टीमों के बारे में भी पढ़ाया जा रहा है।
ओलंपिक पदक विजेता- क्रिकेट सितारों के बाद सबसे ज्यादा पढ़ाए जा रहे है ओलंपिक में पदक जीतने वाले भारतीय खिलाड़ी। अभिनव बिंद्रा, सायना नेहवाल, एम सी मैरीकॉम, राज्यवर्धन सिंह राठौर, सुशील कुमार, विजेंदर शर्मा, गगन नारंग आदि पढ़ाई का हिस्सा बन चुके हैं।
अन्य खिलाड़ी- इनमें महेश भूपति, लिएंडर पेस, पीटी ऊषा, अंजू बॉबी जार्ज, सानिया मिर्ज़ा, धनराज पिल्लै, भाइचुंग भूटिया और विश्वनाथन आनंद जैसे सफल खिलाड़ी शामिल हैं।
फिल्मी हस्तियां-
फिल्मी हस्तियों में सबसे ज्यादा पढ़ाए जाने वाले अभिनेता हैं अमिताभ बच्चन। इनके बाद संगीतकार ए आर रहमान, पहली मिस यूनिवर्स सुष्मिता सेन, मिस वर्ल्ड एश्वर्या राय और स्वर कोकिला लता मंगेशकर के नाम आते हैं।
न्यूज़ चैनल के चेहरे
प्रणव राय, रजत शर्मा
अन्य समकालीन प्रसिद्ध व्यक्तित्व -  अमर्त्य सेन, श्री श्री रविशंकर, धीरू भाई अंबानी, ज़ाकिर हुसैन, एम एफ हुसैन और अटल बिहारी बाजपेयी

Friday, 26 July 2013

चॉकलेट, कैलोग्स और कोल्डड्रिंक्स में मिले कीड़े, बिस्कुट और जैम में फफूंद

   आप कोका कोला और फ्रूटी बड़े मज़े से पीते हैं। कैडबरी की चॉकलेट बहुत स्वाद ले कर खाते हैं, अपने बच्चों को टाइगर और ब्रिटेनिया के बिस्कुट खिलाते हैं और कैलोग्स कॉर्न फ्लेक्स या व्हीट फ्लेक्स आपके लिए सुबह का सबसे सेहत भरा  नाश्ता हैं, तो ज़रा गौर फरमाईए, यह रिपोर्ट आपके लिए आंख खोलने वाली है। इन सभी पैक्ड और डिब्बा बंद चीज़ों में जीवित कीड़े, कीट, तम्बाकू के पैकेट्स और फंगस मिल रही है। नेट पर कन्ज़्युमर फोरम वेबसाइट (http://www.consumerforums.in) पर इस तरह की इसी वर्ष अब तक 14 शिकायते दर्ज की जा चुकी हैं। जिनमें पूरे भारत से लोगों ने इन विभिन्न खाद्य पदार्थों में की़ड़ों से लेकर फंगस, कूड़ा, कांच और स्टेपलर पिन मिलने जैसी शिकायते दर्ज कराई हैं। आपक यह भा बता दें कि इन शिकायतों का ना तो अभी तक उपभोक्ता फोरम में निपटारा हुआ है और ना ही, सम्बन्धित कंपनी ने इस संबंध में कोई कार्यवाही की है।
हमने जब इनमें से कुछ लोगों से संपर्क स्थापित किया तो इन्होंने हमें बताया कि कंपनी में शिकायत दर्ज कराने के बावजूद किसी ने कोई कार्यवाही नहीं की। कंपनी की तरफ से सिर्फ इतना कहा गया कि हम आपका सामान बदल देते हैं और अगर आप चाहे तो आपको ज़्यादा सामान दे देते हैं। कुछ कंपनिया यह कह कर मुकर गईं कि सामान एक्सपायरी तारीख के बाद का होगा या जिस दुकानदार की दुकान में वो रखा गया है वहां गंदगी के कारण कीड़े या फंगस इन खाद्य सामानों में पहुंचे होंगे लेकिन एक्सपायरी डेट से पहले का सामान खराब कैसे हो गया और सीलबंद सामानों में कीड़े कैसे चले गए इसका जवाब किसी कंपनी के पास नहीं था।

न्यूट्रिलाइट प्रोटीन पाउडर में कीट

फोरम में दर्ज कई शिकायते तो डराने वाली है जैसे कि अजमल फारुख नामक एम्वे कंपनी के एजेंट ने न्यूट्रिलाइट के प्रोटीन पाउडर में पेस्ट्स यानि कीटों के होने की शिकायत दर्ज की है (http://www.consumerforums.in/pest-in-the-product) ।
 आपको याद दिला दें कि एम्वे वो कंपनी है जो वर्ल्ड क्लास उत्पाद बनाने का दावा करती है। इनकी न्यूट्रिलाइट ब्रांड का यह प्रोटीन पाउडर लगभग 1000 रुपए का आता है और लोग अक्सर इसे अपने बच्चों के लिेए खरीदते हैं जिससे उनके विकास में वृद्धि हो। अब इन कीटों वाले प्रोटीन ड्रिंक को पीकर बच्चे बढ़ेंगे या बीमार पड़ेंगे इसका अंदाज़ा कोई भी लगा सकता है।

 कैलोग्स में ज़िंदा कीड़े और मैगोट्स

कुछ ऐसा ही उदाहरण कैलोग्स के उत्पादों का है। यह कंपनी खासतौर से सुबह के नाश्ते के लिए स्वास्थयवर्धक सीरिअल्स, कॉर्न फ्लेक्स, व्हीट फ्लेक्स आदि बनाती है। मुंबई की अंजू नाहटा ने जब लोअर परेल स्थित बिग बाज़ार से खरीदे गए कैलोग्स एक्स्ट्रा मूस्ली नट्स सुबह के नाश्ते में खाने के लिए खोले तो उन्हें यह देखकर गहरा झटका लगा कि उसमें कीड़े चल रहे थे। उन्होंने तुरंत ई मेल के ज़रिए कंपनी में शिकायत दर्ज कराई जिसके बाद कंपनी की तरफ से उनसे माफी मांगी गई और दूसरा डिब्बा दिया गया। लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि दूसरे पैकेट का भी वहीं हाल था यानि उसमें भी कीड़े थे। (http://www.consumerforums.in/contaminated-cereal-pack) । कैलोग्स के अन्य उत्पादों में भी कीड़े, मैगॉट्स, चींटिया और यहां तक कि प्लास्टिक मिलने तक के मामले सामने आए हैं जिनके बारे में आप यहां पढ़ सकते हैं- http://www.consumeraffairs.com/food/kelloggs.html

कैडबरी चॉकलेट में कीड़े- 

कैडबरी चॉकलेट बच्चों और बड़ो दोनों को बहुत पसंद होती है। आजकल तो मिठाईयों की जगह भी तीज-त्यौहारों पर चॉकलेट देने का चलन चल पड़ा है, क्योंकि मिठाई में प्रयुक्त मावा कई बार नकली होता है और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। अमिताभ बच्चन जी भी हर खुशी के मौके पर मुंह मीठा कराने के लिए कैडबरी चॉकलेट खिलाते नज़र आते हैं।  लेकिन स्वास्थ्य के लिेए सुरक्षित और गुणवत्ता से भरपूर मानी जाने वाली चॉकलेट में
अगर आपको कीड़े चलते हुए दिखें तो भी क्या आप इससे मुंह मीठा करना चाहेंगे। जी हां, बैंगलोर की माधुरी जी ने भी जब अपनी पंसदीदा कैडबरी की फ्रूट एंड नट चॉकलेट में कीड़े चलते देखें तो उनके मुंह के साथ दिमाग में भी कड़वाहट भर गई।  ( http://www.consumerforums.in/live-bugs-found-in-cadburys-dairy-milk-roasted-almond)।

 

कोल्डड्रिंक्स में कीड़े, कीट और गुटखे के पाउच

यह फोटो हमें दिल्ली से मिस्टर सुनील पाल ने भेजी है
 
अब बात करते हैं कोल्ड ड्रिंक्स की, जिन्हें सलमान, आमिर और शाहरुख जैसे बड़े-बड़े सितारों  द्वारा बड़े ज़ोर शोर से बेचा जाता है। लेकिन इनकी सीलबंद बोतलों में कई बार लोगों को कोल्डड्रिंक के साथ-साथ कीड़े, गुटखे के पाउच, कूड़े और यहां तक कि फंगस के भी दर्शन होते रहते हैं। कोका कोला और मिनट मेड जूस में कीटाणु (http://www.consumerforums.in/adultrated-drink), http://www.consumerforums.in/foreign-particles-in-minute-maid, मैंगो स्लाइस की बोतल में कीड़ा और गुटखे का पाउच ( http://www.consumerforums.in, स्प्राइट की बोतल में ठोस कूड़ा (http://www.consumerforums.in/solid-waste-material-inside-the-sealed-bottle-of-sprite), और फ्रूटी में कीट पाए जाने जैसी कई शिकायतें लगातार आ रही है। लोग शिकायत भी दर्ज करते हैं लेकिन अफसोस कंपनी की तरफ से कोई ठोस कार्यवाही नहीं की जाती। बल्कि कई मामलों में तो कंपनी जवाब तक देना ज़रूरी नहीं समझती। हम आपको बता दें कि कोल्डड्रिंक्स में अलग अलग चीज़े मिलने की शिकायतें आपको सबसे ज्यादा दिखेंगी।

बिस्कुट, ब्रैड और जैम में फंगस

बिस्कुट और फ्रूट जैम, ब्रैड वगैरह जो कि बच्चों को ज्यादा पसंद आने वासे खाद्य पदार्थ हैं और ज्यादातर घरों में बच्चो के लिए ही मंगाए जाते हैं में भी स्टेपलर पिन(http://www.consumerforums.in/foul-biscuits-sold), विषाक्त पदार्थ और फंगस (http://www.consumerforums.in/fungus-found-over-mixed-fruit-jam) आदि मिलने के मामले सामने आए हैं।

यहीं नहीं आटा, ब्रांडेड पानी की बोतलें, केक्स आदि में भी कीड़े, फंगस और पॉलीथीन आदि मिलने के कई मामले उपभोक्ता फोरम में दर्ज है जो बताते हैं कि स्वास्थ्यवर्धक सामान बेचने वाली इन बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियों के उत्पाद इतने स्वास्थ्यवर्धक है कि आम जनता तो छोड़ो कीट, कीड़े और फफूंदी भी इन्हें खाकर फल-फूल रहे हैं।

एक आध अपवाद होते हैं, माना जा सकता है कि शायद ग़लती हुई होगी और इन उत्पादों में कीड़े या कूड़ा आ गया लेकिन सवाल यह भी है कि साफ सफाई और हाइजीन की दुहाई देकर लागत से दो सो, ढाई सौ गुना महंगा सामान बेचने वाली और बड़े बड़े सितारों से अपने उत्पादों का विज्ञापन कराने वाली इन कंपनियों के खाद्य पदार्थों में गुणवत्ता मानकों पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता। क्या इस तरह के सामान बाज़ार में बेच कर यह कंपनिया सरेआम जनता की सेहत के साथ खिलवाड़ नहीं कर रही हैं।
   
 

सरलीकरण के नाम पर गलत लिखी और पढ़ी जा रही है हिन्दी

           ग़लत हिन्दी में लिखी हुई सूचनाएं, मात्राओं की गलती से भरे हुए हिन्दी के शब्द वगैरह तो आपने काफी पढ़े होंगे और उन्हें पढ़कर हंसे भी होंगे, लेकिन यहां हम आम आदमी द्वारा लिखी हुई हिन्दी की बात नहीं कर रहे। यहां स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली हिन्दी की किताबों की बात हो रही है जिनमें हिन्दी लगातार गलत छप रही है।
आधे शब्दों की जगह बिन्दी का प्रयोग, अक्षरों में ऊपर और नीचे आधे र का ग़लत प्रयोग, मात्राओं का गलत इस्तमाल वगैरह आजकल हिन्दी का पाठ्य पुस्तकों में जमकर हो रहा है। और यह सब चल रहा है सरलीकरण के नाम पर।
 जी हां जब पाठ्य पुस्तकों के एक बड़े प्रकाशक से हमने इस विषय पर बात की तो जनाब का जवाब था कि यह सब इसलिए किया जा रहा ताकि क्लिष्ट हिन्दी भाषा को थोड़ा सरल बनाया जा सके और छात्रो को पढ़ने और याद करने में आसानी हो।
अब यह सरलीकरण कैसा है, ज़रा देखिए- मुर्गा- मुरगा बन गया है और बर्तन- बरतन, सर्दी सरदी हो गई है गर्मी गरमी, दोबारा दुबारा हो गया है, कलयुग बना है कलियुग और इस्तमाल को आजकल इस्तेमाल लिखा जाने लगा है।

हिन्दी में बिन्दी का खेल भी जमकर चल रहा है। सरलीकण के नाम पर हर अं की आवाज़ वाले शब्द में बिन्दी का प्रयोग हो रहा है चाहे वो ग़लत हो या सही। हिन्दी को हिंदी लिखा जा रहा है, और बिन्दी को बिंदी। लैंप (लैम्प) में भी बिन्दी है, घंटा (घण्टा) में भी बिन्दी है, खंड (खन्ड) में भी बिन्दी है,  चंचल (चञ्चल) में भी बिन्दी है और तो और हिन्दी और बिन्दी में भी "बिंदी" है। जहां "हैं" होना चाहिए वहां "है" चलाया जा रहा है और जहां "है" सही है वहां "हैं" लगा है। उदाहरण के लिए महमान तो आते है, लेकिन श्याम जाता हैं।

पता नहीं यह सरलीकरण के कारण ही है या खुद लिखने वालो को भी पता नहीं है कि बिन्दी कहां आती है और कहां आधा न, म, ण या ञ आता है। यहीं कारण है कि बच्चे ग़लत लिख रहे, ग़लत पढ़ रहे हैं और ग़लत ही सीख रहे हैं।
 हिन्दी की आज हालत यह है ड़ और ड के बीच का अन्तर खत्म हो गया है। कहीं कंकड़ में ड़ के नीचे की बिन्दी हट जाती है और वो कंकड हो जाता है और कहीं सांड मं ड के नीचे बिन्दी लग जाती है और वो सांड़ हो जाता है। कुछ यही हाल ढ और ढ़ का है। आपने अक्सर लिखा पढ़ा होगा काके दा ढ़ाबा और ढ़पली बजी..... 


हंसने की भाषा बन गई है हिन्दी

मेरी बड़ी भाभी लखनऊ के स्टैला मैरिस कॉन्वेन्ट स्कूल में नौंवी कक्षा के बच्चों को हिन्दी पढ़ाती है। पिछली साल अर्धवार्षिक परीक्षाओं में हिन्दी के पर्चे में एक निबन्ध लिखने को आया जिसका विषय था- मेरा प्रिय विषय... एक छात्र ने निबंध की पहली लाइन में लिखा- मेरा प्रिय विषय "भाएओ" है। मेरी भाभी ने बहुत सिर पटका, बहुत कोशिश की समझने की कि किस विषय की बात हो रही है पर समझ नहीं आया। आखिरकार उन्होंने निबंध पढ़ना शुरू किया। और दूसरे पैराग्राफ में जब उन्होंने यह पढ़ा कि मुझे भाएओ इसलिए पसंद है क्योंकि मैं डॉक्टर बनना चाहता हूं और इसके लिए भाएओ पढ़ना ज़रूरी है, तब उनकी समझ में आया कि छात्र बायो यानि जीवविज्ञान विषय की बात कर रहा था।

       यह वाक्या सुनाते वक्त मेरी भाभी बहुत हंसती हैं। जब मैंने उनसे पूछा कि क्या अधिकतर बच्चे ऐसी ग़लती करते हैं तो उन्होंने बताया कि दरअसल ऐसा ही है। हिन्दी में सभी छात्रों की हालत बेहद खराब है। बच्चे मात्राओं और शब्दों की इतनी गलती करते हैं कि कई बार अर्थ का अनर्थ हो जाता है। भाभी ने बताया  कि हिन्दी के पेपर जांचने का काम अक्सर एक अच्छा टाइमपास होता है क्योंकि उनमें हंसने के लिए बहुत सी बाते होती है। जी हां यह सिर्फ एक छोटा सा उदाहरण है लेकिन सच्चाई यहीं है कि हिन्दी आज चुटकुलों और चुटकी लेने की भाषा बन कर रह गई है। जिसे कोई गंभीरता से नहीं लेता। हिन्दी में तो कुछ भी कैसे भी लिखा जा सकता है कोई फर्क नहीं पड़ता। आप ने खुद ही कई बार हिन्दी में लिखी बातें, सूचनाएं आदि पढ़ी होंगी जो कि गलत हिन्दी में लिखी होती हैं और उन्हें पढ़कर खूब चुटकी भी ली होगी।

 

     

Thursday, 25 July 2013

आत्महत्या पर आमादा है भारत के विवाहित पुरुष और गृहणियां, रास आ रहा है फांसी का फन्दा

अब तक किसानों और छात्रों द्वारा आत्महत्या किए जाने के मामले देश को दहलाते रहे हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि आत्महत्या करने वालों में सबसे आगे विवाहित पुरुष और स्त्रियां हैं। देश के शादीशुदा जोड़ो को जिन्दगी रास नहीं आ रही।  आर्थिक और सामाजिक तनाव से जूझते विवाहित पुरुष और भावनात्मक परेशानियों से घिरी भारतीय गृहणियां फांसी के फन्दे और ज़हर की बोतलों में अपनी मुश्किलों के हल ढूंढ रहे हैं...... यह हम नहीं कह रहे बल्कि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े यह तथ्य बयां कर रहे हैं कि वैवाहिक बंधन में बंधे हिन्दुस्तानी लोग किस तरह अपना ही जीवन लेने पर तुले हुए हैं। 

 एनसीआरबी की अधिकृत वेबसाइट पर पिछले साल देशभर में हुई आत्महत्याओं के आंकड़े हैं जो काफी चौंकाने वाले हैं। यह आंकड़े बताते हैं कि साल 2012 में देश में कुल 1, 35,445 लोगों ने अपनी जान दी यानि हर एक घंटे में 15 लोगों ने आत्महत्या की और इनमें 71.6 फीसदी विवाहित पुरुष थे जबकि 67.9 फीसदी विवाहित महिलाएं थी। यानि अगर संयुक्त आंकड़ा लिया जाए तो कुल आत्महत्या करने वाले लोगों में से 70 फीसदी विवाहित लोग थे और हर 6 आत्महत्या करने वालों में से एक गृहिणी थी।

              पुरूषों ने जहां सामाजिक और आर्थिक परेशानियों के कारण अपनी जान ली वहीं महिलाओं ने निजी मुश्किलों और भावातिरेक में आकर आत्महत्या की। पारिवारिक परेशानियों और बीमारी के चलते भी लगभग 46 प्रतिशत लोगों ने अपनी जान ली।   इतना ही नहीं आपको जानकर आश्चर्य होगा कि बीते साल देश में पूरे परिवार समेत या कई लोगों द्वारा एक साथ आत्महत्या करने के भी 109 मामले दर्ज हुए हैं जिनमें से सबसे ज्यादा 74  मामले राजस्थान में हुए हैं। 
      आंकड़े यह स्पष्ट तौर पर दिखाते हैं कि आत्महत्या करने में विवाहित पुरुष और महिलाएं सबसे आगे हैं लेकिन और विस्तार से देखें तो पता चलता है कि छात्र-छात्राएं और बच्चे भी खुद अपनी जान लेने में पीछे नहीं हैं। देश में हुई कुल आत्महत्याओं में 5.5 प्रतिशत विद्यार्थियों द्वारा की गईं हैं जिनमें 14 साल की उम्र तक के बच्चे भी शामिल हैं।  
   एक और चौंकाने वाली बात जो यह तथ्य दिखाते हैं वो यह है कि पिछले साल लोगों द्वारा आदर्शवादिता या किसी हीरो को पूजने के कारण जान देने के मामलों में आश्चर्यजनक वृद्धि (329.3 प्रतिशत) हुई है।
यहीं नहीं यह आंकड़े बताते हैं कि आत्महत्या करने वालों में शिक्षित वर्ग के लोग ज्यादा (23 फीसदी) थे और अशिक्षित कम (19.5 फीसदी)। और खुद को मारने वाले लोगों में 37 फीसदी वो लोग थे जो खुद अपना व्यवसाय चला रहे थे जबकि सिर्फ 7.4 ऐसे थे जो बेरोज़गार थे।

 

जान लेने के लिए सबसे कारगर है फांसी का फन्दा

अगर आत्महत्या के तरीकों पर गौर करे तो पता चलता है कि बीते सालों में आत्महत्या करने वाले लोगों के बीच फांसी का फन्दा तेज़ी से लोकप्रिय हो रहा है। पिछले तीन सालों से फांसी लगाकर मरने वाले लोगों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। साल 2012 में भी आत्महत्या करने वाले 37 प्रतिशत लोगों ने फांसी पर झूल कर अपनी जान दी। फांसी के बाद जान देने का दूसरा सबसे कारगर तरीका है ज़हर खाना। जी हां पिछले साल 29.1 प्रतिशत लोगों ने मरने के लिए ज़हर खाया।    
कुछ और महत्वपूर्ण तथ्य-
  •  तमिलनाडु में देश में सबसे ज्यादा 12.5 प्रतिशत लोगों ने आत्महत्या की।
  • 2012 में पूरे देश में 2738 बच्चों ने आत्महत्या की जिसमें पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और उड़ीसा में आत्महत्या करने वाले बच्चों का प्रतिशत सबसे ज्यादा (55.5) रहा।
  • उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले में आत्महत्या के मामलों में आश्चर्यजनक 105.7 फीसदी की वृद्धि हुई है। जहां 2011 में यहां 35 आत्महत्या के मामले दर्ज हुए थे वहीं 2012 में 72 आत्महत्या के मामले सामने आएं हैं।
  •  पिछले साल 214 पुलिसवालों ने आत्महत्या की जिनमें से सबसे ज्याद मरने वाले 45 से 55 आयु वर्ग के थे।
  • आत्महत्या करने वाले लोगों में सरकारी कर्मचारियों का प्रतिशत सबसे कम- सिर्फ डेढ़ प्रतिशत रहा।





Wednesday, 24 July 2013

जिया, जेल और ज़िंदगी की परतें खोलता है सूरज पंचोली का साक्षात्कार


अभिनेत्री जिया ख़ान दो बार पहले भी आत्महत्या की कोशिश कर चुकी थी। सूरज माता-पिता के होते हुए भी चार कुत्तो के साथ अकेले रहते हैं और आर्थर रोड जेल में कैदियों द्वारा किशोरों का शारीरिक शोषण किया जाता है... यह सभी वो चौंकाने वाले तथ्य हैं जिनका खुलासा सूरज पंचोली के एक साक्षात्कार में हुआ है। जी हां, अभिनेत्री ज़रीना बहाव और अभिनेता आदित्य पंचोली के बेटे सूरज पंचोली, जिन्हें अभिनेत्री जिया खान को आत्महत्या के लिए उकसाने के जुर्म में गिरफ्तार किया गया था।  
 23 दिनों तक जेल में रहने के बाद ज़मानत पर रिहा हुए इस 22 वर्षीय युवा ने जब टाइम्स ऑफ इंडिया को अपना पहला साक्षात्कार दिया तो बेहद बेबाकी के साथ जिया खान से अपने संबंधो से लेकर जेल में गुज़ारे अपने दिनों और अपने परिवार के बारे में भी खुलकर बातें की। सूरज पंचोली के इस साक्षात्कार ने बहुत सी ऐसी बातों पर प्रकाश डाला है जिससे सभी पूरी तरह अनजान थे फिर चाहे वो जिया खान की ज़ाती ज़िंदगी हो या खुद सूरज पंचोली का निजी जीवन... इस साक्षात्कार से जो बातें निकल कर आईं हैं वो हैरान करने वाली हैं।

  • 14 साल की उम्र में बलात्कार का शिकार हुई थी जिया खान- 
इस साक्षात्कार में जिया के साथ अपने संबंधो की बात करते हुए सूरज बताते हैं कि जिया खान को फिल्मों में काम नहीं मिल रहा था और उनके पिछले ब्यॉयफ्रेंड भी उनका साथ छोड़ चुके थे जिसकी वजह से जिया खान
काफी असुरक्षित महसूस करती थी। इसलिए फेसबुक के ज़रिए जब अपने से चार साल छोटे सूरज से उनकी दोस्ती और फिर प्यार हुआ तो वो इस रिश्ते को लेकर काफी पोज़ेसिव हो गईं थी। हर रोज़, और हर छोटी से छोटी बात पर सूरज को फोन करना, हर जगह सूरज के साथ आना-जाना जिया की दिनचर्या में शामिल होता जा रहा था। जिया खान पहले भी दो बार आत्महत्या करने की कोशिश कर चुकी थीं। एक बार उन्होंने अपनी कलाई काटी थी और दूसरी  बार खुद को फांसी लगाने की कोशिश की। जिया ने सूरज को यह भी बताया था कि जब वो महज 14 वर्ष की थीं तो लंदन में, उम्र में उनसे काफी बड़े व्यक्ति ने उनके साथ बलात्कार किया था। यहीं नहीं पूर्व में उनके ब्यॉयफ्रेंड भी उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से प्रता़ड़ित कर चुके थे। सूरज और जिया एक तरह से लिवइन रिश्ते में रह रहे थे।
यह सब जिया खान की ज़िंदगी के वो पहलू हैं, जिनसे हम सब कभी भी परिचित नहीं थे। सुना था और पढ़ा भी था कि चमक दमक और ग्लैमर के पीछे काफी दर्द छुपा होता है लेकिन जिया की ज़िंदगी की यह दास्तान काफी चौंकाने वाली है। सिर्फ 26 साल की इस लड़की ने वो सब देखा और झेला जो किसी के लिए भी आसान नहीं है।

  • 16 साल की उम्र से 4 कुत्तो के साथ अकेले रहते थे सूरज- 
इस साक्षात्कार में सूरज ने अपनी ज़िंदगी की भी दास्तां बयां की है। मां ज़रीना बहाव और पिता आदित्य पंचोली के बीच दरार आने के बाद सूरज जूहू में अपने दादा-दादी के साथ रहकर बड़ा हुआ। पांच साल पहले दादा-दादी के गुज़र जाने के बाद सूरज अकेला रह रहा था, उसके साथी सिर्फ उसके पालतू चार कुत्ते थे। जिया जिसे कि सूरज नफीसा कह कर संबोधित करता है, से अपने रिश्तों को लेकर सूरज काफी संवेदनशील था। वो नहीं चाहता था कि उसके रिश्ते का हाल भी उसके मम्मी पापा के रिश्ते जैसा हो इसलिए वह जिया की काफी फिक्र करता था और जहां तक हो सके उसके साथ रहने की कोशिश करता था। सूरज ने स्वीकार किया है कि वो जिया खान से अभी भी बेहद प्यार करता है और उसके साथ जिया का नाम जोड़े जाने पर उसे कोई आपत्ति नहीं है।
 सूरज के द्वारा कहीं गई यह बातें कहीं उसके जीवन के खालीपन का भी आईना है। सूरज भी अकेलेपन का शिकार था और रिश्तों को लेकर उसकी संवेदनशीलता ने ही उसे इतने समय तक जिया खान से जोड़े रखा। साथ ही सूरज का अपने परिवार को लेकर किया गया खुलासा उन सभी स्टार पुत्र-पुत्रियों के दर्द को बयां करता है जो चमक-दमक और दौलत ले भरी बॉलीवुड की दुनिया में रहते हुए भी अपने माता-पिता के अलगाव के कारण अकेलेपन से रूबरू होते हैं।

  • आर्थर रोड जेल में हो रहा है कैदियों का शारीरिक शोषण 
 अपने निजी रिश्तों और बातों के साथ साथ सूरज पंचोली का यह साक्षात्कार सांताक्रूज़ जेल के लॉकअप और
बदनाम आर्थर रोड जेल के हालात से भी वाकिफ कराता है। चार दिन तक सांताक्रूज लॉकअप में सूरज को एक बलात्कारी के साथ रखा गया। लॉकअप में गंदगी का आलम यह था कि एक उनके बिस्तर के पास ही पान की पीक और उल्टी बिखरी हुई थी। और चार दिनों तक सूरज को ऐसे ही रहना पड़ा। लॉकअप में तकिया और ओढ़ने के लिए कम्बल भी नहीं दिए गए। आर्थर रोड जेल के हालात तो और भी बदतर थे। यहां सूरज को अन्डा सेल में उस कोठरी के पास रखा गया था जहां कसाब को रखा गया था। सूरज के मुताबिक जेल में कैदियों के लगभग 10 गैंग बने हुए हैं जो अक्सर लड़ाई करते रहते थे। चूंकि जेल में चाकू उपलब्ध नहीं थे इसलिए ये गैंग चम्मचों को चाकू की तरह इस्तेमाल करते थे। यहीं नहीं अपने जेल में रहने के दौरान सूरज को यह भी पता चला कि कैदी वहां मौजूद 16 साल के बच्चों का शारीरिक शोषण भी करते हैं।
यह सारे तथ्य निश्चित तौर पर सरकार के जेल सुधार संबंधी सारे दावों की पोल खोलने वाले हैं। जेल और कैदियों के सुधार की बात करने वाली सरकार को निश्चित तौर पर इन तथ्यों की जांच करानी चाहिए। आखिर जेल और लॉकअप में सिर्फ कुख्यात अपराधी ही नहीं रहते बल्कि बहुत से अंडर ट्रायल आरोपी भी रहते हैं। और जिस तरह कैदियों द्वारा किशोर बच्चो के शारीरिक शोषण की बात सामने आई है, हालात काफी चिंताजनक है।
 

तस्वीरों में सिमटा मेघों का घर... मेघालय

इस वर्ष मई माह में दिल्ली से लगभग 1500 किमी दूर उत्तर पूर्व में मेघालय भ्रमण पर जाने का मौका मिला। मेघों के इस खूबसूरत घर में प्रकृति की सुंदरता कदम-कदम पर छिटकी पड़ी है। राजधानी ट्रेन में 27 घंटे के सफर के बाद हम गुवाहटी पहुंचे और फिर वहां से प्रसिद्ध कामाख्या देवी के दर्शन के बाद गाड़ी लेकर शिलांग, मेघालय के लिए निकले जो यहां से लगभग 100 किमी दूर है। तीन घंटे के सफर के बाद शिलांग पहुंचकर मेघों से घिरे पहाड़ो और इन विशालकाय पहाड़ों पर जड़े जमाए हरे-भरे पेड़ों को देखा तो सारी थकान उतर गई। लापरवाही से बिखरी पड़ी इस बेजोड़ खूबसूरती को तस्वीरों में कैद कर लाएं हैं हम। इन तस्वीरों से आप भी मेघालय की सैर कीजिए।




दूर तक जहां नज़र जाएं अठखेलियां करते हुए बादल दिखते हैं यहां। शायद इसीलिए इसका नाम मेघों का घर रखा गया है। आसाम की ब्रह्मपुत्र घाटी के उत्तर पूर्व और बांग्लादेश के दक्षिण पश्चिम में बसा मेघालय इतना खूबसूरत है कि एक बार यहां जाए तो वापस आने का मन नहीं करता।





समुद्र तट से 1965 मीटर ऊंची शिंलॉंग चोटी।
यहां से शिलॉंग घाटी का नज़ारा ऐसा दिखता है, मानो किसी ने सन से सफेद रुई के फाहो के बीच हरे, काले दाने बिखेर दिए हों। हर तरफ ऊंचे ऊंचे पहाड़ और पहाड़ों पर झुके हुए बादल यहां पूरे साल नज़र आते हैं।
  

मैं चेरापूंजी में सेवन सिस्टर फॉल्स के पास खड़ी हूं । इसे नो़डकालीकाई झरना भी कहते हैं जो चेरापूंजी का सबसे प्रसिद्ध पर्यटक स्थल है। चेरापूंजी में विश्व में सबसे ज्यादा बारिश होती है। शिलॉंग से सिर्फ 60 किलोमीटर की दूरी पर बसा चेरापूंजी बेहद सुन्दर है।
नोडकालीकाई झरना बांग्लादेश के काफी करीब है यहां से बांग्लादेश की घाटी का भी नज़ारा होता है। एक ही पहाड़ी पर सात छोटे बड़े झरने बहते हुए दिखाई देते हैं। ध्यान से देखिए इस तस्वीर में भी हमने तीन धाराओं में बंटा एक झरना कैद किया है।  
 
 मेघालय की खूबसूरती में चार चांद लगाते हैं यहां हर दो कदम पर पडा़ड़ों से गिरते झरने। कल-कल बहते ये बेबाक, विस्तृत झरने बस यहीं संदेश देते हैं कि चाहे कुछ भी हो, राह में कितनी भी मुश्किलें हो, चट्टानों का सीना चीर कर आगे बढ़ते रहो। पथरीले रास्तों पर भी रुको मत।
मेघालय की खासी पहाड़ियों से गिरते यह झरने इतने तेज़ बहाव के और तेज़ आवाज़ के साथ गिरते हैं कि लगभग आधा किलोमीटर दूर से इनकी आवाज़ सुनी जा सकती है। चूंकि बादल यहां इतनी नीचाई पर हैं और उन्हीं से बरसकर पानी इन झरनों में जाता है इसलिए इन झरनों का पानी इतना शुद्ध होता है लोग पीने का पानी भी इन झरनों से भर लेते हैं।








  पूरे समय बादलों के छाए रहने और कदम-कदम पर पहाड़ों से फूटते मीठे पानी के चश्मों के कारण इस तरह के प्राकृतिक सुंदरता से भरे दृश्य दिखना यहां बेहद आम बात है।










और यह है चेरापूंजी का तामाबिल जहां बांग्लादेश की सीमा है। यह वो पत्थर है जिसके इस तरफ भारत की सीमा है और दूसरी तरफ बांग्लादेश की।पीछे सीमा के नज़दीक बैठे हुए बांग्लादेशियों को भी देखिए। दोनों सीमाओं पर भारत और बांग्लादेश की चौकियां बनीं हैं।  आखिरकार यहां पहुंचकर कर हमारा एक ही समय में दो देशों में पहुंचने का सपना पूरा हुआ।  





और यह है बांग्लादेश की सीमा पर बनी चौकी।
नीचे देखिए बांग्लादेश की सीमा पर लगे पत्थर पर बांग्लादेश का प्रतीक भी देखा जा सकता है।




 भारत की सीमा के प्रहरी, भारतीय चौकी पर मुस्तैदी से तैनात भारतीय जवान के साथ तिरंगे के नीचे खड़े होकर हमने तस्वीर भी खिंचवाई। एक यादगार लम्हा।








वापस लौटते समय हमें
  रास्ते में ट्री हाउस भी दिखा। पेड़ो पर बांस की खपच्चियों से बने इस ट्री हाउस में जाने की कीमत थी सिर्फ पांच रुपए प्रति व्यक्ति। यह ट्री हाउस काफी मज़बूत है। एक बार में कम से कम 250 किलो तक वज़न उठा सकता है। हांलाकि जब हम सर्पीली बांस की सीढ़ियों पर कदम जमाते हुए ऊपर चढ़ रहे थे तो डर भी लग रहा था कि कहीं गिर ना पड़े। पर यहां के लोगों ने, जो काफी सीधे और सरल हैं, हमें हिम्मत दी।






शिलांग स्थित यह रूट ब्रिज आपको प्रकृति की शक्ति का अहसास कराता है। यह पुल सैकड़ो वर्षों पुराने और वृहद बरगद के पेड़ की झूलती जड़ो से बना है। यह पुल बेहद मज़बूत है। ध्यान से देखिए तो इस पर खड़े लोग आपको दिखाई देंगे। प्रकृति निर्मित इस पुल पर खड़े होकर नीचे बहती साफ, पारदर्शी पानी की धारा का नज़ारा लेना कैसा अनुभव देता है, इसे शब्दों में बयां कर पाना आसान नहीं।
मेघों के इस शहर में साल भर और दिन के चौबीसो घंटे बादल अठखेलियां करते रहते हैं जिसके कारण यहां या तो बादलों का सफेद रंग नज़र आता है या फिर पहाड़ियों का कत्थई रंग। लेकिन जिस समय, थोड़ी सी देर के लिए भी बादल छंटते है, यहां बिखरी मृदुल हरी घास और हरियाले पेड़ो का रंग मटमैली पहाड़ी सड़क के रंग के साथ मिलकर अद्भुत छटा बिखेर देता है। यह तस्वीर नहीं किसी चित्रकार की बनाई गई पेंटिंग लगती है ना।  

 
स्वर्ग तो किसी ने नहीं देखा, लेकिन मेघालय आकर और यहां की मनोरम प्राकृतिक सुंदरता देखकर इतना तो अंदाज़ा लगाया ही जा सकता है कि स्वर्ग अगर होगा तो कुछ ऐसा ही होगा।  हम तो खुद को खुशकिस्मत मानते हैं कि मेघों के घर की झरनों भरी ज़मी पर हम भी अपने पैरों के निशां छो़ड़ पाए। आप भी मौका मिलने पर यहां भ्रमण ज़रूर कीजिए और स्वर्गनुमा इस धरती की खूबसूरती का आनंद लीजिए।
 

Tuesday, 23 July 2013

युवाओं में बढ़ रही है भगवान के प्रति आस्था

        
 
  ये रोज़ सुबह उठकर सबसे पहले भगवान का नाम लेते हैं, हफ्ते में एक बार मंदिर जाते हैं,  गायत्री मंत्र और हनुमान चालीसा याद रखते हैं, नवरात्रों में व्रत करते हैं, महाशिवरात्रि पर शिवजी पर दूध चढ़ाते हैं, जन्माष्टमी और दीवाली पर पूजा करते हैं और तीर्थ स्थानों पर जाने की भी इच्छा रखते हैं, गणपति विसर्जन भी करते हैं भी दुर्गा की स्थापना भी ......     आपको क्या लगता है किस की बात कर रहे हैं हम। घर के बुज़र्गों की, माताओं और पिताओं की। जी नहीं यह सारे गुण पाए जाते हैं आज के युवाओं में।
पूर्व में किए गए कुछ सर्वेक्षणों में यह बात सामने आ चुकी है कि आज पूरे देश के युवाओं में अपने धर्म और संस्कृति के प्रति ना सिर्फ प्यार और इज़्जत है बल्कि वे इसके प्रति समर्पित भी हैं। लेकिन यहां हम सिर्फ देश की राजधानी दिल्ली के युवाओं की बात करेंगे, मेट्रो शहर के युवा, जिन्हें बेहद आधुनिक माना जाता है। लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी बेहद आधुनिक और नास्तिक समझे जाने वाली यह नई पीढ़ी भगवान में विश्वास भी करती है और नियमित रूप से प्रार्थना भी करती है।
    मयूर विहार के निवासी श्री विकास गुप्ता, जो कि मल्टीनेशनल कंपनी में क्वालिटी एनालिस्ट हैं, के दोनों बच्चे युवा हैं, बेटी रामजस कॉलेज में इकॉनॉमिक्स की पढ़ाई कर रही है और बेटा आई आई टी की कोचिंग ले रहा है। मिसेज गुप्ता खुद एक प्रतिष्ठित कान्वेन्ट स्कूल में अंग्रेजी की अध्यापिका हैं। घर में पूरी तरह आधुनिकता का माहौल है लेकिन ना सिर्फ दोनों पति-पत्नी भगवान में आस्था रखते हैं, बल्कि इनके दोनों बच्चे भी नियमित रूप से पूजा करते हैं। इनके घर में एक छोटा सा मंदिर भी बनाया गया है जहां सुबह शाम दीपक जलाया जाता है। मिसेज गुप्ता बताती हैं कि इनके दोनों बच्चे और साथ ही उनके लगभग सारे दोस्तों में से एक भी ऐसा नहीं जो भगवान पर भरोसा ना करता हो। वो खुशी खुशी बताती हैं कि उनकी बेटी तो नवरात्रों के दौरान पहला और आखिरी व्रत भी रखती है जबकि बेटा और पति महाशिवरात्रि पर व्रत रखते हैं।
    वसंत कुंज के निवासी सेवानिवृत सेना अधिकारी अनुज गौड़ के घर उनकी पत्नी पुष्पा और एक बेटा व बहू हैं। बेटा बैंक ऑफ अमेरिका में है और बहू फैशन डिज़ाइनर। आधुनिक गैजेट्स और साज सज्जा के सामानों से भरे हुए इनके फ्लैट में घुसते ही सबसे पहले ड्रॉइंग रूम में एक फ्रेम की हुई तस्वीर पर नज़र जाती है जिस पर श्री यंत्र बना हुआ है। यहीं नहीं घर के अन्य कमरों में भी किसी मढ़े हुए फ्रेम में महामृत्युंजय मंत्र लिखा हुआ दिखता है तो किसी में गायत्री मंत्र। खुद आरडब्ल्यूए की एक एक्टिव सदस्य श्रीमती गौड़ गर्व से बताती हैं, कि उनके बेटे और बहू दोनों को भगवान पर बहुत विश्वास है। उन्हीं दोनों ने यह मंत्र और श्रीयंत्र की तस्वीरे लगाई हैं। और अब वो दोनों अपने चार साल के बेटे, एमिटी स्कूल में नर्सरी के छात्र उत्सव को भी पूजा करने और गायत्री मंत्र बोलने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। साल में एक बार पूरा परिवार दो दिन के लिए हरिद्वार के आश्रम में रहने जाता है जिस दौरान ये पूजा पाठ और दान-दक्षिणा करते हैं।
  द्वारका के सेक्टर 18 के पॉश इलाके में रहने वाले रुचि और अनुराग राठौर अपनी ऑनलाइन बिक्री कंपनी चलाते हैं। इनके दोनों बच्चे 10 साल का अनिरुद्ध और  8 साल की गौरी, ओपीजी इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ते हैं। रुचि और अनुराग के घर का नियम है कि यहां रोज सुबह नहाने और पूजा करने से पहले कोई कुछ नहीं खाता। घर में नियमित रूप से हर सुबह दुर्गा स्तुति और शाम को कनकधारा स्त्रोतम का पाठ किया जाता है।पूरा परिवार हर महीने में एक बार छतरपुर मंदिर जाता है।
    सीमा एक न्यूज चैनल में कार्यरत है और बताती हैं कि उसके साथ काम करने वाले लगभग सभी लड़के और लड़कियां भगवान में विश्वास करते हैं। नवरात्रों में व्रत रखते हैं। दीवाली की पूजा करते हैं। और काफी लोग ऐसे हैं जो कि लोकप्रिय धार्मिक स्थानों जैसे शिरडी, तिरूपति बालाजी और वैष्णो देवी या तो जा चुके हैं, या जाने की इच्छा रखते हैं।
  यह सिर्फ कुछ साधारण से उदाहरण है जिनसे काफी हद तक इस बात का संकेत मिलता है कि आज की पीढ़ी अपने धर्म के प्रति कितनी सजग है और भगवान में उनकी कितनी आस्था है।अगर हमारी बात पर शक है तो ज़रा गणपति विसर्जन और दुर्गा पूजा के बाद मूर्ति विसर्जन के लिए जाने वाली टोलियों को याद कीजिए। दशहरे पर रावण दहन के दौरान जुटने वाली भीड़ को याद कीजिए। क्या इनमें युवाओं की संख्या सबसे ज्यादा नहीं होती। हां यह कहा जा सकता है कि हंगामे और मौज मस्ती के कारण युवा इन त्यौहारों से ज्यादा जुड़ते हैं लेकिन साथ ही इनमें युवाओं की आस्था भी जुड़ी है इससे इनकार नहीं किया जा सकता।
 हांलाकि यह भी सच है कि युवाओं में आपको धर्मभीरुता देखने को नहीं मिलेगी यानि आज के युवा भगवान में इसलिए भरोसा नहीं करते कि वो उन्हें इम्तहान में पास कराएगा या अच्छी नौकरी देगा, बल्कि इसलिए विश्वास करते हैं क्योंकि वो अपने ऊपर एक अदृश्य शक्ति की मौजूदगी को मानते हैं और यह आस्था उन्हें मन की शांति देने के साथ साथ अपने परिवार और संस्कृति से जोड़ती है।
क्या है युवाओं के धर्म की तरफ बढ़ते रुझान की वजह
  •  युवाओं में बढ़ते अपने धर्म और त्यौहारों के प्रति लगाव की वजह जब हमने जानने की कोशिश की तो सबसे सटीक जवाब कॉन्वेन्ट स्कूल की अध्यापिका मिसेज गुप्ता ने दिया। इनके अनुसार आजकल लगभग हर स्कूल में सभी बच्चों को नर्सरी में ही गायत्री मंत्र सिखाया और बुलवाया जाता है। प्रत्येक त्यौहार को स्कूलों में भी मनाया जाता है। जिसके कारण शुरू से ही बच्चों में इसके बीज पड़ जाते हैं।
  • सीमा की मानें तो आजकल टीवी पर आने वाले बहुत से लोकप्रिय धारावाहिकों ने भी युवाओं को इस दिशा में प्रेरित करने में अहम भूमिका निभाई है। बहुत से लोकप्रिय धारावाहिक जैसे क्योंकि सास भी कभी बहू थी, बालिका वधू, और हाल ही में शुरू हुए सरस्वती चंद्र जैसे कई धारावाहिकों में मुख्य युवा पात्रों को भगवान में विश्वास रखते, पूजा पाठ करते और साथ ही एक सफल ज़िंदगी जीते हुए दिखाया जाता हैं....यह बातें भी बहुत हद तक आज के युवाओं के लिए प्रेरणा बनती है।
  • यहीं नहीं आज के युवा चाहे वो लड़का हो या लड़की, जिसे भी अपनी रोल मॉ़डल मानते हैं, फिर चाहे वो फिल्मी सितारा हो, कोई खिलाड़ी या व्यवसायी..., जब इनके बारे में पढ़ा या सुना जाता है तो यह सभी अपनी सफलता में भगवान को धन्यवाद देने की बात कहते दिखते हैं। शायद यह भी एक वजह है जो आज के युवाओं को धर्म और पूजा पाठ की तरफ मोड़ रहा है।
  • आज की तारीख में अगर हम युवाओं के फेसबुक अकाउंट पर भी नज़र डालें तो उनमें बहुत सारी पोस्ट अपने धर्म और संस्कृति से जुड़ी हुई होती है। आज धार्मिक होना और पूजा पाठ करना युवाओं को आदर्श बेटा, पति या इंसान बनाता है और इसलिए वो इससे और ज्यादा जुड़ रहे हैं।
 वजह जो भी हो, सच यहीं है कि समय बदलने के साथ और आधुनिक ज़माने के साथ रफ्तार मिलाते हुए युवअपनी जड़ों को, धर्म को और भगवान को नहीं भूले हैं बल्कि उससे जुड़ रहे हैं, जो कि भविष्य के लिए एक अच्छा संकेत माना जा सकता है।