Friday, 20 December 2013

भिखारी भी हैं ट्रेडिंग के धंधे में... भीख के पैसों से होती है ऊपरी कमाई


यह तस्वीर दिल्ली के प्रगति मैदान के पास स्थित दिल्ली के प्रसिद्ध भैंरो मन्दिर से ली गई है। इसे ज़रा गौर से देखिए क्या हो रहा है इसमें। यह काली जैकेट वाला आदमी यहां की पार्किंग का ठेकेदार है और मन्दिर के द्वार पर बैठी यह महिलाए उसके साथ खुले पैसों की ट्रेडिंग कर रही हैं....


दरअसल भिखारियों के पास खुले पैसे या सिक्कों की भरमार होती है। जो भी इन्हें दान में कुछ देता है वो सिक्के या एक, दो या पांच रुपए के नोट होते हैं जिनकी और लोगों को काफी ज़रूरत होती है।


 इसलिए ये लोग भिखारियों को एक या दो रुपए ज्यादा देकर उनसे खुले सिक्के ले लेते हैं। मसलन दस रुपए का नोट देकर एक-एक रुपए के नौ सिक्के लिए जा सकते हैं या फिर बीस-बीस के नोट देकर खुले अट्ठारह या उन्नीस रुपए लिए जा सकते हैं। है तो यह छोटी सी ही ट्रेडिंग, लेकिन इससे इन भिखारियों को थोड़ा फायदा मिल जाता है।   


यह शहजाद है जो भैंरो मन्दिर के बाहर ही भीख मांगते हैं। इन्होंने बताया कि मन्दिर के बाहर बैठने के कारण यहां उन्हें शाम तक सौ-सवा सौ रुपए की खेरीज मिल जाती है और अगर खुले पैसों की किसी को ज़रूरत होती है तो वो दस रुपए ऊपर में उसे यह खुले पैसे बेच देते हैं। और इस तरह उनका 10 रुपए का नफा हो जाता है। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि और पैसे तो भीख के होते हैं लेकिन खुले पैसों की ट्रेडिंग के बाद मिलने वाले पैसे मेहनत की कमाई है। 


यह केवल दिल्ली की ही दास्तान नहीं है बल्कि शहर के अन्य राज्यों में भी भिखारी महिलाएं व पुरुष भीख में मिलने वाले सिक्कों को ज़रूरतमंदों को कुछ ज़्यादा रुपयों में बेच देते हैं। कई जगह तो यह लोग बाकायदा किसी चबूतरे, पत्थर की बेंच या पेड़ की छांव तले अपनी सिक्कों की दुकान सजा कर सिक्के बेचते देखे जा सकते हैं। 


शहजाद के अनुसार इनसे लोग चढ़ावे के लिए, फुटकर सामान खरीदने के लिए या फिर भिखारियों को ही देने के लिए खुले रुपए ले जाते हैं। इस ट्रेडिंग से खुले पैसे लेने वाले और देने वाले दोनों को ही फायदा होता है। ज़रूरतमंद इंसान को छोटे नोट या सिक्के मिल जाते हैं और भिखारियों को बड़ा नोट मिल जाने के कारण भारी रेजगारी या खुले रुपयों का हिसाब रखने के झंझट से छुटकारा मिल जाता है।

Saturday, 14 December 2013

पहचानिए यह कारीगरी किस चीज़ पर की गई है...


क्या आप जानते हैं कि शतरंज के ये खूबसूरत मोहरे किस चीज़ के बने हैं....?



अब इन नक्काशीदार कटारों को देखिए। यह भी उसी से बने हैं जिससे शतरंज के मोहरे बने हैं। सोचिए क्या है यह...


अब इन्हें देखिए यह की चेन्स, जूड़ा पिन्स, कटारें सबकुछ उसी चीज़ से बने हुए हैं लेकिन आप अब तक नहीं पहचान पाए ना क्या है यह...



अब देखिए इन सफेद चीज़ों के टुकड़ों को। इन्हीं से बनी हैं यह सारी चीज़े, यह ज्वेलरी भी। क्या यह सेलम है, संगमरमर, खड़िया या कुछ और? चलिए बताते हैं...


यह ऊंट की हड्डियां हैं, "केमल बोन्स"। जी हां ऊपर दिखाई गई सारी चीज़े केमल बोन्स से बनी हैं। कुछ साल पहले हाथी दांत की खरीद-फरोख्त पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था तब से अधिकतर कलाकार केमल बोन्स से चीज़े बनाने लगे हैं। 


केमल बोन्स हाथी दांत की तरफ दूधिया सफेद नहीं होते इसलिए पहले उन्हें पहले मनचाहे आकार में काटकर संगमरमर के पाउडर के साथ उबाला जाता है ताकि इसे साफ सफेद रंग मिल सके। इसके बाद बोन को हाइड्रोक्सल और पानी से साफ करके इस पर पॉलिश की जाती है जिसके बाद ये कारीगरी के काबिल बनता है।


यह लखनऊ से अब्दुल मोतमीम खान साहब हैं जो केमल बोन्स की कारीगरी में माहिर हैं। इनके यहां पीढ़ियों से यह काम होता है। इनके पिताजी और दादाजी हाथीदांत की कारीगरी करते थे लेकिन हाथीदांत की बिक्री पर प्रतिबन्ध लगने के बाद यह केमल बोन्स इस्तमाल करने लगे हैं। केमल बोन्स से नक्काशीदार चीज़े बनाने में काफी समय लगता है कई बार छः महीने तक।  


खान साहब दिल्ली के नेशनल क्राफ्ट म्यूज़ियम में आमंत्रित किए गए हैं जहां यह अपना स्टॉल लगाते हैं और केमल बोन्स से बनी चीज़ों की बिक्री करते हैं। 


केमल बोन से बनी ज्वेलरी भारत ही नहीं पाकिस्तान और सोमालिया में भी काफी प्रसिद्ध है और बनाई जाती है। भारत में मुख्यतः उड़ीसा और राजस्थान में केमल बोन कार्विंग का काम होता है। इस ज्वेलरी की शुरुआती कीमत 30 रूपए से हज़ारों रुपए तक है। वहीं केमल बोन के अन्य सामान काफी ज्यादा महंगे मिलते हैं। 


फिल्में, डांस क्लास, गेम्स, पिकनिक्स, स्मार्ट बोर्ड पर पढ़ाई.....अब स्कूल जाने का मज़ा और है।

फिल्में... और क्लास में? 
रेन डांस... वो भी स्कूल में?
डांस क्लासेज का पीरियड....स्कूली छात्र-छात्राओं के लिए? 
बिना ब्लैक बोर्ड की पढ़ाई...,
 ऐसे टीचर्स भी होते हैं क्या जो पढ़ाई नहीं करने पर मारते नहीं हैं, सज़ा नहीं देते....?
 क्या! चिल्ड्रन्स डे पर टीचर्स भी बच्चों के लिए कार्यक्रम करते हैं?.....


सोचिए अगर आज से पंद्रह-बीस सालों पहले जब आप स्कूल जाया करते थे, आपने ऐसे प्रश्न पूछे होते और आपको सबके जवाब हां में मिलते तो खुशी के मारे आपका क्या हाल होता। क्या तब भी आप देर तक सोने का, या फिर तबीयत खराब होने का या फिर स्कूल में पढ़ाई ना होने का बहाना बनाकर स्कूल जाना टालते? क्या तब भी आप यह शिकायत करते कि स्कूल इतनी देर तक क्यों चलते हैं, या स्कूलों में इतनी कम छुट्टियां क्यों होती हैं?

मैं तो बिल्कुल नहीं टालती, बल्कि रोज़ सुबह स्कूल जाने के लिए उत्साहित रहती जैसा कि आज कल के बच्चे रहते हैं। जी हां, आजकल के बच्चे बहुत लकी हैं, जिनके लिए स्कूल जाने का मतलब सिर्फ सुबह सात बजे से दोपहर एक बजे तक एक के बाद एक लगने वाले बोरिंग पीरियड्स में सिर्फ पढ़ाई करना बिल्कुल नहीं हैं। जिन्हें मस्ती करने के लिए आधे घंटे के लंच ब्रेक का इंतज़ार नहीं करना पड़ता। जो अपनी टीचर्स के डंडे से डरने की बजाय उनके दोस्तीपूर्ण व्यवहार से प्यार करते हैं और जिनके लिए स्कूल जाने का मतलब है बहुत कुछ नई चीज़े सीखना, यारों से मिलना और मज़ेदार तरीके से पढ़ाई करना।

हममें से अधिकतर लोग सरकारी स्कूलों के पक्षधर हैं, बहुत से लोग कहते हैं कि प्राइवेट पब्लिक स्कूलों में डोनेशन चलता है, बहुत खर्चा होता है और अनाप-शनाप फीस और पैसे लिये जाते हैं। सरकारी स्कूलों के खिलाफ मैं भी नहीं, डोनेशन से और अनाप-शनाप खर्चों से मुझे भी सख्त नफरत है, लेकिन एक सच यह भी है कि इन पब्लिक स्कूलों में पढ़ने और पढ़ाने, सीखने और सिखाने के तरीके इतने रोचक होते हैं कि बच्चों को इन्हें सीखने में मज़ा आता है और वो बेहद रचनात्मक तरीके से शिक्षा ग्रहण करने के साथ-साथ बहुत से सामाजिक तौर-तरीके भी सीख लेते हैं। 

इसे प्रतिस्पर्धा का युग कहें, या एक दूसरे से खुद को बेहतर साबित करने की होड़ कि इन पब्लिक स्कूलों ने पढ़ाई के इतने रोचक तरीके ईजाद किए हैं, बच्चों को इतना कुछ सिखाने की तैयारियां की हैं, स्कूलों को इतना सुविधाजनक बनाया है कि बच्चे इन स्कूलों से भागते नहीं बल्कि प्यार करते हैं। 


पहले स्कूलों में मौज-मस्ती की बात सारे छात्र-छात्राओं के लिए इंटरवैल के खेलों, पी टी पीरियड और छुट्टी के बाद के थोड़े समय तक सीमित थी और कुछ चुनिंदा बच्चों के लिए स्पोर्ट्स डे, एनुअल फंक्शन की तैयारियों में निहित थी। लेकिन अब हर पीरियड फन का पीरियड है। खास तौर पर प्राइमरी क्लासेज के बच्चों के लिए तो इन स्कूलों में इतने रचनात्मक तरीके से पढ़ाई होती है कि बच्चों के लिए वो खेल की तरह ही हो जाती है। 

और शहरों के स्कूलों के बारे में तो मैं नहीं बता सकती लेकिन दिल्ली के स्कूलों में स्मार्ट बोर्ड पर पढ़ाई बहुत आम हो गई है जो ब्लैक बोर्ड पर पढ़ने से बिल्कुल अलग अनुभव है। इसमें बच्चे सिर्फ लिखा हुआ देखते नहीं हैं, बल्कि वीडियो पर उसे अनुभव भी करते हैं और इसका परिणाम यह होता है कि वो पढ़ा हुआ जल्दी सीख और समझ लेते हैं। 

किसी भी क्लासरूम में जाकर देखिए। वहां आपको बोरिंग काले सफेद सिद्धांतों के चार्ट नहीं मिलेंगे बल्कि बेहद रंगीन, सजे धजे एसाइनमेन्ट्स दिखेंगे। नर्सरी क्लासेज़ में तो बच्चों की पढ़ाई के लिए खास तौर पर कार्टून्स से सजी हुई दीवारें और रंग बिरंगी कुर्सिया-मेज़े दिखती है जिन पर पढ़ने का मज़ा ही कुछ और है। 


आज इन स्कूलों में बच्चे पौष्टिक भोजन करना भी सीख रहे हैं और डायनिंग टेबल पर बैठ कर खाना खाने के तौर-तरीके भी। कक्षा में पढ़ाई कर रहे हैं तो फिल्में भी देख रहे हैं, अनुशासन सीख रहे हैं तो डांस भी, पर्यावरण के बारे में पढ़ रहे हैं तो पार्क में पिकनिक्स पर जाकर पर्यावरण को देख और समझ भी रहे हैं, स्वीमिंग सीख रहे हैं तो रेन डांस का भी मज़ा ले रहे हैं। हर त्यौहार को भी स्कूल में मनाया जाता है जिससे बच्चे उसकी अहमियत समझ सकें। 

आज से दो दशकों पहले स्कूलों में ऐसा होता था कि बस आपको टीचर्स डे पर टीचर्स के लिए तोहफा लाना होता था और उनके लिए ही प्रोग्राम पेश करना होता था जबकि टीचर्स चिल्ड्रन्स डे पर बच्चों के लिए कुछ भी नहीं करते थे, लेकिन आज के स्कूलों में टीचर्स भी चिल्ड्रन्स डे पर बच्चों के लिए उतने ही उत्साह से तैयारी करते हैं जितना कि बच्चे उनके लिए करते हैं। मेरे बेटे के स्कूल में तो इस दिन बच्चों को टीचर बनने का मौका दिया जाता है। टीचर्स बच्चों के लिए डांस या स्किट करते हैं। 

सरकारी स्कूलों के बारे में तो मैं कुछ नहीं कह सकती लेकिन प्राइवेट स्कूलों में ऐसा बहुत कम होता है जब टीचर्स बच्चों को मारते हैं या सजा देते हैं बल्कि वो कई बार उनकी परेशानी को समझकर और अभिभावकों से बात करके उसका हल ढूंढने की कोशिश करते हैं। यहीं नहीं यह स्कूल कितने ही सामाजिक सरोकारों जैसे पर्यावरण रक्षा, सड़क सुरक्षा, रक्त दान आदि के बारे में बच्चों को अवगत कराने मे महत्वपूर्ण भूमिका भी निभा रहे हैं। और यह काम यह स्कूल इसी तरह से फिल्में दिखा कर, स्किट करवाकर या वर्कशॉप आयोजित करके करते हैं जिनमें बच्चे सीखते भी हैं और आनंद भी लेते हैं। 

 और अंत में बस एक तमन्ना.. कि काश मुझे भी ऐसे ही स्कूल में पढ़ने का मौका मिला होता... :-) 


Thursday, 12 December 2013

कच्ची मिट्टी या बीच का बिच्छू... , ... कुट्टी और पुच्ची..


जितने मज़ेदार हुआ करते थे बचपन के खेल उतनी ही मज़ेदार थी बचपन के खेलों की शब्दावली। तब यारी-दुश्मनी निभाने, कमज़ोर खिलाड़ी या पक्के खिलाड़ी का पता लगाने और डैन चुनने के लिए मजेदार इशारे, खेल और शब्दावली हुआ करती थी। आईए इनको भी याद कर लें.....

पुकाई-
 हर खेल में डैन का फैसला पुकाई से हुआ करता था। पुकाई यानि सभी खिलाड़ियों द्वारा एक के ऊपर एक हाथ रखकर हाथों को उल्टा या सीधा खोलना। असमान हाथ लाने वाले को बाहर कर दिया जाता था। इस तरह पुकाई तब तक चलती रहती थी जब तक कोई एक बचा ना रह जाए। जो अंत में बचता था वहीं डैन होता था।

कच्ची मिट्टी-
कच्ची मिट्टी यानि कमज़ोर खिलाड़ी। जैसा कि अक्सर होता है जब बड़े बच्चे खेल रहे होते थे और उनमें से किसी का छोटा भाई बहन खेलने की ज़िद करता था, तो बड़े बच्चे उसका दिल रखने के लिए उसे खिलाने को तैयार तो हो जाते थे लेकिन उसे कच्ची मिट्टी करार कर दिया जाता था। यानि उसका आउट होना आउट होना नहीं माना जाएगा, वो डैन नहीं बनेगा... जैसी सुविधाएं उसके लिए होती थी।

बीच का बिच्छू-
किसी कमज़ोर या बेहद मज़बूत खिलाड़ी को बीच का बिच्छू बनाया जाता था। मतलब वह खिलाड़ी दोनों की तरफ से खेल सकता है। अगर आप अंत्याक्षरी जैसा खेल खेल रहे हैं तो किसी बड़े को बीच का बिच्छू बना दो। यह बीच का बिच्छू दोनों टीमों की बड़ी मदद करता है और दोनों को खेल में डटा रहने में सहयोग करता है।

कुट्टी और पुच्ची- 
अपने दोस्तों से लड़ाई या प्यार दिखाने का सबसे क्यूट तरीका। अगर किसी दोस्त से लड़ाई हो गई है तो उससे कुट्टी कर दी जाती थी। कुट्टी में "दो दिन की छुट्टी, तेरी मेरी कुट्टी" कहकर अंगूठा दिखाया जाता था। और अगर किसी से वापस दोस्ती हुई है तो पुच्ची की जाती थी। दोनों के अलग-अलग इशारे होते थे। कई बार ज्यादा झगड़ा होने पर पक्की कुट्टी और ज्यादा प्यार उमड़ने पर पक्की पुच्ची होती थी।



कहां गया ऊंच-नीच का पापड़ा, इक्कड़ दुक्कड़ की गोटी और पिट्ठू तोड़ने वाली गेंद... "एक शब्दकृति बचपन के खेलों के नाम"

कम्प्यूटर गेम्स और वीडियो गेम्स के इस ज़माने में हमारे बच्चों को शायद वो खेल कभी खेलने को ना मिलेंजिन्हें कभी हम सभी बचपन में खेला करते थे और जो धीरे-धीरे गायब होने लगे हैं। तब हमारे पास आज के बच्चों जैसी टीवी और कम्प्यूटर की सुविधा नहीं थी और ना ही रिमोट वाले अनगिनत खेल। सो जब चाहा, अपने दोस्तों के साथ इकट्ठा हुए और किसी के भी घर के सामने, पेड़ की छांव तले, आंगन में, पार्क में या बगीचों में यह खेल खेल लिए।

यह मज़ेदार इनडोर और आउटडोर खेल बहुत रचनात्मक होते थे और इनको खेलने के लिए चाहिए होते थे चार-पांच दोस्त या सहेलियां, खुला मैदान या घर की छत और सामान के रूप में पत्थर की गिट्टियां, गेंदे, डंडे, कंचे, कागज़- पैंसिल या खड़िया जैसी साधारण सी चीज़े। आज ऐसे ही कुछ खेलों को याद करते हैं जिनके साथ हमारे बचपन की प्यारी यादें जुड़ी है और जिन्हें खेलने का सौभाग्य शायद हम अपने बच्चों को ना दे पाएं...

ऊंच-नीच का पापड़ा




यह खेल ऐसी जगह खेला जाता था जहां सीढ़ियां या पत्थर या कोई भी ज़मीन से थोड़ी ऊंची जगह मौजूद हो। नीची जगह को 'नीच' और ऊंची जगह को 'ऊंच' कहते थे। पुकाई में हारा बच्चा डैन होता था। सब उससे पूछते थे ऊंच मांगी या नीच। डैन 'ऊंच' या 'नीच' में से एक जगह मांग लेता था। यदि डैन ने 'नीच' मांगी तो वो जगह उसकी हो जाती थी और बाकी लोग 'ऊंच' पर खड़े हो जाते थे और बार-बार डैन की 'नीच' पर खड़े होकर उसे चिढ़ाते थे.... "हम तुम्हारी नीच पर रोटिया पकाएंगे".... डैन उन्हें पकड़ने के लिए भागता था। अगर कोई "नीच" पर है और डैन ने उसे छू दिया तो अगला डैन वो बनता था।


गुट्टे

मुझे विश्वास है हर महिला ने अपने बचपन में यह मज़ेदार खेल ज़रूर खेला होगा। रंग-बिरंगे पांच लकड़ी के गुट्टों या पत्थर के चौरस टुकड़ो से खेला जाने वाला यह खेल इतना रोचक होता है कि पहले घंटो-घंटो लड़कियां और यहां तक कि उनकी मम्मियां और चाची, ताईयां भी चबूतरे या छत के किसी कोने में बैठकर गुट्टे खेला करती थीं। कई बार तो लड़कियों को यह कहकर डांटा जाता था "गुट्टे खेलने की उमर हैं यह तेरी..., पूरे दिन गुट्टे खेलती रहती है... "। इस खेल में हाथों में गुट्टे उछाल-उछाल कर पकड़ने होते थे और जितनी देर में गुट्टा उछल रहा है उतनी देर में ही अन्य गुट्टों को कोटरी, डिब्बी या पुल के नीचे से निकाला जाता था। अब तो खैर यह गुट्टे मिलने बंद हो गए हैं पर पहले हाट या बाज़ारों में रंग बिरंगे लकड़ी या लाख के गुट्टे खूब मिला करते थे और लड़कियां अपनी सहेलियों के साथ उन्हें खेलने के लिए बड़ा सहेज कर रखती थी। यू ट्यूब पर यह वीडियो मिला है इसे देखिए और गुट्टों का आनंद लीजिए।

पोशम पा


यह मज़ेदार खेल कुछ बच्चे आज भी खेलते हैं। इसमें दो लीडर होते हैं जो जाकर अपने-अपने सीक्रेट नाम रखते हैं और फिर आकर हाथों का ट्राइंगेल बनाकर गाते हैं.. " पोशम पा भई पोशम पा, डाकियों ने क्या किया, सौ रुपए की घड़ी चुराई। अब तो जेल में जाना पड़ेगा। जेल की रोटी खानी पड़ेगी, जेल का पानी पीना पड़ेगा..." बाकी सब लोग ट्रांइगेल के नीचे से निकलते हैं। अंत में जो बच्चा बच जाता है, उसे लीडर पकड़कर एक तरफ ले जाकर अपना सीक्रेट नाम बताकर पूछते थे कि तुम क्या मांगते हो और वो बच्चा जिस भी लीडर का सीक्रेट नाम लेता है, उसकी टीम में आ जाता है। इसी तरह एक एक करके दोनों टीमें बन जाती है और अंत में टग ऑफ वॉर की तरह दोनों टीमें एक दूसरे को खींचती थी। जिस टीम ने दूसरी टीम के सारे लोगों को अपनी तरफ खींच लिया वो जीत गई।


एक सहेली

यह मुख्य तौर पर लड़कियों का खेल है। इसमें एक लड़की डैन बनती थी और दोनों हाथों से आंखे बन्द करके बीच में बैठ जाती थी। बाकी लड़कियां उसके चारों तरफ गोला बनाकर घूमते हुए गाती थीं..- "एक सहेली रो रही थी, धूप में बैठी रो रही थी। उसका साथी कोई नहीं, चलो सहेली उठकर आओ, अपना साथी ढूंढ लो।" इसके बाद गोले में से एक लड़की आकर डैन को चपत मारकर भाग जाती थी और डैन को सभी लड़कियों में से उसे पहचानना होता था। अगर डैन ने सही पहचान लिया तो अगला डैन पहचानी गई लड़की बनती थी वरना वापस डैन को ही गोले के बीच में बैठना पड़ता था।


गोला चमार खाई, पीछे देखो मार खाई


यह खेल आप सभी ने ज़रूर खेला होगा, जिसमें सभी लोग एक गोले में बैठते हैं और डैन हाथ में रुमाल लेकर सबके पीछे गोल-गोल दौड़ता है। दौड़ते हुए वो एक बच्चे के पीछे रूमाल डाल देता है। अगर बच्चे को पता चल गया तो वो रूमाल उठाकर डैन को मारता है और अगर डैन के दोबारा घूम कर आने तक उस बच्चे को पता नहीं चला तो डैन उस रुमाल को उठाकर उस बच्चे को मारता है। इस खेल में चीटिंग भी खूब होती है, जब सामने बैठे बच्चे आखों के इशारे से अपने दोस्तों को बता देते हैं कि रूमाल तेरे पीछे फेंका गया है।

इक्कड़-दुक्कड़/ लंगड़ी टांग


यह एक और प्रसिद्ध खेल जिसके लिए सड़क चलते-चलते भी गिट्टियों पर नज़र रहती थी। और जहां कोई अच्छा, चिकना और समतल पत्थर मिला उसे हम इक्कड़-दुक्कड़ की गोटी बनाने के लिए संभाल कर रख लिया करते थे। घर के आंगन, बरामदे, चबूतरे या छत पर खेला जाता था लंगड़ी टांग का यह खेल।
 इस खेल में खड़िया या चॉक से एक से लेकर आठ तक खाने बनाए जाते थे। दो टीमें बटती थीं। और हर टीम के एक खिलाड़ी को एक गोटी एक खाने में फेंककर बाकी खानों पर लंगड़ी टांग से चलकर आना होता था और वापस आकर उसी खाने से गोटी उठानी होती थी। अगर बीच में खिलाड़ी गिर गया या गोटी नहीं उठा पाया, या फिर गोटी सही खाने पर नहीं गई तो वो आउट हो जाता था और दूसरी टीम को मौका मिलता था। इस तरह एक-एक करके सारे खानों में गोटिया डालनी और उठानी होती थी।
जिस खिलाड़ी या टीम ने सारे खाने पार कर लिए उसे किसी एक खाने पर गोटी फेंककर उस खाने पर अपना घर बसाने का मौका मिलता था। एक बार घर बस गया तो विरोधी टीम उस घर पर गोटी नहीं फेंक सकती और ना ही उस पर पैर रख सकती है। बल्कि विरोधी टीम को उसे लंगड़ी टांग से ही लांघ कर पार करना होता है। प्रत्येक घर बसने के बाद गेम फिर से एक नंबर से शुरू होता है। अंत में जिस खिलाड़ी या टीम के ज्यादा घर होते हैं वो जीत जाता है। इस खेल में बहुत घर मैंने भी बनाए हैं :-)


चक चक चलनी, पल्ले घर मंगनी/ कॉर्नर-कॉर्नर

यह खेल एक कमरे, आंगन या बरामदे में खेला जाता था। इसमें पांच लोग खेलते थे। पांचों बीच कमरे या आंगन के बीचों-बीच जमा होकर एक-दो-तीन कहकर भागते थे। और जल्दी से जल्दी आंगन के चारों कोनों में खड़े हो जाते थे। जो किसी कोने में खड़ा होने से रह गया वो डैन। डैन हर कोने में जाता है और बाकी साथी उसको बोलते हैं "चक चक चलनी, पल्ले घर मंगनी"। बीच-बीच में कोने में खड़े साथी भाग-भाग कर कोने आपस में बदलते हैं, इस दौरान अगर डैन ने कोई कोना ले लिया तो जिसका कोना गया वो डैन बन जाता है।

गिट्टीफोड़ या पिट्ठू


यह बेहद मज़ेदार खेल हैं जो दो टीमें खेलती हैं। पत्थर के ऊपर पत्थर रखकर पिट्ठू बनाया जाता है और पहली टीम का एक खिलाड़ी गेंद मारकर वो पिट्ठू तोड़ता है। अब दूसरी टीम को यह पिट्ठू वापस जमाना होता है। इस बीच पहली टीम के खिलाड़ी दूसरी टीम के खिलाड़ियों को गेंद से मारने की और पिट्ठू दोबारा तोड़ने की कोशिश करते रहते हैं। अगर बॉल की मार से बचकर दूसरी टीम ने पिट्ठू वापस जमा लिया तो वो जीत जाती है। इस खेल को खेलने के लिए भी बड़ी ज़ोर -शोर से पिट्ठू की पत्थर तलाशे जाते थे। और एक बार खेल लिए जाने के बाद वो पत्थर फेंके नहीं जाते थे बल्कि उन्हें संभाल कर रखा जाता था ताकि अगली बार पिट्ठू बनाया जा सके।

हम आते हैं, हम जाते हैं ठंडे मौसम में 

फिल्म तवायफ में इस खेल पर एक गाना फिल्माया गया है। दो टीमें इसे खेलती हैं। और दोनों एक के बाद एक गाते हैं "हम दूर देश से आए हैं, हम ठंडी सड़क से आए हैं, तुम किसको लेने आए हों, हम इसको लेने आए हैं.." दूसरी टीम एक खिलाड़ी का नाम लेती है, और उसे अपनी तरफ खींचने की कोशिश करती है। टग ऑफ वॉर की तरह खेल चलता है। और अंत में जिस तरफ ज्यादा खिलाड़ी होते है, उसकी टीम विजयी होती है।  

विश-अमृत

इसमें खेल में एक डैन होता है जो बाकी लोगों को छूने की कोशिश करता है। वो जिसे छू कर 'विष' बोलता है, उसे वहीं बैठ जाना पड़ता है। फिर वो खिलाड़ी तब तक नहीं भाग सकता जब तक कि कोई दूसरा खिलाड़ी आकर, बैठे हुए खिलाड़ी के सिर पर हाथ रखकर "अमृत" ना बोल दे। अमृत बोलने के बाद वो खिलाड़ी जि़ंदा हो जाता है और फिर से भागने लगता है। अगर डैन ने सारे खिलाड़ियों को "विश" कर दिया तो जो सबसे पहले विष हुआ था वो डैन बनता है। आजकल इस खेल का एक नया वर्जन निकला है "बर्फ-पानी"। डैन ने जिसे छू लिया वो बर्फ और दूसरे खिलाड़ी ने छूआ तो पानी।

रुमाल छू

यह खेल बिल्कुल फिल्म हम आपके हैं कौन में सलमान और माधुरी के बीच जूते उठाने के लिए हुइ लड़ाई की तरह खेला जाता है। दो टीमें बनती हैं। आमने सामने टीमें खड़ी होती हैं और बीच में एक गोला खींचकर उसके अन्दर रुमाल रखा जाता है। दोनों टीमें अपने पास से एक एक खिलाड़ी भेजती हैं जिन्हें वो रुमाल उठा कर लाना होता है। अगर रुमाल उठा कर भागते समय दूसरे खिलाड़ी ने उसे छू लिया तो वो आउट। जिस टीम ने ज्यादा बार रुमाल उठाया वो जीत गई।

शेकमताड़ी

यह बड़ा खतरनाक खेल है जिसमें बड़ी गेंदे पड़ती हैं। लड़कों का पसंदीदा खेल। इस खेल में डैन पर खिलाड़ी ताब़ड़तोड़ गेंदे मारते हैं और डैन को बचना होता है। अगर किसी खिलाड़ी की गेंद डैन को ना लगकर किसी और को लग गई तो अगली बार वो डैन बनता है।

राजा-वज़ीर-चोर सिपाही



यह चार लोगों के बीच खेला जाने वाला एक रोचक इनडोर गेम है। आप सबने यह मजेदार गेम ज़रूर खेला होगा। चार पर्चियां बना कर उन पर राजा, वजीर, चोर, सिपाही लिखते हैं। चारों खिलाड़ी एक-एक पर्ची उठाते हैं और फिर जो राजा बनता है वो पूछता है "मेरा वज़ीर कौन"। जिसके पास वज़ीर की पर्ची आती है वो कहता है "राजा का वज़ीर मैं"... और फिर राजा आदेश देता है "चोर सिपाही का पता लगाओ"।  अगर वज़ीर ने सही पता लगा लिया तो उसको अंक मिलते हैं और गलत पता लगाया तो उसके अंक चोर को मिल जाते हैं। गर्मी की दोपहरों में, घरों में बैठकर इस खेल को खेलने का मज़ा ही अलग है।

लड़का-लड़की-शहर- सिनेमा



यह एक और मज़ेदार इनडोर गेम है जिसे दो या दो से ज्यादा लोग खेलते हैं। सभी लोग एक खाली पेज लेकर उस पर लड़का, लड़की, शहर और सिनेमा नाम से चार खानें खींच लेते हैं। अब एक खिलाड़ी कोई भी एक अक्षर या एल्फाबेट बोलता है और बाकी खिलाड़ियों को जल्दी-जल्दी उसी अक्षर से शुरू होने वाले एक लड़के का नाम, एक लड़की का नाम, एक शहर का नाम और एक फिल्म का नाम लिखना होता है। जिसने सबसे पहले लिख लिया वो स्टॉप बोलकर खेल खत्म कर देता है। इसी तरह एक-एक करके सबको अक्षर बोलने होते हैं। अंत में वो जीतता है जिसने सबसे ज्यादा नाम लिखे होते हैं। इस खेल को अंग्रेजी में " नेम-प्लेस-एनिमल-थिंग" के नाम से भी खेला जाता है।

इनके अलावा भी  डंडे से गिल्ली उड़ाने वाला खेल "गिल्ली डंडा", कंचे से कंचे पर निशाने लगाने वाला "कंचे का खेल", रंगो की चीज़े छूकर आने के लिए खेला जाने वाला "टिप्पी टिप्पी टॉप", लंगड़ी टांग से खेले जाने वाले  "नारियल, स्टापू", और छिपने और पीठ पर हाथ मार कर थप्पा बोलकर खिलाड़ियों को ढूंढे जाने वाले "आई स्पाई" और कान में शब्द बोलने वाले "कानफूसी" जैसे बहुत सारे खेल हैं, जिन्हें हम बचपन में खेला करते थे। बहुत सारे खेल नए नामों से आज के बच्चे खेल रहे हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी है जो सिर्फ हमारी यादों में जिन्दा हैं।



Monday, 9 December 2013

डोन्ट अन्डरएस्टीमेट द पावर ऑफ अ कॉमन मेन....


"डोन्ट अन्डरएस्टीमेट द पावर ऑफ अ कॉमन मेन..." फिल्म चेन्नई एक्सप्रेस का यह डायलॉग आज पूरी तरह से प्रासंगिक हो गया है। कल तक जिस कॉमन मेन पर ना तो जनता विश्वास दिखा रही थी, ना कोई चैनल जिसे भाव दे रहा था और ना ही जिसे बीजेपी या कांग्रेस के नेता अपने बराबर खड़े होने लायक मान रहे थे, आज उस कॉमन मेन ने एक वार में सबको चित्त कर दिया।  कल तक केजरीवाल को सड़क की पार्टी कहने वाले कांग्रेसी नेता मुंह छिपाते फिर रहे हैं। सालों से जीतते आ रहे दिग्गज नेता आम चेहरों से हारने के बाद सद्मे में हैं।
 आप को सिर्फ 6 सीटें मिलने की भविष्यवाणी करने वाले चैनलों और अखबारों में आज कुछ इस तरह की हैडलाइन्स हैं...बीजेपी विनर, कांग्रेस ज़ीरो, आप हीरो.., केजरीवाल ने झाड़ू फिराई.., हर तरफ आप ही आप... , कांग्रेस साफ, भाजपा खिली, आगे आप... । कल तक केजरीवाल को भाव ना देने वाले चैनल्स आज आप उम्मीदवारों की प्रतिक्रिया जानने को माइक और कैमरा लेकर उनके आगे-पीछे घूम रहे हैं।

और तो और, जनता को भी विश्वास नहीं हो रहा है कि आप ने इतना जबरदस्त धमाका कर दिया है। हर पान की दुकान और चाय की टपरी पर सिर्फ आप की जीत के बारे में डिस्कशन हो रहा है।

इस आश्चर्यजनक और धमाकेदार जीत ने ना सिर्फ आम आदमी की ताकत फिर से दिखा दी है बल्कि कुर्सी को अपनी बपौती समझ कर सोए राजनेताओं को भी नींद से जगाने का काम किया है। इस जीत में सबके लिए सबक है...

अब तो समझ जाओ कांग्रेस-

-उम्मीद है मैडम जी अब आपको, आपके सुपुत्र को और आपके चमचों की पार्टी को यह समझ आ गया होगा कि जनता बेवकूफ नहीं है, आप उन्हें चाहे 1 रूपए में चावल और अनाज दें, चाहें मुफ्त में मोबाइल और लैपटॉप बांटे या मुफ्त के घरों का झांसा दें, जनता जानती है कि मुफ्तखोरी की आदत डालकर आप उन्हें बना तो भिखारी ही रहे हैं और जनता भिखारी बनने से इनकार करती है। आपने महंगाई का बिगुल बजा कर जनता के मुंह से रोटी छीनी जनता ने वोटों का हथियार चलाकर आपके नीचे से कुर्सी ही खींच ली... अब पता चला गिरने का दर्द...?
-प्रिय सुशील कुमार शिंदे जी अब तो आप जान गए होंगे कि जनता कुछ नहीं भूलती। बल्कि जनता का इंसाफ तो भगवान की लाठी की तरह है जो बिना आवाज़ के पड़ती है और क्या खूब पड़ती है। आपकी कांग्रेस को पड़ गई... और अभी आगे भी पड़ेगी.. लोकसभा चुनाव भी हैं, बस देखते जाईए।

-'हाथ' की छत्रछाया में चलने वालों अब समझ में आया कि महगांई, भ्रष्टाचार और महिलाओं की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर गलत नीतियां बनाने का परिणाम क्या होता है। उज्जवल भविष्य का झांसा देकर कमरतोड़ महंगाई देने वालों और नेताओं के भ्रष्टाचार को कमेटियों की आड़ में छिपाने वाले 'हाथों' को ऐसे ही 'कमल' और 'आप' पड़ते हैं।

-और तैंतालीस साल के युवा नेता राहुल गांधी जी आपको भी पता चल गया होगा कि आप कितने बड़े स्टार प्रचारक हैं...। जनता ने मैडम साहिबा के युवराज को उनकी औकात दिखा दी है।

ज्यादा खुश मत हो भाजपा..



-आपको बधाई भाजपाईयों। चार में से तीन राज्यों में आपने शानदार जीत हासिल की है और राजधानी दिल्ली में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरे हैं। आप जश्न मना सकते हैं। आपके पास वजह है। लेकिन यह ना भूलें कि आप इसलिए नहीं जीते कि लोगों ने आपको चुना है, बल्कि इसलिए जीते कि जनता ने कांग्रेस को नकारा है। जहां भाजपा के अलावो अन्य विकल्प ही नहीं था वहां लोगों ने भाजपा को वोट देकर विजयी बनाया और जहां ( दिल्ली में ) लोगों को दूसरा विकल्प मिला, वहां आपको सरकार बनाने के लाले पड़ते दिख रहे हैं।

-प्यारी भाजपा आपको दूरदर्शिता से काम लेने की जरूरत है। क्योंकि आपको अपनी राजनीति का फायदा कम मिला है, कांग्रेस के अनीतियों, भ्रष्टाचार और उसके एकमात्र विकल्प होने को फायदा ज्यादा मिला है। जब दिल्ली में 'आप' के कारण भाजपा का यह हाल है तो सोचिए अगर बाकी राज्यों में भी 'आप' के प्रतिद्वंदी होते तो क्या भाजपा इतनी आसान जीत हासिल कर पाती...?

-कांग्रेस के साथ भाजपा को भी आत्ममंथन करना है कि उसे भी अब अपनी पारम्परिक राजनीतिक सोच और मंदिर मस्जिद की राजनीति से ऊपर उठकर आम आदमी के आम मुद्दो पर वाकई में काम करना पड़ेगा वरना कोई बड़ी बात नहीं कि आगे के चुनावों में आप लोग भी कांग्रेस के साथ इक्का दुक्का सीटों पर खड़े नज़र आएं।

नेताओं और मी़डियाकर्मियों अब तो सुधर जाओ....

-आम आदमी पार्टी के जीतने के बाद देश भर के मीडिया की हालत भी देखने लायक हो गई है। सात दिसंबर यानि नतीजों के एक दिन पहले तक कोई भी न्यूज़ चैनल या अखबार आम आदमी पार्टी को कहीं गिन ही नहीं रहा था। कई अखबारों और चैनलों पर तो साफ-साफ भाजपा और कांग्रेस उम्मीदवारों के बीच की लड़ाई का ज़िक्र किया गया। आप और उसके उम्मीदवारों का तो ज़िक्र ही नहीं किया गया।

- रविवार सुबह तक मीडिया के लोग आप और आप के उम्मीदवारों को बेहद हल्के में लेकर चल रहे थे और शाम होते-होते सबके सुर बदल गए। आप को कहीं खड़ा नहीं करने वाली मीडिया के लोग शाम होते होते आप नेताओं की बाइट के लिए भागते दिखे।

-हर चैनल में सभी पार्टी के प्रत्याशिय़ों का बायोडाटा तैयार करके रखा जाता है कि हार या जीत के बाद उसको दिखाया जा सके। लेकिन चैनलो और अखबारों ने आप को इतना कमतर आंका कि इनके उम्मीदवारों के नाम तक की लिस्ट ठीक से नहीं बनाई गई और शाम को किसी भी चैनल पर किसी विजयी आप प्रत्याशी की बायोडेटा या बैकग्राउंड संबंधी न्यूज़ देखने को नहीं मिली। आप की इस जीत ने मीडिया को भी चौंकाया है और उन्हें अच्छा सबक दिया है।

-एक सबक उन सभी नेताओं के लिए भी है जो एक दिन पहले तक आप पर फिकरे कस रहे थे और उन्हें प्रतिद्वंदी तक मानने को तैयार नहीं थे, वो दूसरे दिन 'हार' का गम ओढ़े अपना मुंह छिपाते फिर रहे थे।

-एग्ज़िट पोल कराने वाली कंपनिया और उन्हें ज़ोर शोर से दिखाने वाले न्यूज़ चैनल्स को शायद य़ह सबक भी लेना चाहिए कि इनका कोई फायदा नहीं। बार बार एग्ज़िट पोल दिखाने और परिणाम अक्सर उलट आने के कारण दरअसल चैनल्स की क्रेडिबिलिटी ही सवालों के घेरे में आती है। बेहतर है आगे से एग्ज़िट पोल की बजाय कोई और रचनात्मक कार्यक्रम दिखाए जाएं।


टिके रहना है तो 'आप' को करके दिखाना होगा....



डीयर 'आप', आप को जनता ने चुन लिया है। जनता ने अपना काम कर दिया और अब काम करने की बारी आपकी है। कृपया अपनी बातों और वादों पर अटल रहें, उन्हें निभाएं और कुछ अच्छा बदलाव लाकर दिखाएं। कांग्रेस और बीजेपी की हालत से और खुद अपनी जीत से सबक लें। और जैसा कि आप खुद देख ही चुके हैं, अगर आपने भी वो सब नहीं किया जिसकी उम्मीद में जनता ने आपको यहां तक पहुंचाया है तो याद रखें जनता 'आप' की उम्मीदों पर भी झाड़ू फिराने में भी देर नहीं लगाएगी।

 एक बात और आदरणीय केजरीवाल जी, पब्लिक ने आपको जो मैंडेट दिया है उसकी इज्जत कीजिए। अगर आपको सिर्फ अपने बलबूते पर ही सरकार बनानी थी तो पहले बता देते। अगर दूसरी बार भी ऐसा ही हुआ जैसा अभी हुआ है तो क्या करेंगे, फिर से चुनाव,,? ऐसा मत कीजिए केजरीवाल जी, दोबारा चुनाव की बात मत करिए, जनता की पैसे की बरबादी की बात मत करिए। जो जीत मिली है उसका आनंद लीजिए और सरकार बनाने की बात कीजिए वरना कहीं ऐसा न हो कि मैजोरिटी पाने के चक्कर में आप इन सीटों को भी गंवा दें।


Friday, 6 December 2013

कुछ यादें आज पोटली से निकल पड़ी हैं...

हर इंसान के पास एक यादों की पोटली होती है जिसमें बहुत ही सहेज कर, एक के ऊपर एक तह करके रखी जाती है यादें। खूबसूरत या बदसूरत, दोनों की ही शक्ल में इस पोटली में मज़बूती से बंद यादों को बड़ी तरतीब से मैंने भी रख रखा है, लेकिन परेशानी यह है कि यह पोटली कभी मेरे खोले नहीं खुलती...।  इसको रखने पर तो मेरा बस है लेकिन खोलने पर बिल्कुल नहीं।

 कभी कहीं पार्क में बच्चों को झूलता देखकर तो कभी कुछ लोगों को चाट की ठेल पर हंसी मज़ाक करते हुए गोलगप्पे खाते देख या फिर कभी बाज़ार से सामान लेकर लौटते हुए- स्कूल की दो सहेलियों को बतियाते हुए अपनी-अपनी साइकिलों पर जाते देखकर और या फिर कभी- कभी यूं ही खाली बैठे, इन यादों की पोटली खुल जाती है और इसमें से भरभराकर गिरने लगती हैं यादें.....।  बातरतीब रखी यादें इतने बेतरतीब तरीके से छितर कर गिरती है... पट, पट, पट.. एक के ऊपर एक.., कि बस समझ ही नहीं आता किसे सहेजे, किसे जाने दें.. और कैसे इन्हें फिर से साफ सुथरे तरीके से झाड़ पौंछ कर वापस जमाएं....।

दिसंबर की इस गुनगुनी दोपहर में यूंही बाहर खिली धूप को ताकते हुए आज यह पोटली फिर से खुल गई, और मेरे सामने महर्षि पुरम कॉलोनी के मेरे घर की छत और उस पर खिली धूप की यादें आ पड़ी। याद उन दिनों की जब हम जाड़े की दोपहरों में स्कूल से वापस आते ही गैलरी में साइकिल खड़ी करके, जल्दी-जल्दी जूते और जुराबे उतारकर और जैसे-तैसे कपड़े बदलकर मम्मी से खाना मांगते थे और खाना मिलते ही एक हाथ में खाने की प्लेट पकड़े, दूसरे में पानी का गिलास थामे और बगल में कहानी की किताब, पत्रिका, या अखबार दबाए छत पर चढ़ जाया करते थे। 
तब हमारी छत के बाएं ओर धूप सुबह ही आ जाया करती थी और दिन ढलने तक बरकरार रहती थी.., लगभग चार बजे तक। दोपहर दो बजे तो धूप में तेजी भी खूब हुआ करती थी और कुछ सीधी धूप में बैठने पर सांवले होने का डर..., कि हम अलगनी पर पहले एक चादर या शाॉल टांगकर उसकी आड़ बनाते थे और फिर चटाई पर ऐसे बैठा करते थे कि पीठ धूप की तरफ रहे और सिर छांव में। और यूं सूरज को पीठ दिखाते और चादर की आड़ में दीवार से टिक कर हम या तो ताहिरी, या दाल-चावल या रोटी सब्जी का मज़ा लिया करते थे।

आलथी-पालथी मार कर बैठे हुए, एक घुटने पर किताब को खोले, एक-एक कौर खाते हुए और कहानी पढ़ते हुए धूप का आनंद लेते हुए मेरी तस्वीर की इस याद को मैं सहेज ही रही थी, कि अचानक साइकिलों वाली एक और याद पोटली से छिटक गई। मेरी यादों के बाइस्कोप में आगरा के बाईपास रोड की सर्विस लेन खुल गई और उस पर अपनी-अपनी साइकिलों पर चलती मैं और मेरी दो सहेलियां...।  हरीपर्वत का चौराहा, चौराहे की रेड लाइट, रुका हुआ ट्रैफिक और ट्रैफिक तोड़ कर निकलती मेरी, निधि और काजल की साइकिलें..., हम लोगों को भौचक्के से देखता हुआ ट्रेफिक हवलदार और हंसते हुए लोग। .... दयालबाग में मामाजी की फिजिक्स की ट्यूशन क्लास और उसके बाद तुलसी टॉकीज के पीछे एसएन सर की केमिस्ट्री क्लास के ठहाके...। क्या बात है, मेरी इस याद में तो पीरियोडिक टेबल भी है और कैमिस्ट्री के एलीमेन्ट्स का नॉमनक्लेचर फॉर्मूला भी...., ऑर्गेनिक केमिस्ट्री भी और परमाणु संयत्र भी....।

एक याद फिजिक्स लैब में एक दूसरे पर शीशे की चमक फेंकने की है और एक याद बायो लैब में मेंढक का डायसेक्शन करते समय कंपकपाते हाथों की... । हरबेरियम फाइल के साथ थिएटर रूम में शोर मचाने की याद गुथी हुई है। ... और यह एक और याद भोपाल के होस्टल की छत की भी निकल आई। मैं, नेहा, ऐश्वर्या, जया, श्वेता, नीतू... हम सब होस्टल के टैरेस पर चारपाई पर बैठे धूप सेंक रहे हैं और कॉलेज के बारे में गॉसिप कर रहे हैं। रविवार के दिन छत पर कपड़ों का अंबार..., सुबह शाम की चाय.., भोपाल की झीलें और नवभारत का ऑफिस। इस याद में मैं और सरिता हैं और नवभारत के बाहर वाली फ्रूट चाट वाले भैया की दूकान।हम दोनों जाड़े की धूप में बैंचों पर बैठकर मिक्स्ड फ्रूट चाट खा रहे हैं और यह भी डिस्कस कर रहे हैं कि आज कौन सी स्टोरी देनी है...।

ऐसा नहीं है कि मेरी यादों की पोटली से हर याद सीक्वेंस में निकल रही है। बीच-बीच में पीर कल्यानी वाले अम्मा बाबा के पेड़ों और फूलों से लदे बगीचे की याद..., दूरदर्शन के गलियारों में गाना गाते हुए चलने की याद, लखीमपुर के जंगल में खुली हुई जीप से घूमने की याद और खोई हुई डायरी मिलने पर मन कामेश्वर मंदिर जाने जैसी यादें भी निकल पड़ी हैं।

किसे संभालू, किसे छोड़ू, य़ह यादें तो रुक ही नहीं रही है...। और अब मैं अचानक महसूस करती हूं कि इन यादों के बारे में लिखते हुए ना जाने कब से मेरे होठों पर मुस्कान खिली हुई है। मुझे पता ही नहीं चला कि इस पूरे वक्त मैं मुस्कुराती रही हूं...। वक्त हो चला है, अभी तो बहुत सी यादें अनदेखी हैं। लेकिन अब नहीं फिर किसी रोज.., बाद में, फुरसत में इनको खोलूंगी।

 फिलहाल तो  इन यादों को फिर से सहेज देती हूं। पता नहीं कब गम को मेरा पता मिल जाए, तब खुद इस पोटली को खोलूंगी और मुझे मालूम है तब जतन से सहेजी गई यह यादें ही मेरे दिल को खुशी देने और चेहरे पर मुस्कान लाने के काम आएंगी...।

  


Tuesday, 19 November 2013

विशुद्ध ऊर्जा का रूप हैं विचार... और सोच पर टिकी हैं खुशियां....?

क्या हम खुद अपने भाग्य के निर्धारक हैं? क्या खुश रहना या दुखी रहना पूरी तरह से हमारे हाथ में है? क्या परिस्थितियों का इसमें कोई हाथ नहीं? क्या हम चाहे तो सिर्फ अच्छी सोच रखकर विपरीत परिस्थितियों को अपनी ओर कर सकते हैं और खुश रह सकते हैं.....?
कुछ समय पहले जब मैं काफी तनाव से गुज़र रही थी, मेरी एक दोस्त ने मुझे एक प्रसिद्ध किताब के बारे में बताया.."सीक्रेट्स"... और उसे पढ़ने के लिए कहा। किताब तो खैर मैं नहीं पढ़ पाई लेकिन उस किताब के बारे में काफी कुछ पढ़ा और जो वो किताब कहती है काफी हद तो वो मेरे समझ में आ गया। जब मैंने उसके बारे में सोचा तो मुझे काफी बाते सही लगी। मैंने जाना कि दरअसल हम ही अपनी खुशी और दुख के ज़िम्मेदार हैं। और जो हम इस दुनिया को देते हैं हमें वहीं वापस मिलता है.....। इन निष्कर्षों से पहले मैं यह बताना चाहती हूं कि उस किताब के ज़रिए क्या बातें मैंने जानी और समझी...

1. हमारी सोच दरअसल विशुद्ध ऊर्जा होती है। जो कुछ भी हम सोचते हैं वो मन के द्वारा निस्तारित ऊर्जा का रुप होता है जो हमारे द्वारा इस यूनिवर्स में पहुंचती है। अगर हम कुछ अच्छा सोचते हैं तो पॉजिटिव एनर्जी यानि धनात्मक ऊर्जा का प्रवाह करते हैं और अगर कुछ बुरा सोचते हैं नैगेटिव एनर्जी यानि ऋणात्मक ऊर्जा इस यूनिवर्स को देते हैं।

2. न्यूटन के क्रिया प्रतिक्रिया नियम के अनुसार हम जो भी देते है हमें उतने ही बल से वहीं चीज़ वापस मिलती है। मतलब अगर हमने नेगेटिव एनर्जी इस यूनिवर्स को दी तो यूनिवर्स उतने ही फोर्स से उतनी ही नेगेटिव एनर्जी हमें वापस करता है और अगर हम पॉजिटिव ऊर्जा इस यूनिवर्स को दें तो बदले में हमें भी पॉजिटिव ऊर्जा ही मिलती है।

3. जिसे हम भगवान कहते हैं वो दरअसल यह ब्रह्मांड है जो हर पल हमारे हमारे शरीर के और हमारी सोच के साथ सामंजस्य में रहता है, या यूं कहें कि कम्यूनिकेट करता रहता है...ऊर्जा का आदान प्रदान और प्रवाह एक तरफ से दूसरी तरफ लगातार चलता रहता है और इस तरह हम लगातार ब्रह्मांड से जुड़े रहते हैं।

4. हमारी सोच चूंकि ऊर्जा का रूप है इसलिए वो ऊर्जा को आकर्षित करती है। अगर हम यह सोचकर दुखी होंगे कि हमारा जीवन परेशानियों से भरा है, या हमारे पास सीमित साधन हैं तो यूनिवर्स में ऐसी ही एनर्जी जाएगी और वो हमें नेगेटिवली ही रिस्पॉन्ड करेगा और दरअसल हमें परेशानियां ही देगा। लेकिन इसके विपरीत अगर हम यह सोचना शूरू कर दें कि हम तो सर्वसम्पन्न हैं और हमारे जीवन में खुशियां हैं तो हमारी सोच के रूप में पॉजिटिव एनर्जी इस यूनिवर्स में जाएगी और बदले में हमें खुशियां ही मिलेंगी।

5. अगर हम चाहें तो सिर्फ पैसे के बारे में सोचकर और विश्वास रखकर कि हम सम्पन्न हैं, सम्पन्न बन सकते हैं। जिस तरह समान चीज़े समान चीज़ों को आकर्षित करती हैं, उसी तरह खुशी और सम्पन्नता की सोच खुशियों  और धन को, जबकि दुख और गरीबी की सोच दुखों और विपन्नता को आकर्षित करती है।

6.भाग्य, दुर्भाग्य और कुछ नहीं हमारी सोच और इस सोच के रूप में जैसी ऊर्जा हम ब्रह्मांड को दे रहे हैं, उसी का खेल है। कितनी ही बार ऐसा होता है कि हम अच्छा सोचते हैं और हमारे साथ दरअसल अच्छा हो जाता है और कितनी ही बार सबकुछ अच्छा होते जाने पर भी एक विपरीत बात दिमाग में आ जाने पर हमारे साथ गलत हो जाता है।

7. यह समस्त ब्रह्मांड और इसमें व्याप्त हर एक चीज़ ऊर्जा का बहुत बड़ा भंडार है और इससे ही हमें ऊर्जा मिलती है। बात सिर्फ इतनी सी है कि हम अपनी सोच के रूप में कौन सी ऊर्जा की कामना इस ब्रह्मांड से कर रहे हैं। धन, गरीबी, भाग्य, दुर्भाग्य, बीमारियां... यह सबकुछ और कुछ नहीं, हमारी अपनी सोच का आविर्भाव या प्रत्यक्षीकरण अथवा अंग्रेजी में कहें तो मैनिफेस्टेशन है। जो हमने मांगा वो हमें मिल गया.....।

इच्छाशक्ति या डिटरमिनेशन इसे ही कहते हैं। जिस समय हमारे मन में किसी चीज़ को पाने की प्रबल इच्छा होती है तो हम बार बार उसी के बारे में सोचकर यह ऊर्जा ब्रह्मांड को भेजते हैं और ब्रह्मांड उस चीज़ को हमसे मिलाने की कोशिश में लग जाता है...। और अगर थोड़ा गूढ़ होकर सोचे तो बात सारी विश्वास पर आकर टिकती है। विश्वास है तो सबकुछ है और विश्वास नहीं तो कुछ भी नहीं।

आपको शायद घुमाने वाली बातें लगें, लेकिन यह वो महत्वपूर्ण बातें हैं जिनका जीवन में महत्व तब पता चलता है जबकि आप उन पर अमल करना शुरू कर देते हैं। पहले तो मुझे इन बातों पर यकीन नहीं हुआ लेकिन जब मैंने इनपर अमल करके पॉजिटिव सोच रखनी शुरू की तो यकीन मानिए मेरे साथ दरअसल अच्छा होना शुरू हो गया।

हममें से कोई भी विश्वास के साथ नहीं कह सकता कि यह बातें सच हैं और इनका कोई असर किसी पर होता है लेकिन यह भी सच है कि पॉजिटिव सोच रखने के बहुत फायदे हैं। यह शायद हर इंसान ने महसूस किया होगा कि हर चीज़ चाहे वो अच्छी हो या बुरी, सभी के दो पहलू होते हैं। और अगर हम ध्यान से और बिना बायस हुए देखें तो इन दोनों पहलूओं को देख सकते हैं। यहां बात सिर्फ बुरे पहलू को नज़रअंदाज़ करके अच्छे पहलू पर ध्यान देने की है। और यह कोई मुश्किल काम नहीं। जो हो चुका है उसे तो हम नहीं बदल सकते लेकिन जो हुआ है उसके धनात्मक पहलू पर अपनी सोच रूपी ऊर्जा को केन्द्रित करने से अगर कुछ अच्छा हो जाए तो कोशिश करने में क्या हर्ज है...




Friday, 18 October 2013

सकारात्मक सोच, ऊंचे सपनों और बुलंद हौसलों का नाम है "मलाला"


अब तक कई बार मलाला का नाम सुना था लेकिन कभी ठीक से जानने की कोशिश नहीं की कि क्यों मलाला युसुफज़ई इतनी मशहूर हो गई, क्यों दुनिया भर में लोग उसकी ज़िंदगी की दुआएं मांग रहे हैं और क्यों उसके नाम से पुरुस्कारों की घोषणा की जा रही हैं....
 सिर्फ कुछ ऐसा ही पता था कि उसने तालिबानी हुक्म के खिलाफ लड़कियों के स्कूल जाने का अभियान चलाया था जिसके बाद तालिबानी आतंकियों ने उसे गोली मार दी और बहुत मुश्किल के बाद उसे बचाया जा सका। आज इत्तिफाक से सीएनएन पर उसका इंटरव्यू देखने को मिला। तब पहली बार सोलह साल की इस जीवट किशोरी को देखा, सुना तो जाना कि कौन और "क्या" है मलाला...।

पहली बार जाना कि हिम्मत का उम्र से कोई वास्ता नहीं। हिम्मत कभी भी आ सकती है और कहीं भी आ सकती है। संगीनों और तालिबानी आतंक के साये में एक किशोरी के पढ़ने का जुनून जीत गया। गोली खाकर भी वो ज़िदा रही और आज मिसाल बनकर तमाम दुनिया को हिम्मत दे रही है। इस सोलह साल की लड़की के आत्मविश्वास से लबरेज चेहरे पर मुस्कान थी और वो हर सवाल का बहुत शांति, मुस्कुराहट और विश्वास के साथ जवाब दे रही थी।

मलाला से जब पूछा गया कि क्या सोचकर तुमने तालिबानी फरमान के लड़कियों को स्कूल ना जाने देने वाले फतवे के खिलाफ जाने का फैसला किया तो इस बहादुर किशोरी का जवाब था कि "मार तो वो हमें वैसे भी देते मैंने सोचा कि क्यों ना मरने से पहले अपनी आवाज़ लोगों तक पहुंचाई जाए।"....इतनी हिम्मत होना वो भी इस नादान उम्र में...तो यह है मलाला

उसने बताया कि जब गोली लगने के बाद अस्पताल में उसकी आंखे खुली तब उसे सबसे ज्यादा इस बात की खुशी हुई कि वो ज़िन्दा हैं। गोली ने उसके कान और शरीर के कुछ अन्य हिस्सों को स्थायी नुकसान पहुंचाया है, लेकिन वो यह सोचकर परेशान नहीं थी कि गोली ने उससे क्या छीन लिया बल्कि यह सोचकर खुश थी कि गोली क्या नहीं छीन पाई.... उसकी रीढ़ की हड्डी को नुकसान नहीं पहुंचा..., वो ज़िन्दा है.., सबके सामने हैं, सबसे बात कर रही है और अपना संदेश दुनिया तक पहुंचा रही है इससे बढ़कर खुशी की बात उसके लिए कोई नहीं.....-सकारात्मक सोच से भरपूर मलाला।

और जब उससे यह पूछा गया कि आप दुनिया को क्या संदेश देना चाहेंगी तो उसने कहा  कि "मैं सभी देशो के लोगों से कहना चाहूंगी कि वो पढ़े,आगे बढ़े, क्योंकि हमारे लिए यह आसान बिल्कुल नहीं है। दुनिया में आपमें से जिस जिस को पढ़ने का मौका मिला है उसका पूरा फायदा उठाइए। आप नहीं जानते कि जब आपका पढ़ने का अधिकार छीन लिया जाता है तो कैसा लगता है। यह बहुत बड़ी बात है कि आपको स्कूल जाने का, अध्यापको को जानने और उन्हें समझने का मौका मिला है। इसका खूब उपयोग करिए और खूब पढ़िए".... तालीम की रौशनी से रौशन होने का संदेश देने वाली मलाला

 पहले डॉक्टर बनने की चाह रखने वाली मलाला अब राजनीतिज्ञ बनना चाहती है। उन्हीं के शब्दों में "जब मैं स्वात में थी तो हमारी क्लास में हर लड़की डॉक्टर या टीचर बनना चाहती थी। वहां लड़कियों की ज़िंदगी का यहीं हाल होता है। या तो पढ़ लिखकर डॉक्टर या टीचर बन जाओ या ज़िंदगी भर एक गृहिणी बन कर रहो और अपने बच्चे पालो, इसलिए मैं भी डॉक्टर बनना चाहती थी। लेकिन अब जब मुझे अपने मुल्क से बाहर आने का और बहुत सी चीज़े जानने और समझने का मौका मिला तो मैंने जाना कि डॉक्टर बनकर तो मैं सिर्फ कुछ लोगों की मदद कर सकती हूं लेकिन एक राजनीतिज्ञ बनकर मैं पूरे देश की मदद कर सकती हूं।" बेनज़ीर भुट्टो को अपना आदर्श मानने वाली मलाला अब पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बनने का और अपने मुल्क की सभी लड़कियों को शिक्षा दिलवाने का सपना देखती हैं... छोटी उम्र में बड़े सपनों वाली मलाला

एक सोलह साल की बच्ची वाले सारे शौक है मलाला के। वो इस बात का ख्याल रखती है कि अपनी आवाज़ अपने भाईयों से ऊंची रखें क्योंकि पाकिस्तान में ऐसा कम होता है कि महिलाओं की आवाज़ पुरुषों के सामने निकले इसलिए वो अपने भाईयों से ऊंची आवाज़ में झगड़ा करके यह इच्छा पूरी करती हैं। पश्तो संगीत और गानों के अलावा मलाला को जस्टिन बीबर को सुनने का भी शौक है और जब भी मौका मिलता है वो अपना यह शौक पूरा करती हैं......तो एक आम किशोरी की तरह ही है मलाला।

अपनी मां द्वारा पर्दा रखने पर जोर देने पर बोलते हुए मलाला ने बताया कि उनकी मां जब भी उनके साथ बाहर कहीं जाती थी वो हमेशा मलाला को यहीं बोलती रहती थी कि अपना चेहरा ढको अपना चेहरा ढको... देखो यह आदमी तुम्हें देख रहा है, देखो वो आदमी तुम्हें देख रहा है और मलाला कहती थी कि देखनो दो ना अम्मी मैं भी तो उन्हें देख रही हूं... मलाला का यह रूप भी है

और जब मलाला यूसुफजई के सामने यह सवाल आया कि क्या उसे आतंकियो से डर नहीं लगता वो तो ताक में बैठे हैं, उसे दोबारा मारने की कोशिश भी तो कर सकते हैं। तो मलाला का जवाब था "वो मेरे शरीर को ज़रूर मार सकते हैं लेकिन मेरे सपनों को नहीं.. मेरे सपने हमेशा जिन्दा रहेंगे।".... जी हां ऐसी है मलाला।  

well... I am impressed :-)




Wednesday, 9 October 2013

एक देसी दशहरा मेले की सैर...

कितना वक्त हो गया आपको किसी मेले में गए हुए...? ..यहां मैं लायन्स क्लब या आरडब्ल्यूए, या मंदिर समिति या किसी समाजसेवी संस्था द्वारा आयोजित मेले में जाने की बात नहीं कर रही हूं जिनकी दिल्ली जैसे महानगरों में त्यौहार आते ही बाढ़ आ जाती है और जहां ब्रांडेड खाना, ब्रांडेड खिलौने, महंगे झूलों, स्टेज पर हो रहे सांस्कृतिक कार्यक्रमों और सज संवर कर आए लोगों का हुजूम होता है....। यहां बात उन मेलों की हो रही है जिन्हें दिखाने के लिए बचपन में हम अपनी मम्मी-पापा से ज़िद किया करते थे और खूब भीड़-भाड़ वाले ऐसे मेलों में वो हमें ले जाते थे। वहां बहुत सी ऐसी चीज़े होती थी जो आज के सुसभ्य और सुसंस्कृत मेलों से गायब हो चुकी हैं।
खैर कल मेरे बेटे की ज़िद पर हम लोग उसके स्कूल के रास्ते में लगने वाले ऐसे ही एक मेले में गए। और यकीन मानिए जब हम उस मेले में गए तो बहुत सी तो पुरानी यादें ताज़ा हो गई और बहुत सी चौंकाने वाली चीज़े भी दिखी...

आदर्श रामलीला कमेटी द्वारा आयोजित इस दशहरा महोत्सव मेले का आयोजन पूर्वी दिल्ली के त्रिलोकपुरी इलाके में चांद सिनेमा के पास हर साल किया जाता है। यह मेला दिल्ली की एलीट सोसाइटी के लिए नहीं है क्योंकि इसमें ज्यादातर त्रिलोकपुरी निवासी, शशि गार्डन निवासी या सीधे शब्दों में कहें तो निचले तबके के लोग आते हैं। इसलिए यह मेला भी दिल्ली के इलीट मेलों से बिल्कुल अलग था बिल्कुल देसी और देहाती टाइप मेला था। यहां दर्शक वर्ग भी वैसा ही था।

 यहां हमें बहुत सी ऐसी चीज़े देखने को मिली जो अब या तो मेलो से गायब हो चुकी है या फिर कस्बाई इलाकों या छोटे शहरों के मेलों में ही देखने को मिलती हैं,और कुछ ऐसी भी जो बदलते समय के साथ इनमें शामिल हो गई हैं लेकिन जो कभी भी इन मेलों की पहचान नहीं रहीं...।

यह देखिए फूलों की बैकग्राउन्ड में तस्वीर खिंचवाता एक परिवार। इस मेले में अलग अलग बैकग्राउन्ड के साथ तस्वीरे खिंचवाने की व्यवस्था की गई थी। जैसे मोटरसाइकिल के साथ, कार के साथ, पहाड़ी बैकग्राउन्ड में या फिर रेगिस्तानी बैकग्राउन्ड में। 50 रुपए में अपने मनपसन्द स्टाइल में तस्वीरे खिंचवाओं और 15 मिनट में उस तस्वीर को ले जाओ। आपके घर में पापा, मम्मी, दादा या दादी की ऐसी कोई ना कोई तस्वीर ज़रूर होगी...। आजकल भले ही हमें ऐसी तस्वीरे देखकर हंसी आएं लेकिन एक ज़माने में इन तस्वीरों का ज़बरदस्त क्रेज़ हुआ करता था।


और यह  रंग-बिरंगे गुब्बारों पर निशाने लगाने वाला खेल। पहले पांच रुपए में पांच बार निशाना लगाते थे लेकिन अब महंगाई के कारण 10 रुपए में चार निशाने लगाने को मिलते हैं। यह निशाने मैंने भी बचपन में खूब लगाए हैं, आप सबने भी लगाए होंगे, वरना आपके मम्मी-पापा ने तो शर्तिया लगाए होंगे। आज के मेलों से यह निशाने वाले रंगीन गुब्बारे लगभग गायब हो गए हैं। लेकिन यकीन मानिए इन गुब्बारों पर लंबी नाल वाली बंदूक से निशाना लगाने में बड़ा मज़ा आता है। कभी मौका मिले तो लगा कर देखिएगा।


यहां का एक मुख्य आकर्षण था मौत का कुंआ। यह लकड़ी की खपच्चियों से बनी विशाल कुंए जैसी आकृति होती है जिसकी गोल दीवारों पर ऊपर तक मोटरसाइकिलें और कारें दौड़ती हैं।बीस रुपए की टिकिट में मौत के कुंए का यह खेल देखने का रोमांच आपको शानदार एक्शन फिल्म देखकर भी नहीं मिलेगा। इस कुंए में मोटरसाइकिल दौड़ाने के लिए तो हिम्मत चाहिए ही लेकिन देखने के लिए भी बहुत हिम्मत की दरकार है। गोल गोल चलती हुई मोटरसाइकिल और कारें कई बार ऊपर दर्शकों के पास तक आ जाती हैं और अगर आप खुश होकर इन्हें पैसे देना चाहें तो यह जांबाज खिलाड़ी ऊपर रेलिंग तक आकर आपके हाथ से खुद वो ईनाम ले जाते हैं।

 और यह हैं इस मेले की सबसे ज्यादा चौंकाने वाली चीज़ जो मैंने पहले कभी किसी मेले में नहीं देखी थी। यह है एम के बूगी बूगी संस्कृत आदर्श कला केंद्र का पंडाल। था तो यह आदर्श कला केंद्र लेकिन दरअसल यहां कोमल धमाका के नाम से दस मिनट तक फिल्मी गानों पर मॉडल जैसी दिखने  वाली लड़कियों द्वारा डांस किया जा रहा था।  20 रुपए की टिकिट लेकर अंदर जाने की इजाज़त सिर्फ पुरुषों को थी। किसी भी महिला को पंडाल में जाना मना था।
आयोजक दर्शकों को आकर्षित करने के लिए विशेष तरीका अपना रहे थे। जब पंडाल पूरा भर जाता था और नाचने के लिए मॉ़डल आ जाती थी तो ज़रा सा पर्दा हटा दिया जाता था ताकि बाहर खड़ी भीड़ को उसकी झलक मिल जाए और फिर एक मिनट में ही पर्दा खींच दिया जाता था। कुछ कुछ टीज़र एडवर्टाइज़िंग जैसा...। इस पंडाल के बाहर सबसे ज्यादा भीड़ थी। सारे शो हाउसफुल जा रहे थे और यहां बहुत से पुलिसवाले भी जमा थे। सीटियों और तालियों की आवाज़े बाहर तक आ रही थीं।
वैल... मुझे कहना पड़ेगा कि यह पुराने तरह के मेलों में एक नई उपस्थिति है क्योंकि मैंने बचपन में देखे किसी भी मेले में ऐसे पंडाल नहीं देखे।
    यह है रिंग फेंककर ईनाम जीतने वाला गेम। यह खेल तो बहुत आम है और बहुत मज़ेदार भी। आप सभी ने खेला होगा। यहां 20 रुपए में तीन बार रिंग्स फेंकने का मौका मिल रहा था। जो भी चीज़ आपकी रिंग में आ गई वो आपकी। ध्यान से देखिए यहां पीछे की तरफ एक सौ रुपए की गड्डी भी रखी है। यानि 20 रुपए में 100 रुपए की गड्डी जीतने का मौका...।

इसके अलावा भी यहां बहुत से ऐसे खेल थे जिनमें हर किसी को खेलने और जीतने का मौका मिलता है। जैसे बॉल मारकर गिलास गिराने का खेल, नंबर की सीरीज बनाने का खेल, माचिस से मोमबत्ती जलाने का खेल.. इत्यादि। यहां झूलों की भी कोई कमी नहीं थी और जाइन्ट व्हील तो इतना ज्यादा जाइंट था कि बैठने के ख्याल से ही डर लगने लगे।
कोलम्बस, मैरी गो राउंड, ड्रैगन ट्रेन जैसे लगभग सारे झूले यहां थे और हर झूले कि टिकिट थी मात्र 20 रुपए। यहां एक मैजिक शो भी था जिसमें देखते देखते एक लड़की नागिन में बदल जाती है। मैं वो शो भी नहीं देख पाई क्योंकि हाउसफुल था और साथ ही एक शीशों का घर जिसमें तरह तरह के शीशे लगे थे जो आपको अलग अलग शेप और शक्ल का दिखाते हैं।



Tuesday, 8 October 2013

तब लोगों ने तंदूर का खाना तक खाना छोड़ दिया था...

तब मैं शायद नाइन्थ में थी। आज भी याद है, मैं स्कूल जाने के लिए तैयार हो रही थी कि अचानक पापा की तेज़ आवाज़ सुनाई दी..".हद हो गई यह तो। पत्नी को मारकर तंदूर में जला दिया...।" जब यह शब्द कानों में पड़े तो तुरंत पापा के पास आई। वो अमर उजाला का दूसरा पेज पढ़ रहे थे जिस पर पूरी खबर विस्तार से छपी थी। नैना साहनी, सुशील शर्मा और 'उस' तंदूर की फोटो छपी थी। जब पापा ने पेपर छोड़ा तब मैंने उस घटना को पूरा पढ़ा। पेपर में पूरी घटना विस्तार से ब्लैक एंड व्हाइट फोटो के साथ छपी थी। उसमें लिखा था कि कांग्रेसी नेता ने अपनी पत्नी के टुकड़े करके अपने ही रेस्टोरेंट के तंदूर में जला दिए...

इतना खतरनाक और वीभत्स हत्याकांड था यह जिसके बारे में इससे पहले ना तो मैंने कभी पढ़ा था और ना ही सुना था। जब मैं स्कूल पहुंची तब भी दो अध्यापिकाएं इसी के बारे में चर्चा कर रही थीं। तब चौबीस घंटे वाले बहुत सारे न्यूज़ चैनल्स नहीं होते थे सिर्फ दूरदर्शन पर रात को न्यूज़ आती थी इसलिए अधिकतर लोगों को सारी डिटेल्स अखबार पढ़कर ही पता चलती थी और इसके बावजूद यह खबर आग की तरह फैली थी।

काफी दिनों तक यह खबर अखबार की सुर्खियों में रही।  इसे तंदूर कांड का नाम दे दिया गया था।मुझे अच्छी तरह से याद है कि इस खबर को पढ़ने के बाद लोगों को तंदूर से घृणा हो गई थी। अखबार में अक्सर यह खबरे छपती थी कि बहुत सारे लोगो ने तो तंदूर का खाना खाना ही छोड़ दिया था।

तब तक जहां तक मुझे याद है इस बात का जिक्र ज्यादा नहीं था कि सुशील शर्मा ने नैना साहनी की पहले गोली मार कर हत्या की थी। बस तंदूर में टुकड़े करके जलाने का जिक्र था। जो बड़े ठंडे दिमाग और क्रूरता से हत्या के साक्ष्य मिटाने के लिए किया गया था। इस मामले में उसके रसोईए और मैनेजर का भी जिक्र था जिन्होंने इस काम में उसकी सहायता की थी।

पति द्वारा इस क्रूरता से अपनी पत्नी को मारने के कारण तो यह केस सुर्खियों में था ही इसके अलावा जो एक और बात थी वो यह कि नैना साहनी पायलट का प्रशिक्षण ले चुकी थी। विदेश में रह चुकी थी। मतलब वो एक आधुनिक और पढ़ी लिखी महिला थी जिसने अपनी मर्ज़ी से प्रेमविवाह किया था। और सुशील शर्मा कांग्रेसी नेता था। यानि दोनों ही सभ्य, पढ़े लिखे और आधुनिक समाज का प्रतिनिधित्व करते थे और सभ्य समाज मे इस तरह की क्रूरता पहली बार सामने आई थी।

और मैं आपको बता दूं कि उस समय नेताओं के भ्रष्टाचार, दुर्वव्यवहार, हत्याओं और अपराधों के मामले इतने आम नहीं हुआ करते थे जितने कि आज होते हैं और हर दूसरे दिन हम किसी अपराध में किसी नेता की भूमिका के बारे में सुनते हैं। इसलिए भी यह मामला बेहद अहम हो गया था क्योंकि इसमें एक युवा कांग्रेसी नेता की भूमिका थी।

 तब हर मीटिंग, किटी पार्टी और और गली मोहल्लों और पान की दुकानों पर होने वाले गॉसिप्स में यह केस ही डिस्कस हुआ करता था और लोग इस तंदूरकांड से इतने दहशतजदां थे कि तंदूर का खाना खाना पसंद नहीं करते थे।


वो आते हैं...


-बेबी जी आप ऑपरेशन के लिए चली जाईए, क्यों बार बार नर्स को वापस भेज रही हैं...?
-पहले मॉम को आने दो, उन्होंने प्रॉमिस किया था वो ऑपरेशन से पहले मुझसे मिलने आएंगी। वो आएंगी तभी मैं ऑपरेशन के लिए जाऊंगी। रात से वेट कर रही हूं। 
-लेकिन बेबी जी, आपके शरीर में सैप्टिक फैल सकता है, आपका ऑपरेशन होना ज़रूरी है। मालकिन को दिल्ली से आने में देर लग सकती है। मान जाईए बेबीजी, कहते हुए गोपाल काका की आंखे छलक आईं...
-कहा ना नहीं जाऊंगी, आज मम्मी को ही आना पड़ेगा, चाहे मैं मर जाऊं पर उनसे मिलने के बाद ही जाऊंगी। ... कहते हुए सिमरन ने मुंह फेर लिया।

गोपाल काका रोते हुए बाहर आए। सामने से महेश बाबू आते दिख गए। "बाबूजी आप गए। बेबी जी से मिल लीजिए, उन्हें अब तो बताना ही पड़ेगा, वो ऑपरेशन के लिए नहीं जा रहीं...."
-लेकिन यह नहीं हो सकता गोपाल, सिमरन कमज़ोर है हम उसे नहीं बता सकते...

तभी रूम का दरवाज़ा खुला और सिमरन स्ट्रैचर पर बाहर आती दिखाई दी। पास से गुज़री तो पापा और गोपाल काका को देखकर बोली... मैंने कहा था ना, मम्मी आएंगी। वो मुझसे मिलकर चली गईं।  
क्या....! गोपाल काका और महेश बाबू दोनों अवाक... ऐसा कैसे हो सकता है..
अभी-अभी तो महेश बाबू श्यामली की बॉडी को आग देकर रहे हैं...पुलिस वाले बता रहे थे, वो अस्पताल पहुंचने की जल्दी में गाड़ी बहुत तेज़ चला रही थी... ट्रक ने टक्कर मारी तो वहीं उसकी तुरंत मौत हो गई... फिर वो कैसे सकती है... ?????”
तभी गोपाल का हाथ महेश बाबू के हाथों को दबाने लगा, …....ऐसा होता है बाबूजी, कभी कभी लोग मरने के बाद भी जा नहीं पाते, कोई काम अधूरा रह जाता है...मालकिन भी शायद इसलिए आई होंगी एक बार... ताकि बेबी जी की जान बच सकें...