Monday, 24 April 2017

बिन दु:ख सब सून



आप मानें या ना मानें, एक समय ऐसा था जब इस धरती पर हर खास-ओ-आम को भगवान बनने का मौका मिलता था। यह वो समय था जब भगवान दूर स्वर्ग में नहीं रहते थे बल्कि यहीं ज़मीन पर विचरण करते थे। तब दरअसल देवलोक, धरतीलोक या पाताललोक जैसी अलग अलग जगहें थी ही नहीं। इसी धरती पर पाताल भी था और आकाश के बादल भी। सब एकसार था, एक साथ था। प्रभु हर इंसान से मिलते थे, उसके दुख-दर्द सुनते थे, तकलीफें दूर करते थे और खुशियों में शरीक होते थे, और साथ ही सबको भगवान बनने का अवसर भी देते थे।

आम लोगों में से ही कईं अपनी किसी खूबी के चलते भगवान बनना चुन लेते थे। जैसे अगर किसी के पास धन-दौलत बहुत ज़्यादा थी, तो वो मनी गॉड बन जाता था। किसी की दुआओं में असर रहा हो तो ब्लैसिंग गॉड, कोई लकी है तो वो गॉड ऑव लक। इसी तरह क्लोथ गॉड, फूड गॉड, वॉटर गॉड, एम्यूज़मेन्ट गॉड जैसे हर तरह के गॉड्स हुआ करते थे।

गॉड बनने का तरीका भी अलग था। साफ-सुथरा, नफासत भरा और पूरी तरह एपॉलिटिकल। दक्षिण दिशा में एक खूबसूरत बादलों का पहाड़ था। स्लेटी और नीले रंग का, जिस पर सूरज की शुभ्र और पावन छाया पड़ा करती थी। इस पहाड़ की चोटी पर था पैराडाइज़ टैम्पल, जिसमें सूरज खुद निवास करता था। जो कोई भी अपनी किसी खूबी के कारण गॉड बनना चाहता था उसे यहां तक पहुंच कर, सूरज की गर्म किरणों को हाथ में लेकर कसम उठानी पड़ती थी कि आज के बाद वो केवल लोगों की खुशी के लिए काम करेगा और जो उसके पास बहुतायत में हैं, उसे ज़रूरतमंदों के साथ बांटेगा।

जिन लोगों के मन सच्चे होते थे, वो बिना किसी बोझ के हवा से भी हल्के हो जाते थे और बहुत आसानी से बादलों का पहाड़ चढ़कर पैराडाइज़ टैम्पल पर पहुंच जाते थे। और क्योंकि उनमें ख्वाहिशों की गर्मी नहीं रह जाती थी बल्कि नेकियों की शीतलता रहती थी, सूरज की ऊष्ण किरणें उन्हें जला नहीं पाती थीं। और वो कसम उठाकर, भगवान बनकर वापस लौट आते थे। लोगों के साथ रहते थे, घूमते थे और उनकी सहायता किया करते थे। वहीं जो लोग गॉड बनना तो चाहते थे लेकिन सांसारिक बंधनों से मुक्त नहीं हो पाते थे वो भारी होने के कारण या तो पहाड़ नहीं चढ़ पाते थे या फ़िर उनमें इतनी शीतलता नहीं रहती थी कि सूरज की किरणों का सामना कर सकें।

गॉड हो या सामान्य लोग सबकी औसत उम्र 400 बरस हुआ करती थी। तब लोग जन्म और मृत्यु के बंधनों से भी मुक्त थे। कोई मरता नहीं था और ना ही कोई जन्म लेता था। बस लोग अपनी उम्र पूरी करने पर स्वर्ग में भेज दिए जाते थे जो वहीं पैराडाइज़ टैम्पल वाले पहाड़ के पश्चिम में उसकी तलहटी में बसा था। यह खूबसूरत लाल, पीले,नीले, सफेद रंगों वाले फूलों की घाटी थी, जिसमें शीतल झरने बहते थे। मंद पवन बहा करती थी। यहां लोगों की सुख सुविधाओं का हर सामान मौजूद था। उम्र पूरी कर लेने पर लोगों को यहां लाया जाता था। यह काम हैवन गॉड के जिम्मे था। स्वर्ग में रहने का औसत समय 100 वर्ष था। हर इंसान स्वर्ग में ही आता था क्योंकि तब पनिशमेंट की अवधारणा नहीं थी। और इसलिए नर्क भी नहीं था। लोगों को जस की तस स्वर्ग में ले आया जाता था। और सौ बरस का स्वर्ग निवास पूरा होने के बाद उन्हें एक नए रूप में वापस धरती पर भेज दिया जाता था, फ़िर से 400 वर्ष का जीवन जीने के लिए। 

शायद आपको विश्वास ना हो लेकिन उस समय लोगों के लिए स्वर्ग का प्रवास ही सबसे दुखद अनुभव होता था। क्योंकि वो सशरीर और यादों के साथ स्वर्ग लाए जाते थे। ऐसे में चूंकि उनकी यादें मिटाई नहीं जाती थी, वो अपने परिवारजनों को बहुत मिस किया करते थे। अच्छी यादें उन्हें स्वर्ग में सभी सुख सुविधाओं के बीच भी चैन से नहीं रहने देती थीं और उन्हें हर समय अपनों की यादें और उनके साथ होने की इच्छाएं सताती थी। लेकिन फ़िर भी कई हज़ार वर्षों तक यहीं प्रबंध आराम से चला। लोग ना मरे, ना पैदा हुए, गॉड्स बनते रहे, स्वर्ग आते रहे, स्वर्ग से जाते रहे और यूहीं समय बीतता रहा।

धीरे-धीरे सारे निवासी खुश हो गए। क्योंकि यहां कहीं कोई  भेदभाव नहीं था। सबकी उम्र लगभग समान थी और सबके दुख दूर करने के लिए बहुत सारे गॉड्स थे और एक समय तो ऐसा आया जब कोई निवासी दुखी नहीं रहा। उस दिन किसी के पास करने को कोई काम नहीं बचा। बहुत सारे लोग गॉड बन चुके थे तो उनके पास केवल लोगों की विशेज पूरा करने का काम था लेकिन मज़ेदार बात यह कि विश मांगने के लिए कोई इंसान दुखी नहीं बचा था। मतलब अब गॉड्स भी बेगार हो गए थे। धरती के गॉड्स दुखों की डिमांड करने लगे थे जिन्हें  वो दूर कर सकें और उधर स्वर्ग में रहने वाले लोगों ने मांग उठाई थी कि उनकी यादों को मिटाया जाए जिससे वो स्वर्ग में खुश रह सके।

यहीं वो क्षण था, यहीं वो समय था जब सूरज की आंखे खुली और उसने जाना कि सबको गॉड बनने का समान अवसर देने से और सबका दुख दूर करने का इंतज़ाम करने से दुनिया नहीं चलने वाली। ऐसे तो ज़िंदगी मोनोटॉनस हो जाती है। हमेशा खुशियां मिलने से किसी को खुशी का अहसास नहीं होता। सूरज ने अहसास किया कि इंसान की मैमोरी सलामत रहे तो वो कभी अपने खुशी के क्षण भूल नहीं पाता और स्वर्ग में भी दुखी रहता है।

उसी दिन से एक कम्पलीट इन्फ्रास्ट्रक्टरल चेंज का फैसला लिया गया। दुखों को इन्ट्रोड्यूस किया गया। सबको गॉड बनने का अवसर देने की प्रक्रिया बंद कर दी गई। भूलने की क्वालिटी लोगों में डाली गई। यहीं नहीं देवलोक, पृथ्वीलोक और पाताललोक को भी अलग कर दिया गया। उस दिन सूरज ने जाना था कि दुनिया अगर चलानी है, और अच्छे से चलानी है तो हर फीलिंग का होना ज़रूरी है। केवल सुख, किसी को सुखी नहीं रख सकता। थोड़ी पार्शियेलिटी, थोड़ा करप्शन, थोड़ा दुख, थोड़ा अत्याचार लोगों में जीने की, लड़ने की और जीतने की ललक जगाएगा और लोगों के जीने को यादगार और फोकस्ड बनाएगा।

बस उस दिन का दिन है कि ब्रह्मांड बदल गया और उस रूप का बन गया जिसमें हम आज जी रहे हैं। हांलाकि लोग इस स्थिति से भी खुश नहीं हैं और फिर से भगवान से वैसी ही व्यवस्था करने की गुज़ारिश करते हैं लेकिन अब सूरज महाराज अनुभवी हो चुके हैं और शायद अब वो फ़िर से हमें वैसे जीने का मौका ना दें।